‘द रीयल रिव्यू’ में आज बात हिंदी फिल्म ‘पायर’ की, पायर यानी चिता। इस नश्वर शरीर का अंतिम ठिकाना, और ये कहानी है घरों पर लटकते उन तालों की, जिनके पीछे छूटी ज़िंदगी दोबारा किस मोड़ पर मिलेगी, किसी को पता नहीं होता। घरों पर ताला लगना अच्छा नहीं है। खासकर उस घर पर, जिसे किसी ने अपने पूरे जीवन की कमाई लगाकर इस उम्मीद से बनाया हो कि उसमें उसका परिवार ख़ुशहाली से रहेगा।

लेखक-निर्देशक विनोद कापड़ी की फ़िल्म ‘पायर’ देखते हुए पहाड़ के घरों पर लटकते ताले मुझे अपने गांव ले गए। मेरे पापा और मेरी मां वहीं रहते रहे। पापा चले गए तो हमारे दोनों घरों पर ताले लग गए। परदे पर खाली होते घरों को देखते हुए अपने घरों की याद आती रही। किसी घर के बंद होने के पीछे कितनी ज़िंदगियां और कितने सपने होते हैं, यह उसके दरवाज़े पर लटका ताला कहां बता पाता है! माता-पिता बच्चों को पढ़ाते हैं, उन्हें बाहर नौकरी करने भेजते हैं। उनकी तरक़्क़ी में अपनी ख़ुशी देखते हैं। चिड़िया के बच्चों की तरह घोंसला छोड़कर उड़े ये बच्चे फिर लौट नहीं पाते।
फिल्म ‘पायर’ इस दूरी को महसूस करने का अवसर देती है। बुज़ुर्गों का अकेलापन सिर्फ़ उनके बच्चों की नीयत से नहीं समझा जा सकता, इसमें रोज़गार की ज़रूरत और हमारी बदलती पारिवारिक व्यवस्था भी शामिल है। फिल्म शुरू होती है तो पदम और तुलसी के गांव में कुल जमा 10 लोग बचे हैं। एक पोस्टमैन कभी-कभार आता है और लोग एक-एक कर गांव छोड़ रहे हैं। पदम के पास ले-देकर बकरियों की संपत्ति है। वह इसे भी इस उम्मीद में बांटता जाता है कि शायद इसी के लालच में कोई गांव में रुक जाए। उम्र भर जोड़ा हुआ धन आख़िरी समय में किसी मनुष्य की मौजूदगी ख़रीदने के काम आए, इससे अधिक उदास करने वाली बात क्या होगी! उसकी चिंता में एक व्यावहारिक विवशता भी है।
पदम और तुलसी की चिंता बेटे के लौटने की प्रतीक्षा से आगे जाती है। दोनों में से एक मर गया तो पीछे बचे दूसरे का क्या होगा? और, उसके भी चले जाने पर चिता को आग कौन देगा? फिल्म में उन खबरों का ज़िक्र आता है, जिनमें पहाड़ के गांवों में मरने वाले बुज़ुर्गों को कंधा देने वाला कोई नहीं मिला और उनके शव पड़े रहे। यह डर दोनों की नोकझोंक और साथ रहने की ज़रूरत के भीतर उतरता जाता है।
बेटे की चिट्ठी इस सूने संसार में उम्मीद लेकर आती है। जिस उम्र में शरीर अपनी सीमाएं बताने लगा हो, वहां किसी अपने के आने की संभावना भी जीने की वजह बन सकती है। विनोद कापड़ी की पटकथा का असर इस उम्मीद को दंपती के रोज़मर्रा के जीवन में जगह देने से बनता है। उनके झगड़े हैं, आदतें हैं, एक-दूसरे से शिकायतें हैं और साथ बिताई उम्र का अपनापन है। फिल्म बुज़ुर्गों को लगातार दुखी रहने वाले पात्र नहीं बनाती। वे हंसते हैं, चिढ़ते हैं और अपनी बात मनवाने की कोशिश भी करते हैं। और, इसी के चलते उनकी तकलीफ़ ज़्यादा सच्ची लगती है।
पदम जिस जगह रहता है, वहां न फ़ोन है, न बिजली, न सड़क और घर तक पानी पहुंचने की सुविधा भी नहीं है। पहाड़ों का भारत आज भी ऐसा ही है। गांव वालों को बुलाना हो तो पदम पहाड़ों पर प्रचलित तुतुहरी जैसे एक वाद्ययंत्र में बूढ़े फेफड़ों का दम फूंकता है। फिल्म की लोकेशन इतनी ज़्यादा ख़ूबसूरत है, लेकिन वहां का जीवन जो इस फिल्म में दिखता है, वह उस ख़ूबसूरती का असल चेहरा है।
इसी साल मार्च में बुज़ुर्गों पर लिखे अपने आलेख में मैंने उनके स्वास्थ्य के साथ सामाजिक जुड़ाव की ज़रूरत पर भी बात की थी। ‘पायर’ उस चिंता को दो चेहरों में सामने रख देती है। लंबी उम्र के साथ किसी का साथ भी चाहिए। ‘अमर उजाला’ में रहते हुए बुज़ुर्गों के लिए सोचे उस ऐप की याद भी आई, जिसमें सहायता का बटन दबाने पर घंटे भर के भीतर कोई उनके पास पहुंच सके। लेकिन पदम के यहां तो सूचना देने का साधन भी नहीं है। उसके लिए गांव में किसी का रुक जाना ही सबसे बड़ा सहारा है।
मैंने जिस स्क्रीनिंग में यह फ़िल्म देखी, वह हाउसफ़ुल था। लोग हंसे, तालियां बजाईं और बगल में बैठे युवा को रोना भी आया। फ़िल्म की सिनेमैटोग्राफ़ी इसकी जान है। मानस भट्टाचार्य का ठहरा हुआ कैमरा गाय, बकरियों, बिल्लियों और कौए के बीच बुज़ुर्ग दंपती की झुर्रियों में झांकता है। इन चेहरों और इनके आसपास के जीवन को देखने के लिए वह दर्शक को समय देता है। धीरे-धीरे हम उनकी दिनचर्या की गति पकड़ लेते हैं और उसी में मनोरंजन भी मिलने लगता है। हर दृश्य में किसी बड़ी घटना की ज़रूरत नहीं रह जाती।
पदम सिंह कापड़ी और हीरा देवी की मौजूदगी फ़िल्म का सबसे मज़बूत आधार है। यहां किसी नामी कलाकार का न होना बहुत काम आता है। सितारे अपने साथ अपनी छवि और पुराने किरदारों की यादें भी लेकर आते हैं। दर्शक के लिए उसे भूलकर केवल नया पात्र देखना कभी-कभी मुश्किल हो जाता है। इन दोनों को देखते हुए वह बाधा नहीं आती। कठिन पहाड़ी परिवेश में उनकी सहजता, बोलने और प्रतिक्रिया देने का ढंग पात्रों पर भरोसा बनाता है। पहली बार अभिनय कर रहे कलाकारों के साथ यह हासिल करना निर्देशक विनोद कापड़ी की तैयारी और धैर्य का भी प्रमाण है।
बेस्ट डायरेक्टर का नेशनल फिल्म अवार्ड जीत चुके विनोद कापड़ी दोनों के रिश्ते में प्रेम दिखाने के लिए छोटे व्यवहारों पर भरोसा करते हैं। लंबा साथ निभा चुके पति-पत्नी हर समय अपने लगाव की घोषणा नहीं करते। उनकी शिकायतों में भी एक-दूसरे की आदतों की पहचान होती है। ‘पायर’ इस पहचान को पकड़ती है। दोनों को देखते हुए यह समझ में आता है कि किसी एक के जाने का डर इतना गहरा क्यों है? उसके साथ वह व्यक्ति भी चला जाएगा, जो दूसरे की ज़िंदगी को सबसे अधिक जानता है..!
फिल्म की गति मंथर है, लेकिन ये चूल्हे पर पकती दाल जैसी ख़ुशबू साथ लिए है। फिल्म का संपादन कमाल है। पैट्रिशिया रोमल और शुभजीत दृश्यों को ठहरने की जगह देते हैं और कथा का भाव भी बनाए रखते हैं। माइकल डैना और अमृता वाज़ का पार्श्वसंगीत बेहद प्रभावी है। कैमरे, संपादन और संगीत का मेल दर्शक को इस जीवन के साथ कुछ समय बिताने देता है। फिल्म का सामाजिक प्रश्न इसी अनुभव से निकलता है, इसलिए उसे समझाने के लिए अलग से भाषण देने की ज़रूरत नहीं पड़ती।
विनोद कापड़ी की बड़ी सफलता यही है कि पदम और तुलसी किसी समस्या के उदाहरण बनकर नहीं रह जाते। वे अपने स्वभाव, ज़िद और रिश्ते के साथ याद रहते हैं। फिल्म ‘पायर’ देखने के बाद मुझे घरों पर लटकते ताले देर तक याद आते रहे। कोई माता-पिता अपने बच्चों की तरक़्क़ी नहीं रोकना चाहता। किसी बच्चे के लिए हर ज़िम्मेदारी छोड़कर गांव लौट आना भी आसान नहीं है। लेकिन इन दोनों बातों के बीच अकेले पड़ गए बुज़ुर्ग की ज़िंदगी चलती रहनी चाहिए। उसके पास इलाज तक पहुंचने का रास्ता हो, संकट में बुलाने के लिए कोई हो और उसके जाने पर कंधा देने वाले लोग हों। पदम जैसे लोगों की की बची हुई बकरियां कितने दिन किसी पड़ोसी को रोक पाएंगी?
फिल्म समाप्त होती है तो दिमाग के किसी कोने में एक बैचेनी बची रह जाती है। चिड़िया के बच्चों की तरह घोंसला छोड़कर उड़े बच्चे गांव क्यों नहीं लौट पाते? माता-पिता तक लौटने की इच्छा बनी भी रहे तो लौटना टलता रहता है। ‘पायर’ इस दूरी को महसूस करने का अवसर देती है। बुज़ुर्गों का अकेलापन समझने के लिए ये फिल्म देखना बहुत ज़रूरी है। अगर आपके माता-पिता भी किसी दूसरे शहर या गांव में अकेले हैं, तो ये फ़िल्म देखने के बाद आपको उनसे बात करने की, उन्हें चिट्ठी लिखने की या अगली छुट्टियों में उनके पास जाने की इच्छा ज़रूर हो जाएगी…मस्ट वाच फ़िल्म है, जै जै!
पंकज शुक्ल, वरिष्ठ फिल्म पत्रकार


