शशि शेखर, जवानी आपकी भी जाएगी

हिंदुस्तान से प्रमोद जोशी, सुषमा वर्मा, शास्त्रीजी, प्रकाश मनु, विजय किशोर मानव हो रहे हैं विदा : ‘इस्तीफा नहीं दिया है’ जैसी बात कहते हुए भी हिंदुस्तान, दिल्ली के सीनियर रेजीडेंट एडिटर प्रमोद जोशी चले जाने की मुद्रा में आ गए हैं। एकाध-दो दिन आफिस वे आएंगे और जाएंगे लेकिन इस आने-जाने का सच यही है कि वे फाइनली जाने के लिए आएंगे-जाएंगे। दरअसल, एचटी मीडिया से हिंदुस्तान अखबार को अलग कर जो नई कंपनी हिंदुस्तान मीडिया वेंचर्स लिमिटेड (एचएमवीएल) की स्थापना की गई है, उसमें रिटायरमेंट की उम्र 60 की बजाय 58 साल रखी गई है। रिटायर होने की उम्र पहले 58 ही हुआ करती थी लेकिन केंद्र सरकार ने इसमें दो साल की वृद्धि की तो नियमतः सभी निजी-सरकारी संस्थानों ने भी अपने यहां 60 साल कर लिया। पर इस लोकतंत्र में नियम केवल नियम हुआ करते हैं, पालन करने योग्य नहीं हुआ करते। कई निजी कंपनियों में तो लोग 44 या 55 की उम्र में ही रिटायर कर दिए जाते हैं। ऐसा ही एक मुकदमा बनारस में चल रहा है।

तो, नई कंपनी एचएमवीएल की स्थापना में इसका खास ध्यान रखा गया कि रिटायर होने की उम्र 58 साल ही रखी जाए।  ऐसा इसलिए क्योंकि वहां एक बेहद जवान संपादक पहुंचे। नियम बन गया। नए नियम लागू कराने वाले भी नए उर्फ नौजवान टाइप लोग आ गए। पहले वाले पुराने लोग नियम उर्फ प्रयोग पर अमल किए जाने वाले गिनी पिग टाइप समझ लिए गए। ऐसे में प्रयोग शुरू होना ही था। प्रमोद जोशी को 58 साल के लिहाज से रिटायर होने में कई महीने बाकी हैं पर उन्हें नौजवान टाइप संपादकों ने इशारा दे दिया कि गुरु, निकल लो, शेष महीनों के पैसे ले लो, अब यहां तुम्हारी कोई जरूरत नहीं है। ऐसे विपरीत माहौल में प्रमोद जी कब तक और किससे-किससे लड़ते। उन्होंने हामी भर दी। अब यह तय हो गया है कि निकट भविष्य में वे हिंदुस्तान के हिस्से नहीं रहेंगे। कुछ दिन आएंगे-जाएंगे। अपना वजूद हिंदुस्तान में होने- न होने के बीच, गफलतों-मुखालफतों को कभी चुपके कभी साफ-साफ, कभी कनखियों से कभी साफ-साफ बोल-बोल के, बताते-दिखाते जाएंगे-आएंगे। पर यह तो तय है कि वो जाएंगे। उम्र की मार उन पर भी पड़ गई है। मृणाल पांडेय का किला जो डोला तो अभी तक उनके सभी महल, किले, राजे-रजवाड़े, प्रजा-जनता हिल-कांप रही है।

खबर और भी है। हिंदुस्तान की सीनियर मोस्ट एक और जर्नलिस्ट को उम्र की मार की जद में लाकर विदा कर दिया गया है। नाम है सुषमा वर्मा। सुषमा के पिता मुकुट बिहारी वर्मा। हिंदुस्तान साप्ताहिक के एडिटर हुआ करते थे। सन 1963 में रिटायर हुए। पिता संपादक रहे, सो बिटिया को रख लिया गया। बिटिया ने काम करके दिखाया। बनी रहीं। आगे बढ़ती रहीं। उनके पति धर्मेंद्र पाल सिंह भी एसोसिएट एडिटर हुआ करते थे। उन्हें बहुत पहले छंटनी का शिकार बना दिया गया। सुषमा बची थीं। पर अब उन्हें भी गुडबाय बोल दिया गया। एक शास्त्री जी हुआ करते थे हिंदुस्तान में। प्रूफ रीडर। जगदीश प्रसाद शर्मा शास्त्री। धोती पहनकर आते थे। बुजुर्ग थे। भारत-अमेरिका के रिश्तों पर कम, नवरात्रि पर ज्यादा बातें करते थे। उन्हें भी उम्र की आड़ में निपटा दिया गया है। कई और हैं लाइन में। डा. प्रकाश मनु। नंदन के सहायक संपादक। विजय किशोर मानव। कादंबिनी के संपादक। क्षमा शर्मा कुछ बाद में जाएंगी। नंदन की एडिटर हैं। सब एक-एक कर जाएंगे। रह जाएंगे तो सिर्फ नौजवान लोग और नौजवान संपादक।

यह वही हिंदुस्तान है जिसमें पांच साल से सेलरी नहीं बढ़ी। उन लोगों की जो कांट्रैक्ट पर सन 2005 में अक्टूबर महीने में रखे गए थे। कहा गया था कि अगले साल अप्रैल में बढ़ेगा। पर नहीं बढ़ा। सैकड़ों छुट्टियां लोगों की खत्म हो गईं। तकलीफें बढ़ गईं। पर सेलरी नहीं बढ़ी। 2007 में अप्रेजल हुआ तो सेलरी बढ़ी तो एक राइडर लगा दिया गया। कंपनी घाटे में होगी तो सेलरी घटेगी। कंपनी मुनाफे में होगी तो सेलरी बढ़ेगी। पर कंपनियां अपने हिसाब से मुनाफा घटाती बढ़ाती हैं। मिंट के चलते घाटा हुआ तो गाज हिंदुस्तान वालों पर गिरी। बढ़ी हुई सेलरी भी वापस ले ली गई। 2005 से 2010 हो गया। सेलरी जस की तस। काम और तनाव के क्षण बढ़ते रहे। उन दिनों जो अंग्रेजी में पत्रकार आए थे, वो बढ़ते चले गए। हिंदी वाले जो आए थे और चतुर-चालाक हो गए, वो भी बढ़ते रहे। पर यथास्थिति के शिकार वे ही रहे जो चुपचाप अपना काम करते रहे।

शशि शेखर एंड कंपनी आई है। नई रोशनी लाई है। पर ये भी सच है कि ये लोग अमरत्व प्राप्त नहीं हैं। इन्हें भी जाना है। जाना तो बिड़ला जी को भी था, सो वो भी चले गए, इतना बड़ा राज-पाठ बनाकर। तो शशि शेखर क्या चीज हैं। ये हिंदी समय और समाज की उस अराजकता की उपज हैं जो बाजार को माई-बाप मानकर, उसके हिसाब से अपने को ढाल-नाप कर आगे बढ़ रहे हैं। पर अपने समय का तो हीरो वही होगा ना जो कहे कि पैदा होने का मतलब गुलामी करना नहीं बल्कि जिंदगी जीना होता है और जिंदगी जीने के लिए कभी-कभार नौकरियां कर लिया करते हैं, नौकरियों के लिए जिंदगी नहीं जीते हैं। शशि शेखर ने नौकरी के चक्कर में अपनी जिंदगी और अपने परिवार का कितना कुछ खोया है, यह उनका दिल-दिमाग और आत्मा को पता होगा। पर ये सच है कि शशि शेखर के चलते जिनकी नौकरियां जा रही हैं, जिनकी नौकरियां जा चुकी हैं और जिनकी नौकरियां जाने वाली हैं, वे उन्हें कभी माफ नहीं करेंगे।

माफी के लायक कभी मृणाल पांडेय भी नहीं रहीं। अपनी कुर्सी के चक्कर में जिन-जिन निर्दोषों को उन्होंने चुपचाप और अचानक निकलवा दिया, उनकी बददुवाएं उनके साथ हैं। वे उन्हीं बददुवाओं के साएं में मरेंगी, यह तय है। पर जिस कुर्सी के चक्कर में उन्होंने ये नापाक हरकत किया, वो कुर्सी भी उनकी नहीं रही और उनको एक दिन चुपचाप और अचानक विदा होना पड़ा। उनके रखे गए उनके सिपहसालार एक-एक कर विदा हो रहे हैं, लेकिन मृणाल कुछ नहीं कर पा रही हैं। वे विरोध में बयान तक नहीं दे पा रही हैं क्योंकि वे भी बाजार और कंपनियों को सर्वोच्च सत्ता मानती रही हैं। मृणाल पांडेय के हाथों निकाले गए लोग लगभग एक बरस के बाद जहां-तहां जीवन यापन कर रहे हैं लेकिन सब के सब संतुष्ट हैं। पर सर्वाधिक कोई अगर असंतुष्ट है तो वो मृणाल पांडेय।

ये हम नहीं कह रहे, मृणाल पांडेय की आत्मा कह रही है क्योंकि उनका राज उनके जीते जी, उनकी आंखों के सामने दफन हो गया है, और लगातार हो रहा है। उनमें ताकत नहीं है कि वे अपने नष्ट होते ‘हिंदुस्तानी’ राज-पाठ को बचा सकें। वे केवल कर ये सकती थीं कि भड़ास4मीडिया जैसे पोर्टलों पर मुकदमा ठोंक सकती थीं जो उनके किए-धरे को दुनिया के सामने ला रहा था। पर भड़ास4मीडिया को न तो शशि शेखर से बैर है और न मृणाल पांडेय से। दोनों एक ही बाजार के उस्ताद है। कोई तेज, कोई खराब उस्ताद। पर हैं दोनों उस्ताद, बाजार के, धंधे के, बिजनेस के, सत्ता के, पत्रकारिता को धंधा बनाने के।

भड़ास4मीडिया को बैर है तो खुद अपने आप से, अपने समय से, अपने समाज और सत्ता से। जन्म ले लिया है, आंखें खुल चुकी हैं तो मरने तक जो सच-सा महसूस होगा, उसे बोलना-बताना फर्ज है, सो बोल रहे हैं, बोलते रहेंगे, जिसे उखाड़ना, जो करना हो, वो उखाड़ ले, सो कर ले, उसी में अपन का आनंद है क्योंकि कुमार गंधर्व की आवाज और कबीर के शब्दों में….  …नइहरवा, हमका ना भावे…. साईं की नगरी, परम अति सुंदर…. जहां कोई जाये ना आवे… चांद सूरज जहां पवन ना पानी… को संदेश पहुंचावे….. दरद यह साईं को सुनावे…. बिन सतगुरु अपनो नहीं कोई…. को यह राह बतावे…. कहत कबीर सुनो भाई साधो…. सपने में प्रीतम आवें…… आगे चले पंथ नहीं सूझे… पीछे दोष लगावें….. केहि बिधि ससुरे जाऊं मोरी सजनी….. बिरहा जोर जरावे….विषै रस नाच नचावें… नइहरवा….

आभार के साथ

नए वर्ष की शुभकामनाएं, सभी छुपे-दिखे भड़ासियों को.

यशवंत सिंह

yashwant@bhadas4media.com

09999330099

Comments on “शशि शेखर, जवानी आपकी भी जाएगी

  • Pradeep Kumar Rawat says:

    Yashwant bhai namaskar, apka lekh pada accha laga k koi to hai jo sach ke aawaj ko likhta hai. Ap ne “Shashe Shekhar Je Aap Ka Bhe Bhudapa” likha to es mai kya galat lika hai Awadesh Pandey ji ko Mirch kyo lagrahe hai. Sab ko pata hai k mranal ji ne apne samay mai kya kya gul khilaye. Ab Wahe kam Shasahe Shekhar ji kar rahey hai. Apney logo ko set karney k chakaar mai begunaha napey ja rahey hai.Ye bat Bhe Sahe hai k Yiuth ko moka dena Chaaheye. or Aaney wala samay yuwaao ka hoga lkin ye kahaa ka insaaf hai Awadesh Pandey ji k yuwao or apney logo ko Set karney k Chakkar mai apney Seniors ko Nikal kar use Aanjam dai. to Pandey ji Aap Se or Resp. Sashe Shekher ji ko Sabse pahaley Apney Ghar k Bujurgo ko Baahar ka rasta dikana hoga. Aadarneey Pandey ji kya apney jaayaj mag ko bhe uthaana Apradh hai. Sabhe News Paper k Maalikan Employees ke mehanat se apne tijore bhar rahey hai. naa k. employees maalik se pesa kama rahey hai.Patrakar agar H.T. Management se Incriment ke maag kartey hai to ye unke jaya maag hai. ye Ak paper ke bat nahe Desh k Har paper k Employees ke Bat hai. Awadesh Ji Khiseyane Bille Khamba Niaucheygee he…. Pradeep Kumar Rawat

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  • एक पत्रकार says:

    प्रणाम यशवंत सर, बहुत दिनों से सोच रहा था. कि आपसे संपर्क किया जाए, लेकिन कोई पुख्ता वजह समझ नहीं आ रही थी. लेकिन शशिशेखर, जबानी तो आपकी भी जाएगी,,, शीर्षक से भड़ासनुमा लेख पढ़कर रहा नहीं गया, लगा की आप तो अपने ही वाले हैं, कल तक चाहता था कि हिन्दुस्तान अखबार में काम करना है, शायद वहां की पत्रकारिता में अभी सब कुछ ठीक – ठीक चल रहा रहा है, लेकिन आपका लेख पढ़कर लगा कि महेंन्द्र बाबू बड़े गफलत में थे, सभी जगह बड़ी मछलियाँ छोटी को डसने की साजिश रच रही हैं, दरअसल कसूर तो हमारा यही है कि हम पत्रकारिता से पेट पालने कि उम्मीद करते हैं, और कुछ जो पत्रकारिता करते
    – करते अधिक समझदार हो गए हैं उन्होंने पेट भरने को ही पत्रकारिता मान लिया हैं, शायद बाजार के माफिक हम गफलत में हो लेकिन हमारी बीमारी यही है कि बाजार का मतलब हमारे लिय पेट भरने तक ही है, दरअसल पत्रकारिता का मौसम अभी पूरी तरह नहीं बदला है, अच्छी पत्रकारिता अभी भी हो रही है लेकिन कई चेहरों ने बाजार की मौसमी हवाओ से बचने के लिए दूसरों कि चादरों को लपेटना शुरू कर दिया है,
    शायद पत्रकारिता कि उलझन में मैं अपना परिचय देना भूल गया हूँ लेकिन मेरा सबसे अच्छा परिचय यही होगा कि मुझे आप पत्रकारिता के बदले मौसम से व्यथित स्वाघोषित पत्रकार समझें, जिसके पास कलम तो है लेकिन कागज नहीं, खड़े होने कि कोशिश कर रहा हूँ बाजार कि हवाओ के खिलाफ, शायद कभी मौसम बदले लेकिन डर है कि इन हवाओं की तेजी का सामना मेरे जैसा दुबला पतला इंसान कैसे करेगा, यदि नाकाम साबित हुआ तो या तो आपके पास आऊंगा, या अपने कुनबे कि गंदगी साफ करने कि कोशिश करूँगा, क्योंकि पेट के लिय पत्रकारिता बदलने का साहस मुझमें नहीं हैं,
    आपका अपना
    एक व्यथित स्वाघोषित पत्रकार

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