पता नहीं इन्हें शर्म आई या नहीं

दैनिक जागरण, दैनिक भास्कर और दैनिक हिंदुस्तान। संजय गुप्ता, सुधीर अग्रवाल और शोभना भरतिया। तीन बड़े अखबार, तीन बड़े मीडिया ब्रांड और इनके तीन मालिक। तीनों ऐसे मालिक जिन्हें अपने-अपने ब्रांडों के प्रतीक के रूप में जाना जाता है। तीनों में काबिलियत है। तीनों सिंसीयर हैं। तीनों डायनमिक हैं। तीनों देश व समाज के हित की चिंता करते हुए दिखते हैं। तीनों कभी न कभी किसी न किसी रूप में ताकतवर व्यक्ति, प्रतिष्ठित आदमी, सूझबूझ वाले उद्यमी, सोच-समझ वाले युवा आदि के रूप में अखबारों-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। तीनों का व्यक्तित्व इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि तीनों के जीवन का एक नैतिक पक्ष है, जिसे उनके अधीन काम करने वाले लोग उद्धृत करते हैं, फालो करते हैं, बताते रहते हैं। पर इन तीनों ब्रांडों के तीनों मालिकों के दामन पर धब्बा है। बहुत गहरा धब्बा है। पेड न्यूज का धब्बा। पेड न्यूज को भ्रष्टाचार का दूसरा नाम बताया गया है। इन तीनों मालिकों ने कभी न कभी भ्रष्टाचार को देश के विकास में बाधक जरूर बताया है। पर इन्हीं मालिकों ने बदले हुए समय में भ्रष्टाचार को अंगीकार किया।

इन्हीं मालिकों ने पेड न्यूज के चलन को शिरोधार्य किया। दरअसल कहने को छोटा सा शब्द है पेड न्यूज पर इस चलन ने किस कदर हमारे समाज के विश्वास, नैतिकता और सच्चाई की परंपरा पर प्रहार किया है, वह उनसे पूछिए जो भारतीयता को जीते-सोचते-समझते हैं। संसद में पेड न्यूज पर कल बात हुई। पूरी गंभीरता से हर दल के लोगों ने इसे बहुत खतरनाक कहा। यही कहते रहे प्रभाष जी। पर तब इन्हीं मालिकों के टुकड़ों पर पलने वाले लोगों ने प्रभाष जी को ही कटघरे में खड़े करने की कोशिश की और पेड न्यूज को न जाने किन-किन कुतर्कों से सही ठहराने की कोशिश की थी। अब जब राजनीति के समझदार लोग इस मुद्दे पर बात कर रहे हैं, लगाम लगाने की रणनीति बना रहे हैं तो पूरी मीडिया जगत का नेतृत्व दम साधे सुन रहा है। कभी यही मीडिया वाले नेताओं को सही रास्ते पर लाने के लिए चिंतित रहते थे पर आज स्थिति पलट गई है। मीडिया वाले ज्यादा करप्ट हो गए और नेता उन्हें सुधारने की रणनीति बनाने लगे हैं। जिन मीडिया वालों के कंधे पर देश, समाज व जनता के दुख-सुख को बिना डरे उठाने-बताने का जिम्मा था, उन मीडिया वालों ने भ्रष्ट नेताओं से पैसे लेकर उनके कार्यकर्ता की माफिक जिंदाबाद और जीतेगा भाई जीतेगा जैसी खबरें छापने लगे थे। सिर्फ पैसे के लिए। तो मान लें कि हमारे दौर के बड़े मीडिया हाउसों के प्रतिभाशाली मालिकों की नैतिकता तेल लेने जा चुकी है। उन्हें पैसे के अलावा कुछ नहीं सूझता है। अगर ऐसा नहीं है तो तीनों ही अखबारों के मालिकों को अपने-अपने अखबारों में अपने पाठकों से पेड न्यूज के लिए माफी मांगनी चाहिए और आगे से ऐसा न करने का आश्वासन भी देना चाहिए।

नैतिक जवाबदेही है इन अखबारों की अपने पाठकों के प्रति। इस जवाबदेही और विश्वास की हत्या की है संजय गुप्ता, सुधीर अग्रवाल और शोभना भरतिया ने। इन दिग्गजों ने अपने खराब आचरण से मीडिया में गलत ट्रेंड की शुरुआत की है। दिग्गज होने के नाते, बड़े मीडिया हाउस के मालिक होने के नाते इन पर दोहरी जिम्मेदारी होती है। एक तो ये ऐसा आचरण करें जिससे छोटे मीडिया हाउस व उसके मालिक उस आचरण को आदर्श मानकर उसे फालो करने की कोशिश कर सकें। दूसरे, वे ऐसे काम करें जिससे पत्रकारिता की गौरवशाली परंपरा को समृद्ध करने में इनका नाम गर्व व सम्मान के साथ लिया जा सके। पर माफ करिएगा, पेड न्यूज के धंधे को मंजूरी देकर और अपने अखबारों में इसे बड़े पैमाने पर लागू करके इन मालिकों ने गलत आदर्श तो पेश किया ही, पत्रकारिता की गौरवशाली परंपरा पर कालिख पोत दी है।

असली दोषी तो ये मालिक ही हैं। इनके यहां काम करने वाले संपादक तो इनके हुक्म के गुलाम हैं। पिछले चुनाव में हरिवंश जी ने प्रभात खबर में और अतुल माहेश्वरी व शशि शेखर ने अमर उजाला में साफ-साफ पेड न्यूज का धंधा न करने का ऐलान किया, इसके लिए ये लोग बधाई के पात्र हैं पर अब शशि शेखर हिंदुस्तान के हिस्से हैं। ऐसे में देखना है कि वे पेड न्यूज को लेकर अपने स्टैंड से शोभना भरतिया को कितना कनवींस कर पाते हैं। मृणाल पांडेय तब संपादक हुआ करती थीं जब लोकसभा चुनाव चल रहे थे। हिंदुस्तान में पैसे ले-लेकर जिस तरीके से पहले पन्ने पर पेड न्यूज पब्लिश की गईं, उसका खुलासा उन दिनों में भड़ास4मीडिया ने किया था। सबसे निर्लज्जता व सुसंगठित तरीके से पेड न्यूज का  धंधा किया दैनिक जागरण ने। इस अखबार के संपादक व रिपोर्टर टारगेट पूरा करने में जुटे रहे। दैनिक भास्कर ने छिटपुट डील पर कम, सेंट्रलाइज डील पर ज्यादा ध्यान दिया। पंजाब व हरियाणा के चुनाव इसके गवाह हैं।

वक्त अब भी है। देर आए, दुरुस्त आए की परंपरा अपने यहां रही है। गल्ती हो जाने के बाद उसे स्वीकार लेने से दो तिहाई पाप माफ मान लिया जाता है। तो इन मालिकों को वाकई अपने पाठकों से और देश की जनता से पेड न्यूज के मुद्दे पर क्षमा याचना करनी चाहिए। ध्यान रखिए, गल्ती मानने से कद छोटा नहीं बल्कि बड़ा होता है। गल्ती वही मानता है जिसके अंदर नैतिक साहस होता है। गल्ती वही मानता है जो सोच-समझ रखता है। हम अपने देश के तीन बड़े हिंदी अखबारों के मालिकों से उम्मीद कर रहे हैं कि वे पेड न्यूज के मसले पर पिछले कई महीनों से चल रही बहस में शिरकत करेंगे और अपना पक्ष रखेंगे, अपनी गल्ती स्वीकारेंगे।

-यशवंत, भड़ास4मीडिया

yashwant@bhadas4media.com


कल संसद में पेड न्यूज पर जो कुछ बातें हुईं, वो इस तरह हैं-

सूचना एवं प्रसारण मंत्री अम्बिका सोनी ने पैसे लेकर खबरें “पेड न्यूज” प्रकाशित करने की समस्या पर रोक लगाने की सरकार की वचनबद्धता जताते हुए कहा है कि इस मुद्दे पर भारतीय प्रेस परिषद की उपसमिति की रिपोर्ट आने के बाद उचित रणनीति बनाई जाएगी। उन्होंने कहा कि इसी महीने प्रेस परिषद की रिपोर्ट आ जाएगी, फिर उसे संसद में चर्चा के लिए रखा जाएगा। अम्बिका शुक्रवार को राज्यसभा में इस मुद्दे पर माकपा के सीताराम येचुरी तथा भाजपा के कलराज मिश्र सहित चार सदस्यों के ध्यानाकर्षण प्रस्ताव पर चर्चा का जवाब दे रही थीं। उन्होंने मीडिया के कॉरपोरेट स्वामित्व एवं स्वरूप पर सदस्यों की चिन्ता से सहमति जताई। इससे पहले सदन ने दलगत भावनाओं से परे एक स्वर में इस प्रवृत्ति को मीडिया ही नहीं, लोकतंत्र के भविष्य के लिए गम्भीर खतरा बताया और इससे निजात के लिए समाचार माध्यमों एवं कॉरपोरेट घरानों के सम्बन्ध में सार्थक हस्तक्षेप करने की जरूरत बताई।

राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष अरुण जेटली ने कहा कि भारतीय चुनावों में धन के उपयोग की बुराई में विगत कुछ वर्षों में भारी वृद्धि हुई है। चुनावों में अत्यधिक व्यय से सार्वजनिक जीवन में भ्रष्टाचार पनपता है। प्रतिफल के बदले राजनीतिक पक्षपात किया जाता है। इस तरह के लेन-देन में खासी वृद्धि हुई है। राज्यसभा में इस संबंध में मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) के सीताराम येचुरी के ध्यानाकर्षण प्रस्ताव पर हुई बहस में भाग लेते हुए जेटली ने कहा कि हाल में हुए चुनावों में देखने में आया है कि प्रत्याशियों द्वारा किए गए व्यय का भारी हिस्सा दत्तमूल्य समाचारों (पेड न्यूज) हेतु भुगतान के लिए व्यय हुआ है। दत्तमूल्य समाचार मीडिया में भ्रष्टाचार का समानार्थी होता है। जो समाचार-पत्र और चैनल दत्तमूल्य समाचार देते हैं, वे इस प्रिमाइज पर काम करते हैं कि चुनाव के दौरान प्रत्याशियों को भुगतान करना चाहिए। यदि मीडिया संगठनों को यथेष्ठ रूप में भुगतान कर दिया जाता है तो वे समाचारों को तोड़-मरोड़ देंगे और प्रतिपक्षी उम्मीदवार के समाचार का विलोपन कर देंगे। भुगतान न किए जाने पर प्रत्याशी के चुनाव अभियान के समाचार नहीं दिए जाएंगे।

मीडिया संगठनों के वाणिज्यिक प्रतिनिधियों के लिए अब यह आम बात हो गई है कि वे न्यूज पैकेजिंग के लिए उम्मीदवारों तथा राजनीतिक दलों से संपर्क साधते हैं। हाल के चुनावों में समाचार संगठनों के अलावा कुछ इलेक्ट्रॉनिक चैनलों ने दत्त समाचारों की वैकल्पिक विधि वैध रूप में अपनाई। आम चुनावों के दौरान राष्ट्रीय समाचार चैनलों ने अपनी विज्ञापन दरों में कई गुना वृद्धि करने का निर्णय किया था। वाणिज्यिक विज्ञापनों और चुनावी विज्ञापनों की दरों के बीच भारी अंतर था। इसको इलेक्शन प्रीमियम के रूप में औचित्यपूर्ण ठहराया गया था। चैनलों के प्रतिनिधियों ने राजनीतिक दलों को सूचित किया था कि इस अतिरिक्त प्रभार से राजनीतिक दलों की विज्ञापनों के साथ-साथ रैलियों और प्रेस सम्मेलनों के आंखों-देखा कवरेज द्वारा प्रतिपूत हो जाएगी।

उन्होंने कहा कि दत्तमूल्य समाचार मीडिया के लिए रिश्वत है। इसके कारण स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों की प्रक्रिया निषेधित होती है। इसके द्वारा उस व्यक्ति के पक्ष में, जो भुगतान कर सकता है, राजनीतिक माहौल को तोड़ा-मरोड़ा जाता है। इसके कारण चुनावों में निर्वाचन आयोग द्वारा निर्धारित व्यय सीमा का उल्लंघन होता है। दत्तमूल्य समाचारों के प्रतिफल के रूप में काला धन आयकर अधिनियम के प्रावधानों का उल्लंघन करता है। उन्होंने कहा कि ऐसे किसी भी पराजित अथवा विजयी उम्मीदवार को, जो चुनाव अभियान को साधित करने के लिए दत्तमूल्य समाचारों का सहारा लेता है, छह वर्ष की अवधि के लिए अयोग्य घोषित किया जाना चाहिए।

मीडिया में धन लेकर खबर देने की बढ़ती घटनाओं पर शुक्रवार को राज्यसभा में विभिन्न राजनीतिक दलों के सदस्यों ने गहरी चिंता जताते हुए इस प्रवृत्ति को अभिव्यक्ति की आजादी का दुरुपयोग और संसदीय लोकतंत्र के भविष्य के लिए खतरनाक प्रवृत्ति करार दिया। सूचना एवं प्रसारण मंत्री अंबिका सोनी ने कहा कि इस मुद्दे पर विचार के लिए भारतीय प्रेस परिषद द्वारा गठित उप समिति की रिपोर्ट को संसद में पेश किया जाएगा।

समाचारों के नाम पर धन देकर प्रसारित कराए जा रहे खबरों में संलिप्त प्रिंट एवं इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की भूमिका से उत्पन्न स्थिति के बारे में ध्यानाकर्षण प्रस्ताव पर हुई चर्चा का जवाब देते हुए अंबिका ने स्पष्ट किया कि धन लेकर खबर देने के मामलों को सरकार अभिव्यक्ति की आजादी के अधिकार का दुरुपयोग मानती है। उन्होंने कहा कि ऐसी घटनाओं को आमतौर‘पेड न्यूज सिंड्राम’कहा जाता है। उन्होंने कहा कि यद्यपि ऐसी घटनाएँ नई नहीं हैं लेकिन हाल में ऐसी घटनाओं पर लोगों का अधिक ध्यान गया है और वे देश में चर्चा का विषय बनी हुई हैं। उन्होंने कहा कि भारतीय संपादक गिल्ड सहित तमाम पत्रकार संगठनों ने इस प्रवृत्ति की निंदा की है।

Comments on “पता नहीं इन्हें शर्म आई या नहीं

  • sanjay sharma says:

    BHAI
    AAP NE BADA NAJUK MUDDA UTHA DIYA HAI. HAKIKAT BHI YAHI HAI. JAB PAISE LE KAR KHABRE CHAPEGE TO KAHE KI PATRAKARITA OR KAHE KA DAR. ISI KARAN SE SARE NETA DUTKARNE LAGE HAI. PRABHASH JOSHI JI NE JO RAASTA CHUNA THA BO HUM SABKE SWABHIMAN SE JUDA THA.

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  • Narender Vats says:

    विज्ञापन ·े दम पर छुपा देते हैं बड़ी ·रतूत
    यशवंत भाई सहाब सच्चाई लिखने ·े लिए बधाई। आप ने पेड नयूज ·ी बात लिखी है। मामला सिर्फ यहीं त· सीमित नहीं है। अगर ·ोई आम इंसान अपराध ·रता है, तो इन अखबारों ·े पहले पन्ने पर सुर्खियां बन जाती हैं। ·िसी बड़े गु्रप या ·ंपनी में इस तरह ·ा ·ोई अपराध होता है, तो सबसे पहले अखबार ·े विज्ञापन संबंधी हितों ·ो ध्यान में रखा जाता है। अगर ·ंपनी या गु्रप अखबार ·ो लगातार विज्ञापन ·ा अच्छा पै·ेज देता है, तो उस·े खिलाफ या तो खबर छापी ही नहीं जाती और छापी जाती है, तो भी बिना ·ंपनी ·े नाम, सिंगल ·ॉलम और अंदर ·े पेज पर। खबर ·ो ·ोने में ऐसे पट·ा जाता है, ता·ि उस पर पाठ·ों ·ी नजर नहीं नहीं जाए। मैंने ·ई बार देखा है ·ि अखबार ·े पहले पन्ने पर सेट ·ी हुई खबर ·ो मालि·ों ·े आदेश पर ऐन मौ·े पर हटवा दिया गया। ऐसे में निष्पक्ष पत्र·ारिता ·ी बात सोचना भी बेमानी सा लगता है।

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  • Rajeev Ranjan says:

    वेश्यावृत्ति जैसी यह मालिकों की पत्रकारिता
    – निरंजन परिहार –
    मीडिया में मूल्यों की मौत हो गई है। या आप यह भी कह सकते हैं कि पत्रकारिता का पतन हो गया है। बरसों पहले अपन कहीं – कहीं कुछ लोगों को कभी – कभार यह कहते सुना करते थे कि सेवा के इस काम काज में पीत पत्रकारिता करने वाले लोग भी आ गए हैं। लेकिन अब तो ऐसा लगने लगा है कि पूरी पत्रकारिता को ही पलीता लग गया है। हाल ही में एक गोष्ठी में देश के जाने माने पत्रकार और बहुत ही खरी – खरी लिखने – कहने वाले हमारे भाई आलोक तोमर ने एकदम जब यह कहा कि नीच मालिकों की वजह से आज बेचारे पत्रकार कठघरे में खड़े हैं। तो लगा कि कोई तो है जिसमें सच बोलने की ताकत है। पता नहीं यह ताकत बाकी लोगों में कितनी बची है। पर, अपने भीतर तो है, यह अहसास कराने के लिए ही अपन आपके सामने आए हैं।
    अपना तो है ही, आप भी जरूर यही मानते होंगे कि मीडिया अब मिशन नहीं रहा। मालिकों ने इसे माल कमाने की मशीन मान लिया है। यही वजह है कि राजनीति की तरह मीडिया भी अब दलालों, दोगलों, और अहसान फरामोश लोगों की मंडी बन गया है। इसीलिए, कई अखबारों और चैनलों के मालिको को आज नैतिकता का भाषण देते देखा जा सकता है। जो लोग खबरें बेचने के लिए नेताओं के सामने खुद झोली फैलाकर गली – गली पैकेज की भीख मांगते रहे, उनके मुंह से तो नैतिकता का नाम भी नहीं निकलना चाहिए। लेकिन दरअसल, पत्रकारिता को धंधा मान कर चैनलों और अखबारों के मालिक बन बैठे कुछ लोग अपने मातहत काम कर रहे लोगों को कमाई का जरिया मानकर, उसकी कोशिशों के जरिए अपनी औकात से भी कई गुना बड़े सपने पालने लगे हैं। पत्रकारिता को सेवा का पेशा मानकर इसमें आए पत्रकारों की मजबूरी को भुनाते हुए ये मालिक उनसे वसूली करवा रहे हैं। और फिर भी उसका दोषी वे खुद को नहीं, बल्कि पज्ञकारों को बताते हैं। अब, आप ही बताइए, इसका क्या किया जाए। अपन जानते हैं कि माहौल लगातार खराब होता जा रहा है। पत्रकारों को संभलने की जरूरत है। दरअसल, अखबारों के चिरकुट किस्म के वसूली करवाने वाले मालिक अपने यहां नौकरी करने वाले पत्रकारों को बंधुआ मजदूर मान बैठे हैं। आज पत्रकारों की घर चलाने की मजबूरी की वजह से ये मालिक लोग यह मान बैठे हैं कि पत्रकारिता करने वाले लोग कम हैं, और नौकरी करने वाले ज्यादा। सो, उनसे जो करवाया जाएगा, वह वे झक मारकर करेंगे। क्योंकि संस्थान से विदाई का हथियार दिखाकर मालिक उन्हें डराते रहते हैं। यह सब, उसी का रोना है, भाई साहब। अखबारों के मालिकों ने पत्रकारिता के नाम पर खबरें बेचने को ही अब धंधा बना लिया है। अपन तो इसे वेश्यावृत्ति मानते हैं। खबरों की वेश्यावृत्ति जैसी यह ऐसे मालिकों की वैसी पत्रकारिता उन्ही को मुबारक।
    दरअसल, मीडिया में मालिकों ने अपने आप को भगवान मान लिया है। चैनलों और अखबारों के मालिकों को लगने लगा है कि वे किसी को भी हरा या जितवा सकते हैं। लेकिन ऐसा कतई नहीं है। मीडिया किसी को भी हरा या जिता नहीं सकता। नरेंद्र मोदी की सरकार को हराने के लिए गुजरात में पूरा मीडिया जुट गया था। क्या हुआ ? मीडिया हार गया, मोदी जीत गए। अपन कोई मोदी के समर्थक नहीं हैं, पर जो सच है, वह सच है। मीडिया मैनेज होकर लिखता और दिखाता है, अब यह लोग जान गए हैं। गुजरात में दंगों को लेकर मीडिया ने मोदी को बदनाम करने की जितनी कोशिश की, मोदी उतने ही मजबूत होकर सामने आए। यह सही है कि नहीं ? पता नहीं, मीडिया को यह भ्रम क्यों हो गया है कि वह जो कह देगा, लोग उसी को सच मानकर किसी को भी चुनाव में जिता या हरा देंगे।
    अपन प्रभाष जोशी की परंपरा के वाहक हैं। अपना मानना है कि यह जो बाजारीकरण की आड़ लेकर मालिकों ने पत्रकारों को रंडी बाजार की तरह सरे राह बिकने को खड़ा कर दिया है। वह ठीक नहीं है। लेकिन ये हालात अब परंपरा में भी तब्दील हो गए हैं। इसीलिए किसी को भी, कहीं भी इज्जत नहीं मिल रही है। आज हम सबकी इज्जत चौराहे पर नीलाम हो रही है। अखबार और न्यूज चैनलों के मालिकों की कहीं से भी कमाई निकालने की कोशिश में खबरों को बेचने का धंधा शुरू कर देने की वजह से आज पत्रकार और पत्रकारिता दोनों ही बदनाम हो रहे हैं। हम सबने पिछले कुछ चुनावों में हर बार देखा है कि चिरकुट किस्म के लोभी मालिकों ने अपने फायदे की कोशिश में खबरों को बेचने के लिए रंडियों की तरह सरे बाजार बिकने के लिए अपने पत्रकारों को खुले आम खड़ा होने को मजबूर कर दिया। और ऐसे मालिक देश भर में घूम – घूम कर अब खुद को इज्जतदार साबित करने की कोशिश करते देखे जा रहे हैं। यह पत्रकारिता का पतन और मीडिया में मूल्यों की मौत नहीं तो और क्या है ?
    (लेखक निरंजन परिहार देश के जाने माने पत्रकार हैं. उनसे niranjanparihar@hjotmail.com पर या 09821226894 पर संपर्क किया जा सकता है)

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  • सबसे पुराना भडासिया says:

    यशवन्त जी, अच्छे लेख के लिये बधाई, लेकिन एक सवाल जो पेड न्यूज के मामले मे हमेशा छूट जाता है. वो ये कि बडे मीडिया हाउसो पर एकबारगी लगाम लग भी गयी तो क्या उससे हमारी कस्बाई पत्रकारी मानसिकता बदल जायेगी? मेरा अपना विचार ये है कि जब न्यूज के पेड होने पर बहस या आन्दोलन चल ही रहा है तो उसे समग्रता से चलाय जाय, फ़िर चाहे चुनावी पेड न्यूज का मामला हो या अखबारी दुनिया की रोज़मर्रा की जिन्दगी मे किसी और खबर को लेकर पेमेन्ट की बात हो…

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  • kamta prasad says:

    यशवंत भाई एक बात को लेकर तमाम लोग भ्रम में रहते हैं ऐसा मेरे को लगता है। आजादी के आंदोलन के दौरान या उसके शीघ्र बाद के दशकों के बनिये भी आज के बनियों जितने ही ‘महान’ था। चूंकि उस दौर में उनके और जनता के हित मिलते थे इसलिए विद्वानों की तथाकथित इज्ज त थी और अखबार में आदर्श था पर आज परिद़ृश्य बदल चुका है इसलिए सब कुछ नग्नर-निर्मर तरीके से चल रहा है, यह कुछ-कुछ उसी तरह से है जैसे कोठों पर गजल नहीं सुनाई जाती सिर्फ नितांत कुदरती कारोबार गैर-कुदरती तरीके से सम्प न्नइ होता है इसलिए छाती पीटना बंद करें। आलोचनात्मुक विवेक के साथ सुधारवाद की ऐसी-तैसी करते हुए जनता के मीडिया को शक्लन देने की मशक्क त हो।
    एनजीओवाद-सुधारवाद मुर्दाबाद।

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  • Pradeep Kumar says:

    Yashwant Je, Wakai mai Aap badhaaye k Patra hai jo Etney badey mudeey ko Lekar aap ney Himaat dikhaaye hai. lekin Yashwant ji Ye log to vaishyaao se Bhe gai beetey hai.. wo to khulam khulaa Apna badan bechte hai ye Media Maafiya to desh ke Janta ko Khuley Aam Dhoka de rahey hai..inka koi Dharm Nahe..! inko Sirf Paisa Chaaheye..kise bhe Taraha.. inlogo ney to Patrikaarita ka he Patan Kar Diya Ha. Balki ye kahai k Patrikarita ka Cheer Haran kar diya hai To Kahana Galat na hoga… Desh ke Patrikaarit k Liye Chintit Ak Coota Sa Kalam Chaalak..!

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  • Well….why wud they be ashamed. I havn’t seen a businessman feeling ashamed of profit making. Paid news is just another way of profit making.

    Lets see wut the sub-committee comes up with. Has already taken so long. I wonder what if they had constituted a full blown committee!!!

    Yashwant ji dunn single out Amar Ujala. It is not that paid news is a very recent phenomenon. It was already there. Just that it has been taken note of this general election. I remember during 2007 UP assembly elections there were whispers that some candidates have paid two leading news papers of my city, the city of jhumka, to cover their campaign exclusively. And it was clear from reporting. Some candidates were daily in news. One is now a congress MP; he lost the assembly election in 2007.

    Also, this menace of paid news works at grassroot level, in every news paper. Just plant a simple news item in the name of the doctor, and rest assured. Now the journo and his friends and relatives can get free consultancy. If not satisfied give another doctor a chance. Writing abot city’s business… put the name of businessman in some news in a way that suits his business and……u can boast of sporting a branded jacket worth Rs 10,000.

    This is not all list is endless, even in academics….. give the byte of some professor in some news-item, mould the news the way it suits him/her and get help in admissions even in question papers for exams, one of my friend has pocketed many degrees this way. Read Dainik jagran jhumka city edition. The reporter covering education beat seems to be idolizing the VC MJP Rohilkhand Univ. Every two or three days u will see that French bearded VC’s face in some news or other. The journo is so fond of him that he sincerely reports every word coming out of that VC’s mouth. Even philosophical lectures of VC that have nothing to do with general public are there in DJ as four or five column reports. The question is WHY??

    BUT it is even more profitable to with-hold news then to transmitting it to public.

    All this to say, payment for news is not always in cash, it is in kind also and journos of all kind want and enjoy it as their birth right. NO wonder people have coined new words PRESSTITUTE and PRESSTITUTION. I am afraid it can’t be stopped by making laws. Instead. New modes of transmitting news to public should be tried. Bhadas is a welcome try.

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  • Gaurav bevaak,jaipur. says:

    paid news ki baat jhabarmal ismriti vkhyan 2010 mein bhi samane aayi thi,mp mla chunavo mein paid news ki baat khub samane aayi,ab ye baat sansad ke patal par pahunch gayi achhi baat hai,achhi baat tabhi hogi jab isamein karyavahi hogi,lagam lagaya jayega un par jo partakarita ke name par kala dhandha karatein hain, samay rehate paid news ko roka nahi gaya to vo din dur nahi jab patrakaron ke bhi sting hone lagenge aur patrakarita ki sakh girati chali jayegi.

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  • vijay, Chandigarh says:

    बिलकुल सही लिखा है आपने यशवंत भाई,
    अख़बार अब उस वेश्या की तरह हैं जिसे जो बड़ी रकम दिखाए वो उसके साथ कुछ भी करने को तैयार है. ऐसे वेश्या बनाया है इसके नए स्मार्ट मालिको ने. इन मालिको को जब दम हिलाने वाले वेतनभोगी संपादक मिले तो उनसे सही सलाह की उम्मीद करना ही व्यर्थ था. इस दौर मे भी कुछ संपादक और मालिक एसे दिखे जिन्हें खरीदा न जा सका. कितनी शर्म की बात है की भ्रस्ट कहे जाने वाले नेता अब इनको नैतिकता पढ़ा रहे हैं. वाह खबर बेचने वालो, तुम पर लज्जा आती है.

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  • Prashant kr Singh says:

    yaswant sir apne is mudde ko utha kar is desh ki bebas janta par bahoot bada ahsan kiya hai, jo bechari khabro par bharosa kar ke apna sab kuchh loota deti hai.

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  • yashwant bhai ye log to ambika soni ji ki bhi khabar ko paid news bana denge abhi election to aane do kya pujab kesari kya jagran kya rashtrya sahara sabhi paid news ka jhanda pakar kar chlenge in bade newspaper mafia ke aage sabhi bone ya chote he ye mafia to ambika ji ki ministary hatane ka dum bharte he baki soni ji ne paid news par sahi kaha -rudra pardeep

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