तो इसलिए गाज गिरी राजेंद्र तिवारी पर!

कभी गंभीर-गरिष्ठ साहित्यकारों के हवाले थी पत्रकारिता तो अब सड़क छाप सनसनियों ने थाम ली है बागडोर : झारखंड के स्टेट हेड और वरिष्ठ स्थानीय संपादक पद से राजेंद्र तिवारी को अचानक हटाकर चंडीगढ़ भेजे जाने के कई दिनों बाद अब अंदर की कहानी सामने आने लगी है. हिंदी प्रिंट मीडिया के लोग राजेंद्र पर गाज गिराए जाने के घटनाक्रम से चकित हुए. अचानक हुए इस फैसले के बाद कई कयास लगाए गए. पर कोई साफतौर पर नहीं बता पा रहा था कि आखिर मामला क्या है. लेकिन कुछ समय बीतने के बाद अब बातें छन-छन कर बाहर आ रही हैं.

पता चल रहा है कि लड़ाई शशि शेखर बनाम राजेंद्र तिवारी की हो गई थी और ऐसे में राजेंद्र तिवारी को तबादला झेलना पड़ा. हिंदुस्तान के उच्च पदस्थ सूत्र बताते हैं कि दरअसल हुआ ये कि शशि शेखर भले ही राजेंद्र तिवारी को लेकर हिंदुस्तान आए, पर राजेंद्र तिवारी अपनी निष्ठा शशि शेखर के प्रति सिद्ध करने में समय जाया करने की बजाय संस्थान के प्रति सिद्ध करने में जुटे रहे. खासकर झारखंड के मोर्चे पर भास्कर को परास्त करने के लिए राजेंद्र तिवारी ने खुद के स्तर पर जो व्यूह रचना कर दी थी, वह भास्कर के रणनीतिकारों के पसीने बहाने के लिए काफी थी. भास्कर के होर्डिंग कंपेन को हाइजैक करने से लेकर कंटेंट के लेवल पर कई नए प्रयोग करने और टीम में नई ऊर्जा भरने तक का कार्य राजेंद्र तिवारी ने कुछ ही महीनों में कर दिखाया. राजेंद्र तिवारी को बेस्ट परफारमेंस के लिए हिंदुस्तान ग्रुप के इंटरनल एवार्ड से भी नवाजा गया. इस सबकी खबरें समय-समय पर भड़ास4मीडिया के पास लगातार आती रहीं और छपती रहीं.

राजेंद्र तिवारी का कद देखते ही देखते काफी बड़ा होने लगा. यह कद हिंदुस्तान के अन्य संपादकों के मुकाबले बड़ा होता दिखने लगा. शशि शेखर को जानने वालों को पता है कि वे अपने अधीनस्थ संपादकों से क्या अपेक्षा रखते हैं और कैसे बर्ताव की उम्मीद करते हैं. राजेंद्र तिवारी ने हिंदुस्तान में आने के बाद मान लिया था कि वे बेहतर काम की बदौलत हिंदुस्तान प्रबंधन का विश्वास हासिल कर लेंगे. झारखंड में हिंदुस्तान के कायाकल्प और आक्रामक रणनीति पर भास्कर प्रबंधन नजर रखे हुए था. राजेंद्र तिवारी भास्कर से ही हिंदुस्तान आए.  वे भास्कर में कई जगहों पर बड़े पदों पर काम कर चुके हैं. सो, भास्कर प्रबंधन से उनके नजदीकी रिश्ते स्वाभाविक हैं. सूत्र बताते हैं कि भास्कर प्रबंधन राजेंद्र तिवारी को झारखंड में कमान सौंपने के मूड में था पर राजेंद्र तिवारी इसके लिए राजी न थे.

राजेंद्र को भास्कर आने के लिए राजी करने के वास्ते भास्कर ग्रुप के कई वरिष्ठ लोगों को लगाया गया. भास्कर के वरिष्ठ लोग राजेंद्र तिवारी से घंटों बात करने लगे. मीटिंग करने लगे. राजेंद्र ने न बात करने से मना किया और न मीटिंग करने से. पर उनका विजन स्पष्ट था कि जिस समूह ने उन पर विश्वास करके इतना बड़ा प्रोजेक्ट सौंपा है, उसे वे धोखा नहीं दे सकते और इस प्रोजेक्ट को बीच में नहीं छोड़ सकते. राजेंद्र तिवारी ने अपने करीबी मित्रों से भी भास्कर से संपर्क में रहने की बात पहले ही बता दी थी और यहां तक कि उन्होंने हिंदुस्तान के शीर्ष नेतृत्व को भी इस घटनाक्रम से सूचित कर दिया था कि भास्कर के लोग उन्हें अपने पाले में करने के लिए पूरे प्रयास कर रहे हैं.

सूत्रों के मुताबिक, बिना किसी की चापलूसी किए अपने अंदाज में बेहतर काम कर रहे राजेंद्र तिवारी को नाथने का मौका यहीं पर शशि शेखर को मिल गया. राजेंद्र तिवारी के भास्कर प्रबंधन के लोगों से लंबी-लंबी बातचीत के काल डिटेल निकलवाए गए और इसी को आधार पर बनाकर उन पर गाज गिरा दी गई. यह अलग बात है कि हर अखबार-चैनल का छोटा-बड़ा संपादक दूसरे अखबार के मालिकों और संपादकों से गाहे-बगाहे बात करता रहता है पर ज्यादातर का बाल तक बांका नहीं होता. ऐसा इसलिए क्योंकि मिलना-जुलना बात करते रहना इंडस्ट्री के लिए एक सामान्य बात है.

गाज गिराने की इस एक चाल के जरिए शशि शेखर ने हिंदुस्तान की आंतरिक राजनीति के लिहाज से दरअसल कई चाल चल दिए थे. नवीन जोशी को रिप्लेस कराने का सपना देखते हुए शशि शेखर भले ही अशोक पांडेय को हिंदुस्तान में ले आए पर संपादक, हिंदुस्तान, लखनऊ की कुर्सी पर उन्हें आसीन नहीं करा पाए. सीनियारिटी का मामला आड़े आ गया. अशोक पांडेय अमर उजाला में कभी स्टेट हेड नहीं रहे. वे सिर्फ लखनऊ यूनिट के आरई थे. नवीन जोशी सीनियर आरई के रूप में एक तरह से यूपी के हेड के रूप में काम देख रहे हैं. अभी हाल फिलहाल ही उनके हिस्से की कुछ यूनिटों को सुधांशु श्रीवास्तव के हवाले कर दिया गया, फिर भी नवीन जोशी का कद घटा नहीं. वरिष्ठता कम न हुई. हिंदुस्तान प्रबंधन का अगाध भरोसा नवीन पर कायम है. तो, नवीन जोशी को लखनऊ की कुर्सी से हिलाया न जा सका. अशोक पांडेय को लखनऊ के पड़ोसी महत्वपूर्ण यूनिट कानपुर का आरई बना दिया गया. राजेंद्र तिवारी का इधर तबादला किया गया और उधर अशोक पांडेय को स्टेट हेड पद पर प्रमोट कर झारखंड की जिम्मेदारी दे दी गई.

अब भविष्य में अशोक पांडेय को लखनऊ और नवीन जोशी को पटना या रांची, कहीं भी भेजा जा सकता है और इस बहाने नवीन जोशी को अस्थिर करने की कोशिश हो सकती है. मामला यूपी को अपने कब्जे में करने का है. नवीन जोशी के कुछ करीबी लोग अशोक पांडेय के तबादले से खुश दिखे, यह मानते हुए कि चलो, बवाल दूर गया. पर कुछ अन्य लोग इसे गंभीर परिणाम वाला घटनाक्रम मान रहे हैं. इनका कहना है कि अब नवीन जोशी के कद के बराबर अशोक पांडेय का कद कर दिया गया है और कुछ महीनों बाद नवीन जोशी को रिप्लेस करने की कोशिश एक बार फिर की जा सकती है.

राजेंद्र तिवारी को हटाकर अशोक पांडेय को लाना शशि शेखर द्वारा अपने सबसे विश्वासपात्र अधीनस्थ संपादक को मजबूती प्रदान करना है. आंतरिक राजनीति व दांवपेंच के चतुर-माहिर खिलाड़ी अशोक पांडेय की शशि शेखर के प्रति आस्था-भक्ति जगजाहिर है. इसी वजह से शशि शेखर ने अमर उजाला में लखनऊ जैसी महत्वपूर्ण यूनिट उनके हवाले किया. अब हिंदुस्तान में भी लखनऊ की यूनिट अशोक पांडेय के हवाले करने की तैयारी है. पर इसमें अभी वक्त है, साल-छह महीने का.

रांची में सब कुछ प्री-प्लांड तरीके से हुआ. राजेंद्र का तबादला. अशोक पांडेय की ताजपोशी. राजेंद्र तिवारी अवाक. उन्हें सपने में भी एहसास न था कि वे जिस यूनिट को एक बड़ी जंग के लिए तैयार कर रहे हैं, वहां से उन्हें अचानक इस तरह बेदखल कर दिया जाएगा. वे तो ये मान कर बैठे हुए थे कि हिंदुस्तान समूह के सभी दिग्गज उन्हें ब्लैंक चेक दे चुके हैं भास्कर से निपटने के लिए, झारखंड में हिंदुस्तान को शीर्ष पर ले जाने के लिए. सूत्रों के मुताबिक राजेंद्र तिवारी खुद को छला हुआ महसूस कर रहे हैं. फिलहाल वे अवकाश पर चल रहे हैं. बताया जा रहा है कि एक जून को वे हिंदुस्तान, चंडीगढ़ में ज्वाइन करेंगे लेकिन जिस तरह उनके साथ बर्ताव किया गया, उससे वे बेहद आहत हैं.

सूत्रों के मुताबिक अगर राजेंद्र तिवारी को भास्कर जाना होता तो इस तबादले के तुरंत बाद ही वे इस्तीफे का ऐलान करते हुए भास्कर के पाले में खड़े हो गए होते और रांची में झारखंड के लांचिंग कंपेन का हिस्सा बन गए होते लेकिन उन्होंने भास्कर प्रबंधन से बातचीत में कभी ज्वाइन करने की बात स्वीकार ही नहीं की. लिहाजा, भास्कर प्रबंधन भी अब राजेंद्र तिवारी को लेकर लुक एंड वाच की स्थिति में है. भास्कर प्रबंधन इस बात से खुश है कि उसके अखबार की लांचिंग से ठीक पहले झारखंड में हिंदुस्तान का घर आंतरिक कलह का शिकार हो गया है.

ताजी सूचना है कि जहां एक तरफ भास्कर लांचिग की तैयारी कर रहा है वहीं हिंदुस्तान, झारखण्ड के कई जिलो से ब्यूरो इंचार्जों को हटा कर उन्हें नए जिलों में भेजा जा रहा है. इस बदलाव को ठीक नहीं माना जा रहा है क्योंकि यह एक तरह से अपना ही घर खोदना हुआ. जिलों में नए जिला इंचार्ज को जमने में महीनों लग जाएंगे. ऐसे में कंटेंट, सरकुलेशन, बिजनेस, सभी में हिंदुस्तान का मार खाना लाजिमी है. जिलों में सूचना तंत्र कमजोर होगा सो अलग. इसका सीधा लाभ भास्कर को मिल सकता है. हरिनारायण सिंह के हिंदुस्तान रांची से जाने के बाद कर्मियों में जो असुरक्षा का माहौल था, उसे राजेंद्र तिवारी ने धीरे धीरे दूर कर दिया था और नई कार्यपद्धति के हिसाब से अपनी टीम तैयार कर ली थी. पर अब एक बार फिर नया टीम लीडर अपने हिसाब से टीम को री-स्ट्रक्चर करेगा. जाहिर है, इससे काम प्रभावित होगा.

खबर है कि रांची में अशोक पांडेय टीम के सभी सदस्यों से अलग-अलग बातचीत कर रहे हैं और सबका इतिहास पता कर रहे हैं ताकि विश्वसनीय व अविश्वसनीय कर्मियों का पता लगा सकें. प्रमोशन और इनक्रीमेंट के लिए भी फिर से कागज तैयार किए जा रहे हैं. पुराने निर्णयों की समीक्षा हो रही है. तो इस सारी कवायद में कुछ महीने लग जाएंगे. इन कुछ महीनों में जो समय रणनीति और कंटेंट पर दिया जाना चाहिए, जाहिर है, वह दूसरे कामों में लगेगा.

रांची में एक बड़े जमे-जमाए अखबार का घर डिस्टर्ब होने की खुशी भास्कर वालों में तो है पर भास्कर के मालिकों के अंदरुनी विवाद और रांची-पटना से भास्कर की लांचिंग को चुनौती दिए जाने के कारण अब भास्कर खेमे में भी मायूसी है. इन दोनों हाउसों के अंतरकलह का पूरा लाभ प्रभात खबर उठाने के मूड में है. प्रभात खबर के प्रधान संपादक हरिवंश ने एनपी सिंह को दिल्ली में वरिष्ठ पद पर नियुक्त कर संदेश दे दिया है कि झारखंड का मोर्चा हिंदुस्तान व भास्कर, दोनों के लिए आसान नहीं रहने वाला है.

बात हो रही थी राजेंद्र तिवारी की. जिस उत्साह और उम्मीद के साथ राजेंद्र तिवारी ने हिंदुस्तान ज्वाइन किया था, वे ठीक उसके उलट, उतने ही बेआबरू करके तबादले के शिकार बना दिए गए. शशि शेखर ने राजेंद्र तिवारी का तबादला कर जो कई चालें चली हैं, उसमें अशोक पांडेय को प्रमोट कर नवीन जोशी के पैरलल लाना तो शामिल है ही, अपने अधीनस्थों को भी संकेत दे दिया है कि ज्यादा उड़ने की कोशिश करोगे तो यही हश्र होगा.

शशि शेखर अपनी टीम पर मजबूत नियंत्रण रखने वाले संपादक माने जाते हैं. वे किसी अधीनस्थ संपादक के दाएं-बाएं मुंह खोलने, स्वतंत्र सोच के साथ काम करने, इधर-उधर के संस्थानों के लोगों से मिलने, निजी ब्रांडिंग-मार्केटिंग करने के सख्त खिलाफ होते हैं. यह तरीका कारपोरेट मीडिया हाउसों में कई बार कारगर भी होता है पर अमर उजाला का जो हश्र हुआ है, उसे देखकर कहा जा सकता है कि आने वाले दिनों में हिंदुस्तान को भी संपादकीय विभाग में बौद्धिक अकाल को झेलना पड़ सकता है और इसका दूरगामी असर ब्रांड पर पड़ सकता है.

जब तक अलग-अलग दिमाग, सोच, विचार के लोग एक साझे उद्देश्य के लिए नहीं लगते, तब तक बेस्ट प्रोडक्ट सामने नहीं आ पाता. अगर एक दिमाग किसी प्रोडक्ट को तराशता-बनाता है तो जाहिर है, उसमें ढेर सारी कमियां होंगी. हिंदुस्तान में अभी तक जो परंपरा रही है, उसमें कई विसंगतियों के बावजूद टैलेंट को प्रमुखता दिया जाता था और इनटरनल डेमोक्रेसी को लोग इंज्वाय करते थे. पर अब धीरे-धीरे ये चलन खत्म हो रहा है. राजेंद्र तिवारी का हश्र देखकर हिंदुस्तान में जो भी लोग इनटरनल डेमोक्रेसी की हिमायत कर रहे थे, या इस व्यवस्था को पुराने दिनों से जीते हुए चले आ रहे थे, उन्हें रक्षात्मक मुद्रा में आना पड़ा है.

कुल मिलाकर राजेंद्र तिवारी प्रकरण से हिंदुस्तान में आंतरिक सनसनी की सी स्थिति है. शशि शेखर ने प्रबंधन पर अपनी मजबूत पकड़ दिखाने के साथ-साथ ये भी संकेत दे दिया है कि वे जिसे चाहेंगे, वही आगे बढ़ेगा और रहेगा. ऐसा नहीं कि ये सिर्फ शशि शेखर कर रहे हों. मीडिया इंडस्ट्री में ज्यादातर मीडिया हाउसों में किसी एक व्यक्ति की ही चलती है. उदाहरण के तौर पर अमर उजाला में इन दिनों यशवंत व्यास की जमकर चल रही है और जो यशवंत व्यास को नापसंद करते हैं, वे रक्षात्मक मुद्रा में हैं या फिर इस्तीफा देकर जा रहे हैं. यशवंत व्यास जिस पर हाथ रख रहे हैं, उसकी इंट्री अमर उजाला में हो रही है और अच्छी यूनिटें भी उन्हीं को मिल रही हैं.

राजस्थान पत्रिका को ही ले लीजिए. वहां भुवनेश जैन को मालिकों के बाद सबसे ताकतवर माना जाता है. भुवनेश जैन जिसे चाहते हैं, वही आगे बढ़ता है. भुवनेश जैन की सहमति के बगैर कोई राजस्थान पत्रिका में देर तक टिक नहीं सकता, ऐसा कहा जाता है. दैनिक भास्कर में संपादकीय स्तर पर एक जमाने में श्रवण गर्ग की चला करती थी. चलती अब भी उनकी है लेकिन कल्पेश याज्ञनिक और यतीश राजावत को प्रबंधन ने नए ताकतवर संपादकों के रूप में खड़ा कर दिया है. ये दोनों जिसे चाहते हैं वही भास्कर में आता है और इनकी इच्छा के विपरीत कोई बहुत देर तक भास्कर में टिक नहीं पाता.

दैनिक जागरण में मालिक ही संपादक हैं इसलिए अलग अलग यूनिटों में मालिकों की मर्जी ही चलती है. मालिकों के बेहद करीब मैनेजर और संपादक उनकी सहमति से अपनी मर्जी चला पाते हैं. फिर भी कुछ नाम तो लिए ही जा सकते हैं. जैसे दिल्ली में निशिकांत ठाकुर. लखनऊ में एक जमाने में विनोद शुक्ला हुआ करते थे. बिहार-झारखंड में शैलेंद्र दीक्षित हैं. आदि आदि. जागरण में थोड़ा डिसेंट्रलाइज माहौल है. इसका कारण इनके मालिकों की ढेर सारी संख्या. यूनिटें व इलाके अंदरखाने बंटे हुए हैं इसलिए सब अपने-अपने इलाकों के राजा हैं.

तो, मीडिया हाउसों में मजबूत संपादक के हवाले पूरा अखबार करने की परंपरा पहले भी रही है और आज भी है. इस कारण, कई तेजतर्रार और प्रतिभावान लोग, जो किसी महान संपादक का चारण गान नहीं कर पाते, हाशिए पर पड़े रहते हैं, बेरोजगार घूमते रह जाते हैं. जाहिर है, इसका खामियाजा हिंदी पत्रकारिता उठा रही है और हिंदी पत्रकारिता का जो चाल, चलन व चेहरा है, वह बताता है कि तेजी से बाजारू होती पत्रकारिता, जोड़तोड़ वालों के हाथों गिरवी रखी जाती पत्रकारिता के दिन निकट भविष्य में बहुरने वाले नहीं हैं.

हिंदी पत्रकारिता पहले कभी बहुत गरिष्ठ किस्म के साहित्यिक विद्वानों के हवाले हुआ करती थी तो अब बेहद छिछले किस्म के सड़क छाप लोगों के हाथों में आ चुकी है. जो थोड़े बहुत गंभीर लोग हैं भी तो वे तलछटों की सामूहिक गर्जना के मारे भयभीत हो किनारे दुबके हैं. पर यह दौर भी लंबा नहीं चलेगा. कंटेंट की लड़ाई अगर शुरू होगी तो उसे सनसनी से शब्द सत्ता तक की यात्रा करनी पड़ेगी. ऐसा जन दबाव कराएगा.

बाजार के मोह में शब्दों की सनसनी के जरिए ज्यादा देर तक टिके नहीं रहा जा सकता, बुलबुले फूटेंगे ही. झारखंड-बिहार जैसे इलाके जो अपने सुधी पाठकों के लिए जाने जाते हैं, राजनीति के साथ-साथ पत्रकारिता में भी बदलाव के वाहक बन सकते हैं क्योंकि उस इलाके में आग है. बौद्धिक आग, जिससे पैदा होते हैं नक्सली और जिससे पैदा होते हैं विचारक. एक बंदूक थामे तो दूसरा कलम थामे. जिन्हें कलम पर भरोसा है वे अक्सर बंदूक नहीं थामते और लेकिन जिन्हें बंदूक पर भरोसा है, वे अक्सर सोचते-चाहते हैं कि काश, कलम ही उनके बंदूक का काम कर दे तो वे हिंसा से तौबा कर लें.

विचारों की ऐसी खदबदाहट भरी बिहार-झारखंड की जमीन से अगर भविष्य में कुछ बड़े सबक सीखने को मिलें तो आश्चर्य नहीं करना चाहिए. अभी  नकारात्मक खबरें ही आ रही हैं. पर अच्छी खबरों के लिए ‘भविष्य’ नामक यह वक्त कितने दिनों-वर्षों का है, यह आज तय नहीं है. कुछ लोग इसे पांच साल मानते हैं, कुछ दशक भर से ज्यादा. कुछ निराशावादी लोग 25 साल तक इसे खींच ले जाते हैं. लेकिन एक चीज जान लीजिए. तेजी से अपडेट, डेवलप, रोटेट होती इस दुनिया की नई पीढ़ी भी बहुत खुर्रफुर्र टाइप की है. वो बहुत तेज रिएक्ट करती है. वे धधकने के लिए सुलगने का इंतजार नहीं करते, सीधे फट पड़ते हैं.

-यशवंत

एडिटर, भड़ास4मीडिया

संपर्क : yashwant@bhadas4media.com, 09999330099

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Comments on “तो इसलिए गाज गिरी राजेंद्र तिवारी पर!

  • siddharth kalhans says:

    भईया प्रशांत कालेकर मैं आपको जानता नही। कारोबार (9 महीने), पॉयनियर ( 9 साल), इंडियन एक्सप्रेस (2 साल) और अब 2 साल से ज्यादा समय से बिजनेस स्डैंडडर् में हूं। आप जैसे दोस्त से कहां मुलाकात हुई याद नही आता। दारू से याद्दाश्त कमजोर हो जाती है। लगता है आप दोस्त हैं या रहे हैं। न भी रहे हैं तो परिचित तो हैं ही जरा अपना इज्मे शरीफ याद करा दें। आपकी बातों से लगता है काफी माल खर्च कर आपने पिलाया है। रही बात एक दारूबाज की दूसरे की तारीफ करने की तो वो तो स्वाभाविक है। दोस्त तिवारी जी तो पहले भी ज्यादा पी वी नही पाते थे अब भी नही। मैं मैदान से रिटायर हो चला। यशवंत भाई अपना मैदान में डटा है। आपको दारूबाजों से कुछ ज्यादा मोहब्बत लगती है तो एक दिन रख दो कार्यक्रम। हां अगर किसी छद्म नाम से लिख पढ़ रहे हो तो एसों की बातों का क्या जवाब देना।
    मनोरथ जी आयडियल एक्सप्रेस बाराणसी का अखबार था न कि भदोही का। टकसाल सिनेमा वाली बिल्डंग में उसका दफ्तर था। जब आप उसके बारे में जानते हैं तो वहां कौन-कौन काम करते थे यो भी पता होगा आपको। आपकी जानकारी के लिये तवारी जी वहां से जागरण गये थे अमर उजाला नही। रही बात चीफ सब बनने की तो फिर भईये ये पत्रकारिता है। कब क्या होता है किसे पता

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  • ऊपर बहुत सारी टिप्पणियां पढ़ीं. कुछ बेदम हैं, कुछ बकवास मात्र हैं और कुछ प्लांटेड लग रही हैं। मैं तो सिर्फ इतना कहना चाहता हूं कि झारखंड को राजेंद्र तिवारी जैसे संपादक की जरूरत थी, लेकिन हिंदुस्तान प्रबंधन ने उनको हटा दिया। हो सकता है अशोक पांडेय के रूप में और अच्छा संपादक मिल जाए या फिर भास्कर में कोई ऐसा संपादक आ जाए जो झारखंड का झाड़-झंखाड़ साफ करने में कुछ रास्ता दिखा सके।

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  • bhartendu says:

    APNE STAR BANAYE GAGE AUR FIR GIRAYE GAYE EK EDITOR KI KAHANI LIKHI, ACCHA LAGA. MAINE REACTIONS BHI PADE…APKE VIRODHIYON MAI DUM NAHI…MUJHE YE BHI DAR HAI KI SASHI SEKHAR AB AISE PAPPU BHI PALNE LAGE HAI…JO SASHI KAR RAHE HAI…WAH RAWAN KA GHAMAND HAI…AUR RAWAN KA KYA HOTA HAI SAB JANTE HAI…LEKIN APNE NAYE LOGON SE ASHA BHI BADHI HAI…NISCHIT ROOP SE HINDI PATRAKARITA KA BHAWISYA BHI BADLEGA.

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  • Dr Matsyendra Prabhakar says:

    Kahte hain ki jo bat such hai uske sath kuchh jodna achha nahi lagta. lekin jahan tak Shri Rajendra Tiwarh ki kshamta aur kaushal ka prashna hai, is bare men mujhe koi shak nahin hai. unke patrakarita kshetra men aane ke samay se hi maine vyaktigat roop se dekha aur samjha hai. Aadarniya patrakar sathiyon, sabhi apni bat kahen kintu shaleen tarike se, kyonki shesh samaj ko ab bhi aap-hum sab se badi ummiden hain.

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  • anujasanghvi says:

    written by Anuja
    यशवंत जी

    आपने राजेंद्र तिवारी के बारे मैं काफी कुछ लिखा . मैंने पहले भी उनके बारे मैं काफी लिखा था लेकिन पता नहीं क्यों छापा था . अब शायद छापेंगे. तिवारी जी जब इंदौर मैंने संपादक थे तब उन्होंने जितने लोगों क़ी रोजी-रोटी छीनी यह उनकी आहों का संताप है जो उन्हें लगा. वे जिस तरह अपना तबादला होने पर अवाक् रह गए वैसे ही वो लोग अवाक् रह गए थे जब तिवारी जी ने उन्हें एक झटके में बेरोजगार कर दिया था . १०-१५ साल भास्कर के लिए दिन-रात एक करने वाले,अपना घर,परिवार से ज्यादा भास्कर को समय देने वालों को उन्होंने एक लाइन में कह दिया क़ी संस्थान को अब आपकी जरूरत नहीं है जबकि उसी समय एक महिला रिपोर्टर के इस्तीफा देने पर उसका इस्तीफा खुद उन्होंने अपने हांथ से फाड़ दिया था. यह दर्द मैंने इसलिए सहा है क़ी मेरे एक बहुत अजीज मित्र जो भास्कर क़ी लांचिंग से ही उसके साथ जुड़े थे और भास्कर में सबसे लम्बी पारी तक काम करने पर chairman द्वारा उन्हें सम्मानित भी किया गया था उनकी निष्ठा पहचाने बिना तिवारी जी ने उन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया था. यह तिवारी जी के कर्मो का फल है क़ी वे अपने को ठगा सा महसूस कर रहे है. लेकिन यशवंत जी आपसे गुजारिश है क़ी आप अपनी लेखनी क़ी धार बनाये रखिये. भड़ास जिस तरह लगातार लोकप्रिय होता जा रहा है उससे अपेक्षा क़ी जाती है क़ी वो तिवारी जी जैसे मामले में इस तरह baised नहींहोगा.

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    Reply
  • yaswant ki lekhani mean daru ke sath jatiwad ka pani bhar gaye hea. i next kanpur ke manoranjan singh ko jab rajendra tiwari yaswant ke kahane per raanchi mea news editor bana diye to unki chhaplusi iss tarah karne laga.jase woh shashi shlekhar se bare ho gaye. rajendra tiwari ke jate he yaswant manoranjan singh ke kahane per rajendra tiwari ki chhaplusi aur shashi shekhar ke khilaf daru peekar ramayan likh raha hea. manorath ji app puch rahe the yaswant kayno shashi ji. mrinal ji aur yaswant vvas ke khilaf likhate hea. yeh sab log pandit hea. yaswant pondit virodhi hea. rahi baat visesh kumar ki yeh naam yaswant ko hea daru peene ke bad apani trp ke lea khud comment per comment karteh hea. yaswant jink kuttao ki kanpur ki road per mara hea unki aatam uske andar ghus gaye hea. issi karana woh kutta jasi harkat kar raha hea. bhoonnoo .. karo beta yaswant aur karo

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  • manorath mishra says:

    Mr Mazmoon. who is going to teach me manner and behaviour, You. Mr Mazmoon, i was just asking a question to Mr Sidhartha Kalhansa why a person joined as Chief sub editor before to work as an editor. You reply it.

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  • विशेष कुमार says:

    इ मनोरथवा बेहूदा से पूछो कि असली नाम से क्यों नहीं लिख रहा।यक्यों जवाब नहीं दे रहा है कि वह महान संपादकों का मिश्रित औलाद है क्या? अबे मनोरथवा, तेरी पालिटिक्स क्या है बे? तू नकली नाम से मत लिख। यअसली नाम से सामने आओओ।. बेवकूफी भरे सवाल पूछता है भगोड़े चिरकुट। तुम्हें क्या पता कि कोई अपने दम पर संघर्ष करके कैसे आगे बढ़ता है। तू जिस शार्टकट से पैदा हुआ है और आगे बढ़ा है, वो अब सबको समझ में आ रहा है।

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  • jagdish srivastav jee, aap tathyon ke bina baaat naa karein to behtar ho. rajendra tiwari ko aapke certificate aur yashwant ke chaplusi kee jaroorat nahin. tiwari jee indore mein kareeb 3 saaal rahe, ek baaar pata kar lijiye?
    manorath mishra is a dam duffer. he doesnt know how to talk about a senior and qualified journalist.

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  • manorath mishra says:

    merey bhai, gaaliyan essey bhi gandi likh sakta hoon, de saakta hoon aur latiya bhi sakta hoon apney swabhimaan ke liye, mai to sidartha kalhans se pooch raha tha ki ek aadmi jo 3 saal me editor ho gaya fir wo ek saal baad chief sub kyon ban gaya. mera naam pata apni mummy se poochna wo batayengi. samjhey beta.

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  • b4m ek bahut achha madyam hai jankari lene aur dene ka mera aap logo se anurodh hai ki plz sayyamit bhasha ka prayog kare.shayad kisine galat baat keh di ho bandhu leking sansdiy bahsha ka prayog kariye. achha nai lagta hai. mana ki hum log samaj ke sach ko ujagar karte hai humare andar akhrosh bhi hai jo hona bhi chahiye fir bhi aap yahi apatti bahut achhe shabdo me bhi vyakt kar sakta hai iska mujhe vishvas hai plz mere agrah ko anyatha mat lijiyega

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  • विशेष कुमार says:

    चूतिए मनोरथ, तू असल की औलाद है या नकल की. अगर असल की है तो नाम पहचान पता के साथ सामने आ. तू साले क्या जानता है पत्रकारिता के बारे में. कल को तू लिखेगा कि सारे अखबार मंत्रियों की आलोचना क्यों करते हैं? जो उच्च कुर्सियों पर बैठे हैं, उनके कार्यों के प्रति आलोचनात्मक रुख रखना गलत है क्या? अगर तारीफ छपनी शुरू होगी तो कहेगा कि क्या तेलबाजी है? दरअसल, तू दोगला किस्म का नामर्द इंसान है इसलिए छुपछुप कर भड़ास निकाल रहा है. अपने तू इन महान लोगों से कह दे कि घटिया सोच और काम से तौबा कर लें, फिर देख, उनकी कैसे बुराई छपती है. पर ये ढक्कन लोग अपने कर्मों से अपनी पोल खोलते हैं तो कोई क्या करे?
    लेकिन मनोरथ बेटा, तू बहुत हरामजादा किस्म का इंसान है, ये पता लग गया है. तू शीर्ष पदों पर बैठे लोगों की दोगला औलाद है. अगर असल का है तो तू अपना मोबाइल नंबर और असली नाम पता इसी कमेंट पर लिख दे ताकि पता तो चले कि तू है कौन….

    विशेष कुमार

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  • manorath mishra says:

    Bhaiya Sidhartha, Sahara ke sub editor ko Ideal express jaise bhadohi ke akhbaar me editor honey ki katha to aap ne likhi. fir aapke mahan sampadak uskey baad Chief Sub per kyon amar ujala gaye. Bhai Rajendra Tiwari ki mahanta per mujhe aapti nahi hai na mai Yashwant ko chaplus likh raha hoon, maine ek sawal khada kiya ki Bhadas per SHASHI SHEKHAR, MRINAL PANDEY, YASHWANT VYAS ki khilaf hi kyon likha jaata hai, ye bhadas ki ekaangi honey ka sabut deta hai,

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  • gautam tripathi says:

    tiwari ji ne jaise ek jhatke men kai stringaron ko hataya, woise hi wo bhi hate. dusron ki roti ko majak banane wale khud hi majak ban gaye

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  • gautam tripathi says:

    iske pahle aapne rajendra tiwari ko hataye jane ko is tarah prastut kiya tha jaise wo hindustan men rah kar bhaskar ke liye kam kar rahe the.ab achanak aapke sur kyon badal gaye.tiwari ji ne bans kiya kya ? sach kaha jye to aapka pahle wala bichar hi sahi tha .tiwari jee ne bhaskar aane ke thik pahe hindustan ke kai diggajon ko hata kar jis tarah se team ko tahas nahas kiya usase to yahi lagta hai kiwo bhaskar ke agent ka kaam kar rahe the. hazaribag ke shailesh sharma;rajiv ranjan sriwatawa,pramod ko ek jhatke men hatane ko aap kya kahenge.yashwant ji jharkhand men aapne sutra majboot kijiye fir koi tippni kijiyega

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  • prashant kalekar says:

    very good sidharth kalhans ji…….ek daru baaj doosre daru baaj ki tarif mein kaside pad raha hai…..
    woh din bhool gaye jab tum khud har jagah tiwari ki burai kiya karte the…kuch to sharam kar lee hoti sale daru baaj…

    prashant

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  • rajnikant says:

    maze ki baat ye hai ki hindustan me hi ek stringer mahashay hai jo ye dava karte hai ki unhe agar ticket mil jaye to vo pata nai kitne navin joshi bana denge.shayad vo apna mansik santulan kho chuke hai.ummid hai ki unse ye pucha jana chahiye ki vo aisa kaise keh rahe hai kam se kaam unki chutti to ho jani chahiye

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  • यशवंत भाई,
    अापकी स्टोरी अाधा सच है। पूरा सच यह है िक राजेंदऱ ितवारी कािबल थे, लेिकन जाितवादी थे। िहन्दुस्तान रांची में अपने पहले िदन ही वे िजस तरह से लोगों से नाम के साथ जोर देकर टाइिटल पूछे थे, उसका यही मैसेज गया था। लोग मजाक में कहने लगे थे िक गैर पंिडत कोटॆ में एफडेिवड करा नाम के अागे िकसी पंिडत का टाइिटल लगा लें। बहरहाल, राजेंदऱ जी रांची में िसफॆ खबरों की पौकेिजंग कराते थे और पेज वन सुंदर िदखे इसपर जोर देते थे। उनके कायॆकाल में एक भी बड़ी खबर बऱेक नहीं हुई। वे पूरी टीम के नेता नहीं, बिल्क कुछ पछलग्गुअों के कैप्टन थे। यही कारण था िक उनके हटने से दुखी कम और खुश लोग ज्यादा थे। िजला के ब्यूरों चीफों का तबादला ितवारी जी ने िकया था, ना िक अशोक पांडेय ने। िजलों में १० साल से काम कर रहे कई को उन्होंने िबना कारण बताये हटा िदया था। वे अपनी पकड़ बनाने के िलए लोगों में असुरच्छा भर रहे थे। शिश जी और ितवारी जी का क्या मामला था, वो िदल्ली में बैठ अाप बेहतर जानते होंगे, लेिकन रांची में मैं इतना जानता हूं िक िहन्दुस्तान रांची में हिरनारायण िसंह का कोई िवकल्प नहीं था और ना अागे रहेगा। मेरा ईमेल अाइडी न िदखायें।

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  • Siddharth Kalhans says:

    यशवंत भाई, कमेंट में कई लोगों ने राजेंद्र तिवारी पर लिखे गये आपके पोस्ट को जापलूसी और एक साहब ने तो उन्हें अदना सा संपादक मान लिया। पहले साफ कर दूं कि बीते 13 साल से अंगेजी पत्रकारिता में रहा हूं सो किसी तरह की चापलूसी का मेरा कोई इरादा नही। राजेंद्र तिवारी काबिल है इसमें कोई शक नही। जिसे शुबहा हो कहीं भी बहस कर ले। तिवारी जी उन पत्रकारों में हैं जो 1991 से शुरू कर 1994 में ही संपादक बने बनारस से छपने वाले आयडियल एक्सप्रेस के। वहां उनके साथी रहे आज कई बड़ी जगहों पर विराजमान हैं। तिवारी जी अपनी क्षमता के दम पर संपादक बने उनका कोई गॉडफादर कभी नही रहा। मैं उन्हें पढ़ाई के दिनों से जानता हूं मेधा के धनी व परिश्रमी रहे हैं। प्रयोग करते हैं और लोगों को साथ लेकर चलना जानते हैं। छात्रनेता भी रहे हैं सो लोगों को जोड़ना भी जानते हैं। रही बात भास्कर में कई जगहों पर भेजे जाने की तो यह उनकी प्रतिभा ही थी जो इंदौर जैसे बड़े एडीशन में बैठाये गये। उनके रहते इंदौर एडीशन कितना आगे गया बताने की जरूरत नही। तिवारी जी ने जम्मू में अमर उजाला को स्थापित किया क्या भी बताने की जरूरत है। रही बात आनलाइन एडीशन में भेजे तो दोस्तों य़शवंत के इतने लंबे चौड़े पोस्ट को लगता है आप समझे नही। अरे भईया ये पत्रकारिता है और वो भी हिंदी। कब क्या हो जाये किसे पता नही। एक साहब कहते हैं कि यशवंत ने इस पोस्ट के जरिये राजेंद्र तिवारी के भास्कर में प्रवेश की पेशबंदी की है। यशवंत भाई आप पुराने और बुरे दिनों के साथी हैं अपने अगर वाकई आपकी पेशबंदी से कुछ एसा होता है तो मेहरबानी करके मेरे लिये भी कुछ लिख मारो।
    वैसे राजेंद्र जी उर्जावान, क्षमतावान और परिश्रमी हैं। उनका भला ही होगा।

    आप सभी का सिद्धार्थ कलहंस

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  • sapan yagyawalkya says:

    Yashvant ji,aap man ki har baat bina kisi parvah ke vyakt karne ka sahas dikhate hain.yah aapka bahut bada aur vandan yogya naitik bal hai.

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  • जगमोहन फुटेला says:

    तबादले होते रहे हैं,होते रहेंगे.पर,मैं प्रधान संपादकों नहीं,मालिकों से जानना चाहूँगा कि पंजाबी,हरियाणवी और हिमाचली दूर दूर तक नहीं जानने वालों को चंडीगढ़ और भोजपुरी से कतई अनजान पत्रकारों को बिहार में सम्पादक क्या सोच कर लगाया जाता है?

    संवाद के लिए ज़रूरी भाषा ज्ञान के बिना समाचारों के साथ मज़ाक करते हैं ऐसे पत्रकार.अखबार डूबे हैं.दैनिक हिंदुस्तान को ही ले लीजिये.जिद में छप रहा है अखबार.मुश्किल से तीन,चार हज़ार.पहले तो स्थानीय संपादक अकू श्रीवास्तव के पूरे पंजाब में स्ट्रिंगर सिर्फ चार. दैनिक हिंदुस्तान में वो खबरें कहीं सिंगल कालम भी नहीं छपती थीं जिन्हें उसी बिल्डिंग में छपने वाले हिंदुस्तान टाइम्स ने लीड या सैकंड लीड बना रखा होता था.

    पंजाब में अमर उजाला और दैनिक जागरण का इतिहास भी कमोबेश ऐसा ही है.मैं एक मिसाल दूं….चंडीगढ़ के एक नामचीन रिपोर्टर ने एक्सक्लूसिव पेली.लिखा कि चंडीगढ़ में कोठे हैं.इनपे आई.ए.एस. अफसर आते हैं.उन ने वहां एसी लगवा रखे हैं.इस पे तुर्रा ये कि निबटने के लिए सरकारी फाईलें भी इन्हीं कोठों पर आती हैं….जस रिपोर्टर,तस डेस्क.खबर ” फर्स्ट पेज बॉक्स” मार्क हो के कम्पोजिंग में चली गई. सिर्फ फर्स्ट पेज बॉक्स चूंकि संपादक को दिखा के छपता था. खबर उनके पास आई.खबर रोक ली गई.

    संपादक थे पंजाबी.वे जानते थे कि रिपोर्टर यूनियन वालों के मुंह से अफसरों के जिन ‘कोठों’ पे फाईलें मंगाने की बात सुन के आया है,पंजाबी भाषा में उनका मतलब होता है,चौबारा.यानी फर्स्ट,सैकंड या थर्ड फ्लोर.वो खबर तो रुक गयी.पर अखबार फिर भी बंद हो गया.क्योंकि बिका ही नहीं.जिस भाषा और जैसे शीर्षकों के साथ छपता था वो तो खुद वितरण विभाग के मुताबिक़ पढने और बिकने की हालत में नहीं था….लीड लायक एक बड़ी खबर रोक ली भोपाल से आये एक चीफ सब ने.सिर्फ इस लिए कि जिस डेटलाइन से वो आई,उन्हें लगा कि अबुलखुराना नाम की वैसी कोई जगह नहीं हो सकती.

    सच पूछिए,अपनी सहानुभूति भाई राजेंद्र तिवारी नहीं,बड़े भाई शशि शेखर भी नहीं,बहन शोभना भारतीय के साथ है!

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  • surendranath sinha says:

    apne thora jiada lekin achha aur nyaypoorna likha hai.ye bhi sahi ki ab hindustan ki bari hai.

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  • shubhachintak says:

    Yashwant Bhai
    Mai aapki report sey puri tarah sehmat hu. Rajendra Tiwari Ji wakai mai bahut achha kam jharkhand mai kar rahey they
    Jaha tak baat BC ko hataney ki thi to unhoney thik kiya kyoki kuchh bc ke bhrashth honey ki unhey khabar lag gai thi aur unhoney achha kiya

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  • manorath jee
    Yashwant ki lekhni per sawal khada karna thik nahi. Aapne pura post padhker v yeh nahi samjha ki isme tiwari jee ki tarif nahi balki un halat ka jikra hai jo ghatit huye.
    Jharkhand ke hindustan ko dekh len, rajendra tiwari ko salam thonkne ki tabiyat hogi.
    Aap log tippani karne ke liye tippani kyon karte hain? Rahi baat rajendra jee ko online edition men karne ki to bhai, baniya ki naukari men damdi ke kuch v kiya ja sakta hai. Wahi bhaskar wale rajendra jee ki yes ke liye hotel capital hill men kyon 4 din rooke rahe?

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  • avinash aacharya says:

    shashi shekhar ke saath jinhoney kaam kiya hai ya jo bhi amar uajalaite hai wo aapko bata dengey ki wo hamesh se apne edition’s ke ek ek center per jaatey rahey hai. khud mai bhi eska ek gavaah hooon. kisi manorath aur rajendra tiwari ke hawaley se ye kehna ki wo zila zila kyon jaa rahey hai.waise es post ko aap do hisson me kar saktey they. part-1 aur part-2.

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  • Agar Bhaskar ke sampark me rahne ke karan Rajendera Tiwari ko hataya gaya hai to Hindustan Ranchi me Admin. ke high level ke log bhi Bhaskar ke kai logo se mil chuke hai. Unpar bhi karbai honi chahiye.Kyoki Rajendera ji to sirf Ph. par bat kiye the lekin ye High level ke log Bhaskar ke Mr. Anil Singh(GM) se lagatar sampark me hai. Jaida bo log jinka pichle dino Hindustan me bura bakt chal raha tha. ye admi high level ke Admin. me hain. Kripya mail id show nahi karen.

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  • jagdish srivastav says:

    यशवंत जी, तिवारी जी का इतना महिमामंडन आपको चापलूसों की श्रेणी में खड़ा कर देता है। तिवारी जी अगर इतने ही काबिल होते तो उनका दैनिक भास्कर में सात-सात बार तबादला नहीं होता। कहीं एक जगह छह महीने से ज्यादा उनका कार्यकाल नहीं रहा है। हिंदुस्तान को भी उन्होंने खास कुछ नहीं दे दिया। हिंदुस्तान बिहार-झारखंड में पहले से ही बादशाह की भूमिका में है। आपने तो तिवारी जी को प्रभाष जोशी, राजेंद्र माथुर और शशि शेखर की श्रेणी में ला खड़ा किया है। अदने से संपादक की ऐसी चापलूसी। धन्य हो यार।

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  • brijesh singh says:

    abbey yaswant tum daru peene ke bad hos-howas mean nbahi rahte ho. daru peekar mat likha karo. itana lamba likhel ho jase anil yadev ki randi katha ho. shashi shekhar ke khilaf lihane se pahele apani pahli ppst padh liya hota. jisme sri rajendra tiwari je killing instinct paiida karene ki bat kahe the. killing issincit dusare akhabar me naukari ke lea cv bhajene aur maliko se batiyane se team mea hoti hea kya. shashi shekhae ke bare mean likhkar tum trp ppane mea jute ho. trp ke lea dimag daru ke sath milakr pee gaye ho kya. daru kam karo, dimag se kaam karo

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  • tiwari ji kabil hain lekin aapki ki khichdi men makkhan jyada pad gaya. baki jo bahkte hue likha hai bahi bhadas hai. Yaar baba ho rare ho ya krantikari.? Ek paig pahle likhna tha. kya mast likha hai! unki to dho di.hi hi hi ha ha ha :)[url][/url]

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  • यशवंत says:

    मनोरथ जी, मैं आपको नहीं जानता. हो सकता है कि आपका ये नाम छद्म नाम हो. बावजूद इसके, आपकी बात को जवाब देने लायक मान रहा हूं.
    पूरी पोस्ट लिखते हुए मैं आखिर में भटक गया. किस विषय से शुरू किया और कहां पहुंच गया. माफ करिएगा, पर भड़ास ही तो है.
    राजेंद्र तिवारी का इसमें महिमामंडन बिलकुल नहीं है. उनको हटाए जाने की परिस्थितियों व आंतरिक राजनीति का वर्णन है.
    राजेंद्र के झारखंड के काम को आप इगनोर नही कर सकते. यही कारण है कि राजेंद्र तिवारी का तबादला करने के बाद शशि शेखर और अशोक पांडेय झारखंड के जिले जिले घूम रहे हैं. इस वक्त भी दोनों झारखंड के किसी जिले में हैं. ये पक्की सूचना है. सोचिए, प्रधान संपादक मारा मारा फिर रहा है, अपने स्टेट हेड को हटाने के बाद से. क्या प्रधान संपादक का काम यही होता है कि वह जिले के ब्यूरो को हैंडल करे?
    दरअसल राजेंद्र उस गैंग के हिस्से नहीं बन पाए, इसीलिए उनका तबादला कर दिया गया, सिर्फ यही एक लाइन की सूचना है जिसे उपर काफी किंतु परंतु करके लिखा गया है.
    राजेंद्र तिवारी के खिलाफ भड़ास4मीडिया में काफी कुछ छप चुका है. जर्नलिस्ट आलोक नंदन ने अपने कालम पत्रकारिता की काल कोठरी से में राजेंद्र तिवारी की जिस कदर ऐसी तैसी की थी, वो शायद आपने पढ़ा नहीं.
    भड़ास पर कोई राग द्वेष नहीं है. हां, अगर लोग राग द्वेष मानते हों तो मानते रहें, हम उसकी परवाह नहीं करते. इतनी हिम्मत, या दुस्साहस, जो कह लीजिए, भगवान ने अपने लोगों को दे रखी है. जब जाना होगा तभी इस दुनिया से जाएंगे, दुनियावालों के उपाय करने से नहीं हिलने वाले.
    आभार
    यशवंत

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  • behtarin likha. tiwari jee ne jo kuch likha—————-kiya, use behter kaha ja sakta hai. sawal yeh hai ki aage kya hoga?
    aap apne lekh men antim chhano men bhatak gaye. phir v is lekh ko main insight story ki shreni men rakhtata hoon

    Reply
  • nasir zaidi kanpur says:

    yashwant bhai jab sekhar sb abhi tak naveen sir ko lko say nahi hata paye tou aagay kaisay hata dengay.naveenji akeley nahi badi team hai.

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  • ek achhchi aur bebaak report k liye dhanyabaad. aapki himmat ko salam, jinhone ek bebaak report samne rakhi.

    Reply
  • yar chhota likha karo, chutia ho gaye ho……………………..

    itna likha hai ki koi bhi padhte-padhte so jayga.

    Reply
  • manorath mishra says:

    राजेंद्र तिवारी अगर इतने महान पत्रकार थे तो उन्हें भास्कर प्रबंधन ने एक तरह से निपटाकर आनलाइन में क्यों भेज दिया था, वहां तो शशि शेखर नहीं थे। राजेंद्र तिवारी की महानता पर इतनी लंबी पोस्ट, कुछ हजम नहीं हुआ। अपनी जानकारी के लिए इसे सनद कर लीजिए, राजेंद्र को भास्कर जाने में आपकी ये पोस्ट पेशबंदी के सिवा कुछ नहीं है। यशवंत आप जाने-अनजाने भड़ास को लोगों की स्वाथपूतिॆ का जरिया बना रहे हैं। इसका अहसास भी एक दिन आपको होगा। मुझे भड़ास के भटकने का दुख होता है। लगाव भी है, जो इधर से गुजरता हूं, लेकिन खटास भी भर आती है कि आपको किसी की तारीफ झोंकेगे तो सबकुछ उड़ेल देगें। रंजिश पाल लेगें तो हर कोने से उसके खिलाफ जुट जाएगे।

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  • rajesh srivastava says:

    yas bhai, isiliye to kahte hain ki shashi ne ..aaj ke bad amar ujala ki mari hai ab hindustan ki bari hai… jai ho shani-sekhar ki.

    Reply
  • sawal is bat ka nahi hai ki kya hua. post aur commevt dekhkar yahi lag raha hai ki hum hum apne apne pale ki peshbandi kar rahe hai.
    maine rajendra sir ke sath bhi kam kiya hai aur ashok sir ke sath bhi. dono ki apni chamtaye hai aur dono ne samay par sabit bhi kiya hai. aise me jaruri yeh hai ki kewal mudde par bat ki jay. kya sidhi sapat bat nahi ho sakti aur hum swarthao ki peshbandi me bhadas ko use na kare.

    Reply

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