मुरादाबाद में खनन माफिया के गुंडों ने प्रेस फोटोग्राफरों को बुरी तरह पीटा

मुरादाबाद। रेत खनन माफिया का दुस्साहस दिनोंदिन बढ़ता ही जा रहा है. बेखौफ खनन माफिया जहां दिन के उजाले में शहर के भीतरी हिस्सों व घनी आबादी में रामगंगा का तट खंगालने में भी संकोच नहीं कर रहे हैं, वहीं रोकथाम की कोशिश करने वाली सरकारी टीमों व कवरेज करती मीडिया टीमों पर हमलावर तेवर अपना रहे हैं. शनिवार दोपहर बेलगाम खनन माफिया ने अपना निशाना बनाया प्रेस फोटोग्राफरों को. महानगर के कटघर इलाके में पुल के नीचे खुलेआम रेत खनन का पता चलने पर नगर आयुक्त के निगम की छापामार टीम के साथ वहां पहुंचने की जानकारी मिली. इस सूचना पर कई मीडिया फोटोग्राफर मौके पर पहुंच गए.

अपने कारनामों के कैमरे में कैद होने के डर से माफिया के इशारे पर खनन में लगे मजदूरों ने मीडिया कर्मियों पर सरिया, डंडों व फावड़ों से जानलेवा हमला बोल दिया. तमंचे से फायर करते हुए हमलावरों ने दैनिक जागरण के फोटोग्राफर राजू सैनी व एक अन्य फोटोग्राफर अमित को घेरकर बुरी तरह पीटा. यही नहीं, दोनों के कैमरे, मोबाइल फोन, पर्स, एटीएम कार्ड, चेन, अंगूठी छीन लिया और बाइक भी तोड़ डाली. अन्य मीडिया कर्मियों के मदद के लिए शोर मचाने पर हमलावर दोनों को बेहोशी की हालत में छोड़कर फरार हो गए.

कुछ देर में ही पुलिस भी मौके पर पहुंच गई और बुरी तरह जख्मी हुए दोनों प्रेस फोटोग्राफर को जिला अस्पताल में भर्ती कराया. पुलिस ने आसपास तलाश की मगर कोई हमलावर हाथ नहीं आया. घटना से रोष में आए मीडिया के तमाम फोटोग्राफर व पत्रकार एसएसपी एन. चौधरी से मिले. एसएसपी ने मामले में सख्त कार्रवाई के साथ हमलावरों की शीघ्र गिरफ्तारी को एसओ को निर्देश दिए हैं.

मुलायम सिंह जी ने यूपी के मुसलमानों को किस गलती कि सज़ा दी है!

Mohammad Anas : ना हरगिज़ नहीं, इस्तीफ़ा और गिरफ़्तारी से शहीद ज़िया उल हक़ नहीं वापिस आयेंगे.. ना… हमें नहीं मंज़ूर तुम्हारी ये सारी दलीले. हम हैं ही कहां, गिनती के दस बीस पचास ही बन पाते हैं ज़िया के जैसे, बाकियों को तुम जब मर्जी स्टेशन और घरों की दिवारों के पीछे से जेलों की सलाखो के पीछे डाल देते हो! राजा भैय्या या उसके जैसे मुख्तार और शहाबऊद्दीनो ने जाने कितने को मारा होगा, क्या उन सबको वापिस ला पाओगे, शायद नही ..तो फ़िर क्यों करते हो ऐसा काम, क्यों जगह दी थी मंत्रीमंडल में… क्यों एक निर्दलीय को जो खुद जेल के भीतर रहता है, उसे जेल मंत्री बना देते हो…

ये प्रदेश की कानून व्यवस्था से मजाक नहीं था तो और क्या था… फ़िर जिस राजा पर अस्थान में मुसलमानो को चुनावी रंजिश का सबक सिखाने के लिये पूरा मोहल्ला फ़ूंक देने की ज़रुरत पड़ जाये, उस राजा भैय्या को आप अपने साथ चोपर मे घुमाते हैं, जिस राजा भैय्या के भय से पुलिस वाले अपना ट्रांसफ़र करवाये, उस राजा भैय्या को आप और ताकतवर बना देते हो, ताकि वर्दी वाले ही उसे सेल्य़ुट करें… आज़म खान साहब, आप तो आये थे पिछली बार हमारे मुहाने, रुआंसे हो कर पिछली बसपा सरकार के कारनामों का हवाला दे रहे थे, और कह गये थे कि अपनी नस्ल बचानी हो तो सपा को वोट दीजिये… देखिये ना साब, हमने दिया वोट, और आपके भेजे हुए 224 लोगों को चुन कर सत्ता की चाभी सौंप दी, आपने नस्ल और वंश को ही खत्म कर दिया, किस गलती कि सज़ा दी है मुलायम सिंह जी ने!

युवा पत्रकार और एक्टिविस्ट मोहम्मद अनस के फेसबुक वॉल से.

प्रतापगढ़ में राजा भैय्या के तिलिस्म और गुंडा राज के सबसे प्रबल विरोधी वहां के मुसलमान रहे हैं

Mohammad Anas : हथिगवां एसओ मनोज शुक्ला और कुंडा के कोतवाल सर्वेश मिश्र ने सीओ ज़िया उल हक़ से कहा था कि आप जाइये गांव के भीतर… जब आक्रोशित भीड़ उन्हें घेर कर मारने लगी तो पुलिस के ये वीर सिपाही भाग कर शौचालय और पशुबाड़े में छिप जाते हैं… कल से फ़ेसबुक पर इस तरह की कहानी तैर रही है कि सर्वेश मिश्र भी शहीद हुए हैं, ऐसे भगोड़े वर्दी धारियों के लिये सीओ कि बीवी सिर्फ़ इतना कह पा रही है कि ये सब चाह लेते तो मेरा फ़रिश्ता बच जाता, वो कुंडा पीएचसी के बाहर जब रोती हैं तो आस पास खड़े सारे लोग रोने लगते थे, अभी उम्र ही कितनी है सिर्फ़ 27 साल!

xxx

प्रतापगढ़ में राजा भैय्या के तिलिस्म और गुंडा राज के सबसे प्रबल विरोधी वहां के मुसलमान रहे हैं ,पिछली बसपा सरकार में जिला अधिकारी मुहम्मद मुस्तफ़ा होते हैं जो कि राजा से उसके पाप का हिसाब लेते हैं इस बार अस्थान में हुए दंगे के बाद सी ओ के पद पर कुंडा में तैनात हुए जुझारू और निर्भीक परन्तु सरल स्वभाव के ज़िया उल हक़ ना तो राजा के दरबार में हाजिरी लगाने जाते हैं ना ही उसके आतंक के आगे हथियार डालते हैं… पिछले लोक सभा के चुनाव में इलाहाबाद के बाहुबली एवं फ़ूलपुर के पूर्व सांसद अतीक अहमद राजा के किले को चुनौती देते हैं और प्रतापगढ़ के मुसलमान एवं पटेल उन्हें पूरी ताकत से जिताने की कोशिश करते हैं पर यह संभव नही हो पाता…. इन सबके बाद अस्थान को राजा के लोग जला देते हैं… पचास से अधिक घर फूंक दिये जाते हैं… वजह चुनावी रंजिश और दबंग बने रहने की ठसक! अब अगर कोई ये कहे कि डीएसपी ज़िया उल हक़ की हत्या में उनका धर्म अलग करके बात की जाये तो ये सबसे बड़ी मूर्खता होगी… राजा के अब्बा हूजूर पर वैसे ही एक दशक से अधिक समय पहले पूरा मोहल्ला जलाने का आरोप लग चुका है, जो कि सिर्फ़ मुसलमानों का मोहल्ला होता है, किसी दूसरे ग्रह से आये हुए एलियन लोगों का मोहल्ला नहीं…. कुछ सज्जन और भोले भाले टाइप के लोग आयेंगे और कहेंगे आप फ़िर मुसलमान-मुसलमान खेलने लगे तो उनसे अभी ही कहे देता हूँ, ये भारत है,  यहां आज भी हिन्दू के घर में मुसलमान के लिये अलग गिलास और मुसलमान के घर में हिन्दू के लिये अलग कटोरी रखी जाती है, ये कोई अमेरिका नही हैं, प्रतापगढ़ है जहां राजा भैय्या जैसा कम्युनल विधायक कई दशक से चुनाव जीत रहा है!

युवा पत्रकार और एक्टिविस्ट मोहम्मद अनस के फेसबुक वॉल से.

दिल्ली की 35 महिला पत्रकारों को ”इंद्रप्रस्थ मीडिया रत्न पुरस्कार” मिला, ये है नामों की लिस्ट…

नयी दिल्ली : राजधानी की 35 महिला पत्रकारों को आज यहां इंद्रप्रस्थ मीडिया रत्न पुरस्कार 2013 से सम्मानित किया गया। राजधानी के कंस्टीट्यूशन क्लब में ‘इंद्रप्रस्थ प्रेस क्लब ऑफ इंडिया’ संस्था द्वारा आयोजित समारोह में इन पत्रकारों को यह सम्मान प्रदान किया गया। संस्था के अध्यक्ष नरेंद्र भंडारी और महासचिव अंजलि भाटिया ने इस मौके पर कहा कि दिल्ली में चर्चित सामूहिक बलात्कार की घटना के बाद उनकी संस्था ने आगामी अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस (आठ मार्च) को ध्यान रखने में रखकर महिला पत्रकारों को सम्मानित करने का फैसला किया।

पत्रकारिता के क्षेत्र में उनके योगदान के लिए ज़ी न्यूज की श्वेता के अलावा पीटीआई भाषा की मनीषा श्रीवास्तव, पीटीआई की रूचि, दिव्या (न्यूज 24), सायदा (सहारा समय), ममता (महुआ न्यूज), आरती पांडेय (लाइव इंडिया), अंशिया राय (एनडीटीवी), निष्ठा (टाइम्स नाउ), प्रमिला दीक्षित (आजतक), संजोली (इंडियान्यूज), सोनल (सीएनएनआईबीएन), विनीता (एबीपी न्यूज), निधि (पीसेवन न्यूज), ज्योति (ट्रिब्यून), नाविद (इंडियन एक्सप्रेस) को सम्मानित किया गया।

इनके अलावा नीतू (हरिभूमि), निवेदिता (हिन्दुस्तान टाइम्स), रश्मि (अमर उजाला), परिनिती (दैनिक भास्कर), अर्चना ज्योति (पाइनियर), वैशाली (हिन्दुस्तान टाइम्स), योजना (एशियन एज), तनुश्री (ईस्टर्न क्रोनिकल), वंदना अग्रवाल (हिन्दुस्तान टाइम्स), सुनीता तिवारी (नंदन), संगीता वर्मा (यूएनआई), गीतिका (चाइल्ड कैरियर), गायत्री वशिष्ठ और शिखा कौशिक (जाब फार वुमैन), प्रतिभा शुक्ला (जनसत्ता), अनीता रावत (विजयपथ), रिचा (न्यूज एक्सप्रेस), उजमा हैदर नकवी (आवाम ए हिन्द), रिचा (चैनल वन), दिव्यज्योति सक्सेना को भी सम्मान से नवाजा गया। पत्रकारिता के साथ सामाजिक क्षेत्र में अहम योगदान दे रहे पंजाब केसरी के वरिष्ठ पत्रकार अश्वनी चोपड़ा और पत्रकार अनिल नरेंद्र को भी सम्मानित किया गया। इनके अलावा चार जनसंपर्क अधिकारियों को भी पुरस्कृत किया गया।
 

टोटल टीवी से इस्तीफा देकर न्यूज एक्सप्रेस में चैनल में एंकर-प्रोड्यूसर बने रोहित पुनेठा

टोटल टीवी के प्रमुख एंकर और प्रोड्यूसर रोहित पुनेठा ने अपनी नई पारी न्यूज एक्सप्रेस चैनल के साथ शुरू की है। न्यूज एक्सप्रेस में भी उन्‍हें एंकर / प्रोड्यूसर बनाया गया है।  रोहित पुनेठा ने सितंबर 2012 में ही साधना न्यूज से इस्तीफा दे कर टोटल टीवी ज्वाइन किया था। टोटल टीवी से पहले रोहित साधना न्यूज और टीवी 100 में कार्यरत रहे हैं। रोहित पुनेठा की गिनती मीडिया के उभरते और प्रतिभाशाली एंकरों में की जाती है।

भड़ास तक अपनी बात आप bhadas4media@gmail.com के जरिए पहुंचा सकते हैं.

जागरण कार्यालय में मंत्रियों के आने पर छापा पड़ने की अफवाह उड़ी

दैनिक जागरण के बदायूं कार्यालय में मंत्री लोग ब्यूरो चीफ के बुलावे पर आए तो शहर में चर्चा फैल गई कि जागरण पर छापा पड़ा है. हुआ यह कि कल बदायूं में उत्तर प्रदेश सरकार के मंत्री अबधेश कुमार और अरुण कुमार कोरी विभिन्न योजनाओं के चेक वितरित करने आये थे. ये लोग जागरण के ब्यूरो चीफ के पूर्व परिचित भी बताये जाते हैं. कार्यक्रम में ही जागरण के ब्यूरो चीफ ने उनसे मुलाक़ात कर कार्यालय आने का आग्रह कर लिया, तो कार्यक्रम के बाद दोनों मंत्री भारी पुलिस फ़ोर्स के साथ जागरण कार्यालय पहुँच गये.

इसे देख कर शहर में अफवाह फ़ैल गई कि जागरण कार्यालय में रेड पड़ी है. लोग जागरण कार्यालय की ओर दौड़ पड़े. पर मौके पर आकर पता चला कि कार्यालय में मंत्री बैठे हैं, तो लोग जागरण के ब्यूरो चीफ के झटके की चर्चा करते हुए लौट गये. उधर जागरण कार्यालय के सामने गाड़ियों का रेला जमा होने से जाम लग गया, जिससे लोगों को बेहद परेशानी का सामना करना पड़ा. एक घंटे तक जागरण के रिपोर्टर मंत्रियों और मंत्रियों के साथ आये अधिकारियों की आवभगत में लगे रहे, जिससे जागरण का काम कल देर से शुरू हुआ. साथ ही यह भी चर्चा रही कि ऐसा अमर उजाला या हिन्दुस्तान के ब्यूरो चीफ ने कर दिया होता, तो नौकरी पर ही बन आती, ऐसा जागरण में ही हो सकता है.

एक झटके में ही आडवाणी हुए रेस से बाहर!

भाजपा के तीन दिवसीय राष्ट्रीय अधिवेशन का आज समापन होने जा रहा है। शुक्रवार को कार्यकारिणी की बैठक हुई थी। इसमें भी पूरे समय गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी की वाहवाही, बाकी सभी मुद्दों पर भरी पड़ी। पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने भी पहले दिन से ही मोदी महिमा के बखान से शुरुआत की। इसके बाद तो यह सिलसिला लगातार बढ़ता ही रहा। कल से दो दिवसीय राष्ट्रीय परिषद की बैठक शुरू हुई है। इसमें भी मोदी ही छाए रहे।

राजनाथ सिंह ने जिस अंदाज में मंच पर मोदी को माला पहनाई, वह अपने में अभूतपूर्व माना जा रहा है। इस खुले अधिवेशन में देशभर से आए करीब 22 सौ प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया। ज्यादातर नेता मोदी का ही ‘भजन’ करते नजर आए। कई उत्साही कार्यकर्ताओं ने तमाम रोकटोक के बावजूद मोदी के पक्ष में नारे भी लगा डाले। दबाव यही रहा कि इसी अधिवेशन में मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किया जाए।

अपना महिमा मंडन देख-सुन कर मोदी लगातार मुस्कराते देखे गए। लंबे अरसे बाद यह पहला मौका है, जबकि गुजरात के मुख्यमंत्री तीन दिन के अधिवेशन में पूरे समय हाजिर रहे। राजनाथ सिंह ने यह भी याद दिला डाला कि मोदी भाजपा के पहले ऐसे नेता हैं, जो लगातार भारी बहुमत से तीसरी बार मुख्यमंत्री बनने में सफल रहे हैं। जबकि कांग्रेस जैसी बड़ी पार्टी ने मोदी को हरवाने के लिए अपनी पूरी ताकत लगा डाली थी। इसके बावजूद मोदी ने जीत का इतिहास बना डाला है। ऐसे में स्वाभाविक तौर पर पार्टी के सभी कार्यकर्ताओं के लिए वे अहम बन गए हैं। पार्टी नेतृत्व, मोदी के बारे में सभी कार्यकर्ताओं की भावनाओं को समझ रहा है। ऐसे में इन भावनाओं का आदर जरूर किया जाएगा। अध्यक्ष के तौर पर वे सभी को इस बात का आश्वासन दे रहे हैं।

कल मंच पर ही उन्होंने माला पहनाकर मोदी का अभिनंदन किया था। इसी के साथ उन्होंने सभी का आह्वाहन कर दिया था कि सभी प्रतिनिधि खड़े होकर अपने लोकप्रिय नेता का स्वागत कर दें। अध्यक्ष ने माहौल में जोश पैदा करने की कोशिश की, तो कुर्सियों पर जमे बैठे प्रतिनिधियों ने खड़े होकर काफी देर तक तालियां बजार्इं और मोदी के पक्ष में नारेबाजी कर डाली। कई वक्ताओं ने इस बात पर जोर दिया कि यदि पार्टी को अपनी जोरदार चुनावी हवा बनानी है, तो मोदी का नाम पीएम उम्मीदवारी के लिए तुरंत घोषित कर दिया जाए। बिहार भाजपा के पूर्व अध्यक्ष सीपी ठाकुर ने तो कार्यकारिणी की बैठक में भी मोदी के नाम की जमकर माला जपी थी। जिस अंदाज में पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने कार्यकारिणी से लेकर राष्ट्रीय परिषद में मोदी की सराहना की है, उससे सीपी ठाकुर काफी खुश नजर आए।

पूर्व केंद्रीय मंत्री सीपी ठाकुर कहते हैं कि नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में एक दशक के अंदर गुजरात का कायाकल्प हो गया है। इस राज्य ने विकास और सुशासन के नए मापदंड बना दिए हैं। सच्चाई तो यह है कि गुजरात का विकास पूरे देश के लिए एक आदर्श मॉडल बन गया है। नरेंद्र मोदी कुशल प्रशासक भी साबित हुए हैं। ऐसा शख्स देश की बागडोर संभाले, तो बात बन जाए। उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री भगत सिंह कोश्यारी ने राष्ट्रीय कार्यकारिणी के बाद, राष्ट्रीय परिषद की बैठक में भी अपनी मोदी मुहिम जारी रखी। उनका कहना है कि बगैर किसी देरी के मोदी के नाम का ऐलान हो जाना चाहिए। यदि ऐसा किया गया, तो पार्टी को खास राजनीतिक फायदा मिलेगा। क्योंकि सभी ने देख लिया है कि देशभर से आए पार्टी प्रतिनिधियों ने एक स्वर से मोदी का ही नाम लिया है। यदि नाम का ऐलान हो जाता है, तो पार्टी को अंदरूनी कलह के तमाम मामलों से अपने आप राहत मिल जाएगी। क्योंकि मोदी के नाम का जादू पार्टी के कार्यकताओं में दूना उत्साह पैदा कर देगा।

राज्यसभा में विपक्ष के नेता अरुण जेटली ने भी खुलकर मोदी की तारीफ करनी शुरू कर दी है। जबकि मोदी को लेकर उनका रवैया सवालों के घेरे में माना जाता रहा है। लेकिन मोदी के पैरवीकरों की संख्या बढ़ती देखकर उन्होंने भी यह बात स्वीकार कर ली है कि पार्टी के अंदर सबसे लोकप्रिय नेता मोदी हो गए हैं। जेटली ने एक मीडिया इंटरव्यू में यह बात स्पष्ट रूप से स्वीकार की है कि प्रधानमंत्री पद की उम्मीदवारी के लिए वे सबसे मजबूत दिखाई पड़ते हैं। क्योंकि पार्टी कार्यकर्ताओं की भावनाएं सबसे ज्यादा उनके साथ हैं। जेटली के इस नए रुख को भाजपा के हलकों में काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

लोकसभा में विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज के रुख को लेकर जरूर पार्टी की निगाहें टिकी हैं। क्योंकि इस अधिवेशन में सुषमा ने मोदी का महिमा मंडन नहीं किया। राजनाथ जैसे नेताओं की तरह उन्होंने यह भी नहीं कहा कि पार्टी में मोदी ही सबसे लोकप्रिय नेता हैं। उल्लेखनीय है कि सुषमा को भी पीएम उम्मीदवारी की रेस में माना जा रहा है। शिवसेना के प्रमुख बाल ठाकरे ने अपने आखिरी दिनों में कहा भी था कि सुषमा, भाजपा में सबसे काबिल नेता हैं। इस बयान के बाद पार्टी में यह बहस शुरू हो गई थी कि सुषमा का नाम आगे बढ़ा, तो मोदी का सपना अधूरा रह सकता है। वैसे भी उनके नाम को लेकर एनडीए के घटकों में एक राय नहीं है। खासतौर पर जदयू ने मोदी को लेकर अल्टीमेटम तक दे डाला है। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार कह चुके हैं कि सांप्रदायिक छवि वाले किसी नेता को वे अपना पीएम उम्मीदवार स्वीकार नहीं कर सकते। हालांकि, जेटली ने कहा है कि अभी जल्दबाजी में कोई निष्कर्ष निकालना ठीक नहीं होगा। पार्टी की कोशिश है कि जदयू से सहमति बनाकर ही चला जाए। वे खुद नीतीश कुमार के संपर्क में रहते हैं। उन्हें उम्मीद है कि जदयू का साथ बना रहेगा।

गुजरात विधानसभा का चुनाव मोदी के नेतृत्व में तीसरी बार भाजपा ने जीता है। इस जीत के बाद मोदी को केंद्रीय राजनीति में लाने का दबाव बढ़ा है। संघ नेतृत्व ने भी मोदी के पक्ष में दबाव बना दिया है। पार्टी के नए अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने इस अधिवेशन से साफ-साफ संकेत दे दिए हैं कि मोदी के मामले में उनका रुख पूरे तौर पर सकारात्मक है। पार्टी के बुजुर्ग नेता लालकृष्ण आडवाणी को लेकर कई तरह के कयास लगते रहते हैं। चर्चा यह भी रही है कि ऐन वक्त पर ‘पीएम इन वेटिंग’ के लिए आडवाणी के नाम पर ही सहमति बनेगी। क्योंकि उनके नाम पर किसी घटक को ऐतराज नहीं हो सकता। उल्लेखनीय है कि 2009 के चुनावों में आडवाणी ही एनडीए के ‘पीएम इन वेटिंग’ थे। लेकिन इस चुनाव में हार के बाद संघ नेतृत्व के इशारे पर उन्हें ‘रिटायर’ करने की पहल तेज कर दी गई थी। लेकिन आडवाणी ने कभी नहीं कहा कि वे किसी रेस से बाहर हो गए हैं। ऐसे में उनको लेकर पार्टी में अटकलों का बाजार गरम बना रहा है।

लेकिन पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने अधिवेशन में कुछ ऐसे शब्द कहे जिससे कि एक झटके में ही आडवाणी ‘रेस’ से बाहर होते लगे। पार्टी अध्यक्ष ने कह दिया कि आदरणीय आडवाणी जी पार्टी में संकटमोचक की तरह हैं। वे हमेशा हमारे मार्गदर्शक बने रहेंगे। पार्टी हलकों में राजनाथ की इस टिप्पणी का यही निहितार्थ माना जा रहा है कि अब आडवाणी की भूमिका महज मार्गदर्शक की ही रहेगी। हालांकि, इस संदर्भ में पार्टी का कोई वरिष्ठ नेता औपचारिक टिप्पणी करने को तैयार नहीं हुआ। पार्टी प्रवक्ता शहनवाज हुसैन ने यही कहा है कि नेतृत्व ने अधिवेशन में प्रतिनिधियों की भावनाएं समझ ली हैं। प्रधानमंत्री पद की उम्मीदवारी का फैसला सही समय पर संसदीय बोर्ड लेगा। ऐसे में राष्ट्रीय परिषद की बैठक में किसी को फैसले की उम्मीद करनी भी नहीं चाहिए।

बिहार भाजपा के वरिष्ठ नेता एवं नीतीश सरकार के कैबिनेट मंत्री गिरिराज सिंह मोदी के धुर समर्थक माने जाते हैं। कार्यकारिणी की बैठक में उन्होंने जोर देकर कहा था कि अब मोदी के नाम का ऐलान हो ही जाना चाहिए। लेकिन शनिवार को उनकी प्रतिक्रिया यही रही कि पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने जिस अंदाज में मंच पर मोदी का अभिनंदन किया है, उससे उन्होंने साफ-साफ संदेश दे दिया है। अब मोदी के नाम का ऐलान हो या नहीं, इससे ज्यादा फर्क नहीं पड़ता? इसी तरह की भावनाएं कोश्यारी सहित कई धुर मोदी समर्थकों ने व्यक्त की हैं। राष्ट्रीय परिषद की बैठक में कई राजनीतिक और आर्थिक प्रस्ताव भी रखे गए। प्रतिनिधियों ने यूपीए सरकार के खिलाफ अपनी राजनीतिक मुहिम चलाने के लिए रणनीतियों पर भी लंबी चर्चा की। राजनाथ ने जोर देकर यही कहा कि करप्शन ही ऐसा मुद्दा है, जिसे घर-घर तक पहुंचाकर कांग्रेस को निर्णायक शिकस्त दी जा सकती है। यह काम पार्टी ने शुरू भी कर दिया है। अब इसको बड़े स्तर पर शुरू किया जाए, तो 2014 का विजय लक्ष्य पाने में कोई दिक्कत नहीं होगी।

लेखक वीरेंद्र सेंगर डीएलए (दिल्ली) के संपादक हैं। इनसे संपर्क virendrasengarnoida@gmail.com के जरिए किया जा सकता है।

सेबी ने फिर सहारा के खिलाफ जारी की एडवाइजरी, अबकी बैंकों को किया एलर्ट

पूंजी बाजार नियामक भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) ने अब बैंकों, वित्तीय संस्थानों और सरकारी विभागों को भी सहारा समूह की दो कंपनियों और उनके वरिष्ठ अधिकारियों से लेन-देन में सावधानी बरतने की सलाह दी है. इससे पहले सेबी ने सहारा से कारोबार को लेकर आम लोगों को चेताया था. सेबी ने सहारा की इन कंपनियों की संपत्तियां जब्त करने का आदेश जारी कर चुका है.

सेबी ने बैंकों, म्युचुअल फंडों, पूंजी बाजार इकाइयों और सरकारी विभागों को भेजी अपनी सलाह में कहा है कि सहारा की दो कंपनियों की संपत्तियां जब्त की जा रही है, इसलिए इनके साथ लेन-देन में पूरी सतर्कता बरतें. सेबी ने सहारा इंडिया रीयल एस्टेट कॉरपोरेशन, सहारा हाउसिंग इन्वेस्टमेंट कॉरपोरेशन और समूह के चेयरमैन सुब्रत राय सहित तीन अन्य निदेशकों के बैंक खाते, सभी निवेश और अन्य चल-अचल संपत्तियां जब्त करने का आदेश जारी किया है.

सेबी अब तक सैकड़ों वित्तीय संस्थानों को यह सलाह भेज चुका है. बाकी को भी यह संदेश भेजा जा रहा है. सेबी ने कहा कि है वह निवेशकों का पैसा वापस करने को सहारा से 19 हजार करोड़ रुपये की वसूली के लिए बैंकों, भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) और अन्य नियामकों की मदद लेगा. सहारा ने सेबी को अब तक 5,120 करोड़ रुपये की रकम का भुगतान किया है. सुप्रीम कोर्ट ने अगस्त में कंपनी को निवेशकों से जुटाए गए 24,000 करोड़ रुपये की रकम ब्याज सहित लौटाने का आदेश दिया था. अदालत ने सेबी को इस रकम को निवेशकों तक पहुंचाने की जिम्मेदारी सौंप रखी है.

सीओ के मौत पर इतना हल्ला, प्रधान और उसके भाई की मौत पर चर्चा नहीं!

Harishankar Shahi : प्रतापगढ़ के बालीपुर विवाद के बारे में खूब स्यापा पढ़ने में आ रहा है. इसमें पुलिस के एक अधिकारी जो मुस्लिम भी थे, उनकी मौत हो गई. पूरे घटनाक्रम की शुरुआत में बालीपुर ग्राम प्रधान की हत्या हुई थी और उसके बाद पुलिस फायरिंग में उसके भाई की मौत हो गई थी. लेकिन स्यापा के रंग देखिये. सारा जोश जूनून केवल साहब के मरने पर है. इन दो और आम लोगों के मरने पर किसी ने शब्द भी खर्च नहीं किये. साहब मुसलमान थे और पांच वक्त के नमाज़ी व देशभक्त थे, यह बातें खूब फेस्बूकियाई जा रही है. लेकिन उन दो अन्य मरने वालों का नाम लेना फेसबुक एक्टिविज्म और पत्रकारिता के लिए पाप होता जा रहा है.

अधिकारी के नाम पर सीधा निशाना कुंडा से विधायक और मंत्री रघुराज प्रताप सिंह पर साधकर अपनी राजनीति को चमकाने का अच्छा प्रदर्शन है. किसी को मार डालना अच्छा नहीं हो सकता पर क्या मरने में भी भेद विभेद रखा जाना चाहिए. अधिकारी के मरने पर मंत्री को निशाने पर लेने से पहले क्या पुलिस फायरिंग में मरने वाले के प्रति चंद शब्द खर्च कर देना गुनाह हो जाएगा. पत्रकारिता में एक्टिविज्म वाले अब मौके के साथ राजनीति हल करने लगते हैं. तो मुस्लिम समुदाय के पुलिस अधिकारी के बहाने मंत्री से सियासी खुन्नस निकाल लेने का काम शुरू हो चूका है. कलम के धनी माने जाने वाले लोग भी कोरस गान कर रहे हैं.

इलाहाबाद के एक माफिया नेता जिन्होंने अपनी ही पिछड़े वर्ग की एक पार्टी के नेता की बेटियों पर दबाव बनाकर उन्हें उनकी पिता की मौत की बाद निकलने और पार्टी के टूटने पर मजबूर कर दिया. उनको इस कांड की राजनीति में एक हीरो की तरह भी पेश करते हुए कुछ फेसबुक पोस्ट पढ़ने को मिली हैं. एक्टिविज्म को लाइक करना एक्टिविस्ट होना अच्छी बात है लेकिन हमेशा ग्लैमर साधने की कोशिश करने वाले की बातों को एकदम से यकीन कर लेना पता नहीं कैसा होगा. श्रद्धांजली और विरोध का दौर शुरू हो गया है जिसमें एक पक्ष में साहब के सहारे राजनीति हल करने वाले है जिनका उद्देश्य मंत्री को निशाना बनाना है और दूसरे पक्ष में मंत्री है. लेकिन इसी बीच साहब से भी पहले मरे उन दो लोगों को एक बार याद करते हुए उनके लिए भी चन्द शब्द दर्ज करना पत्रकारिता और इसके सहारे के एक्टिविज्म हल करने वालों के लिए शायद जरूरी ना हो. बालीपुर ग्राम प्रधान और उनके भाई को श्रद्धान्जलि. इनकी गलती इतनी थी यह साहब नहीं थे. और इनके सहारे राजनीति हल नहीं हो पाती. मौत और हत्या भी राजनैतिक वजन मांगती है. और अब पत्रकारिता के शब्द वजन के आधार पर लुढकते हैं.

हरिशंकर शाही के फेसबुक वॉल से.
 

जानवरों से भी बदतर है मेनका गांधी के स्‍कूल के शिक्षकों की दशा

पशु पक्षियों के संरक्षण के लिए अभियान चलाने वाली मेनका गाँधी के विद्यालय के अध्यापको की दशा जानवरों से भी बदतर है । शोषण अन्याय के खिलाफ अध्यापक आन्दोलन की राह पर है । अध्यापकों ने महंगाई की मार से बचाने के लिए वेतन बढ़ाने की मांग की तो उन्हें निष्कासित कर दिया गया । मनरेगा मजदूरों की मजदूरी से कम वेतन पाने वाले एम० एड० तथा बी० एड० की डिग्री लेकर बच्चों को पढ़ने वाले अध्यापक ताला बंद हड़ताल पर बैठ गये है ।

कालीन बुनकरों व गरीब बच्चों को शिक्षा देने के नाम पर मीरजापुर जिले के छानबे विकास खण्ड अंतर्गत कलना गाँव में रग मार्क जूनियर हाईस्कूल संचालित है । विद्यालय में 187 बालक बालिकाओं को 9 अध्यापक शिक्षा प्रदान करते है । तीन माह से अध्यापकों को वेतन नही मिला है । महंगाई से त्रस्त आम इन्सान होने के नाते अध्यापकों ने वेतन वृद्धि की माँग की तो एक साथ 5 अध्यापको का तबादला वर्तमान विद्यालय से करीब 120 किलोमीटर दूर के विद्यालयों पर कर दिया गया । उच्च शिक्षा ग्रहण करने के बावजूद मात्र 3414 (तीन हजार चार सौ चौदह ) रूपये में काम करके बेरोजगारी के कलंक से मुक्ति पाने वाले अध्यापकों को दो दिन बाद ही निलम्बित कर दिया गया । संस्था के प्रबंध तंत्र के खिलाफ बगावत का झंडा बुलंद कर अध्यापक धरना प्रदर्शन पर बैठ गये है । प्रधानाचार्य अशोक शर्मा , अध्यापक आशुतोष चतुर्वेदी का कहना है कि पशु पक्षियों से प्रेम करने एवं उनके संरक्षण के लिए आवाज़ बुलंद करने वाली मेनका गाँधी रगमार्क संस्था की चेयर परसन है । इस संस्था को बच्चों के शिक्षा के लिए जर्मनी तथा विश्व बैंक से अनुदान प्राप्त होता है । विदेशी धन आने के बावजूद विद्यालय में अध्यापको की दशा जानवरों से भी बदतर है । इनकी गुहार सुनने के बजाय तानाशाही रवैया अपनाया जा रहा है । इलाके में तमाम विद्यालय होने के बाद भी अच्छी शिक्षा देने के लिए विख्यात रगमार्क स्‍कूल में जूनियर हाई स्कूल होने से सैकड़ो अभिभावकों ने अपने बच्चों का प्रवेश कराया । दस बारह वर्षो से बच्चों को पढ़ा रहे अध्यापक कल तक अच्छे थे, आज वेतन वृद्धि की माँग किया तो वह उनका अपराध बन गया । अध्यापको के हड़ताल पर जाने से पठन पाठन बंद है । विद्यालय में ताला बंदी व हड़ताल से अभिभावक चिन्तित है आखिर उनके बच्चों का भविष्य दाँव पर लगा है । पूर्वांचल के चार जिलों में संस्था के सात विद्यालय संचालित है । वाराणसी में एक , इलाहाबाद में एक , भदोही (संत रविदास नगर ) – 4 तथा मीरजापुर में एक विद्यालय खुला है । जिसको वाराणसी के क्षेत्रीय कार्यालय द्वारा संचालित किया जाता है । अध्यापकों के तमाम आरोपों को क्षेत्रीय प्रबन्धक संजीव मिश्र ने अनुशासन हीनता बताया । कम वेतन पर संस्था के ऊपर वालो तक बात पहुचाने को कह कर किनारा कस लिया । सभार- नितिन अवस्‍थी

राहुल शर्मा ने न्यूज11 से इस्तीफा देकर आर्यन टीवी ज्वाइन किया

पटना से सूचना है कि राहुल शर्मा ने आर्यन टीवी में बतौर एंकर कम प्रोड्यूसर के रूप में कल ज्वाइन कर लिया. राहुल अभी तक न्यूज11 में काम कर रहे थे. वहां से उन्होंने इस्तीफा देकर आर्यन का दामन थामा है. वे न्यूज11 में भी एंकर के रूप में कार्यरत थे. राहुल रफ्तार टीवी, दूरदर्शन, जी न्यूज, आल इंडिया रेडियो में ट्रेनी जर्नलिस्ट के रूप में काम कर चुके हैं. 

मीडिया से जुड़ी सूचनाएं, आलेख, विश्लेषण, वीडियो, आडियो, स्टिंग, टिप्पणी, क्रिया, प्रतिक्रिया आदि-इत्यादि भड़ास तक पहुंचाने के लिए आप bhadas4media@gmail.com पर मेल भेज सकते हैं.

कहानी उस पत्रकार की इस प्रकार है…

सेवा में, प्रधान संपादक (यशवन्त जी), सादर प्रणाम! मेरे एक मित्र ने बताया कि आप पत्रकारों की खबर भी छापते हैं। जो पत्रकार अनियमितता करता हो उसका पोल खोलते हैं। लेकिन मुझे दुःख के साथ कहना पड़ रहा है कि एक पत्रकार जो तस्कर है अखबारों से निकाला जा चुका है उसका संरक्षण आप दे रहे हैं तथा उसकी लिखी खबर भी लगा रहे हैं। इसके पहले भी मैं आपको एक मेल भड़ास4मीडिया पर किया था। आपने कुछ उत्तर नहीं दिया। कहानी उस पत्रकार की इस प्रकार है-

महराजगंज जिला मुख्यालय से 40 किमी दूर हमारा कस्बा ठूठीबारी स्थित है जो नेपाल बार्डर के समीप है। यहां पर तस्करी खुलेआम होती है और यह पत्रकार की कहानी है कि कथा कथित पत्रकार अरूण कुमार वर्मा पुत्र भगवती प्रसाद वर्मा अमर उजाला का ठूठीबारी का प्रतिनिधि था और सहज जन सेवा केन्द्र चलाता था। उसने हमारे मोटर सायकिल का वीमा सहज जन सेवा केन्द्र से  किया। जिस मोटर सायकिल का नंबर यू.पी.56 ई 8084 का वीमा फर्जी स्कैन करके दिया। मेंरे तरह ही लगभग दस लोगों का वीमा स्कैन करके फर्जी तरीके से नाम बदलकर सबको देता गया। जब इसकी जानकारी हमको हुयी तो हमने वीमा कंपनी ओरियेन्टल को पत्र लिख सत्यता जॉच करने के लिये पहल किये। वस्तुतः मामला फर्जी निकला। सहज कंपनी के द्वारा मामला फर्जी होन पर उसका लाइसेंस निरस्त हो गया तथा हम लोगों ने जिलाधिकारी से शिकायत की। जिलाधिकारी महोदय के निर्देश पर ठूठीबारी कोतवाली के अन्तर्गत 08.10.2012 को आई.पी.सी. की धारा 419, 420, 467, 468, 471, 506 के तहत मुकदमा पंजीकृत कर लिया गया। गिरफ्तारी भी हुई अन्ततः 6 महीना जेल भी रहा और कुछ दिनों के बाद एक महिला से दुष्कर्म में पकडा़ गया। फलतः गॉव के लोगों ने पंचायत कर मामला समझा बुझा दिया। गॉव के लोग अमर उजाला के जिला प्रभारी धीरज पाण्डेय से मुुलाकात की और सारी कहानी बताई। धीरज पाण्डेय ने उसको अपने अखबार से निकाल दिया।

अभी हमारे एक मित्र ने बताया कि वह भड़ास के लिये काम कर रहा है। मेरे पैर से जमीन खिसक गयी कि क्या यशवन्त जी ऐसे लोगों को जोड़ना प्रारम्भ कर दिये हैं। वह इन दिनों पुलिस पर अपनी धाक जमाने के लिये अपनी भी एक बेबसाइट चला रहा है। उस पर रिपोर्टिंग करता है तथा अपने को पत्रकार कहता है। जो आपके बेबसाइट पर श्री श्री रविशंकर की समाचार चल रही है वह उसका नहीं है, एक रिपोर्टर दिवाकर पाण्डेय का है, जो उस वेबसाइट पर खबर चलती है उसकी कॉपी कर आपको भेजता है जिससे आपकी छवि खराब हो रही है। मैं नीचे एफ. आई. आर. की प्रति एवं सहज जन सेवा केन्द्र का आई कार्ड तथा दिवाकर पाण्डेय का लिखा समाचार अटैच कर रहा हूं… स्वयं आप देख लीजिए। सच्चाई पता चल जायेगी। एफ.आई.आर. मेरी माता मंजू देवी द्वारा किया गया। मैं उन्हीं वादी का पुत्र हूं जो एक सरकारी बैंक में मैनेजर हूं।   

धन्यवाद!
मुन्ना प्रसाद जायसवाल   

पुत्र प्रभुनाथ जायसवाल
ठूठीबारी, जिला महराजगंज

रोमिंग फ्री फोन का वादा कहां गया?

संचार मंत्री कपिल सिब्बल ने पिछले साल कहा था कि नए साल में सेल फोन रोमिंग फ्री हो जाएंगे। पिछले महीने उन्होंने कहा कि फरवरी में रोमिंग फ्री हो जाएगा। फरवरी का महीना बीत गया। कहीं रोमिंग फ्री होने की सुगबुगाहट तक नहीं है। क्या केंद्रीय मंत्री सिब्बल भूलने लगे हैं। यह एक महत्वपूर्ण वादा है। देश भर के लोग रोमिंग फ्री घोषणा का इंतजार कर रहे हैं। देश के विभिन्न समाचार पत्रों को इसकी याद दिलानी चाहिए। इलेक्ट्रानिक मीडिया को इसकी याद दिलानी चाहिए।

कुछ जगहों पर तो यह लिखा गया है कि बजट लोकलुभावन है। कहां से लोकलुभवन है यह आम बजट? अगले ही दिन पेट्रोल १.४० रुपए महंगा हो गया। जो लोग यह लिख रहे हैं कि बजट लुभावना है,वे किस दुनिया में रहते हैं? क्या वे बाजार नहीं जाते? चीजें नहीं खरीदते? या कि वे केंद्र सरकार की तरफ से नियुक्त किए गए हैं। ऐसे हास्यास्पद लेख और बयान अक्सर अखबारों में छप रहे हैं। जो बजट की तारीफ करते अघा रहे हैं, क्या उन्हें नहीं पता कि आम आदमी महंगाई से कराह रहा है? धन्य हैं ऐसे विश्लेषक। हां, रोमिंग फ्री का वादा क्या खटाई में पड़ गया?

लेखक विनय बिहारी सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं.

तकनीकी चूक से एनडीटीवी ने खुद खोल ली अपनी पोल (देखें वीडियो)

तकनीक बड़ी मायावी होती है। आपको छिपा भी सकती है और आपका पर्दाफाश भी बड़ी आसानी से कर सकती है- जैसे स्वामी अग्निवेश का हुआ। अभी ताज़ा मामला NDTV का है। परसों के बड़ी बहस का मामला है। बहस के शुरुआत में भाजपा के राष्ट्रिय कार्यकारिणी की बैठक के अलोक में प्रवक्ता रविशंकर प्रसाद का बयान चल रहा था।

रविशंकर प्रसाद अपने बयान में कांग्रेस और बीजेपी की तुलना वगैरह की बात कर रहे थे और अपनी बात को विवेकानंद से भी जोड़ा। संभवतः कोई प्रोग्राम-कंट्रोलर या निर्माता रहा होगा जो एंकर को कह रहा है की इस बात पर कांग्रेस की तरफ से "डिफेंड" कर देना। हाँ भाई नमक अदायगी का सवाल जो है। तकनीकी चूक से ये बात लाइव प्रसारित हो गयी और रिकार्डेड भी- ठीक उसी तरह जैसे प्रधानमंत्री का #ठीक है- जुमला हो गया था। शायद मैं भूल गया वहाँ भी तो इसी NDTV के पचौरी जी थे।

टिप्पणी-  अभिनव शंकर

वीडियो डाउनलोडिंग व एडिटिंग : रोहित बरनवाल

वीडियो देखने के लिए उपरोक्त तस्वीर पर क्लिक कर दें.

उपेंद्र राय फिर हुए ताकतवर, मुख्यधारा में वापस लौटे

एक बड़ी और चौंकाने वाली खबर सहारा से आ रही है। हाल के दिनों में साइडलाइन कर दिए गए उपेंद्र राय पर सहारा समूह के चेयरमैन सुब्रत रॉय ने फिर से भरोसा जताया है। उपेंद्र राय को सहारा को संकट से निकालने का जिम्मा दिया गया है। सूत्रों के मुताबिक इसके लिए सहारा में एक आंतरिक मेल भी जारी किया गया है। सहारा के सभी विभागों के प्रमुखों को जारी मेल में कहा गया है कि वो उपेंद्र राय को पूरा सहयोग करें। यही नहीं उपेंद्र राय को मीडिया में दखल देने का भी पूरा अधिकार दिया गया है। यानी सहारा के लिए संकटमोचक की भूमिका में आ गए हैं उपेंद्र राय।

सूत्रों के मुताबिक सुब्रत रॉय से अधिकार मिलने के बाद शनिवार को देर रात उपेंद्र राय ने एक इमरजेंसी बुलाई जिसमें सहारा मीडिया के सभी वरिष्ठ शामिल हुए। सूत्रों के मुताबिक करीब चार घंटे चली इस मीटिंग में सहारा को संकट से उबारने के लिए एक रूपरेखा तैयार की गई। उपेंद्र राय के एक बार फिर से ताकतवर बनने से मौजूदा समय में मीडिया का काम देख रहे संदीप वाधवा खेमे में खलबली मच गई है। जाहिर है कि संदीप वाधवा पर सुब्रत रॉय का भरोसा कम हुआ है। सूत्रों के मुताबिक संदीप वाधवा सहारा के मीडिया डिवीजन को चलाने में अभी तक नाकाम साबित हुए हैं जिसको लेकर सुब्रत रॉय काफी नाराज हैं। सूत्रों का ये भी कहना है कि संदीप वाधवा से कॉरपोरेट फाइनेंस के प्रमुख की जिम्मेदारी भी छीन ली गई है। अब देखना ये है कि फिर से मजबूत हुए और मुख्यधारा में वापस लौटे उपेंद्र राय सहारा को संकटों से कितना बचा पाते हैं।

उनके लिए जिन्हें मनीषा पांडेय के बोलने से मिर्ची लगती है….

Shahnawaz Malik : जिन लोगों को मनीषा पांडेय के बोलने से मिर्ची लग रही है, ये दरअसल वही लोग और वही मानसिकता है, जिसके खिलाफ उसकी लड़ाई है। और ये लड़ाई भी सिर्फ मनीषा की नहीं, बल्कि किसी भी पढ़े-लिखे, समझदार और संवेदनशील व्‍यक्ति की है। और अगर नहीं है तो होनी चाहिए। कुंठित लोगों के पास जब कुछ और नहीं बचता तो निजी टीका-टिप्‍पणियों पर उतर आते हैं। मैं पूछता हूं कि आप लोग उसे जानते कितना हैं? उसकी पढ़ाई, उसके काम, उसके लिखने से कितना वाकिफ हैं? पत्‍नी को "नौकरानी" कहने पर इतनी तकलीफ क्‍यों हो रही है आपको? आपको लगता है कि नौकरानी के लिए कुछ महान शब्‍द ईजाद कर देने से वास्‍तविकता बदल जाएगी। क्‍या आप वो भोले इंसान हैं जो सचमुच "यत्र नार्यस्‍तु पूज्‍यंते" टाइप स्‍लोगन को सच माने बैठा है।

अपनी बात मैं एक कहानी के जरिए कहना चाहूंगा। रूसी लेखक अस्‍कद मुख्‍तार का एक उपन्‍यास है- चिंगारी। रूसी क्रांति की पृष्‍ठभूमि में दागिस्‍तान के इलाके में हो रही भयानक समाजिक उथल-पुथल, बदलाव और स्‍त्री मुक्ति उपन्‍यास की विषयवस्‍तु हैं। सैकड़ों पात्रों की उस कहानी में एक कैरेक्‍टर है, जो एक गांव में रहने वाला अमीर व्‍यक्ति है। अविवाहित है। उसके घर में एक विधवा औरत नौकरानी का काम करती है। उसी के घर में रहकर पूरा घर संभालती है। बदले में वह उसे दो वक्‍त का खाना और कपड़ा देता है। याद रखें- तंख्‍वाह नहीं। और उसका यौन उपभोग भी करता है। वो बहुत ही गरीब बेसहारा औरत है। उपन्‍यास के बाद के हिस्‍सों में दिखाया है कि कैसे रूस में क्रांति हो चुकी है और सोवियत सोशलिस्‍ट प्रजातंत्र संघ बन गया है। क्रांति के बाद अब नए रूसी कानून के तहत घर में काम करने वाले नौकरों की तंख्‍वाह तय की दी गई है। अब उतना पैसा देना जरूरी ही नहीं, बल्कि कानून है।

ये कानून आते ही एक दिन वो आदमी अपनी नौकरानी को लेकर मौलवी साहब के पास जाता है और निकाह पढ़ा लाता है। अब वो उसकी ब्‍याहता है। सबकुछ वैसे ही चलता रहता है, जैसे चल रहा था। बस अब उसे तंख्‍वाह नहीं देनी पड़ेगी। सिर्फ नौकरानी रहती तो तंख्‍वाह देनी पड़ती। नौकरानी को पत्‍नी बना दिया तो उस जिम्‍मेदारी से भी छूट गए। पत्‍नी के घरेलू कामों पर प्‍यार और रिश्‍तों का मुलम्‍मा चढ़ाकर ही उसे आसानी से गुलाम बनाए रखा जा सकता है। अगर उसे एहसास हो जाए कि पत्‍नी शब्‍द सिर्फ छलावा है और हकीकत तो यही है कि वो नौकरानी है तो क्‍या होगा। इसलिए मैं चाहता हूं कि सच से डरने और उसे तोड़-मरोड़कर पेश करने वालों के खिलाफ मनीषा की ये लड़ाई जारी रहे। आपका तिलमिलाहट बता रही है कि उसके लिखे में ताकत है। वो मर्म पर चोट करती है। इसलिए आप बेचैन हैं।

शाहनवाज मलिक के फेसबुक वॉल से. जिन मनीषा पांडेय के बारे में शाहनवाज ने अपने फेसबुक पोस्ट में जिक्र किया है, वो मशहूर ब्लागर, इंडिया टुडे मैग्जीन के फीचर एडिटर और प्रखर महिलावादी है.

इलाहाबाद में गोली मारकर प्रधान पति की हत्‍या

इलाहाबाद। गंगापार के नवाबगंज में अपराध थमने का नाम नहीं ले रहा है। कछार के अकबरपुर उर्फ गंगागंज में दो मार्च को दिनदहाड़े ताबडतोड़ गोली मारकर मौत के घाट उतार दिया गया। कत्ल के पीछे पुरानी चुनावी रंजिश बताई जा रही है। मृतक के भाई नौशाद ने थाने में एफआईआर दर्ज कराई है। इसमें उसी गांव के ही तीन लोगों को नामजद कराया गया है। पुलिस अफसरों ने मौके पर पहुंचकर लोगों से पूछताछ की। देर शाम तक किसी भी आरोपी को गिरफ्तार नहीं किया जा सका है।

इब्ने अहमद की पत्नी मेहनाज बानो वर्तमान में अकबरपुर उर्फ गंगागंज की प्रधान है। इसके पहले खुद इब्ने अहमद भी ग्रामप्रधान चुना गया था। इब्ने अहमद पर जानलेवा हमला उस समय किया गया जब वह मनरेगा के तहत ग्रामपंचायत के मजरे गंगागंज में खडंजा मार्ग और नाली का निर्माण करा रहा था। दोपहर करीब एक बजे इब्ने अहमद गांव के ही दशाराम पटेल के दरवाजे पर बैठा था तभी तीन युवक वहां आए और रायफल-तमंचा निकाल कर इब्ने पर ताबड़तोड़ फायरिंग कर दी। फायरिंग होते ही वहां भगदड़ मच गई। घटना को अंजाम देने के बाद हमलावर हवा में फायरिंग करते हुए मौके से भाग निकलने में कामयाब रहे।
 
उधर, फायरिंग की आवाज सुनकर मौके पर ग्रामीण आ जुटे। इब्ने ने घटनास्थल पर ही दम तोड़ दिया। उसके गले के पीछे और पेट के हिस्से में गोली लगी थी। घटना की सूचना पाकर परिजन भी मौके पर आ गए। पुलिस को जानकारी दी गई। नवाबगंज पुलिस ने लाश का पंचनामा कर पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया। वारदात स्थल पर सोरांव के सीओ राहुल मिश्र, एसपी गंगापार शफीक अहमद कई थाने की फोर्स लेकर मौके पर पहुंचे। मृतक इब्ने अहमद चार भाइयों में दूसरे नंबर पर था। इब्ने के तीन बेटे और तीन बेटियां हैं। इस घटना में उसी गांव के सउद फैसल, शेरे और राशिद को नामजद किया गया है। नवाबगंज एसओ आदित्य कुमार सिंह ने बताया कि घटना की जांच की जा रही है।

इलाहाबाद से शिवाशंकर पांडेय की रिपोर्ट।

ट्रैफिक कुप्रबंधन से नाराज नागाओं ने पुलिस जीप पर किया कब्जा

काशी में यातायात की समस्या काफी पुरानी है और उसका निराकरण शून्य प्रतीत होता रहा है। इस समस्या से काशीवासी भले ही रोजाना दोचार होने के बावजूद शान्त पडे रहते हों किन्तु आज नागा साधूओं ने अपने निराले अंदाज में इसका जमकर विरोध प्रदर्शित किया। वाराणसी के सबसे व्यस्त इलाके कबीर चौरा के पास उस समय सबकी निगाहे पुलिस की एक जीप पर ठहर गयी जब नगर में प्रवेश कर रहे नागा सन्यासियों ने पुलिसकर्मियों को उन्ही के जीप से उतार कर उस जीप पर कब्ज़ा जमा लिया। इतना ही नहीं नागा सन्यासियों ने अपना आक्रोश जताते हुए जीप की बोनट पर चढ़ जमकर नारे बाज़ी भी की, ये सभी नागा साधू शहर के ट्राफिक व्यवस्था से नाराज थे। नागा बाबाओं का जुलूस पुरे शान-शौकत और धूम धडाके के साथ निकला गया था जिसमें हजारो नागा साधू-सन्यासी परम्परागत रूप से शामिल हुए। उत्साह और जोश में उन्होंने सुरक्षा ब्यवस्था को भी ताक में रख दिया और पुलिस की गाडी पर कब्जा करके चढ़ गये। नागा सन्यासियों को इस बात को लेकर खासा गुस्सा था कि रास्ते पेशवाई निकलनी थी ,पुलिस ने कोई ट्राफिक प्लान नहीं किया था । जिसकी वजह से सन्यासियों को काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ा। समाज की सुरक्षा में लगे पुलिस कर्मी इन नागा सन्यासियों के आगे घंटों मूकदर्शक बने रहे। कुंभ के समापन पर नागा सन्यासियों का काशी आकर बाबा विश्वनाथ के दर्शन पूजन की हजारो साल पुरानी परम्परा है । इसी परम्परा के तहत नागा सन्यासी और महा मंडलेश्वर की सवारी ने आज काशी में नगर प्रवेश किया।

अखबारों ने अपनाया जो मिले लूट लो का फार्मूला

: लोगों को खुद लुटवाने में लगे अखबार : यशवंत, जी हद हो गई एक तरफ अखबार चलाने वाले लोगों को इंसाफ दिलाने का दम भरते हैं वहीं दूसरी तरफ खुद अखबार ही जनता को लुटवाने में लगे हुए हैं। तमाम अखबारों में विज्ञापन को लेकर इस कदर होड़ मची रहती है कि वो ये तक नहीं देखते की जनता तक जो मैसेज पहुंचाया जा रहा है उसमें कितनी सच्चाई है। इसका उदाहरण मैं इस तरह से देना चाहूंगा। अमर उजाला में क्लासीफाइड पेज आता है। उस पर दुनियाभर के अनगिनत विज्ञापन छोटे छोटे कोलम में दिए होते हैं।

कोई बेरोजगारों को जॉब दिलाने का दावा करता है तो कोई टेलीफोन का टॉवर लगाने के लिए नाम पर लोगों को लाखों रुपये की इनकम दिलवाने की बात करता है। इस विज्ञापन में बकायदा संबंधित कंपनी का नाम मोबाइल नंबर भी दिया होता है। चाहे बात जॉब दिलाने की हो या फिर टेलीफोन का टॉवर लगाने की ऐसे जाने कितने ही मामले सामने आ चुके हैं, जिनमें लोगों अपनी खून पसीने की कमाई लूटा चुके हैं। जब भी इस तरह की कोई घटना होती है अखाबार से लेकर न्यूज़ चैनल इन खबरों को जमकर चलाते हैं। लेकिन सवाल ये है कि इन घटनाओं को जिम्मेदार भी तो मीडिया खुद ही हैं। लोगों का कहना होता है कि उन्होंने अखबार में विज्ञापन पढ़ा था और उसे पढ़ने के बाद ही वो संबंधित व्यक्ति या कंपनी के झांसे में आ गए, ऐसे में यहां सवाल ये उठता है कि क्या इन विज्ञापनों को बुक करते वक्त इनकी वास्तविकता की जांच नहीं की जाती है। जब मीडिया को इस बात की पहले से ही जानकारी है कि इन तरह के विज्ञापनों में हमेशा धोखाधड़ी की बात ही सामने आते है तो फिर उन्हें अखबारों में छापा ही क्यों जाता है। इन बातों से साफ होता है कि पैसे कमाने के लिए अखबार वाले अपना स्तर इतना गिरा चुके हैं जनता की परेशानियों से कोई सरोकार नहीं है।

अखबार वाले अब भागते चोर की लंगोटी ही सही वाली कहावत पर काम कर रहे हैं। अमर उजाला में छपे एक विज्ञापन की वास्तविकता परखने के लिए मैंने टेलीफोन टॉवर लगाने का दावा करने वाली एक कंपनी के पास कॉल की। कॉल सुनने वाले ने खुद को किसी एक्सिस कंपनी का वर्कर बताया। उसने कहा कि वो टेलीफोन का टॉवर लगवा देगा लेकिन उसके लिए पहले मुझे 5 सौ रुपये रजिस्ट्रेशन कराना होगा। उस व्यक्ति ने मेरे मोबाइल पर इस नंबर 09889369947 से पीएनबी बैंक का ये एकाउंट नंबर 0540000102471082 और नाम हरी प्रकाश का एसएमएस भेजा। इस एकाउंट में ही ये पैसे डलवाने को कहा गया है। ऐसे ही एक वाकया भरतपुर का है। अमर उजाला में ही एक विज्ञापन छपा जिसमें मारूति सुजुकी के गुडगांव मानेसर प्लांट में नौकरी दिलाने का दावा किया गया है। विज्ञापन के साथ ये नंबर 09829519017 दिया गया और कॉल करने पर संबंधित व्यक्ति ने अपना नाम जितेंद्र बताया। जो लोग विज्ञापन पर दिए गए पते पर भरतपुर पहुंचे उनसे साढे़ 6 सौ रुपये रजिस्ट्रेशन फीस वसूली गई और एक ज्वानिंग लैटर थमा दिया गया। लेकिन इनकी नौकरी कब लगेगी ये भगवान भरोसे है। कुल मिलाकर ये सब लिखने का मकसद ये है कि अखबार ऐसे लोगों के खिलाफ मुहिम चलाने की बजाए खुद उन्हें को सपोर्ट कर रहे हैं।

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

बांग्लादेश के हालात पर भारतीय मीडिया की खामोशी

बांग्लादेश में हो रहे जन जागरण आन्दोलन को भारत की मीडिया नजरअंदाज कर रही है। जबकि नेपाल के जनयुद्ध, श्रीलंका का तमिल आन्दोलन, पाकिस्तान का आतंकी अभियान तथा वर्मा का सैन्यीकरण को भारतीय मीडिया ने महत्वपूर्ण स्थान दिया था। आस-पास की गतिविधियों को गौर किये बगैर हम अपनी विदेश नीति तय नहीं सकते हैं। बावजूद भारतीय मीडिया बांग्लादेश की परिघटनाओं से अछूता है।

बांग्लादेश की राजधानी ढ़ाका के शहवाग स्क्वायर में विगत 5 फरवरी से अब तक जनता खास कर युवाओं का हुजूम जमा है। ये आन्दोलनकारी शांतिपूर्ण तरीके से अपनी मांगों के समर्थन में डटे हुए हैं। दिन-ब-दिन भीड़ की तायदात बढ़ती जा रही है। इन आंदोलनकारियों की मांग है कि बांग्लादेश के उदय के समय पाकिस्तान समर्थक युद्ध अपराधियों को फांसी देने के अलावा जमात-ए-इस्लामी को अवैद्य घोषित कर उसकी सम्पत्तियों का अधिग्रहण किया जाय। इस आन्दोलन को बांग्लादेश के अधिकाधिक मीडिया का समर्थन प्राप्त है। बांग्लादेष की प्रधानमंत्री शेख हसीना ने आन्दोलन की व्यापकता को देखते हुए अपना समर्थन प्रदान किया है। बुद्धिजीवी, कलाकार, रचनाकार तथा समाजिक कार्यकर्ता भी इसमें शामिल हो गये हैं।

विगत् 5 फरवरी 2013 को ढ़ाका के व्यस्ततम शहवाग स्क्वायर पर पहले सौ ब्लॉगर उपस्थित हुए। जिनके हाथों के बैनर पर लिखा था-‘युद्धापराधीदेर राय आमरा मानी ना, कादेर मोल्लार फांसी चाई’ अर्थात् युद्ध अपराधियों के निर्णय को हम नहीं मानते हैं, कादेर मोल्ला को फांसी दो। इनके समर्थन में लाखों लोग शरीक हो गये और विश्व के सामाजिक आन्दोलनों से इसकी तुलना की जा रही है। आन्दोलन की व्यापकता के कारण शहवाग स्क्वायर अब ‘प्रजन्म 71’ के नाम से लोकप्रिय हो गया है। इसके पीछे कोई राजनीतिक ताकत नहीं है। लेकिन अब सभी राजनीतिक दलों का इसे समर्थन प्राप्त है। बीएनपी ने पहले इसका विरोध किया, लेकिन आन्दोलन की मजबूती, व्यापकता और जनापेक्षा को देखते हुए उसने भी अपना समर्थन दे दिया है।

1971 में बांग्लादेश के उदय का विरोध तथा पाकिस्तानी फौज के साथ मिलकर संगठित हत्या, अपहरण, बलात्कार और लूट करने वालों के खिलाफ ‘युद्धअपराधी कानून’ मौजूद है। इसके विचारण के लिए गठित ट्रिब्यूनल में बच्चू रजाकार को मृत्यु दण्ड दिया गया। लेकिन सैकड़ों हत्या और बलात्कार के आरोपी कादेर मोल्ला को महज उम्रकैद की सजा देने से युवा-वर्ग काफी आहत हुए। ब्लागर राजीव अख्तर की टिप्पणी के बाद उसकी हत्या कर दी गयी। ट्रिब्यूनल के इस फैसला के विरोध में जमाते इस्लामी ने देश में हिंसा का तांडव चलाया। जमात के कुकृत्य के खिलाफ आम लोग स्वतः स्फूर्त आन्दोलित हुए हैं। जिसमें मुक्तियुद्ध नहीं देखने वाले, राष्ट्रीयता से लवरेज बांग्लादेशी तरुण और युवा अधिक शामिल हैं।

बांग्लादेश के उदय तथा मुक्तियुद्ध की कहानी नई पीढ़ी को मालूम है। उन्हें मालूम है कि जमात-ए-इस्लामी, रजाकार, अल बदर तथा अल सम्स के खात्मे के बाद ही मुक्तियुद्ध का अधूरा सपना पूरा हो सकता है। लिहाजा ऐसे तत्वों के लिए फांसी की मांग नई पीढ़ी का नारा बन गया है। बांग्लादेश के तरुण पीढ़ी के लिए यह अस्तित्व की मांग है। वे अपनी राष्ट्रीय चेतना, मुक्तियुद्ध की किंवदन्ति, बुजुर्गों के अनुभव, गुजरे प्रसंग तथा वीरत्व की गाथा को हकीकत में देखना चाहते हैं। इसमें शामिल बुजुर्गों की इच्छा है कि उनके बच्चे मुक्तियुद्ध का इतिहास, मतादर्श और चेतना के साथ आगे बढ़े। लिहाजा जमात-ए- इस्लामी के हमलों और हत्याओं के खिलाफ आन्दोलनकारियों ने शान्तिपूर्वक जीवन्त आन्दोलन का रुपरेखा तय किया है।

इस बीच जमात-ए- इस्लामी ने राष्ट्रव्यापी हिंसा प्रारम्भ कर दिया है। शहवाग स्क्वायर के आन्दोलन के समर्थन में गठित जनजागरण मंच तथा शहिद मीनार पर तोड़-फोड़ किया और राष्ट्रीय ध्वज को जला कर अपने साम्प्रदायिकता और हिंसक होने का फिर परिचय दिया है। पिछले दिनों मुख्य विपक्षी दल बीएनपी के समर्थन से जमात ने हड़ताल किया। लेकिन बांग्लादेश के लोग जमात के हड़ताल के खिलाफ सड़कों पर उतर आये। मानिकगंज में पुलिस मुठभेड़ में 4 सशस्त्र जमाती मारे गये। जबकि कक्स बाजार में एक की मौत हुई। शिक्षा संस्थान, दफ्तर, अदालत और बाजार बन्द नहीं हुए। छात्र खासकर युवतियां जमात के हड़ताल के विरोध में अधिक सक्रिय रही। यह व्यापक प्रतिआन्दोलन धर्मनिरपेक्ष और प्रगतिशील बांग्लादेश का उदय है।

बांग्लादेश का राष्ट्रधर्म इस्लाम है। लेकिन संविधान सभी धर्मों के प्रति आदर रखता है। बांग्लादेश में द्विदलीय राजनीतिक शासन व्यवस्था है। दोनों दलों का नजरिया पूंजीवादी है। आवामी लीग का इतिहास जहां जनतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष है वहीं बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) का जन्म सेना शासन के अधिन साम्प्रदायिक ताकतों के साथ हुआ था। बीएनपी सरकार में जमाते इस्लामी के दो युद्धअपराधी मंत्री भी हुए थे। मुक्तियुद्ध के आदर्शों से गठित आवामी लीग 1975 में बंगबन्धु शेख मुजीब की हत्या के बाद अपने प्रारंभिक आदर्शों से मुंह मोड़ लिया और वोट की खातिर जमात-ए- इस्लामी सहित अन्य साम्प्रदायिक ताकतों को सहयोग दिया था। अब यक्ष प्रश्न है कि इस आन्दोलन के अभिघात से राजनीतिक दलों की नजरिया बदलेगी?

युद्धअपराधियों के मसले पर विपक्षी बीएनपी सावधान है और सत्तारुढ़ आवामी लीग दृढ़ दिखती है। यह जनांदोलन बांग्लादेश के आगामी चुनाव को प्रभावित करेगा। जनांकाक्षा के अनुरुप बीएनपी अगर धर्मनिरपेक्ष होकर युद्ध अपराधियों के संदर्भ में अपनी नजरिया बदलती है और जमात-ए-इस्लामी का साथ छोड़ देती है तो देश में स्थिरता आयेगी तथा जमात-ए इस्लामी कमजोर होगी। तत्पश्चात बांग्लादेश की नई पीढ़ी का सपना साकार हो सकेगा। युद्ध अपराधियों के संदर्भ में भारत का रुख साफ है। लेकिन अमेरिका, पाकिस्तान तथा सउदी अरब का रुख बांग्लादेश में मायने रखता है। बावजूद इसके नई पीढ़ी के इस आन्दोलन ने चार दशकों से ‘अपहृत’ बांग्लादेश को बरामद कर लिया है। लेकिन पड़ोस की इस बड़ी घटना से भारतीय मीडिया अपनी नजर मूंदे बैठी है।

लेखक डॉ. देवाशीष बोस बांग्लादेश के जानकार हैं।

फैक्‍ट्री मालिकों की शह पर मजदूरों को प्रताडि़त कर रही है नोएडा पुलिस

नोएडा। बिगुल मज़दूर दस्ता सहित कई जनसंगठनों ने नोएडा पुलिस द्वारा मज़दूर नेता तपीश मैन्दोला तथा 6 आम नागरिकों को अवैध रूप से हिरासत में रखने की कड़ी निन्दा की है। अवैध हिरासत के विरुद्ध आज इलाहाबाद उच्च न्यायालय में याचिका भी दायर की जा रही है। दिल्ली मेट्रो कामगार यूनियन के अजय स्वामी ने बताया कि 27 फरवरी की शाम नोएडा पुलिस के 10-12 लोग दो बोलेरो गाडि़यों में भरकर गाजियाबाद में नवीन प्रकाश के डीटीपी सेंटर में आए और उन्हें व उनके कर्मचारी राजू को जोर-जबर्दस्ती अपने साथ ले गए।

उन्होंने नवीन को बाध्य किया कि वे बिगुल मजदूर दस्ता के कार्यकर्ता तथा अपने सामाजिक मित्र तपीश मैन्दोला को फोन करके वहां बुलाएं और जैसे ही तपीश वहां पहुंचे, पुलिस ने उन्हें दबोच लिया। वहां मौजूद लोगों को यह बताए बिना कि उन्हें कहां ले जाया जा रहा है, पुलिस वाले इन तीनों को अपने साथ ले गए। तीनों में से किसी को फोन नहीं करने दिया गया और उनके फोन भी छीन कर बंद कर दिए गए।

अगले दिन सुबह पता  चला कि उन्हें नोएडा के सेक्टर 58 पुलिस स्टेशन में रखा गया है और बीती रात से ही उन्हें शारीरिक और मानसिक रूप से प्रताडि़त किया जा रहा है। इतना ही नहीं, कल सुबह थाने में एसएचओ से मिलने गये नागरिकों के एक प्रतिनिधिमंडल के चार सदस्यों को भी पुलिस ने हवालात में बंद कर दिया। इनमें दिल्ली विश्वविद्यालय के शोध छात्र सनी सिंह, गजेंद्र, साफ्टवेयर कर्मी ज्ञानेंद्र ओझा और बिगुल मजदूर दस्ता के प्रमोद कुमार शामिल हैं। तपीश के साथ हिरासत में लिए गए दो नागरिक उनके सामाजिक मित्र हैं, जिन्हें पुलिस ने केवल इसलिए पकड़ लिया है क्योंकि उन्होंने तपीश को वह सिम कार्ड दिलाने में मदद की थी, जिसका नंबर संपर्क सूत्र के रूप में पर्चे पर दिया गया है। पुलिस कर्मियों ने खुद ही बताया कि यह नंबर पिछले कुछ समय से पुलिस द्वारा (अवैध रूप से) निगरानी में था!

पुलिस ने अब तक किसी व्यक्ति के खिलाफ ना कोई प्राथमिकी दर्ज की है और ना ही कोई आरोप लगाया है। पुलिस बस यही कह रही है कि तुम लोग मजदूरों को हिंसा के लिए भड़का रहे हो, इसलिए हम तुम्हें रासुका के तहत बंद करेंगे। आज यहां हुई विभिन्न जनसंगठनों की आपात बैठक में कहा गया है कि पुलिस बेवजह सनसनी का माहौल पैदा कर रही है। 1 मार्च को हड़ताल के बारे में अफवाहें फैलाई जा रही हैं जबकि किसी भी संगठन ने ऐसा कोई आह्वान नहीं किया है।

‘बिगुल मजदूर दस्ता’ 23 फरवरी से ही नोएडा के विभिन्न इलाकों में नुक्कड़ सभाएं करके पर्चा वितरण कर रहा है जिसमें कहा गया है कि 21-22 फरवरी की हड़ताल के दौरान हुई हिंसा और तोड़फोड़ की घटनाएं नोएडा के दसियों लाख मजदूरों में व्याप्त गुस्से और हताशा की परिचायक हैं, जिन्हें उनके बुनियादी अधिकार तक नहीं दिए जा रहे हैं। पर्चे में कहा गया है कि गुस्से का अराजक विस्फोट समस्या का समाधान नहीं है और मजदूरों को चाहिए कि वे खुद को क्रांतिकारी यूनियनों और राजनीतिक संगठनों में संगठित करें ताकि वे पूंजीवादी शोषण और शोषकों की मैनेजिंग कमेटी की तरह काम करने वाली राज्यसत्ता के खिलाफ संगठित संघर्ष कर सकें। मगर पुलिस की ओर से बेबुनियाद आरोप लगाए जा रहे हैं कि पर्चे में मजदूरों को हिंसा और हड़ताल के लिए भड़काया गया है।

21-22 फरवरी की घटनाओं में शामिल होने के आरोप में पुलिस नोएडा में 200 से ज़्यादा मज़दूरों को गिरफ़्तार कर चुकी है। मज़दूरों का कहना है कि मिलमालिक मनमाने तरीके से मज़दूरों के नाम पुलिस को दे रहे हैं और बिना किसी जांच के पुलिस उन्‍हें घरों से उठाकर ले जा रही है। बैठक में कहा गया कि यह स्पष्ट है कि हमेशा की तरह पुलिस इस मामले में भी नोएडा के कारखाना मालिकों के इशारे पर काम कर रही है जो बुनियादी श्रम कानूनों को भी अपने पैरों तले रखते हैं और विरोध के हर स्वर को कुचलने पर आमादा हैं। यदि सभी व्यक्तियों को अविलम्ब रिहा नहीं किया गया तो विभिन्न जनसंगठन नोएडा तथा दिल्ली में इसके खिलाफ सड़कों पर उतरेंगे। बैठक में बिगुल  मजदूर दस्ता, दिल्ली मेट्रो कामगार यूनियन, करावलनगर मजदूर यूनियन, जागरूक नागरिक मंच, स्त्री मज़दूर संगठन, दिशा छात्र संगठन के कार्यकर्ता तथा अन्य व्यक्ति शामिल थे।

इधर, चारों ओर से पड़े दबाव के बाद पुलिस ने आज रात सातों व्‍यक्तियों को सिटी मजिस्‍ट्रेट के कोर्ट में पेश किया। उन पर शांति भंग की धारा लगाई गई थी। छह लोगों को तो निजी मुचलके पर छोड़ दिया गया लेकिन तपीश मैन्‍दोला को सिटी मजिस्‍ट्रेट के सामने अलग से ले जाया गया, जिसने आते ही माफ़ी मांगने के लिए कहा। जब तपीश ने कहा कि जब मैंने कुछ किया ही नहीं है तो माफ़ी किस बात की मांगूं। इस पर मजिस्‍ट्रेट के आदेश पर उन्‍हें हथकड़ि‍यां लगाकर अदालत के भीतर ले जाया गया जहां उनके साथ मारपीट भी की गई। लेकिन बाद में, देर रात उन्‍हें भी छोड़ दिया। (प्रेस रिलीज)

नवीन गुप्‍ता का दैनिक सवेरा से इस्‍तीफा, अमर उजाला ज्‍वाइन करेंगे

जालंधर से खबर है कि नवीन गुप्‍ता ने दैनिक सवेरा से इस्‍तीफा दे दिया है. वे यहां पर एक्‍जीक्‍यूटिव एडिटर थे. वे अपनी नई पारी मेरठ में अमर उजाला के साथ शुरू करने जा रहे हैं. उन्‍हें यहां पर एनई बनाया जा रहा है. संभावना है कि अमर उजाला का माई सिटी एडिशन की जिम्‍मेदारी नवीन को सौंपी जाएगी. नवीन गुप्‍ता इसके पहले भी अमर उजाला के साथ काम कर चुके हैं. इसे उनकी घर वापसी मानी जा रही है.

नवीन पिछले दो दशक से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं. नवीन गुप्‍ता ने अपने करियर की शुरुआत अमर उजाला, मुजफ्फरनगर से रिपोर्टर के रूप में की थी. इसके बाद वे दैनिक भास्‍कर, हरियाणा से जुड़े यहां लम्‍बे समय रहने के बाद उनका तबादला दिल्‍ली के लिए हो गया. यहां भी लम्‍बे समय तक उन्‍होंने भास्‍कर को सेवा दी. यहां से इस्‍तीफा देने के बाद वे दिल्‍ली में ही दैनिक जागरण से जुड़ गए. इसके बाद जागरण से इस्‍तीफा देकर वे दुबारा पंजाब में दैनिक भास्‍कर से जुड़े. भास्‍कर से इस्‍तीफा देने के बाद से पंजाब की शक्ति तथा उसके बाद दैनिक सवेरा पहुंचे थे.

भ्रष्‍ट पत्रकारिता (14) : नाम का रोजगार, पर करोड़पति शरद प्रधान!

मन मैला, तन ऊजरा, भाषण लच्छेदार,
ऊपर सत्याचार है, भीतर भ्रष्टाचार।
झूठों के घर पंडित बांचें, कथा सत्य भगवान की,
जय बोलो बेईमान की!

प्रजातंत्र के पेड़ पर, कौआ करें किलोल,
टेप-रिकार्डर में भरे, चमगादड़ के बोल।
नित्य नई योजना बन रहीं, जन-जन के कल्याण की,
जय बोलो बेईमान की!

प्रसिद्ध कवि काका हाथरसी की यह कविता सूबे के वरिष्ठ पत्रकार शरद प्रधान पर सटीक साबित होती हैं। नेशनल हेरल्ड समाचार पत्र से अपने कैरियर शुरू करने वाले ये पत्रकार महानुभाव भले ही अपनी कलम से कोई खास कारनामा न कर पाए हो, लेकिन जनहित याचिका के माध्यम से भ्रष्टाचार के आरोप में यूपी के दो पूर्व मुख्य सचिवों की कुर्सी से बेदखल कराने की उपलब्धि जरूर हासिल की है। लेकिन नौकरशाही के भ्रष्टाचार को उजागर करते-करते उसी दलदल में फंस गए हैं। अपनी पहुंच और प्रभाव के बल पर जहां झूठे हलफनामों के सहारे सरकारी आवास का लुत्फ उठा रहे हैं वहीं लखनऊ विकास प्राधिकरण की कई योजनाओं में प्लॉट लेकर अकूत अचल सम्पत्ति के मलिक बन गए हैं।

उल्लेखनीय है कि यूपी के पूर्व मुख्य सचिव अखण्ड प्रताप सिंह और नीरा यादव पर भ्रष्टाचार का आरोप लगा जनहित याचिका करने से सुर्खियों में आए वरिष्ठ पत्रकार शरत प्रधान का विवादों से गहरा नाता रहा है। श्री प्रधान का 24 शंकर नगर लखनऊ में पैतृक आवास है। मौजूदा समय श्री प्रधान सरकारी कालोनी दिलकुशा के आवास संख्या बी-4 में रह रहे हैं। लखनऊ विकास प्राधिकरण के रिकार्ड के मुताबिक पत्रकार कोटे के तहत अलीगंज में आवासीय योजना के तहत सीपी-19 आवास शरद चंद्र प्रधान के नाम से आवंटित है। गोमती नगर के विजय खण्ड में प्लाट संख्या 3/13 शरत सी. प्रधान के नाम से आवंटित है। गोमती नगर में ही विनीत खण्ड में 5/185 प्लाट कामिनी प्रधान के नाम पर आवंटित है। लखनऊ विकास प्राधिकरण ने 30 मार्च 1988 को कानपुर रोड योजना के तहत एक दुकान शरत सी. प्रधान के नाम से आवंटित है। गोमती नगर के विशेष खण्ड में बी- 2/163 शरत सी. प्रधान के नाम से आवंटित है। पत्रकार शरत प्रधान ने अपने पुत्र कुनाल प्रधान के नाम से गोमती नगर के वास्तु खण्ड में प्लॉट संख्या 3/793 आवंटित करवाया है। इस प्लॉट के आवंटन के लिए श्री कुनाल ने अपना पता बी-63 आदिति अर्पाटमेंट नई दिल्ली दर्शाया है।

इन अचल सम्पत्तियों से वरिष्ठ पत्रकार शरत प्रधान की कार्यप्रणाली का सहज अंदाजा लगाया जा सकता है। श्री प्रधान ने इन सम्पत्तियों को हासिल करने के लिए कई बार अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर जहां मनचाहा भूखण्ड प्राप्त किया वहीं ब्याज को भी माफ करवाया। श्री प्रधान ने इन सम्पत्तियों को हासिल करने के लिए तमाम नियमों को ताक पर रखकर झूठे हलफनामें दिए हैं। सबसे खास बात यह है कि अगर आपके पास कोई नौकरी नहीं है और करोड़पति बनना चाहते हैं तो इस विधा का प्रशिक्षण इन महानुभव पत्रकार से ले सकते हैं। इन महानुभव पत्रकार के पास कोई स्थाई नौकरी न होने के बावजूद करोड़ों रुपए की चल-अचल सम्पत्ति बनाने की अजब पैटर्न तैयार किया है। जिससे करोड़पति आसानी से बना जा सकता है। तमाम पत्रकारों ने नाम न छापने की शर्त पर कहा कि शरत प्रधान की अनैतिक कार्यप्रणाली से पत्रकारिता की छवि धूमिल हुई है। इन पत्रकारों का मानना है कि जब आईएएस अफसर, वकील और नेताओं के भ्रष्टाचार को लेकर उनके संगठन या सहयोगी दागियों को चिन्हित करने का अभियान चला सकते हैं तो पत्रकार संगठनों को भी अपने बीच इस तरह के पत्रकारों को चिहिंत करने का अभियान चलाया जाना चाहिए। जिससे पत्रकारिता की गरिमा को बरकरार रखा जा सके।

2005 में मुख्यमंत्री के पूर्व सचिव चंद्रमा प्रसाद यादव और लखनऊ विकास प्राधिकरण के तत्कालीन उपाध्यक्ष बी.बी. सिंह ने एक प्रेसवार्ता कर सब्सिडी से प्लॉट लेने वाले पत्रकारों के नामों का खुलासा किया था। इस प्रेसवार्ता में शरद प्रधान और उनकी पत्नी व पुत्र के नाम से चार प्लॉट के बारे में बताया गया था। मौजूदा समय दिलकुशा के आवास संख्या बी-4 में सरकारी आवास में रह रहे हैं वहां पर मीडिया टेक के नाम से एक कम्पनी भी चल रही है। यह कम्पनी होर्डिग्स बैनर का काम कर रही है। श्री प्रधान ने अपने सरकारी आवास की पहली मंजिल पर राज्य सम्पत्ति विभाग की अनुमति के बगैर एक कमरे का निर्माण करवाया लिया गया है। कई पत्रकारों ने बताया कि आईएएस विजय शंकर पाण्डेय के इशारे पर पूर्व मुख्य सचिव अखण्ड प्रताप सिंह और नीरा यादव के खिलाफ जनहित याचिका की थी।

समाचार पत्र समाजवाद का उदय के वरिष्ठ संवाददाता प्रभात त्रिपाठी ने कहा कि जिन पत्रकारों ने सरकार से सब्सिडी पर आवास या भूखण्ड ले, उन पत्रकारों को सरकारी आवास छोड़ देने चाहिए। उन्होंने कहा कि कई पत्रकारों के भ्रष्ट आचरण की वजह से पत्रकारिता का स्तर दिनों-दिन गिरता जा रहा है। आईएफडब्ल्यूजे के अध्यक्ष के. विक्रम राव ने कहा कि पत्रकारों के भ्रष्ट कारनामों की जांच सरकार करें। उन्होंने कहा कि एक कार्यक्रम के दौरान मुख्यमंत्री अखिलेश यादव से हजरतगंज में कराए गए सौंदर्यीकरण घोटाले में कुछ पत्रकारों की भूमिका पाई गई थी। उन्होंने मुख्यमंत्री से इस मामले की जांच की मांग की थी। श्री राव ने कहा कि पत्रकारिता में ऐसे-ऐसे लोगों का आगमन हो गया है, जिनका पत्रकारिता से दूर-दूर तक नाता नहीं है, वे केवल दलाली के लिए इस पेशे में आ गए हैं। इस संबंध में वरिष्ठ पत्रकार शरद प्रधान से सम्पर्क किए जाने पर प्रतिक्रिया नहीं मिल पाई।

त्रिनाथ के शर्मा की रिपोर्ट. यह रिपोर्ट दिव्‍य संदेश में भी प्रकाशित हो चुकी है.

बठिंडा भास्‍कर वालों ने भाई-बहन को बना दिया पति-पत्‍नी

दैनिक भास्‍कर, बठिंडा यूनिट में फिर एक गड़बड़ी हो गई है। यूनिट के अंदर आने वाले मोगा भास्‍कर में मोगा उपचुनाव के दौरान मतदान के दिन की एक फोटो में भास्‍कर ने सगे भाई-बहन को पति-पत्‍नी यानी दंपति बना डाला। गैरजिम्‍मेदाराना तरीके से किए इस घिनौने कार्य की पोलपट़टी खुली तो बेशर्म भास्‍कर वालों ने तुरंत अगले दिन भूल सुधार छाप दिया।

बताया जा रहा है कि मोगा में तैनात ब्‍यूरो चीफ लक्ष्‍मीकांत दुबे का इंदौर तबादला करवाने के बाद बठिंडा के संपादक महिंद्र कुशवाहा ने बठिंडा सिटी में ब्‍यूरो चीफ नरिंद्र शर्मा और फरीदकोट के ब्‍यूरो चीफ दिलबाग दानिश को चुनाव कवरेज के लिए भेजा था। इनकी अगुवाई में ही यह फोटो मोगा से बठिंडा कार्यालय भेजी गई। इस फोटो में एक मोटरसाइकिल पर युवक व युवती छाता लेकर वोट डालने के बाद घर लौटते दिखाए गए। 24 फरवरी को छपी फोटो के नीचे लिखे विवरण में इन दोनों को भास्‍कर ने दंपत्ति बना दिया। जब अगले दिन फोटो मोगा भास्‍कर के पहले पेज पर प्रकाशित हुई तो भाई-बहन के पविञ रिश्‍ते को तार-तार कर उनको दंपत्ति बताने से दोनों के साथ उनके परिवार को शर्मसार होना पड़ा।

बताया जा रहा है कि जब परिवार को पता चला तो फोटो में नजर आ रहे युवक ने मोगा में कवरेज करने वालों और संपादक कुशवाहा को फोन कर खूब लानत-मलानत की। सूत्रों से पता चला है कि इस युवक ने बदनामी करवाने पर केस करने की बात कही तो ठंड में भास्‍कर वालो के पसीने छूट गए। पूरी टीम ने बडी मुश्किल से माफी मांगकर अपना पीछा छुड़वाया। फिर 25 फरवरी के अंक में भूल सुधार का बॉक्‍स लगाते हुए माफी मांगी। बताया जा रहा है कि सनसनी क्रिएट करने के आदी भास्‍कर वालों यह गलती नई नहीं है। इससे पहले नरिंद्र शर्मा के ब्‍यूरोचीफ रहते भी बठिंडा में भास्‍कर एक फर्जी खबर छाप चुका है जिस मामले में वह कोर्ट का चक्‍कर काटते फिरते हैं।

बताया जा रहा है कि भास्‍कर में कई अधकचरे ज्ञान वाले लोग भर्ती हैं। जो बिना किसी पूरी पड़ताल के इस तरह खबरें व फोटो प्रकाशित कर रहे हैं। बठिंडा यूनिट के लोगों ने उच्‍च अधिकारियों से यह गलती छुपा ली। अपनी खबरों में दूसरे विभागों से सवालों का जवाब मांगने वाले भास्‍कर को खुद भी इस सवाल का जवाब देना चाहिए कि आखिर इतनी बडी गलती कैसे हुई? गलती के लिए कौन जिम्‍मेदार है? जिम्‍मेदार के खिलाफ क्‍या कार्रवाई की गई? बठिंडा यूनिट की इस गलती पर उपर बैठे अधिकारी क्‍यों आंखे मूंदकर बैठे हैं?

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

समाचार प्‍लस में सीनियर प्रोड्यूसर बने मयंक सक्‍सेना

युवा व प्रतिभाशाली पत्रकार मयंक सक्सेना ने अपनी नई पारी समाचार प्‍लस चैनल के साथ शुरू की है. उन्‍हें चैनल में सीनियर प्रोड्यूसर बनाया गया है. वे आउटपुट में अपनी सेवाएं देंगे. मयंक ने कुछ महीने पहले न्यूज24 चैनल से इस्तीफा दे दिया था. मयंक न्‍यूज24 से पहले जी न्यूज, सीएनईबी, सी वोटर समेत कई चैनलों में कार्यरत रहे हैं. मयंक पत्रकारिता में दिल की सुनने वाले पत्रकार माने जाते हैं इसलिए जब जी किया नौकरी की जब मन नहीं रमा तो अपनी मर्जी से इस्तीफा देकर यायावरी करने निकल पड़े.

लखनऊ के रहने वाले मयंक नई पीढ़ी के उन तेजतर्रार पत्रकारों में हैं जो अपनी बात पूरे तर्क व दबंगई के साथ रखने के लिए जाने जाते हैं. माखनलाल से पत्रकारिता की डिग्री लेने के बाद मयंक सक्सेना ने जी न्यूज के साथ जुड़कर अपनी पारी की शुरुआत की थी. ब्लागिंग, वेब और सोशल मीडिया पर सक्रिय रहने वाले मयंक की रुचि फिल्म, साहित्य और संगीत में भी है.

‘समाचार प्‍लस राजस्‍थान’ 14 अप्रैल को होगा लांच

उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में अपनी अलग पहचान बनाने के बाद, अब 'समाचार प्लस' चैनल का विस्तार राजस्‍थान में भी होने जा रहा है. इस नेटवर्क का दूसरा चैनल 'समाचार प्लस-राजस्थान' 14 अप्रैलको लॉन्च होने जा रहा है. इसके लिए सभी तैयारियां लगभग पूरी की जा चुकी हैं. लुक एंड फील तैयार हो चुका है, न्यूज़रूम, स्टूडियो, पीसीआर-एमसीआर भी बनकर तैयार हो चुका है. चैनल को ऑन एयर करने वाली सारी मशीनें तैयार हो चुकी हैं.

समाचार प्लस न्यूज़ नेटवर्क का ये दूसरा चैनल होगा. पहला चैनल उत्तर प्रदेश एवं उत्तराखंड के लिए 15 जून 2012 को लॉन्च हुआ था. समाचार प्‍लस यूपी-उत्‍तराखंड चैनल इन दोनों राज्‍यों में सभी रीजनल चैनलों में अपनी अलग पहचान बनाई है. अब राजस्‍थान में चैनल अपनी डंका बजाने की तैयारी कर रहा है. इस चैनल का मुकाबला सीधे-सीधे ईटीवी से होने की संभावना है, क्‍योंकि यूपी-उत्‍तराखंड में भी इसने सारे रीजनल चैनलों को पीछे छोड़ते हुए ईटीवी को कड़ी टक्‍कर दी है.  

राजस्‍थान चैनल के लांचिंग के लिए टीम भी तैयार की जा चुकी है. जल्‍द ही ब्‍यूरोचीफ की भी घोषणा कर दी जाएगी. राजस्‍थान के बाद मैनेजमेंट 15 जून को हरियाणा चैनल तथा 18 दिसम्‍बर को एमपी-सीजी चैनल की लांचिंग करेगा. इस बारे में भड़ास द्वारा संपर्क किए जाने पर चैनल के सीईओ और एडिटर इन चीफ उमेश कुमार ने कहा कि यूपी-उत्‍तराखंड में चैनल अपनी अलग पहचान बनाने के बाद रोबीले-रंगीले राजस्‍थान में दस्‍तक देने को पूरी तरह तैयार है.

उन्‍होंने कहा कि हम राजस्‍थान में चैनल को एक स्‍ट्रेटजी तथा सरोकार के साथ लांच कर रहे हैं. हम यूपी-उत्‍तराखंड की तरह ही इस चैनल को आम लोगों से कनेक्‍ट करने का प्रयास करेंगे. हम किसी भेड़चाल में शामिल नहीं होंगे. इस चैनल पर बिल्‍कुल अलग एवं बड़े मास को प्रभावित करने वाली खबरों का प्रसारण होगा. हमारी पूरी टीम तैयार है. हम राजस्‍थान में भी वहां की सोच और सरोकार से साथ जमने को पूरी तरह तैयार हैं. उम्‍मीद है कि इसमें समाचार प्‍लस की टीम को पूरी सफलता मिलेगी. इस चैनल से जुड़ने के इच्छुक योग्य कैंडीडेट्स samacharplusrajasthan@gmail.com पर अपना CV और फोटोग्राफ ई-मेल कर सकते हैं.

जींद में ब्राह्मणों ने पंजाब केसरी की होली जलाई (देखें तस्‍वीरें)

जींद में पंजाब केसरी की मुश्किलें कम नहीं हो रही हैं. परशुराम पर खबर लिखना अखबार के ब्‍यूरोचीफ जसमेर मलिक के गले की हड्डी बन गया है. जींद का ब्राह्मण समाज अखबार के खिलाफ लगातार प्रदर्शन कर रहा है. अखबार का विरोध करते हुए ब्राह्मणों ने पंजाब केसरी की प्रतियां जलाईं. इन लोगों राज्‍यपाल को पत्र लिखकर अखबार, संपादक तथा ब्‍यूरोचीफ के खिलाफ कार्रवाई करने की मांग की है. 

गौरतलब है कि पंजाब केसरी के जींद एडिशन में प्रकाशित एक खबर में परशुराम को पहला ऑनर किलर बताया गया था. इसके बाद से ही विरोध शुरू है. कुछ दिन पूर्व पंजाब केसरी कार्यालय में ब्राह्मण समाज से जुड़े कई लोग घुसकर जसमेर मलिक से हाथापाई करने की भी कोशिश की थी. ब्राह्मण समाज के लोगों ने गांव बराह में 12 गांवों की पंचायत आयोजित कर‍के अखबार के बहिष्‍कार करने का भी ऐलान किया था.

मूल खबर – जींद में ब्राह्मण समाज ने पंजाब केसरी के ब्‍यूरोचीफ का किया बहिष्‍कार

बजट से मारा, अब पेट्रोल से जलाया, और डीजल अभी बाकी है मेरे दोस्त

महंगाई पता नहीं हमें कहां ले जाएगी। आमदनी घट रही है। महंगी बढ़ रही है। सरकार कह रही है कि हर एक को आधार कार्ड जरूरी है। लेकिन हालात देखकर अपना मानना है कि आधार नहीं उधार कार्ड जरूरी है। आप जब तक यह पढ़ रहे होंगे, महंगाई और बढ़ चुकी होगी। सरकार ने अपने लुभावने लगनेवाले बजट के घाटे को कम करने का इंतजाम कर दिया है। पहले बजट से तेल निकाला। अब वह तेल से कमाई निकालेगी। दो दिन पहले बजट में जो महंगाई बढ़ाई गई थी, उससे भी ज्यादा महंगाई पेट्रोल के भाव बढ़ाकर बढ़ाई है। 

गुरुवार को बजट पेश हुआ। तब सरकार कुछ नहीं बोली। अब शुक्रवार की आधी रात से पेट्रोल के दामों में फिर से इजाफा कर दिया गया है। सीधे एक रुपए 40 पैसे प्रति लीटर बढ़ाने का ऐलान किया गया है। आप रात को सोए थे। और आपके सोते सोते ही पेट्रोल और महंगा हो गया। पेट्रोल के महंगा होने का मतलब बाकी बहुत सारी चीजों का भी महंगा होना है। इससे पहले 16 फरवरी को ही पेट्रोल के दाम में डेढ़ रुपया बढ़ाया था। पंद्रह दिन के भीतर और बढ़ाकर कुल मिलाकर तीन रुपए की बढ़ोतरी हो गई। सरकारी भाषा में कहें तो तेल कंपनियों के लिए कीमत बढ़ानी पड़ रही है। क्योंकि रुपए के मुकाबले डॉलर की कीमत बढ़ने बढ़ी है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी कच्चे तेल की कीमत बढ़ने का हवाला दिया गया है।

गुरुवार को संसद में पेश बजट से आप और हम पहले से ही परेशान थे। महंगाई का रो रहे थे। सरकार को कोस रहे थे। अब इस पेट्रोल के भावों में बढ़ातरी ने महंगाई का डबल झटका दिया है। चिदंबरम ने बजट में टैक्स स्लैब में भी कोई बदलाव नहीं किया गया। हर हाथ में रहने वाले मोबाइल जैसी छोटी सी चीज पर भी टैक्स लगा दिया। सरकार बहुत खतरनाक तरीके से काम कर रही है। पहले तो टीवी के लिए हर घर में सेट टॉप बॉक्स जरूरी किया। फिर उस पर टैक्स लगा दिया। आम आदमी तो पहले ही महंगाई से परेशान है, उस पर आए दिन पेट्रोल की कीमतों में वृद्धि करके जले पर नमक छिड़कने का काम कर रही है। कम से कम राज्य सरकारों को चाहिए कि वे पेट्रोल से वैट हटा दे तो लोगों को काफी हद तक राहत मिल सकती है। केंद्र के बाद राज्य सरकारों के बजट आनेवाले हैं। उनको तो कम से कम लोगों को हितों का खयाल करना चाहिए। जिस तरह से बजट के ठीक बाद पेट्रोल के दाम बढ़ाए गए, उससे डीजल के दाम बढ़ने की आशंका और बढ़ गई है।

हमारे देश के माननीय प्रधानमंत्री सरदार मनमोहन सिंह जी कल वित्त मंत्री पी चिदंबरम की पीठ थपथपा रहे थे। कह रहे थे कि बढ़िया बजट पेश किया है। लेकिन आज पूरे देश के लोग उनकी और सरदारजी की पीठ पर लाठी मारने की सोच रहे हैं। हमारा इतिहास गवाह है कि निर्मम से निर्मम राजाओं ने भी अपने देश की प्रजा को इस तरह परेशान नहीं किया। जितना वर्तमान सरकार कर रही है। पता नहीं अपने सरदारजी क्या खाकर जन्मे थे कि इस आदमी को रहम ही नहीं आता। हर साल महंगाई और मुंह फाड़ती ही जा रही है। पेट्रोल के झटके के बाद डीजल का झटका भी लगने ही वाला है। तैयार रहिए। लोकतंत्र के डाकू लोग इसी तरह लूटा करते हैं। अपन ने तो पहले ही कहा था कि बजट आनेवाला है। जेब संभालो। और अब भी कह रहे हैं कि जेब संभालिए, क्योंकि डीजल तो अभी बाकी है मेरे दोस्त।

लेखक निरंजन परिहार राजनीतिक विश्लेषक और वरिष्ठ पत्रकार हैं.

जनसंदेश टाइम्‍स के संवाददाता को चार साल की कैद

जनसंदेश टाइम्‍स, बनारस में ऐसे लोगों के हाथों में हैं. जिससे इस अखबार और पत्रकारिता दोनों का भला होना मुश्किल है. बनारस यूनिट से जुड़े चंदौली जिले से खबर है कि जनसंदेश टाइम्‍स ने एक ऐसे व्‍यक्ति को अखबार प्रतिनिधि बना रखा था, जिस जान लेवा हमला करने का आरोप था. इस मामले में सुनवाई करते हुए कोर्ट ने जनसंदेश टाइम्‍स के इस संवाददाता को चार साल कैद की सजा सुनाई है. इसके बाद यह बहस फिर तेज हो गया है कि जनसंदेश टाइम्‍स जैसे अखबार अपराध करने वालों को पाल पोस कर पत्रकारिता कर रहे हैं. 

जानकारी के अनुसार चंदौली जिले में कमालपुर क्षेत्र में रणविजय सिंह जनसंदेश टाइम्‍स अखबार से जुड़े हुए हैं. इनकी नियुक्ति जिला ब्‍यूरोचीफ सिद्धार्थ यादव के रिकमंडेशन के बाद जिलों की जिम्‍मेदारी देखने वाले विजय विनीत ने की थी. सूत्रों का कहना है कि इन दोनों लोगों को पहले ही रणविजय सिंह के अतीत की जानकारी इन लोगों को थी. रणविजय सिंह ने कुछ समय पहले एक व्‍यक्ति को गोली मार दी थी, परन्‍तु वह बच गया था. जिसके बाद उसके ऊपर मामला दर्ज हुआ था. इसके बावजूद रणविजय जैसे अपराधी मानसिकता के व्‍यक्ति को जनसंदेश टाइम्‍स अखबार का पत्रकार बना दिया गया.

अब इसके पीछे इन लोगों की सोच चाहे पैसे वगैरह का लालच रहा हो अथवा किसी गुंडा टाइप व्‍यक्ति को अपने साथ जोड़ने की लालसा, पर इससे पत्रकारिता का नुकसान जरूर हुआ. कोर्ट ने अब इसी मामले में सुनवाई करते हुए रणविजय सिंह को चार साल कारावास की सजा सुनाई है, जिसके बाद पुलिस ने उसे अरेस्‍ट कर लिया. उसे जेल भेजा जा चुका है. परन्‍तु इस घटना के बाद से एक बात तो तय हो गई है‍ कि विजय विनीत और सिद्धार्थ यादव जैसे लोग आरोपी पत्रकारों को अखबार से जोड़कर सरोकारी माने जाने वाली पत्रकारिता की हत्‍या का प्रयास कर रहे हैं.

ये ही एक मामला नहीं है. इसके पहले भी बनारस में जनसंदेश टाइम्‍स लगातार चर्चा में रहा है. चाहे सैलरी में लेट लतीफी का मामला हो या फिर पाठकों के लिखे गए पत्रों में हेराफेरी का. यह अखबार बनारस में लगातार पत्रकारिता को बदनाम करता दिख रहा है. खैर, एक हत्‍या के प्रयास के आरोपी को पत्रकार बनाना सचमुच में पत्रकारिता को बदनाम और बरबाद करने का कदम माना जा सकता है. इस संदर्भ में जनसंदेश टाइम्‍स का पक्ष लेने के लिए संपादक आशीष बागची और जिलो की जिम्‍मेदारी देखने वाले विजय विनीत को भड़ास की तरफ से फोन किया गया, परन्‍तु दोनों लोगों ने फोन पिक नहीं किया.  

इन 12 लाख 60 हजार बाल मजदूरों को मुक्ति कौन दिलाएगा?

राजस्थान राज्य की 12 प्रतिशत जनसंख्या 6 साल से कम तथा 36 प्रतिशत जनसंख्या 7 से 18 साल तक के बच्चों की हैं। सरकार योजनाएं एवं नीतियां राजनीतिक हितों को ध्यान में रखकर तैयार करती है। बच्चे क्योंकि राजनीतिक हितों की पूर्ति में कहीं पर भी सहायक नहीं हैं अतः वे सरकार की प्राथमिकताओं में भी नहीं हैं। यदि वर्ष 2008-09 के राज्य बजट को देखें तो बच्चों की सुरक्षा पर मात्र 0.02 प्रतिशत ही व्यय किया गया है। यानी बाल सुरक्षा सरकार की प्राथमिकता में बहुत नीचे है। 2005-06 से 2010-11 तक वार्षिक बजट व्यय का विश्लेषण देखें तो राजस्थान सरकार ने बच्चों के पोषण, विकास, स्वास्थ्य व सुरक्षा जैसे अति महत्वपूर्ण मदों पर अत्यंत सीमित राशि ही व्यय की है। अत्यंत सीमित बजट प्रावधानों का ही परिणाम है कि राज्य में हर दूसरा बच्चा कुपोषित, हर पांचवां बच्चा शिक्षा से वंचित, हर चौथा बच्चा बाल श्रमिक है।

चिकित्सा एवं स्वास्थ्य के संदर्भ में स्थिति का आकलन करे तो केंद्र की नई स्वास्थ्य नीति (2002) के अनुसार केंद्र  सरकार  ने चिकित्सा सेवाओं पर सकल घरेलू उत्पाद का तीन प्रतिशत व्यय करने का प्रावधान किया है, जिसे राजस्थान सरकार ने भी स्वीकार किया था परंतु पिछले दो वर्षों से राज्य सरकार चिकित्सा सेवाओं पर सकल घरेलू उत्पाद का एक प्रतिशत से भी कम खर्च कर रही है। 2003 में नई स्वास्थ्य नीति (2002) के अनुरूप प्रावधान नहीं किया गया है। इस नीति के अनुसार राज्य को 2004-05 से राज्य के सकल घरेलू उत्पाद का तीन प्रतिशत या राज्य के बजट का सात प्रतिशत चिकित्सा एवं लोक स्वास्थ्य पर खर्च करना था। इसी तरह शिक्षा के संदर्भ में भी राज्य में कोई सुधार नहीं हुआ है। 1990 में ही शिक्षा के मुद्दे पर जोमतीयेन  (थाईलैंड) में हुए विश्व सम्मेलन ‘‘सबके लिए शिक्षा’’ के लिए व्यापक निर्णय लिए गए जिसमें वर्ष 2000 तक सब को प्राथमिक शिक्षा उपलब्ध कराना महत्वपूर्ण था। 1986 की शिक्षा नीति में 1992 में कुछ नए संशोधन के उपरांत कक्षा 1-5 तक में ड्राप आउट दर को 45 प्रतिशत से घटाकर 20 प्रतिशत पर लाना तथा कक्षा 1-8 तक में ड्राप आउट दर को 60 प्रतिशत से घटाकर 40 प्रतिशत पर लाना व अनुसूचित जाति व जनजाति की बालिकाओं में ‘‘बालिका शिक्षा’’ के स्तर में गुणात्मक सुधार लाना सुनिश्चित किया गया था। वर्ष 2010 में इस स्थिति में कोई आशानुरूप सुधार नहीं हुआ है।

राजस्थान में उच्च जन्म दर (28.4 प्रतिशत), बच्चों में कुपोषण (44 प्रतिशत 0-3 वर्ष), बालिका भ्रूण हत्या, बाल विवाह, बालश्रम (22.8 प्रतिशत) राजस्थान में बच्चों की स्थिति को दर्शाते हैं। राजस्थान सरकार की बाल नीति (2008) में ‘‘प्रत्येक बालक को पैदा होने, जीने, बढ़ने और बिना किसी भेदभाव के अथवा अंतर के विकास करने एवं सम्मानपूर्ण तरीके से जीवन जीने का अधिकार है।’’ बाल सुरक्षा का उद्देश्य बच्चों के साथ होने वाले भेदभाव, उपेक्षा, शोषण, अमानवीयता तथा हिंसात्मक व्यवहार से सुरक्षा के प्रति आश्वस्त करना है। इसका उद्देश्य बच्चों के साथ विद्यालयों में मारपीट, यौन शोषण, खरीद फरोख्त व अपहरण, मादक पदार्थों के सेवन से बचाव करना है। अनुमानतः 12 लाख 60 हजार बालश्रमिकों के साथ राजस्थान देश में तीसरे स्थान पर है। जयपुर में लगभग 2 लाख जैम वर्कस में से 70 हजार बच्चे काम करते हैं।

दरअसल, किशोर न्याय (बालकों की देखरेख एवं संरक्षण) अधिनियम, 2007 को समझना व उसे सही अर्थों में क्रियांवित करना राजस्थान सरकार के लिए अभी बाकी है। किशोर न्याय अधिनियम बच्चे को एक विस्तृत क्षेत्र में विभिन्न श्रेणियों जो कि बच्चों की सुरक्षा एवं देखभाल की श्रेणी में आती है, परिभाषित करता है। दूसरी तरफ बाल कल्याण समिति व किशोर न्याय बोर्ड सभी जिलों में संचालित हो रहे हैं परंतु उचित प्रशिक्षण व मार्गदर्शन के अभाव में बच्चों के साथ संवेदनशील नहीं हो पाते हैं। बाल गृह, संप्रेषण ग्रह, बालिका गृह में काफी सेवाओं व सुविधाओं की आवश्यकता है।

बहरहाल, राज्य की कुल जनसंख्या में हर दो व्यक्ति में से एक व्यक्ति 18 साल से कम उम्र का बच्चा तथा हर 10 व्यक्ति में एक 6 साल से कम उम्र का बच्चा है। अतः देश के भविष्य को उज्जवल बनाने के लिए आवश्यक है कि उसकी चिकित्सा, पोषण, विकास, शिक्षा व सुरक्षा पर बजट में उनकी जनसंख्या के अनुरूप अतिरिक्त प्रावधान किए जाएं। इसके लिए जरूरी है कि बच्चों के लिए अलग से बाल निदेशालय का गठन किया जाए जिसमें बच्चों से संबंधित सभी कार्यक्रमों, योजनाओं, कानूनों की क्रियांविति व निगरानी सुनिश्चित हो। विद्यालयों, संस्थाओं व घरों में बच्चों के साथ होने वाली शारीरिक व मानसिक हिंसा को रोकने के लिए भी अलग कानून बनाए जाने की जरूरत है। राजस्थान की 48 प्रतिशत जनसंख्या 18 वर्ष से कम आयु वर्ग की है। अतः इसी अनुपात में बच्चों की शिक्षा, विकास व सुरक्षा के लिए सकल घरेलू उत्पाद का बजट आवंटित किया जाए। साथ ही राज्य बाल नीति 2008 की पुनः समीक्षा करके संशोधित राज्य बाल नीति बनाए जाने व उसकी सख्ती से क्रियावंयन, मूल्यांकन/निगरानी की जरूरत है। केंद्र सरकार के महिला एवं बाल विकास मंत्रालय द्वारा तैयार की गई बच्चों की कार्य योजना 2005 की तर्ज पर राज्य की भी कार्य योजना बनाने की खासी जरूरत है। राज्य सरकार को बच्चों से संबंधित मामलों में तुरंत निपटाने के लिए जिलास्तर पर बाल अदालतों का गठन करना चाहिए। केंद्र सरकार की तर्ज पर राज्य में भी चाइल्ड बजटिंग प्रणाली लागू करने की आवश्यकता है।

लेखक बाबूलाल नागा विविधा फीचर्स के संपादक हैं.

नए एफएम चैनल के जरिए होगा रेडियो उद्योग का विस्तार

वित्त वर्ष 2013-14 के आम बजट में नए एफएम रेडियो स्टेशन खोलने के प्रावधान का मीडिया कंपनियों ने स्वागत किया है। उनका कहना है कि इससे रोजगार तो बढ़ेगा ही, लोगों को न्यूज, नेटवॢकंग, करंट अफेयर्स और खेल आदि से जुड़े नए और बेहतरीन प्रोग्राम भी सुनने को मिल सकेंगे। बजट के अनुसार वर्ष 2014 में 839 एफएम रेडियो लाइसेंस की नीलामी की जाएगी। ये 294 ऐसे शहरों में होंगे जिनकी आबादी एक लाख है।

रिलायंस ब्रॉडकास्ट नेटवर्क लिमिडेट के सीईओ तरुण कटियाल के मुताबिक नए प्राइवेट एफएम रेडियो स्टेशन अथवा चैनेल शुरू की जानके की घोषणा सरकार का एक अच्छा फैसला है। रेडियो विस्तार के तीसरे चरण में नए लाइसेंस की नीलामी बड़ा कदम है। इससे जहां एक ओर रोजगार बढ़ेंगे वहीं समाचार, नेटवॢकंग, खेल और सामयिक विषयों आदि से जुड़े नए प्रोग्राम लोगों को सुनने को मिलेंगे। उनके मुताबिक नए एफएम चैनेल से उद्योग का मुनाफा और राजस्व दोनों में तेजी से बढ़ोतरी होने की उम्मीद है। इसके अन्य फायदे भी होगे। न्यूज, नेटवॢकंग, करंट अफेयर्स और खेल जैसे प्रोग्रामों की लोगों को उपलब्धता होगी। हम नए श्रोताओं के लिए नए प्रकार के कंटेंट और नए विषयों पर भी फोकस कर रहे हैं।

रिचर्स कंपनी प्राइस वॉटर कूपर की मीडिया व इंटरटेंमेंट प्रमुख स्मिता झा के मुताबिक रेडियो विस्तार के तीसरे चरण में वित्त मंत्री पी. चिदंबरम ने प्राइवेट एफएम स्टेशन शुरू करने की जो घोषणाएं की हैं उससे इस उद्योग में क्रांति आएगी। उनके मुताबिक सरकार की इन घोषणाओं का इंतजार उद्योग पिछले दो वर्षो से कर रहा था। नए लाइसेंस के जरिए सरकार को तो शुल्क प्राप्त होगा ही, रेडियो उद्योग की भी रफ्तार तेज होगी। रेडियो जॉकी और जानकारों का कहना है कि नए एफएम चैनल के शुरू होने से इस सेक्टर में युवाओं के लिए नए रोजगार के अवसर बढ़ेंगे। मौजूदा समय में एफएम रेडियो की सेवाएं कुछ बड़े महानगरों तक ही सीमित हैं। (भास्‍कर)

ब्लैक लिस्टेड 125 स्कूलों के परीक्षा केंद्र कैंसिल

इलाहाबाद। यूपी बोर्ड ने हाईस्कूल और इंटरमीडिएट परीक्षा के लिए बनाए गए एक सौ पच्चीस केंद्रों को निरस्त कर दिया है। परीक्षा केंद्र चाहने वाले स्कूल प्रबंधकों के बीच हड़कंप मच गया है। यह सभी केंद्र गड़बड़ियों की वजह से पहले से ही काफी कुख्यात हो चुके थे। इनके नाम काली सूची में डाले गए थे। समझा जा रहा है कि केंद्र निरस्त करने की यह कार्रवाई हाइकोर्ट के सख्त रूख को देखते हुए की गई है।

निरस्त होने वाले ज्यादातर परीक्षा केंद्र पूर्वांचल इलाके, खासकर गाजीपुर और बलिया आदि जिले के हैं। खास बात यह है कि हाई स्कूल और इंटरमीडिएट यूपी बोर्ड वर्श 2013 की परीक्षा 12 मार्च से शुरू होने जा रही है। इसमें लाखों परीक्षार्थी शामिल होंगे। 

इलाहाबाद से शिवाशंकर पांडेय की रिपोर्ट.

आप तो अपने रन कुर्बान कर देते पर एक महान सम्पादक उस रात कुर्बान हो गया था सचिन

आस्ट्रेलिया के साथ दूसरा टेस्ट खेलने हैदराबाद पहुंची टीम इंडिया के सबसे उम्रदराज खिलाड़ी सचिन तेंदुलकर यहां इसी टीम के खिलाफ पांच नवम्बर २००९ को खेले गए एक दिनी मैच में अपनी १७५ रन की पारी और टीम की तीन रन से सनसनीखेज पराजय को याद कर भावुक हो उठे. उन्होंने मीडिया से बात करते हुए गुरुवार की शाम कहा, " मै उस मुकाबले में अपनी टीम की जीत के लिए अपने १७५ रन कुर्बान कर देता".

हम जैसे पत्रकार बिरादरी के वे लोग भी सचिन का यह बयान सुन कर भावुक हो उठे जिनको यह पता है कि उस रात एक महान संपादक निर्वाण को प्राप्त हुआ था और उसका कारण यह मैच, सचिन की पारी और अंत में हुई भारत की हार ही था. जी हाँ सचिन ने उस पुराने घाव को एक बार फिर से हरा कर दिया. बात हो रही है महान संपादक, चिन्तक-पत्रकार और क्रिकेट से जुनूनी हद तक प्यार करने वाले प्रभाष जोशी जी की. प्रभाष जी उस रात वसुंधरा स्थित अपने अपार्टमेंट में यह मैच देख रहे थे. आस्ट्रेलिया के ३५१ के लगभग असंभव से लक्ष्य का पीछा करने के दौरान सचिन जैसे ही आउट हो हुए, प्रभाषजी ने यह सोच कर कि भारत तो जीत की देहरी तक पहुंच ही चुका है, टीवी बंद कर दिया. थोड़ी देर बाद निर्माण विहार वाले उनके आवास से फोन आया, उन्होंने अपने पूर्व क्रिकेटर बेटे संदीप जोशी से पूछा," मैच का क्या हुआ…?" जैसे ही संदीप ने कहा,'' भारत तीन रन से हार गया."

बस इतना सुनते ही उनकी धड़कन हमेशा के लिए थम गयी और एक पत्रकार जो इस खेल से बेइंतहा प्यार करता था, इसी खेल पर कुर्बान हो गया…शहीद हो गया, जिस खेल ने उनको कभी बूढा नहीं होने दिया था, अपने साथ ही लेता चला गया…जरा कल्पना कीजिये कि अगले ही दिन मुझे आकाशवाणी के fm गोल्ड के स्पोर्ट्स स्कैन कार्यक्रम में जब मुझे इस घटना पर बोलना पड़ा तब मेरी क्या हालत हुई होगी, यह आप नीचे उनका संस्मरण पढ़ कर समझ सकेंगे कि कितना असहज हुआ था मैं. गावस्कर और सचिन उनके सबसे प्रिय खिलाड़ी थे. सचिन ने भी उस समय उन्हें याद किया था पर शायद वह पूरी घटना नहीं जानते थे…आज उस पारी के साथ सचिन ने उन्हें भले ही याद न किया हो पर हमें तो प्रभाष जी शिद्दत से याद आये… पढ़िए २२ नवम्बर २००९ को लिखी मेरी यह पोस्ट.

यह खेल मुझे बूढ़ा नहीं होने देगा : प्रभाष जोशी

प्रभाषजी के प्रयाण से लेकर 21 नवम्बर 2009 तक जितनी भी परिचर्चा और श्रृद्धांजलि सभाएं हुई, उनमे लगभग सभी ने यह स्वीकार कर लिया कि विभाजन बाद की भारतीय पत्रकारिता में प्रभाषजी माउंट एवेरेस्ट हैं. सभी ने एक -एक दिशा से एवरेस्ट की चढाई की विशालता और भव्यता का वर्णन किया. मैं उन समस्त वर्णनो का सम्मान करता हूँ. लेकिन मेरा प्रयास है कि प्रभाषजी के एवरेस्ट शिखर की ओर उस दिशा से चढ़ने की पहल करूं जिस ओर किसी ने भी कोशिश नहीं की. प्रभाषजी के समग्र कृतित्व को यदि हम देखें तो सभी ने उनमे एक ज्ञान -वृद्ध स्वरुप को ही ढूँढा. जबकि प्रभाषजी में हमेशा ही एक किशोर जीवित रहा जिसमे शैशव की मधुरता की झलक मिली तो चरम यौवन की अपार संभावनाएं भी.

उन्हीं प्रभाषजी का जीवन मंत्र था – चलते रहो – उस यात्रा में प्रेरक शब्द थे – तेजयांन, बलियान, महियान. वो प्रभाषजी खिलाड़ी थे …जिनमें तेज, बल और महानता की असीम संभावनाए थी और जिसे उन्होंने कभी भी नष्ट नहीं होने दिया. उनके संस्मरणों के बिखरे मोतियों को एकत्र करने पर एक सात लड़ी का हार बन सकता है चाहे वो 1961 का ऐतिहासिक टाई टेस्ट रहा हो या सर डोनाल्ड ब्रैडमन से उनकी यादगार मुलाकातशोध परियोजना के अंतर्गत हिंदी पत्रकारिता के समुद्र मंथन का अदम्य साहस दिखाने वाले अच्युताजी (माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय के कुलाधिपति श्रद्धेय अच्युतानंद मिश्र) ने इस हिमालय सरीखी कठिन परियोजना की संकल्पित यात्रा में निष्पक्ष होकर न केवल सहयात्री नियुक्त किया वरन मुझे हिंदी खेल पत्रकारिता के क्रमिक इतिहास को लिपिबद्ध करने का अवसर भी प्रदान किया.

मेरे क्रीदावेध के मंत्रों का व्याख्याता प्रभाषजी के अलावा कोई और हो ही नहीं सकता था … दो समुद्रों के अधिकारी -सामान्य पत्रकारिता व खेल पत्रकारिता ….बात जुलाई 2005 की है …मैंने डरते -डरते प्रभाषजी को जब अपने इस कार्य के बारे में बताया और उनसे मार्गदर्शन का आग्रह किया तो उन्होंने न केवल स्वीकारोक्ति में मेरे सिर पर हाथ फेरा बल्कि झट से पुस्तक के लिए आमुख भी लिखवा दिया ….हैरत में था मै कि बिना किसी तैयारी के वो किसी रिकॉर्ड की तरह सुर में बजते ही चले गए ….आमुख लिखवाने के बाद उन्होंने मुझे अंग्रेज कवि राबर्ट ब्राउनिंग की पंक्तिया सुनायी और सदैव स्मरण रखने का आदेश भी दिया — “चलने के क्रम में अनेक बाधाएं आ सकती हैं, हताशा के क्षण भी आ सकते हैं, नैराश्य का प्रभाव हो सकता है पर वर्चस्वी उसमें भी जीवन को गतिशील पाता है, निराशा स्थाई नहीं है, मनुष्य उससे अपार बल समेट कर अन्धकार से जूझने के लिए खड़ा होता है".

प्रभाषजी का यह गुरुमंत्र मेरे लिए प्रेरक शक्ति बन गया …उन्होंने पूरी प्लानिंग की और फिर उसी के मुताबिक मैं काम करता रहा और उन्हें दिखाता रहा ….मैं अक्सर दिन में जाता था और जब भी कोई क्रिकेट मैच होता तो प्रभाषजी को मैंने टीवी के सामने उसी में डूबा पाया …साथ में होता था उनका नन्हा पोता …माधव. फिर शुरू होता विश्लेषण, जिसको माधव भी पूरी तन्मयता से सुनता ….प्रभाषजी ने ही बताया कि किस कदर पहला टेस्ट मैच कवर करने की ललक उनमें थी …..प्रभाषजी आमुख में कहते हैं – “मैं पत्रकारिता में इसलिए नहीं आया कि खेल के जुनून में था और खेल पर इसलिए नहीं लिखता कि पत्रकारिता में हूं। यह दुर्घटना है कि मैं पुराना टेस्ट खिलाड़ी होने की बजाय रिटायर्ड संपादक हूं। पत्रकारिता में नहीं भी होता तो भी खेलों में मेरी रुचि इसी तरह आग-सी जलती रहती। जब मैं संपादक हो गया और 1976 में दिल्ली के फिरोजशाह कोटला मैदान में एक टेस्ट हुआ, उसके पहले दिन की शुरुआत देखने के लिए मैं अपने दफ्तर से पास के ही कोटला ग्राउंड तक उत्तेजना में लगभग भागता हुआ गया। कार से जा सकता था, सीधे अपनी जगह पर जाकर बैठ सकता था लेकिन मैं दस बरस के उस उत्तेजित लड़के की तरह कूदता-फांदता गया, ठीक वैसे ही, जैसे लगभग चालीस -पैंतालीस साल पहले अपने घर से यशवंत क्लब (इंदौर) गया था। शाम को लौटकर आया और अपने कमरे में कुरसी पर बैठा तो मुझे अचानक लगा कि अगर क्रिकेट का यह जुनून नहीं होता तो पचास पार मुझ जैसे संभ्रांत प्रतिष्ठित संपादक के दिल में दस बरस के उस बच्चे का दिल धड़कता न होता। अचानक मेरा मन क्रिकेट के प्रति कृतज्ञता से भर गया। यह खेल मुझे बूढ़ा नहीं होने देगा। किसी ने कहा है कि खेल चरित्र बनाने से ज्यादा चरित्र प्रकट करता है। मैं इमानदारी से कह सकता हूं कि मुझे सदा जीवंत रहने वाला मनुष्य खेल ने ही बनाया और वही मेरे चरित्र के सत्व को प्रकट करता है। …..सब कुछ खेल लेने और लीजेंड हो जाने के बाद बोरिस बेकर अपनी पत्नी को विंबलडन के सेंटर कोर्ट पर ले गए और वहां की घास दिखाकर कहा, 'यह वह जगह है, जहां मैं जनमा हूं।' बोरिस बेकर को आप-हम सब जानते हैं- जर्मनी के एक छोटे से गांव में जनमे हैं, अगर वह विंबलडन के सेंटर कोर्ट को अपना जन्म-स्थान बताते हैं तो वे वहां द्विज हुए थे- कुछ वैसे ही जैसे पोरबंदर में जनमे मोहनदास करमचंद गांधी पीटर्स मेरिसबर्ग के रेलवे प्लेटफार्म पर द्विज हुए थे। जब आप अपने को उत्पन्न करके अपना साक्षात्कार करते हैं, तब आपका असली जन्म होता है। पॉवर और पैसे के खेल में जनमे और पनपे बोरिस बेकर को यह आत्म-साक्षात्कार विंबलडन में हुआ। कोई आश्चर्य नहीं कि जब एक अद्भुत फाइनल में वे पीटर सैंप्रस से हारे तो मैच के बाद उन्होंने पीटर के कान में कहा, 'मैं टेनिस से रिटायर हो रहा हूं।' "अपने जीवन की पहली क्रिकेट कवरेज की चर्चा करते-करते प्रभाषजी भावुक हो उठे थे. 1961-62 की वो ऐतिहासिक सिरीज का टाई टेस्ट था. उन दिनों टीवी कौन कहे रेडियो भी हम जैसो के लिए सपना हुआ करता था. पड़ोस में सेना के एक अधिकारी रहते थे उनके रेडियो के 14 मीटर बैंड पैर कमेंट्री आ रही थी. मैंने घर की दीवार पैर बैठ कर कमेंट्री सुनी और विवरण कागज पैर नोट करता रहा. शाम को उसी आधार पर खबर बना दी."

ये थी एक खेल प्रेमी के भीतर की आग जो मृत्यु के समय किस कदर धधकी होगी जब सचिन के 175 की पारी खेलने के बावजूद भारत हार गया था. सचमुच, वीरगति को प्राप्त हुए प्रभाषजी का खेल लेखन इसीलिए सर्वग्राही था कि वो दिल से लिखते थे. वो पाठक के मन को पढ़ते थे और वैसे ही उसे कलम से उकेर देते थे थे. क्रिकेट या टेनिस किसी पर भी उनका लेखन पाठक को गुदगुदाता था तो रुलाता भी था. वो आगे कहते हैं, “मुझे खेल जो आनंद देता है, वह और किसी गतिविधि में नहीं मिलता। जिस इंदौर शहर में मैं पला-पनपा, वह होल्करों का शहर था, लेकिन इसके राजा यशवंतराव होल्कर नहीं, कोट्टरी कनकइया (सीके नायडू) नायडू थे। वहां के लड़कों को जो प्रेरणा और इंदौर के होने का गर्व नायडू से मिलता था, वह और किसी से नहीं। मुझे बार-बार एडिलेड की वह सुबह याद आती है, जब क्रिकेट प्रशंसकों के निरुत्साहित किए जाने के बावजूद हम डॉन ब्रैडमन के घर गए। ब्रैडमन को मैंने कहा, 'यदि आप तत्काल दरवाजा नहीं खोलते तो भी मैं उसके बाहर खड़ा रहता। बचपन के कितने दिन सीके नायडू की एक झलक देखने के लिए मैंने उनके बंगले के बाहर गुजारे। मैं जिस देश से आया हूं, वहां दर्शन करने वाले पट खुलने का इंतजार करते रहते हैं। जब पट खुलते हैं, तब दर्शन करके, जय बोलकर खुशी-खुशी अपने घर जाते हैं। मैं आपके दर्शन के लिए यह करता। डॉन ब्रैडमन को यह बात इस कदर छू गई कि वह सिनीसिज्म या सनकीपन, जिसके खिलाफ हमें लोगों ने आगाह किया था, कहीं दिखा नहीं। उन्होंने ललक कर मुझसे सचिन, गावस्कर और विजय मर्चेंट के बारे में पूछा। खुद दस्तखत करके दिए। बाहर निकले तो कहा, 'कोई फोटो-वोटो नहीं खींचोगे?' मेरे साथ अशोक कुमुट था। उसने फोटो खींचे और फिर अशोक कुमुट के मैंने। मुझे गर्व है कि खेल के प्रति दीवानगी थोड़ी-बहुत मेरे अंदर भी है। इस दीवानगी और खेल के इस आनंद और गौरव को व्यक्त करने के लिए मैं क्रिकेट, टेनिस और दूसरे खेलों पर लिखता हूं। यह अपने को बूढ़ा न होने देने और जवान बनाए रखने का सबसे अच्छा तरीका है। एक पैसे की दवा नहीं और रंग भी चोखा है।"

हिंदी के खेल पत्रकारों को उनका समुचित स्थान न मिलने से प्रभाषजी काम व्यथित नहीं थे… “यह मेरे जीवन के प्रोफेशनल दुखों में सबसे बड़ा दुख है कि मेरी भाषा और मेरे क्षेत्र के लोग अपनी दीवानगी व्यक्त करने के लिए अखबारों और टीवी चैनलों पर वह जगह नहीं पाते, जो मुझ जैसे खेल का आदमी न होते हुए भी अपनी इतर पत्रकारीय हैसियत के कारण सहज पा गया। जब मैं पहली बार ऑस्ट्रेलिया में विश्व कप कवर करने गया तो जो सुख-सुविधाएं मुझे प्राप्त थीं, वे खेल के किसी भी तीसमार खां को प्राप्त नहीं थीं और उसमें सिर्फ हिंदी के पत्रकार नहीं, भारत के सभी खेल पत्रकारों की यही दुर्गति थी। ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड से लौटकर आया तो मुझे जगह-जगह लोगों ने कहा कि जो लोग अंग्रेजी में ही क्रिकेट की रपट पढ़ते थे, वे भी पहले हिंदी में लिखी मेरी रपट पढ़ते थे। मुझे इस पर फूलकर कुप्पा हो जाना चाहिए था, मैं नहीं हुआ। क्योंकि मैं जानता हूं कि अपनी भाषा में जितना असरकारक मैं और मेरे जैसा कोई भी हिंदी वाला लिख सकता है, सीखी हुई अंग्रेजी में नहीं लिख सकता। यह आपका- मेरा दुर्भाग्य है कि हमें उस दरबार में नीचे बैठाया जाता है, जहां का सिंहासन 'अपना' है। मेरी अंतिम इच्छाओं में से एक यह होगी कि मेरी भाषा का कोई पत्रकार एक दिन फिर उस सिंहासन को अपना बनाए और उस पर बैठकर लिखे। हुक्म की तरह नहीं, आनंद की, गौरव की और अपने को बर्फ की तरह गला देने की इच्छा से लिखे।

वरिष्‍ठ खेल पत्रकार पदमपति शर्मा के एफबी वॉल से साभार.

डॉ.कविता वाचक्नवी को ‘आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी पत्रकारिता सम्मान’

हैदराबाद : भारतीय जीवन मूल्यों के प्रसार की अंतरराष्ट्रीय संस्था ‘विश्वम्भरा’ की संस्थापक महासचिव डॉ. कविता वाचक्नवी को लंदन स्थित भारतीय उच्चायोग द्वारा विश्व हिंदी दिवस के अवसर पर दिया जाने वाला ‘आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी पत्रकारिता सम्मान’ प्रदान किए जाने की घोषणा की गई है. यह पुरस्कार उन्हें इंटरनेट और वेब पत्रिकाओं के माध्यम से ब्रिटेन में हिंदी के उत्कृष्ट प्रचार-प्रसार के लिए प्रदान किया जा रहा है.

उल्लेखनीय है कि डॉ. कविता वाचक्नवी विगत कई वर्षों से लंदन में रहकर हिंदी और भारतीय संस्कृति के इंटरनेट द्वारा प्रचार-प्रसार के लिए अहर्निश सेवा कर रही हैं. उनके इस सेवा कार्य को देखते हुए भारतीय उच्चायोग ने उन्हें यह पुरस्कार देने का निर्णय लिया है. पुरस्कार 19 मार्च, 2013 को चार बजे ‘भारत भवन’ में आयोजित समारोह में प्रदान किया जाएगा. इस संदर्भ में देश-विदेश के साहित्य प्रेमियों और हिंदी सेवियों ने डॉ. कविता वाचक्नवी को बधाई और शुभकामनाएँ दी है.

नवदुनिया में एनई बने रवींद्र कैलासिया, देवकी नंदन ने कार्यभार संभाला

दैनिक भास्‍कर के बीटीवी से इस्‍तीफा देने वाले रवींद्र कैलासिया ने भोपाल में जागरण समूह का अखबार नवदुनिया से जुड़ गए हैं. उन्‍होंने न्‍यूज एडिटर के पद पर ज्‍वाइन किया है. रवींद्र कैलासिया ने 1 मार्च को अपनी नई जिम्‍मेदारी संभाली. रवींद्र कैलासिया मध्‍य प्रदेश के तेजतर्रार तथा जानेमाने पत्रकार हैं. वे तीन दशकों से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं. इन्‍होंने अपने करियर की शुरुआत 84 में नईदुनिया के साथ की थी. नवदुनिया के साथ ये घर वापसी कर रहे हैं. इसके अलावा इन्‍होंने चौथा संसार, नवभारत, दैनिक भास्‍कर, पत्रिका को भी लंबे समय तक अपनी सेवाएं दी हैं.

राष्‍ट्रीय सहारा, बनारस से खबर है कि देवकी नंदन मिश्रा ने अपना कार्यभार संभाल लिया है. उन्‍होंने शुक्रवार को यूनिट हेड के रूप में अपनी नई जिम्‍मेदारी संभाली. उल्‍लेखनीय है कि पिछले दिनों ही देवकी नंदन का तबादला पटना से बनारस किया गया था.

तेज से इस्‍तीफा देकर जी न्‍यूज पहुंचे प्रखर, आई नेक्‍स्‍ट से सुधांशु का इस्‍तीफा

आजतक समूह के चैनल तेज से खबर है कि प्रखर श्रीवास्‍तव ने इस्‍तीफा दे दिया है. वे यहां पर सीनियर प्रोड्यूसर थे. प्रखर अपनी नई पारी जी न्‍यूज के साथ शुरू करने जा रहे हैं. उन्‍हें यहां पर डिप्‍टी एक्‍जीक्‍यूटिव प्रोड्यूसर बनाया जा रहा है. प्रखर की गिनती टीवी के तेजतर्रार पत्रकारों में की जाती है. वे लंबे समय से आजतक समूह के साथ जुड़े हुए थे. वे कई अन्‍य संस्‍थानों को भी अपनी सेवाएं दे चुके हैं.

आई नेक्‍स्‍ट, गोरखपुर से खबर है कि सुधांशु कुमार ने इस्‍तीफा दे दिया है. वे यहां पर फोटो जर्नलिस्‍ट के पद पर कार्यरत थे. पांच महीने पहले ही सुधांशु ने आई नेक्‍स्‍ट ज्‍वाइन किया था, परन्‍तु उन्‍हें यहां की परिस्थितियां रास नहीं आई. सुधांशु ने अपने करियर की शुरुआत अमर उजाला, कानपुर से की थी. इसके बाद वे नोएडा के कई अखबारों में अपनी सेवाएं देने के बाद डीएनए के साथ इलाहाबाद में जुड़े. यहां से इस्‍तीफा देने के बाद हिंदुस्‍तान, गोरखपुर से जुड़ गए थे. हिंदुस्‍तान से इस्‍तीफा देने के बाद आई नेक्‍स्‍ट से जुड़ गए थे.

हिंदुस्‍तान, बरेली में संजीव गंभीर बर्खास्‍त, नवीन का इस्‍तीफा

हिंदुस्‍तान, बरेली से खबर है कि सीनियर रिपोर्टर संजीव गंभीर को बर्खास्‍त कर दिया गया है. संजीव पर आरोप है कि वे लंबे समय से छुट्टी पर चल रहे थे. वे हिंदुस्‍तान की बरेली में लांचिंग के समय से जुड़े हुए थे. इसके पहले वे अमर उजाला को अपनी सेवाएं दे रहे थे. इनके पहले डीएनई बृजेंद्र निर्मल को भी अनुशासनहीनता के आरोप में बर्खास्‍त कर दिया गया था.

हिंदुस्‍तान, बरेली से ही दूसरी खबर है कि रिपोर्टर नवीन पपने से प्रबंधन ने इस्‍तीफा मांग लिया है. नवीन का संबंध अब अखबार से खतम हो गया है. उन पर काम में लापहरवाही बरतने का आरोप था. नवीन अपनी नई पारी कहां से शुरू करेंगे इसकी जानकारी नहीं मिल पाई है. समझा जा रहा है कि आने वाले दिनों में काम में लापरवाही करने वाले और लोगों पर गाज गिर सकती है.  

बजट में चिदंबरम ने ‘संतुलन’ साधने की कर दी है सर्कस!

वित्तमंत्री पी. चिदंबरम ने 2013-14 के प्रस्तुत किए गए बजट में काफी चतुराई दिखाने की कोशिश की है। उन्होंने तमाम बजट पूर्वानुमानों को खासे झटके दिए हैं। सत्तारूढ़ कांग्रेस के हलकों में पक्के तौर पर उम्मीद की जा रही थी कि वित्तमंत्री इनकम टैक्स में कर छूट का दायरा जरूर बढ़ाएंगे। ताकि चुनावी वर्ष में पार्टी की राजनीति को ज्यादा चमकदार बनाया जा सके। लेकिन वित्तमंत्री ने इन उम्मीदों पर पूरी तरह से पानी फेर दिया। इनकम टैक्स के स्लैब में भी कोई बदलाव नहीं किया गया। इतना जरूर हुआ कि उन्होंने एक करोड़ रुपए से अधिक की आय वाले अमीरों पर दस प्रतिशत का सरचार्ज ठोंक दिया है। मध्यवर्ग को वित्तमंत्री ने कोई राहत तो नहीं दी। यदि यह वर्ग चाहे, तो अमीरों पर ज्यादा टैक्स लगने से अपने मन को कुछ तसल्ली दे ले।

कांग्रेस के राष्‍ट्रीय महासचिव चौधरी बीरेंद्र सिंह कहते भी हैं कि कांग्रेस की नीतियां हमेशा सच्चे समाजवाद से प्रेरित रहती हैं। वित्तमंत्री ने अगर अमीरों पर टैक्स बढ़ाया है, तो यह हर तरह से उचित कहा जा सकता है। उन्होंने यही कहा है कि वैश्विक मंदी के इस दौर में यूपीए सरकार ने बहुत अच्छे ढंग से भारत को बड़ी आर्थिक चपेट से बचा लिया है। तमाम खराब स्थितियों में भी वित्तमंत्री ने बजट में किसी वर्ग पर ज्यादा बोझ नहीं डाला। इसकी सराहना तो विपक्ष को करनी चाहिए। लोकसभा में विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज का सवाल है कि कांग्रेस के नेता इस बजट के ‘कीर्तन’ गाकर भला देश के लोगोंं को और कितना चिढ़ाएंगे? सुषमा कहती हैं कि बात-बात में आम आदमी की दुहाई देने वाली कांग्रेस के वित्तमंत्री ने 100 मिनट के बजट भाषण में एक बार भी आम आदमी का जिक्र नहीं किया। शायद इसीलिए कि उनके वित्तीय एजेंडे में कहीं आम आदमी के लिए कोई गुंजाइश भी नहीं है।

चिदंबरम ने माना है कि भारतीय अर्थव्यवस्था के सामने कई बड़ी चुनौतियां खड़ी हैं। ऐसे में प्रत्यक्ष करों में वे किसी बड़ी छूट का तोहफा नहीं दे पाए। यदि वे ऐसा कुछ करते, तो इसके परिणाम सेहतमंद नहीं हो सकते थे। आर्थिक और राजनीतिक मामलों के विशेषज्ञ यही कयास लगा रहे थे कि चिदंबरम का यह बजट चुनावी ज्यादा होगा। लेकिन बजट को देखकर सीधे तौर पर यह कहना मुश्किल है कि वित्तमंत्री ने पार्टी की राजनीतिक जरूरतों को ही तरजीह दी है। यह जरूर है कि उन्होंने बड़ी बारीकी से कुछ ऐसी कारीगरी दिखाई है, जिससे कि पार्टी के वोट बैंक की राजनीति को सीधे तौर पर कोई झटका न लगे।

अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (एएमयू) को बजट में विशेष विकास के लिए 100 करोड़ रुपए का प्रावधान किया गया है, तो राजनीतिक संतुलन साधने के लिए बनारस हिंदू विश्व विद्यालय (बीएचयू) को भी इतनी ही रकम आवंटित करने की व्यवस्था है। क्योंकि चिदंबरम की पार्टी अपनी झोली में हर समुदाय का वोट बैंक देखना चाहती है। सीपीआई के वरिष्ठ नेता अतुल कुमार अनजान का मानना है कि कांग्रेस की धर्म निरपेक्षता में राजनीतिक स्वांग ज्यादा होता है। उसकी चिंता सही मायने में गरीब अल्पसंख्यक वर्ग के कल्याण की नहीं होती। ये लोग तो सरकारी रेवड़ियां बांटकर वोट बैंक की चिंता में लगे रहते हैं। बजट को कांग्रेसी अक्सर वोट बैंक की राजनीति का हथियार ही बनाते हैं। इस बार भी कुछ-कुछ ऐसी ही कोशिश हुई है।

अतुल अनजान का मानना है कि वित्तमंत्री ने किसानों और समाज के कमजोर वर्गों के साथ धोखा ही किया है। ऐसे कोई प्रावधान नहीं किए गए जिससे कि कृषि की अर्थ व्यवस्था को और मजबूती मिलती। सच तो यह है कि वित्त मंत्री चिदंबरम की अर्थिक नीतियों से विदेशी पूंजी वाले मस्त हो रहे हैं। जबकि देश की कामगार जनता पस्त हो रही है। हमारे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की चिंता आम आदमी की आर्थिक सेहत पर नहीं रहती। उन्हें तो यही चिंता सताती है कि ऐसा सब कुछ कर दो, जिससे कि विदेशी निवेशक खुश हो जाएं। भले ही ये लोग देश का कितना माल यहां से उड़ा कर ले जाएं? यह शायद उनकी चिंता का विषय नहीं है। यदि यही अर्थिक नीतियां लंबे समय तक चलीं, तो देश को बहुत बुरे दिन देखने पड़ सकते हैं।

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता चौधरी बीरेंद्र सिंह कहते हैं कि आज के दौर में वामदालों को भी अपना घिसापिटा आर्थिक दर्शन बदल लेना चाहिए। क्योंकि दुनिया तेजी से बदल रही है। ऐसे में हम चार दशक पहले वाले आर्थिक सोच के साथ जकड़े नहीं रह सकते। वित्तमंत्री ने टैक्सों के जरिए करदाताओं से 18 हजार करोड़ का अतिरिक्त कर वसूलने का प्रावधान किया है। उनका दावा तो यही है कि ये प्रावधान बहुत सोच समझकर किए गए हैं। इससे किसी वर्ग को ज्यादा तकलीफ नहीं होनी चाहिए। बजट में स्वास्थ्य बीमा का दायरा बढ़ाने पर जोर दिया गया है। इस प्रावधान से यह जताने की कोशिश हुई है कि सरकार हेल्थ सेक्टर के विकास को लेकर खास पहल कर रही है। इससे लोगों के जीवन स्तर में भी बेहतरी जरूर आएगी।

घर बनाने के लिए अब 25 लाख की रकम का कर्ज लेने वालों को भी कर में रियायत का प्रावधान है। उन्हें इस मद में अब एक लाख रुपए तक की छूट मिल जाएगी। खाद्य सुरक्षा गारंटी विधेयक को संसद के इसी सत्र में पारित कराने की तैयारी है। क्योंकि इसकी पहल खास तौर पर कांग्रेस प्रमुख सोनिया गांधी ने की है। पार्टी के रणनीतिकारों को उम्मीद है कि ‘मनरेगा’ की तरह खाद्य सुरक्षा गारंटी कानून अगले चुनाव में यूपीए के लिए राजनीतिक वरदान बन सकता है। क्योंकि 2009 में हुए लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने ‘मनरेगा’ को खूब भुना लिया था। खाद्य सुरक्षा विधेयक अभी लंबित है, लेकिन वित्तमंत्री ने इस मद के लिए 10 हजार करोड़ रुपए का प्रावधान कर दिया है। इसके जरिए खास राजनीतिक संदेश देने की कोशिश जरूर दिखाई पड़ती है। पिछले वर्ष 16 दिसंबर को दिल्ली में एक पैरामेडिकल छात्रा के साथ दुष्कर्म की वारदात हुई थी। इसको लेकर पूरे देश में महिला सुरक्षा के मुद्दे पर बहस छिड़ गई है। यहां तक कि महिलाओं से जुड़े अपराधों पर और ज्यादा सख्त सजा का कानूनी प्रावधान किया गया है। नए कानून के लिए इसी सत्र में एक विधेयक भी पारित होने जा रहा है।

दिल्ली में हुए बहुचर्चित गैंगरेप की पीड़िता का नाम कई मीडिया संस्थानों ने ‘निर्भया’ दिया था। क्योंकि इस लड़की ने बलात्कारियों से जूझने में अभूतपूर्व बहादुरी का परिचय दिया था। वित्तमंत्री ने महिलाओं की सुरक्षा बढ़ाने के लिए विशेष बजट का प्रावधान किया है। इसके लिए 1 हजार करोड़ रुपए से ‘निर्भया फंड’ बनेगा। जाहिर है कि इस प्रावधान से आधी आबादी को खुश करने की कोशिश हुई है। हालांकि, कोई भी वित्तमंत्री के इस कदम पर शायद ही ऊं गली उठा पाए? विपक्ष ने यही कहा है कि सरकार ने अभी तय ही नहीं किया है कि महिलाओं की सुरक्षा के लिए क्या-क्या कदम उठाने हैं, ऐसे में बजट के प्रावधान से ही क्या हो जाएगा?

तमाम विकास परियोजनाओं के लिए सरकार को जमीन अधिग्रहित करनी होती है। कई सालों से यह आवाज उठती आ रही है कि किसानों से मुआवजे की राशि पर टैक्स न वसूला जाए। इस बार चिदंबरम ने साफ तौर पर प्रावधान किया है कि खेती की जमीन खरीदने और बेचने पार कोई टैक्स नहीं रहेगा। वित्तमंत्री ने इस बार कुछ नायाब कदम भी उठाए हैं। अब सरकार ‘महिला बैंक’ खोलेगी, जिसमें सारा स्टाफ महिलाओं का होगा। अक्टूबर में पहला महिला बैंक खोलने का लक्ष्य भी रखा गया है। अगले लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की कोशिश है कि अल्पसंख्यकों का एक मुश्त वोट बैंक उसकी ही झोली में आ जाए। शायद इसी कोशिश में अल्पसंख्यकों के कल्याण के लिए जोरशोर से तमाम योजनाएं चलाई जा रही हैं। इस बार बजट में अल्पसंख्यक विकास के लिए 3511 करोड़ रुपए की भारी रकम का प्रावधान किया गया है। अल्पसंख्यकों के विकास के लिए चिदंबरम ने इतनी बड़ी रकम की व्यवस्था की है, कायदे से इस प्रावधान से मुलायम सिंह जैसे नेताओं को खुश होना चाहिए। क्योंकि ये भी अल्पसंख्यकों के बड़े हिमायती हैं।

लेकिन राजनीति की लकीर हमेशा सीधी नहीं चलती। सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह ने कह दिया है कि यह बजट किसान और गरीब विरोधी है। अल्पसंख्यकों के विकास के लिए कांग्रेस की नीतियों में ईमानदारी ही नहीं है, तो बजट देने से ही क्या हो जाएगा? कांग्रेस के नेता यही ढिंढोरा पीटने में लगे हैं कि वैश्विक मंदी के दौर में भला इससे बढ़िया बजट और क्या होता? वित्तमंत्री ने कहा भी है कि इस दौर में सकल विकास दर में कुछ गिरावट जरूर है, लेकिन इससे वे चिंतित नहीं हैं। क्योंकि जीडीपी के मामले में चीन और इंडोनेशिया ही हमसे कुछ आगे हैं। ऐसे में अपनी इसी विकास दर पर खुश होने के हमारे पास पर्याप्त कारण हैं। अच्छा यही रहेगा कि आर्थिक विकास के मामले में संकीर्ण दलगत राजनीति से ज्यादा से ज्यादा परहेज हो। शायद यही देश की आर्थिक सेहत के लिए ठीक है।

लेखक वीरेंद्र सेंगर डीएलए (दिल्ली) के संपादक हैं। इनसे संपर्कvirendrasengarnoida@gmail.com के जरिए किया जा सकता है।

जागरण में राजेश यादव का गोरखपुर एवं निर्भय सिंह का बनारस तबादला

दैनिक जागरण, बनारस से खबर है कि सर्कुलेशन मैनेजर राजेश यादव का तबादला गोरखपुर कर दिया गया है. राजेश यादव लगभग डेढ़ दशक से दैनिक जागरण से जुड़े हुए हैं. अभी उन्‍होंने गोरखपुर ज्‍वाइन नहीं किया है. उनकी जगह गोरखपुर में तैनात सर्कुलेशन मैनेजर निर्भय सिंह का तबादला बनारस के लिए कर दिया गया है. खबर है कि निर्भय सिंह ने अपनी जिम्‍मेदारी संभाल ली है. राजेश यादव के गोरखपुर ज्‍वाइन करने की संभावनाओं को लेकर कयास लगाए जा रहे हैं.

उल्‍लेखनीय है कि बनारस मंडल में दैनिक जागरण को जमाने का श्रेय राजेश और उनके पिता भानू शंकर यादव को जाता है. ये दोनों पिता-पुत्र दैनिक जागरण के बनारस में लांच होने के समय से जुड़े हुए हैं. पहले जागरण के सर्कुलेशन का चार्ज भानू शंकर यादव के जिम्‍मे था. उनकी मंडल के हॉकरों पर जबरदस्‍त पकड़ थी, जिसका फायदा जागरण को मिला. उनके निधन के बाद राजेश यादव ने जागरण के सर्कुलेशन को नई ऊंचाई दी. पर प्रबंधन ने उनके कार्यों को नजरअंदाज करते हुए उनका तबादला कर दिया है. संभावना जताई जा रही है कि प्रबंधन के फैसले से नाराज राजेश यादव इस्‍तीफा भी दे सकते हैं. हालांकि इसकी पुष्टि नहीं हो पा रही है. 

पत्रकार बताकर अवैध वसूली करने वाला अरेस्‍ट

बल्लभगढ़ : अपने को पत्रकार बता नगर निगम से रेहड़ी लगाने की सहमति दिलाने के नाम पर रेहड़ी वालों से अवैध धन वसूली करने के आरोप में पुलिस ने एक युवक को गिरफ्तार किया है। श्याम कालोनी निवासी अवधेश बस स्टैंड पर केले की रेहड़ी लगाता है। 22 जनवरी को नगर निगम के तोड़फोड़ दस्ते ने सभी रेहड़ियों को हटा दिया, तभी उनके पास गांव साहुपुरा का रहने वाला धर्मेद्र नाम का एक युवक आया, उसने अपने को पत्रकार बताया तथा  रेहड़ी वालों से कहा कि वह उनकी रेहड़ियों को लगवाने के लिए निगम से सहमति ले लेगा। इसके लिए उसे प्रत्‍येक रेहड़ी वालों को 200 रुपये देने होंगे।

कथित पत्रकार की बातों पर विश्वास करके अवधेश व उसके साथ रेहड़ी लगाने वालों ने उसे रुपये एकत्रित कर 5000 रुपये दे दिए। अवधेश व उसके साथियों के कई बार कहने के बावजूद धर्मेद्र ने रेहड़ी लगाने की निगम से सहमति नहीं दिलवाई। बृहस्पतिवार को अवधेश के पास धर्मेद्र दोबारा आया और बोला कि अगर रेहड़ी लगानी है तो 200 रुपये दे दो, नहीं तो तुम्हारी निगम से शिकायत कर दूंगा। अवधेश व उसके चार साथी मनोज, पप्पू, अशोक, पिंटू ने उसे 200-200 रुपये दे दिए। इसके बाद धर्मेद्र रेहड़ी लगाने की सहमति नहीं दिलवाई। इस मामले में वे लोग थाना शहर की बस स्टैंड पुलिस चौकी में शिकायत कर दी। पुलिस ने उसकी शिकायत पर आरोपी धर्मेद्र को अवैध वसूली करने के आरोप में गिरफ्तार कर मुकदमा दर्ज कर दिया।

वो कैमरा ही नहीं, नौकरी भी देने को तैयार, पर ये कथित पीड़ित महोदय कहां हो गए फरार!

किन्हीं राकेश बंसल उर्फ स्वतंत्र फोटोग्राफर ने पिछले दिनों आरोप लगाया कि उनका कैमरा दीपक चौरसिया व उनके लोगों ने छीन लिया, गायब कर दिया, और मांगने पर दे नहीं रहे. राकेश बंसल के इस आरोप को आम आदमी पार्टी के लोगों ने तूल दे दिया. न्यू मीडिया और सोशल मीडिया पर इसे बढ़ा-चढ़ा कर पेश किया गया. लेकिन इसके पीछे की सच्चाई अब पता चली है. मामला ये है कि शुरू से ही दीपक चौरसिया ने राकेश बंसल को न सिर्फ कैमरा देने की बात कही, बल्कि नौकरी भी देने का प्रस्ताव रखा. पर राकेश बंसल गायब हो गए.

असल में राकेश बंसल उस टीम का हिस्सा थे, जो जंतर मंतर पर दीपक चौरसिया के लाइव शो का विरोध कर रही थी, नारेबाजी कर रही थी, लाइव शो का मंच तोड़ देने पर आमादा थी. ये लोग आम आदमी पार्टी के लोग थे. ये लोग केजरीवाल को इंडिया न्यूज द्वारा निशाना बनाए जाने से नाराज थे. हालांकि इंडिया न्यूज के लोगों का कहना है कि उनके चैनल ने अपनी तरफ से कोई आरोप अरविंद केजरीवाल पर नहीं लगाया बल्कि स्वामी अग्निवेश समेत ढेर सारे टीम अन्ना के पूर्व लोगों के आरोपों को प्रसारित किया और इन आरोपों पर केजरीवाल व उनकी टीम के लोगों से पक्ष लिया.

चैनलों का, मीडिया का काम भी यही होता है. पर आम आदमी पार्टी, केजरीवाल और इनके लोगों ने जिस तरीके से दीपक चौरसिया को टारगेट किया, उनके मोबाइल पर लगातार फोन कराए, अश्लील व गाली-गलौज भरे संवाद किए गए, गंदे व गाली-गलौज की भाषा में एसएमएस भिजवाए गए वो निंदनीय व अशोभनीय है. यह शूटिंग द मैसेंजर का ही मामला है जिसके माध्यम से टीम केजरीवाल अपनी तानाशाही और असहिष्णुता को प्रदर्शित कर रही है.

राकेश बंसल लाइव शो के दौरान अंदर घुसकर फोटो खींचने लगे. दीपक चौरसिया को टारगेट करने लगे. तब किसी ने उनका कैमरा उनसे छीन लिया. बाद में जब उन्होंने कैमरा गायब होने की शिकायत दीपक से की तो उन्होंने तुरंत कैमरा देने का आदेश दिया और इसके लिए राकेश बंसल को अपने कैमरे का बिल आदि लाने को कहा. फिर खुद राकेश बंसल ने कहा कि वो सीसीटीवी फुटेज के जरिए देखना चाहते हैं कि कैमरा किसने लिया. उन्हें फुटेज भी दिखाया गया. कुछ लोगों का कहना है कि भीड़ में से ही किसी ने उनका कैमरा चोरी कर लिया और एक हाथ से दूसरे हाथ होते हुए कैमरा गायब कर दिया गया.

राकेश बंसल ने दीपक से मिलकर पहले खुद को आज समाज अखबार का फोटोग्राफर बताया. फिर खुद को स्वतंत्र पत्रकार बताया. अब जबकि दीपक चौरसिया उन्हें कैमरा देने को तैयार हैं तो वे गायब हो गए और दीपक पर तरह तरह के आरोप लगाकर सोशल व न्यू मीडिया में प्रसारित कराने लगे. राकेश बंसल के आरोपों को आम आदमी पार्टी के लोगों ने उछाल कर हवा दे दिया और फिर से लोग दीपक चौरसिया के मोबाइल पर मैसेज कराने लगे. जिसने कैमरा चोरी नहीं की, इसके बावजूद वो नया कैमरा देने के लिए तैयार हैं तो कथित पीड़ित लेने वाला फरार है और उसे आगे कर कई लोग अपनी अपनी भड़ास निकालने में जुट गए हैं. किसी पत्रकार को इस तरह बदनाम और परेशान किए जाने की इस घटना की हर मीडियाकर्मी को निंदा करनी चाहिए क्योंकि ऐसे तो कोई भी राजनीतिक पार्टी किसी को टारगेट कर लेगी और उसका जीना हराम कर देगी.

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

मूल खबर यहां है- फ्रीलांस फोटोग्राफर का कैमरा छिनवा लिया दीपक चौरसिया ने!

डॉ. ज़ाकिर हुसैन ट्रस्ट पीआईएल लखनऊ से इलाहाबाद बेंच स्थानांतरित

इलाहाबाद हाई कोर्ट, लखनऊ बेंच में केन्द्रीय मंत्री सलमान खुर्शीद के डॉ. ज़ाकिर हुसैन मेमोरियल ट्रस्ट की कथित अनियमितताओं के सम्बन्ध में सामाजिक कार्यकर्ता डॉ. नूतन ठाकुर द्वारा दायर रिट याचिका इलाहाबाद बेंच स्थानांतरित कर दिया गया है. यह आदेश चीफ जस्टिस शिव कीर्ति सिंह ने ट्रस्ट के राज्य कोर्डिनेटर लखनऊ स्थित मोहम्मद कौनैन हुसैन द्वारा दिये आवेदन कर किया. इस आवेदन पत्र में कहा गया था कि ट्रस्ट के खिलाफ पत्रकार राजू पारुलेकर द्वारा एक दूसरी जनहित याचिका इलाहाबाद बेंच में दायर है. अतः लखनऊ बेंच में ठाकुर द्वारा दायर याचिका भी सुनवाई के लिए इलाहाबाद स्थानांतरित कर दी जाए.

ठाकुर ने इस का विरोध करते हुए कहा था कि उनकी याचिका राजू पारुलेकर की याचिका से पहले दायर की गयी थी. साथ ही इन दोनों याचिकाओं के पार्थना में भी अंतर है. कोर्ट ने इस सम्बन्ध में सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिये एक निर्णय का हवाला देते हुए याचिका इलाहाबाद स्थानांतरित करने के आदेश दिये. ट्रस्ट की तरफ से वरिष्ठ अधिवक्ता जयदीप नारायण माथुर और ठाकुर की ओर से रोहित त्रिपाठी ने बहस किया.

तांत्रिक ने सप्‍ताह भर दो नाबालिगों के साथ किया बलात्‍कार

: पहले भी हत्या के मामले में जा चुका हैं जेल : बाड़मेर। राजस्थान के बाड़मेर जिले में एक रूह कंपाने सरीखा मामला सामने आया है। बाड़मेर के गुडामालानी कस्बे में एक तांत्रिक ने चौदह और पन्द्रह साल की दो बहनों का अपहरण करके उनका सात दिनों तक लगातार बलात्कार किया। यह तांत्रिक पूर्व में भी ऐसे ही नाबालिग का अपहरण, बलात्कार और हत्या के मामले में आरोपी रह चुका है। लेकिन सबसे गम्भीर बात यह हैं कि इस बार जिन दो नाबालिग लड़कियों का इसने बलात्कार किया वो इसके नजदीकी रिश्तेदार की पुत्रियां थी।

सीमावर्ती बाड़मेर में तंत्र मन्त्र पर लोगों का अंधविश्वास हैं यहाँ तांत्रिकों का जीवन यापन इन्हीं अन्धविश्वासी लोगों के विश्वास पर चलता है। लेकिन इंसान जब इसी भरोसे का गलत फायदा उठाते हुए अपनी आदतों से मजबूर होकर और अपनी गंदी मानसिकता के वश में आकर बहशीपन पर उतर जाए तो वो रिश्तों की हर सीमा को लांघ डालता हैं। ऐसा ही वाकया बाड़मेर के गुडामालानी इलाके में हुआ है। एक तांत्रिक ने अपने ही नजदीकी रिश्तेदार की दो नाबालिग लड़कियों का अपहरण बीती 13 फरवरी को किया और उनके साथ एक हफ्ते तक राजस्थान और गुजरात के कई इलाकों में दुष्कर्म किया। बाद में जब उसकी हवस पूरी हुई तो वो लड़कियों को वापस घर से चार किलोमीटर दूर फेंक कर चला गया। इस घटना के बाद पूरे इलाके में सनसनी फ़ैल गई है। पुलिस इस मामले के खुलासे के बाद आरोपी युवक को पकड़ने के लिए भाग रही हैं। लेकिन कई दिन गुजर जाने के बाद भी यह आरोपी पुलिस की गिरफ्त से दूर है।

दरअसल प्रिया और मनीषा (बदले हुए नाम) अपने घर के पास स्थित खेत में शाम के समय काम कर रही थी। इस दौरान वहां पर आरोपी कुम्भा राम सुथार अपने एक साथी के साथ आया और इन दोनों को आवाज़ देकर पास बुलाया। लडकियां इस आरोपी को नजदीकी रिश्तेदार होने के कारण अच्छी तरह से पहचानती थी और भरोसा करके वो आरोपी की गाड़ी तक चली गईं। इस के बाद आरोपी ने अपने साथी के साथ मिलकर दोनों नाबालिग लड़कियों को अपनी गाड़ी में जबरदस्ती बिठा दिया और वहां से वो उन दोनों को पाली ले गए। पाली में एक रात बिताने के बाद आरोपी इन दोनों लड़कियों को लेकर गुजरात के हिम्मतनगर इलाके में ले गये और किसी के मकान में इन के साथ बारी बारी से दिन और रात में दुष्कर्म किया। पीडि़ताओं के अनुसार आरोपी के इस कृत्य का उसने विरोध करने के प्रयास किया तो उसने चाकू उसके गले पर रख कर चुप रहने को कहा और चुप नहीं रहने की दशा में उसे मार डालने की धमकी दी। यही पर इस सनकी तांत्रिक की हैवानियत और वहशीपन का अंत नहीं हुआ और हिम्मतनगर स्थित उस मकान से निकल कर ये आरोपी किसी अज्ञात स्थान पर स्थित एक होटल पहुंचा और होटल के पास उसने अपनी कार किसी अँधेरी जगह पर रोक कर बारी बारी से दोनों के साथ कार में ही फिर से दुष्कर्म किया।

इस दौरान भी दोनो नाबालिग लड़कियों ने फिर से इसका विरोध किया तो आरोपी ने चाक़ू और तलवार दिखा कर उनको मार देने की धमकी देकर चुप करवा दिया। तांत्रिक कई बार लड़कियों के सिर पर एक कपड़ा बार-बार घुमाता रहा। जो शायद उसकी तांत्रिक विद्या की कोई कोशिश थी। करीब एक साप्ताह तक इन दोनों के साथ लगातार दुष्कर्म होता रहा और लड़कियों को एक हफ्ते बाद वो उनके घर से 5 किलोमीटर दूर फेंक कर फरार हो गया। परिजन उसके बाद से लगातार पुलिस और प्रशासन के अधिकारियों की चौखट पर जाकर न्याय की गुहार कर रहे हैं, लेकिन आरोपी अभी पुलिस से कोसों दूर हैं।

इस घटना के बाद पुलिस के होश भी फाख्ता हो चले हैं। पुलिस ने दो नाबालिग लड़कियों के अपहरण और बलात्कार की घटना सामने आने के बाद विशेष टीमों का गठन कर दिया हैं और आरोपी की तलाश में उसके सम्भावित ठिकानों पर दबिश देनी शुरू कर दी है। लेकिन आरोपी पुलिस की पकड़ में नहीं आ रहा है, जो पुलिस के लिए सिरदर्द का मामला बनता जा रहा हैं। बाड़मेर के अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक नरेन्द्र मीणा के अनुसार आरोपी पूर्व में भी ऐसी वारदातों का दोषी रहा है और उस पर हत्या का मामला भी चल रहा हैं। साथ ही पुलिस का कहना है कि आरोपी तांत्रिक का काम करता हैं, यह भी पुलिस जांच का मुद्दा हैं कि किसी अंधविश्वास के कारण उसके द्वारा बार बार नाबालिग लड़कियों के अपहरण और बलात्कार की घटनाए तो नहीं की जा रही हैं। बाड़मेर में हुए इस नाबालिग बलात्कार के मामले ने सभी को चौंका दिया हैं। क्यूंकि इस इलाके में ऐसे मामले कम ही सुनने में आते हैं कि कोई व्यक्ति अपनी हवस के कारण 14-15 वर्षीय लड़कियां जो उसकी बेटी की उम्र की है उनसे बलात्कार जैसा घिनोना अपराध भी कारित कर सकता है।

शादी नहीं की तो मार दिया था लड़की को : इसी तांत्रिक ने अपने तन्त्र मन्त्र की गिरफ्त में आये एक परिवार की जवान बेटी को शादी नहीं करने के कारण मार डाला था। 25 जून 2011 को इस बहशी तांत्रिक ने सांजटा गाँव निवासी 17 वर्षीय निर्मला को शादी के कारण लिए पहले तो अपने वश में किया और फिर उसका अपहरण कर लिया, जब लडक़ी ने शादी करने से मना किया तो लडक़ी की हत्या कर उसके शव को कुँए में फेक दिया। इस घटना के बाद आस पास के इलाके में सनसनी फ़ैल गई थी। यही नहीं इस तांत्रिक ने जब लडक़ी का अपहरण किया तो उसके बाद तांत्रिक की पत्नी ने भी आत्महत्या कर ली और तांत्रिक उस मामले में जेल जा चुका है।

दुर्गसिंह राजपुरोहित की रिपोर्ट.

‘जनवाणी’ अखबार वाले पैसा नहीं दे रहे, लेखिका ने अपनी पीड़ा सार्वजनिक की

: KIND ATTENTION – DAINIK JANWANI TEAM : LEGAL COMPLAINT TO BE INITIATED FOR NOT RECEIVING RENUMERATION FOR MY ARTICLES PUBLISHED IN MAY & JUNE 2012 IN DAINIK JANWANI : This is to bring to your kind attention that I have not received the remuneration for my two articles published in your magazine 'Dainik Janwani' during May & June 2012. I was assured by the Editor Mr. Sachin Srivastava to whom I had submitted the articles that by July I will receive my honorarium. However after that there has been no correspondance or update on this matter from your magazine.

In Feb 2013 I got to know that Mr. Sachin Srivastava is no longer the Editor of Dainik Janwani. Therefore I put forward my complaint to Mr. Yashpal Singh, the current Editor for Dainik Janwani. Again I was told, almost 15 days before, that I will get the remuneration for the articles and yet again niether the money nor any update regarding it has reached me. I would hereby like to inform you with all due respect that for this deception I intend to take following actions –

1. Make a complaint to the 'Indian Press Council'
2. File a case against 'Dainik Janwani & The Team' under the laws governed in such matters
3. Publicly make a mockery of your magazine so that no young writer like me is harassed

This complaint has also been mailed 8 days before to the only email id available on the website of Janwani, that is, news@janwani.in and yet no reply has been received. To make things worse now the phone number given on the website is also not available.  I WOULD REQUEST EVERYONE TO SHARE THIS MSG AS MUCH AS POSSIBLE, IF YOU FEEL THAT THIS IS INJUSTICE & MISUSE OF TALENT

Thank You All

JAI MATA DI

Regards

Saumya Sharma

Writer/Director/Producer

New Delhi, India


(सौम्या शर्मा ने उपरोक्त पत्र अपने फेसबुक वॉल पर प्रकाशित किया है और इसमें जनवाणी अखबार, सचिन श्रीवास्तव समेत कई लोगों को टैग किया है)

कुदरत का अजूबा – पेड़ के उपर पेड़

कुदरत का अजूबा… गाजीपुर के दिलदारनगर क्षेत्र पेड़ों के उपर पेड़ लोगों के लिए बना हैरत का कारण। क्षेत्र में पकड़ी और पीपल के कई विशाल वृक्षों पर 20 से 30 फिट उंचे ताड़ के पेड़ कुदरत के अजूबे को दिखला रहे हैं। पचासों सालों से खड़े ये पेड़ बरबस ही लोगों को अपनी ओर खींच लेते हैं। जहां स्थानीय आज तक इसे प्रकृति का चमत्कार मान रहे थे वही अब विशेषज्ञों की इस पर अपनी अलग राय है। कुदरत का चमत्कार बना हुआ है हैरानी का कारण। जिले के दिलदारनगर क्षेत्र में एक गांव में कई पीपल और पकड़ी के पेड़ों पर है ताड़ के पेड़। विशाल वृक्षों के ठीक उपर खड़े ताड़ के पेड़ विल्कुल चमम्कारिक दिखाई पड़ते हैं क्योकि इन ताड़ों की जड़ों और जमीन के बीच 20-30की उचाई है। बीना सीधे जमीन के सम्पर्क के हवा में खड़े इन पेड़ों को देख लोग कुदरत का चमत्कार मान रहे है।क्योंकि तीसों फिट के वृक्षों के उपर बीसों फिट का तड़ का पेड़ अजब ही है। लोग भले ही सालों से इसे कुदरत का अजूबा मान रहे हो लेकिन विशेषज्ञ इस स्थिति कि वैज्ञानिक तरीके से सम्भव करार दे रहे है। बल्कि उनका कहना है कि ऐसी ही स्थिति मे आज एक ही वृक्ष पर कई प्रजाति के पेड़ों को उगाया जा रहा है। लेकिन सोचने वाली बात यह है कि यह वैज्ञानिक खोज आज के समय की है जबकि यह पेड़ के उपर पेड़ तो पचासों साल से ऐसे ही हैं। जो चीजें स्थानीय अपने बचपन से देख रहे हैं और कुदरत का अजूबा मान रहे है उसके विषय में आज हो रहे शोध उनकी पूरानी धारणा को बदलने में असमर्थ है। आज भी स्थानीय लोग इन पेड़ों को देखकर अचम्भित हो जाते हैं और इसे कुदरत का अजूबा ही मानते है।

अंग्रेजी पुलिस जैसे निरंकुश बन गए थे वर्दीधारी (देखें तस्‍वीरें)

सुलतानपुर। सोमवार को पुलिस अधीक्षक दफ्तर जलियांवाला बाग से कम नहीं नजर आया। अंग्रेजी हुकूमत की तर्ज पर वर्दीधारी ज्ञापन देने गए लोगों की जान लेने पर उतारू थे। स्थिति को भड़काने में सत्ता पक्ष के माननीय की भूमिका अहम बताई जा रही है। हालॉकि यह दृश्य देख प्रत्यक्षदर्शियों के रोंगटे खड़े हो गए। बहरहाल माना जा रहा है कि पुलिस ने लाठी चार्ज न किया होता तो यह प्रदर्शन जिले के लिए इतिहास बन जाता। कानून को हाथ लेने वाले वर्दीधारियों की खबर लेने की तैयारी चल रही है। उधर, देररात एसआई गणेश शुक्ला व सिपाही रामसमुझ को एसपी ने छायाकार से अभद्रता मामले में निलंबित कर दिया।

पुलिस अधीक्षक कार्यालय में अखिलेश हजारे जब भड़काऊ नारेबाजी कर रहे थे तो वहां पहुंचे सत्ता पक्ष के माननीय से भी बहस हो गई। हजारे ने 2014 के चुनाव में उन्हें औकात में लाने तक की धमकी दे डाली। इतना सुनते ही माननीय भी आग बबूला हो गए। उन्होंने  समाजसेवी को सबक सिखाने के लिए वर्दीधारियों को उकसा दिया। फिर क्या था पुलिस वालों ने लाठियां भांजनी शुरू कर दी। पुलिस लाठी चार्ज से पुलिस अधीक्षक दफ्तर में भगदड़ मच गई। पुलिस इतनी आक्रोशित थी कि वह यह भूल गई कि किसी का गला दबाने से मौत भी हो सकती है। इसकी बगैर परवाह किए कई सिपाही तो प्रदर्शन करने वाले लोगों को सड़क पर ही पटकने लगे थे। पुलिस पिटाई की कई तस्वीरें मीडिया कर्मियों व अन्य लोगों ने भी कैद कर ली है।

पिटाई के बाद आधा दर्जन लोगों को जीप में भरकर हवालात में डाल दिया गया। इस पिटाई के दौरान पुलिस अधीक्षक किरण एस. अपने दफ्तर से भी बाहर नहीं निकले। दूसरा पहलू यह भी है कि यदि सोमवार को वर्दीधारियों ने प्रदर्शनकारियों को न खदेड़ा होता तो शायद यह घटना इतिहास भी बन जाती। लोगों का मानना है कि पहली दफा किसी ने पुलिस अधीक्षक कार्यालय परिसर में भड़काऊ भाषण व नारेबाजी हुई है। हालॉकि इस घटना को पुलिस अधिकारियों ने भी गहराई से लिया है। पुलिस सूत्रों के मुताबिक लाठी चार्ज व पिटाई करने वाले कुछ सिपाहियों पर गाज गिर सकती है। मारपीट करने वाले वर्दीधारियों की पहचान भी की जा रही है। बहरहाल पुलिस दफ्तर में हुई यह घटना लोगों में चर्चा का विषय बनी हुई है। मंगलवार को पत्रकारों ने एडीजी कानून व्यवस्था को पत्र भेजकर दोषी पुलिस कर्मियों के विरुद्ध कार्रवाई की मांग की है।

दूसरी तरफ छायाकार राज बहादुर यादव के साथ हुई अभद्रता मामले में एसआई गणेश शुक्ला व सिपाही रामसमुझ पर हुई कार्रवाई पर सवाल खड़े हो रहे हैं। गणेश शुक्ला जयसिंहपुर में तैनाती के दौरान लाइन हाजिर चल रहा था। जबकि सिपाही रामसमुझ की मौके पर मौजूदगी पर संदेह बरकरार है। हालॉकि यह कार्रवाई सीओ नगर वीपी सिंह की रिपोर्ट पर की गई है। सवाल यह खड़ा होता है कि जिस समय छायाकार के साथ अभद्रता व प्रदर्शनकारियों की पिटाई की जा रही थी वहां सीओ नगर मौजूद थे।

जब सत्येन्द्रवीर ने पेश की थी सहृदयता की मिसाल : वर्ष 2009 में जब एक विधायक की पूर्व महिला मित्र उनके आवास पर हंगामा मचा रही थी तो कवरेज करने गए एक पत्रकार से विधायक समर्थक की हाथापाई हो गई थी। जिसके विरोध में पत्रकारों ने कोतवाली का घेराव कर सड़क जाम किया था। उस समय के एसपी सत्येन्द्रवीर सिंह ने दोषी पर कार्रवाई का आश्वासन देते हुए पत्रकारों से जाम खोलने की अपील की थी। जब पत्रकार ने कहा कि विधायक समर्थक ने मेरी कालर पकड़ी तो एसपी ने सहृदयता दिखाते हुए कहा कि लो तुम मेरी कालर पकड़ लो। एसपी के इस स्वाभाव को देखकर पत्रकारों ने फौरन ही जाम खोल दिया था। काश! सहृदयता की कुछ ऐसी ही मिसाल सोमवार को एसपी किरण एस. पेश करते।

सुल्‍तानपुर से आसिफ मिर्जा की रिपोर्ट.

बिलासपुर में वरिष्‍ठ रिपोर्टर ने की महिला सहकर्मी से छेड़खानी, प्रबंधन बचाने में जुटा

: कानाफूसी : बिलासपुर शहर में कलेक्टर बीट देखने वाले एक बड़े अखबार के रिपोर्टर ने अपनी करतूत से यहां की पत्रकारिता को शर्मनाक स्थिति में ला दिया है. कुछ दिन पहले इस अधेड़ रिपोर्टर ने अपने बगल में बैठने वाली रिपोर्टर, जो उसकी बेटी की आयु की है, के साथ लगातार छेड़खानी करता रहा. एक दिन तो उसने उसका हाथ ही पकड़ लिया. तमतमाई रिपोर्टर ने अपने घर के लोगों को फोन मिलाना शुरू किया. उपस्थित प्रेस के लोगों ने उसे मनाकर रोका और उसको कार्रवाई का आशवासन दिया.

महिला रिपोर्टर के उखड़ने के बाद इसकी जानकारी मैनेजमेंट की लड़कियों को मिली, तब वे भी गुस्से में आ गईं. उनके साथ भी पूर्व में यह रिपोर्टर भद्दे तरीके से पेश आता था. इसके मद्देनजर इन सभी महिला कर्मचारियों ने थोड़ी ही देर में जीएम और सम्पादक से मुलाकात की और लगातार उसके द्वारा ओछी हरकत करने के बारे में शिकायत की. अचंभा है कि इसे छेड़ने वाले अधेड़ रिपोर्टर पर कोई कार्रवाई न कर पर उसे अपना चहेता बनाकर संपादक और जीएम ने रखा हुआ है. न्‍यूज रूम के भीतर महिला अत्याचार की यह बड़ी घटना उस वातावरण में हुई है, जब सारे न्यूज पेपर बलात्कार व छेड़छाड़ बारे में खबर से रंगे जा रहे हैं.

इस अखबार के कार्यालय का माहौल इस घटना के बाद काफी खराब है. इस अधेड़ रिपोर्टर के ही नहीं, बल्कि प्रबंधन के रवैये से वहां के दूसरे रिपोर्टरों के हौसला बुलंद है. शहर में चर्चा है कि गलत करने वालों को बचाकर बढ़ावा दे रहा है यह अखबार प्रबंधन. कुछ ही दिन पहले यहां से तीन मीडियाकर्मी यहां की स्थितियों से परेशान होकर आने के एक दो दिन में भी अपने पुराने संस्‍थान चले गए थे. एक दो साल में सबसे ज्यादा यहीं से काम करने वाले लोग भागे हैं.

संपादक से अभद्रता करने वाले डीएनई बृजेंद्र निर्मल बर्खास्‍त

हिंदुस्‍तान, बरेली से खबर है कि संपादक कुमार अभिमन्‍यु से अभद्रता करने की गाज डीएनई बृजेंद्र निर्मल पर गिरी है. प्रधान संपादक शशि शेखर के निर्देश पर डीएनई बृजेंद्र निर्मल को बर्खास्‍त कर दिया गया है. इस कार्रवाई से एक मैसेज गया है कि प्रबंधन ने बरेली को सुधारने के लिए फ्री हैंड देकर भेजा है. बरेली में माहौल काफी समय से खराब चल रहा है. आशीष व्‍यास जैसा सुलझा हुआ संपादक भी यहां की रानजीति के आगे टिक नहीं सका.

बताया जा रहा है कि इसी के बाद कुमार अभिमन्‍यु को प्रबंधन ने फ्री हैंड देकर यूनिट को सुधारने की जिम्‍मेदारी सौंपी थी. संपादक के कड़े कदम से तमाम लोगों को दिक्‍कतें हुई, कुछ लोग छोड़कर गए तो कुछ लोगों को निकाला गया. अब डीएनई के बर्खास्‍तगी के बाद विरोधी गुट पूरी तरह सकते में है. संभावना है कि प्रबंधन के इस कठोर कदम के बाद यहां की स्थितियों में कुछ सुधार देखने को मिले.

विजन वर्ल्‍ड से आलोक दीक्षित समेत कई ने शुरू की नई पारी

विजन वर्ल्‍ड न्‍यूज चैनल से खबर है कि कई लोगों ने चैनल के साथ अपनी नई पारी शुरू की है. सी न्‍यूज और ईटीवी को अपनी सेवाएं दे चुके आलोक कृष्‍ण दीक्षित ने विजन वर्ल्‍ड के साथ अपनी नई पारी शुरू की है. उन्‍हें चैनल का आउटपुट हेड बनाया गया है. आलोक के अलावा पूनम पाल, रुबी विराठी, नीरज सेठी, गजेंद्र कुमार, अमित गर्ग, ऋषभ सक्‍सेना, हिमात्री, ऋषि कुमार ने आउटपुट में ज्‍वाइन किया है.

इनके अलावा आईटी में चंचल कुमार एवं विष्‍णु की ज्‍वाइनिंग हुई है. इसके अलावा भी कई लोग चैनल से शीघ्र जुड़ने वाले हैं. गौरतलब है कि आजाद न्‍यूज, न्‍यूज एक्‍सप्रेस जैसे चैनलों के लांचिंग टीम के सदस्‍य रह चुके सरफराज सैफी इस चैनल के कार्यकारी संपादक हैं. ये नियुक्तियां उनके ही निर्देशन में चल रही हैं. चैनल के डाइरेक्‍टर अपूर्व पाठक एवं सीईओ नसीम वाहिद हैं.

नेटवर्क10 से विदा हुए 11 पत्रकारों की लिस्‍ट

ख़ुशी आने पर भी थी और जाने पर भी है। कल अकेले थे आज टीम हो गयी। पत्रकरिता जीवन का एक और पड़ाव पार हो गया। उत्तराखंड से प्रसारित पहले 24×7 चैनल की लॉंचिंग टीम ने आखिरकार एक साल के सफर के बाद चैनल को अलविदा कह दिया। ये शायद पहला मौका होगा कि चैनल को अलविदा कहने वाले कर्मचारियों ने चैनल हेड को बकायदा पुष्प गुच्छ देकर उन्हें इस बात के लिए धन्यवाद दिया कि उन्होंने अपने सानिध्य में हमें काम करने का मौका दिया।

ऐसे अवसर मीडिया में कम ही आते हैं जब विपरीत परिस्थितियों में काम करने के बाद एक सौहार्दपूर्ण माहौल में भविष्य की उम्मीदों के साथ कर्मचारी संस्थान को अलविदा कहते हैं। फिर मिलेंगे किसी नए संस्थान में नई जिम्मेदारियों के साथ। नेटवर्क10 के कर्मचारी, जिन्होंने चैनल को अलविदा कहा-  आशीष तिवारी, दीपक तिवारी, संदीप जगूड़ी, मनोज रावत, दिव्या पाण्डेय, भावना पंचभैया, सोनाली शर्मा, अर्चना मनवाल, सुधीर शर्मा, सुधांशु पुरी, शशांक गौड़।

आशीष तिवारी की कलम से.
 

हिंदुस्‍तान, बरेली में संपादक एवं डीएनई के बीच गाली-ग्‍लौज

हिंदुस्‍तान, बरेली में स्थितियां सुधर नहीं रही हैं. खबर है कि गुरुवार की शाम वेतन के मामले को लेकर संपादक तथा डीएनई के बीच सरेआम गरमा-गरमी हुई. बात अपशब्‍दों से होते हुए हाथापाई की नौबत तक पहुंच गई, परन्‍तु एनई ने बीच बचाव कर मामले को सलटा लिया. इस मामले की जानकारी प्रधान संपादक शशि शेखर तक पहुंच गई है. बताया जा रहा है कि उनके निर्देश पर अनुशासनात्‍मक कार्रवाई की तैयारी की जा रही है.

खबर के अनुसार बीमार होने के चलते डीएनई बृजेंद्र निर्मल अवकाश पर थे. संपादक कुमार अभिमन्‍यु ने कुछ समय पहले ही उन्‍हें अपकंट्री हेड बनाया था. इस दौरान उन्‍होंने बृजेंद्र निर्मल से कहा था कि आप मेडिकल दे दीजिएगा तो नियमानुसार आपकी सैलरी नहीं कटेगी. परन्‍तु उन्‍होंने मेडिकल नहीं दिया, जब कल बृजेंद्र निर्मल की सैलरी आई तो उसमें दस दिन का वेतन कटा हुआ था. इसी बीच संपादक कुमार अभिमन्‍यु कल शाम पांच बजे परसाखेड़ा स्थि‍त हिंदुस्‍तान कार्यालय पहुंचे तो बृजेंद्र निर्मल उनसे सैलरी काटे जाने की बाबत पूछने लगे.

इसको लेकर गरमा गरमी हो गई. संपादक अपने केबिन में चले गए. बृजेंद्र निर्मल ने मेल से उन्‍हें नोटिस दे दिया. संपादक ने निर्मल को अपने केबिन में बुलाया तथा अपनी बात रखने को कहा, परन्‍तु अमूमन शांत रहने वाले बृजेंद्र निर्मल सैलरी काटे जाने से इतना खफा थे कि वे थोड़ी तेज आवाज में बात करने लगे. इसी को लेकर संपादक कुमार अभिमन्‍यु ने भी कुछ बोला, जिसके बाद बहस तेज हो गई. सूत्रों का कहना है कि बात गाली ग्‍लौज तक पहुंच गई. परन्‍तु एनई योगेंद्र रावत ने बीच बचाव कर मामले को सुलझाया.

इस घटना के बाद बृजेंद्र निर्मल काम छोड़कर घर चले गए. बताया जा रहा है कि उन्‍होंने वरिष्‍ठों को इसकी जानकारी दी. संपादक ने भी इस मामले से सीनियर लोगों को अवगत कराया. यह मामला प्रधान संपादक शशि शेखर के संज्ञान में भी पहुंचा. उन्‍होंने इस मामले की पूरी जानकारी लिया. हालांकि हिंदुस्‍तान, बरेली से पिछले कुछ समय में कई लोगों ने इस्‍तीफा दे दिया है. इस अखबार के भीतर की स्थितियां काफी बिगड़ चुकी हैं.

सीबीआई ने कोयला घोटाले में छापेमारी के लीक होने की जांच शुरू की

सीबीआई ने कोयला घोटाले में 04 सितम्बर 2012 को ग्यारह शहरों में तीस स्थानों पर मारे गए छापों की जानकारी छापों के पूर्व लीक होने के आरोपों के सम्बन्ध में कार्रवाई शुरू कर दी है. इन छापों के तुरंत बाद आम आदमी पार्टी के कन्वेनर अरविन्द केजरीवाल ने यह आरोप लगाया था कि सीबीआई के ये छापे मात्र दिखावा हैं और उन्हें छापे मारे गए एक कंपनी के एक अधिकारी ने ईमेल से जानकारी दी थी कि उन्हें दो दिन पहले ही इनकी सूचना मिल गयी थी. यही बात इंडिया अगेंस्ट करप्शन ने भी अपनी प्रेस रिलीज में कहा था और यह भी कहा था कि सम्बंधित अधिकारी को किसी भी परेशानी से बचाने के लिए वे उनका नाम सार्वजनिक नहीं कर रहे हैं.

मीडिया में यह खबर आने के बाद यूपी के आईपीएस अधिकारी अमिताभ ठाकुर ने 07 सितम्बर केन्द्रीय सतर्कता आयोग को पत्र लिख कर इन आरोपों की जांच कर उचित कार्रवाई कराने का अनुरोध किया था. सीबीआई मुख्यालय ने सीवीसी को भेजे इस पत्र का संज्ञान लिया है. सीबीआई के आर्थिक अपराध शाखा -एक के डीआईजी रवि कान्त ने ठाकुर को पत्र लिख कर इन आरोपों की पुष्टि में सभी उपलब्ध अभिलेख यथाशीघ्र अग्रिम कार्यवाही हेतु प्रेषित करने को कहा है.

सैलरी क्राइसिस के चलते नेटवर्क10 से कई का इस्‍तीफा

: अपडेट : देहरादून से संचालित नेटवर्क10 से खबर है कि यहां सैलरी को लेकर हंगामा काफी तेज हो गया है. प्रबंधन से नाराज लगभग एक दर्जन पत्रकारों ने चैनल को अलविदा कह दिया है. अब चैनल दोयम दर्जे के पत्रकारों के सहारे संचालित किया जा रहा है. इस्‍तीफा देने वाले सभी पत्रकारों को पोस्‍ट डेटेड चेक दिए गए हैं. चैनल को सबसे बड़ा झटका प्राइम टाइम एंकर आशीष तिवारी के इस्‍तीफा देने से लगा है. आशीष प्राइम टाइम एंकर होने के साथ आउटपुट हेड की जिम्‍मेदारी भी संभाल रहे थे.

अनियमित सैलरी के चलते कर्मचारियों ने हड़ताल कर दिया था, जिसके बाद एक्‍जीक्‍यूटिव एडिटर ने कहा कि जिन लोगों को सैलरी चाहिए उन्‍हें चैनल छोड़ना पड़ेगा. साथ ही शर्त यह रखी कि इस्‍तीफा देने वाले लोगों की सैलरी पोस्‍ट डेटेड चेक से दी जाएगी. मरता क्‍या न करता की तर्ज पर पत्रकारों एवं गैर पत्रकार कर्मचारियों ने अप्रैल माह का पोस्‍ट डेटेड चेक लेकर चैनल को छोड़ दिया है. कर्मचारियों के हड़ताल की वजह से स्‍पेशल प्रोग्राम भी नहीं जा पा रहे हैं. चैनल पर घिसे-पिटे बुलेटिन चल रहे हैं.

आशीष के अलावा इस्‍तीफा देने वाले जिन लोगों के नाम की जानकारी मिल पाई है, उसमें दीपक तिवारी, अर्चना, दिव्‍या पांडेय, सोनाली एवं वीडियो एडिटर संदीप कुमार शामिल हैं. इनके अलावा भी कई लोगों ने चैनल छोड़ दिया है. प्रबंधन बिना विजन के चैनल का संचालन कर रहा था. दीपक का पोस्‍ट करेस्‍पांडेंट का था, परन्‍तु उनसे काम आउटपुट का लिया जा रहा था. इसी तरह से कई अन्‍य पत्रकारों का भी हाल था. बताया जा रहा है कि जल्‍द ही कई और लोग चैनल से इस्‍तीफा देंगे.

खबर है कि प्रबंधन के पास अच्‍छे एंकरों की कमी है, लिहाजा रिपोर्टरों से एंकरिंग करने की तैयारी की जा रही है. सैलरी न मिलने को लेकर चैनल के अंदर तनाव है. बाहर से आए काम करने वाले पत्रकार यहां से जाने की तैयारी कर रहे हैं. अब वे ही लोग मजबूरीवश चैनल में काम करने को तैयार हैं, जिनका घर देहरादून या आसपास में है. सूत्रों का कहना है कि अगर यही स्थिति बनी रही तो चैनल का बंटाधार तय है. बताया जा रहा है कि कुछ लोग खुद की सैलरी जस्टिफाइड करने के लिए नीचे के पत्रकारों पर कहर ढा रहे हैं.

हालांकि इस संदर्भ में नेटवर्क10 में वरिष्‍ठ पद पर कार्यरत राजीव रावत का कहना है कि इन लोगों की विदाई दी गई है. चैनल में किसी प्रकार की कोई परेशानी नहीं है. नए बदलाव के तहत आउटपुट की जिम्‍मेदारी चंद्र बल्‍लभ को दे दी गई है. उन्‍हें चैनल में आउटपुट हेड बनाया गया है. वे कई संस्‍थानों में काम कर चुके हैं. कहीं कोई दिक्‍कत नहीं है. सब कुछ स्‍मूथ चल रहा है.

गुवाहाटी में हिंदी अखबारों ने बढ़ाए अपने दाम

गुवाहाटी। बजट के दिन आज असम के हिंदी अखबारों के पाठकों के लिए दोहरी मार पड़ी। पहली मार वित्त मंत्री ने महंगाई को रोकने के लिए कोई कड़े कदम न उठा कर मारी तो दूसरी पिटाई हिंदी अखबारों ने कर दी। गुवाहाटी के महंगे हिंदी अखबारों ने आज अपने मूल्‍य में एक रुपए की बढ़ोत्तरी कर दी। यानी गुवाहाटी में अब 6 रुपए की जगह अखबार 7 रुपए में मिलेंगे। कर्मचारियों के लिए दो जुन की रोटी के लिए ठीक से पैसे न देने वाले इन अखबारों ने महंगाई का हवाला देते हुए पाठकों से 12 पेज के अखबारों के लिए 7 रुपया देने की अपील की है।

हालांकि इन अखबार प्रबंधकों को कर्मचारियों पर पड़ रही महंगाई का असर नहीं दिख रहा है। कर्मचारियों का शोषण करने वाले इन अखबार प्रबंधकों को शायद यह पता नहीं कि इसी देश में 24 से 28 पेज के अखबार 2 रुपए में मिल रहें हैं। दरअसल, गुवाहाटी में इनकी मनमौजी है। यहां के चारों अखबार मिलीभगत कर दाम बढ़ा देते हैं। पाठकों की मजबूरी है कि वे करें तो करें क्या? असल में राष्ट्रीय अखबार शाम को यहां पहुंचते हैं। यह अलग बात है कि राष्ट्रीय अखबारों के ऑनलाइन संस्करण से खबर लेकर ये लोग अपने पेजों में चिपका लेते हैं।

ऐसी सूचना है कि यहां के अखबारों के पास न्यूज एजेंसी का सब्सक्रिप्शन भी नहीं है। ऐसा भी नहीं है कि अहिंदी क्षेत्रों से निकलने वाले इन अखबारों को विज्ञापन से पैसा नहीं मिलता है। हमेशा भूत-प्रेत, श्मसान घाट और बनियों की कहानी लिखने वाले इन अखबारों को पांच से छह करोड़ रुपए सालाना विज्ञापन से मिलता है। ये दाम इसलिए बढ़ाते हैं कि ज्यादा अखबार छापना न पड़े और लागत खर्च कम हो। क्योंकि प्रसार संख्या बढ़ने-घटने से इन्हें कोई असर नहीं पड़ता। हिंदी के नाम पर विज्ञापन तो मिलेगा ही।

अशोक पांडेय ने किया नेटवर्क10 का बेड़ा गर्क

कहावत है कि पूत के पांव पालने में ही दिख जाते हैं। नेटवर्क 10 की लांचिंग से पहले ही आसार दिखने लगे थे कि आने वाले वक्त में इसकी हालात खस्ता होने वाली है। चैनल प्रबंधन ने मालिकों को शुरुआत में बड़े बड़े सपने दिखाए, उन सपनों के आगोश में आकर ही चैनल मालिकों ने नेटवर्क 10 को खड़ा करने के लिए जमकर पैसे लुटाए। शिमला बाईपास पर एक नई बिल्डिंग में चैनल का आफिस खोला गया। न्यूज़ रूम से लेकर, पीसीआर, आईटी और तमाम आफिस शानदार तरीके बनाए गए। 

 
नेटवर्क 10 के आफिस में जाने के बाद ये अहसास होता था मानो किसी बड़े चैनल के न्यूज रूम में आ गए हों। लेकिन कुछ ही महीने बाद इस चैनल का बंटाधार हो गया। इस चैनल को बर्बाद करने के पीछे प्रबंधन के लोग खुद ही जिम्मेदार है। जिन लोगों के कंधों पर चैनल चलाने की जिम्मेदारी दी गई है उन्हें चापलूसी के अलावा कुछ आता ही कहां है। चैनल प्रबंधन में ऊंचे ओहदे पर बैठे लोगों ने इस चैनल के लिए कभी मन से काम किया ही कहां है। जिस चैनल की कोई पालिसी ही नहीं है भला वो कामयाब कैसे होता। अब आपको इस चैनल के शेड्यूल के बारे में बताते हैं। 
 
इस चैनल में ऊंचे ओहदे पर काम कर रहे ज्यादातर लोग देहरादून से ही ताल्लुक रखते हैं। ये वो लोग हैं जिन्हें नेताओं की चापलूसी के अलावा कुछ नहीं आता है। ड्यूटी से ये अक्सर नदारद रहते हैं और हुक्म अपने जूनियरों पर चलाते हैं। चैनल में ऐसे कई चेहरे हैं जो दूसरे चैनलों के साथ भी काम कर रहे हैं और यहां से भी मोटी सैलेरी उठा रहे थे। नेटवर्क 10 के मालिकों ने जिस हिसाब से पैसा खर्च किया है, अगर उसे सही प्लानिंग के साथ इस्तेमाल किया जाता तो ये चैनल जरूर सक्सेस होता, लेकिन कामचोरों की फौज ने इस चैनल का बेड़ा गरक कर दिया। 
 
न्यूज हेड ऐसे लोगों को बना दिया गया जिन्हें खुद खबरों की परख नहीं हैं। एंकरिंग वो लोग कर रहे हैं जिन्हें ढंग से बोलना तक नहीं आता है। देहरादून में रिपोर्टिंग के लिए ऐसे पत्रकार रखे गए हैं जिन्हें सिर्फ कैमरे के सामने ही चमकने का शौक है। ऐसे हालात में भला कोई क्‍या काम कर पाएगा, इस चैनल में दिल्ली से काफी लोग गए थे, पर सैलेरी के संकट को देखते हुए ज्यादातर लोग दिल्ली वापस लौट आए हैं। इसके अलावा कुछ लोग चंडीगढ़ और कुछ ग्वालियर और आगरा के सी न्यूज का रूख कर रहे हैं।
 
नेटवर्क 10 के कर्मचारियों को अभी भी सैलरी नहीं मिली है, जिस कारण सभी कर्मचारियों ने मालिक के भारत कन्ट्रक्शन के ऑफिस के बाहर धरना दिया। वहीं थोडी देर बाद चैनल के कर्ताधर्ता अशोक पाण्डेय आए और सभी को जल्द ही सैलरी देना का आश्वासन दिया और कहा कि पोस्ट डेटेड चेक ले लो, और चैनल छोड दो। जिसके बाद तमाम लोगों ने चैनल छोड़ने का मन बना लिया है, जो लोग सैलरी नहीं लेंगे उनकी नौकरी बची रहेगी। इस चैनल का बेड़ा गर्क करने के सबसे बड़े जिम्‍मेदार अशोक पांडेय है। वहीं चैनल के मालिक अभी भी स्थिति स्पष्ट करने को राजी नहीं हैं कि आखिर उनके बीच और पाण्डेय जी के बीच डील क्या हुई है।
 
एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

जिंदगी में कभी न रहें उदास : श्री श्री रविशंकर

विराटनगर (नेपाल) : नेपाल के पूर्वांचल दौरे में रहे आर्ट आफ लीविंग का संस्थापक श्री श्री रविशंकर गुरुवार को विराटनगर के ऐतिहासिक शहीद रंगशाला मैदान में हजारों श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए कहा कि इश्वर सर्वत्र है, हमारी जो भी इच्छा है उसे पूरा करता है। जीवन को सरस बनाये नीरस नहीं। अपने चेहरे पर उदासी आने न दें। अध्यात्म को अपनायें और सुखी खुशी रहें। उन्होंने कहा कि जिंदगी में कभी उदास नहीं रहना चाहिए। उदासी किसी समस्या का समाधान नहीं बल्कि रोग बीमारी का लक्षण है।

उन्होंने लोगों से खाद रहित भोजन अपनाने का सुझाव दिया। कहा चीनी कम खायें यह हानिकारक है, इसके खाने से कई बीमारी होती है। उन्होंने गुड़ को भारत का ब्रांड बताया है तथा इसके फायदे गिनाये। उन्होंने अत्यधिक मात्रा में चीनी सेवन से जोड़ों पीठ व घुटनों में दर्द बताते हुए उम्र दराज के लोगों में इसका अधिक असर होने की जानकारी दी। उन्होंने राजनेताओं पर चुटकी लेते हुए कहा कि राजनेता अपनी कुर्सी बचाने के लिए तरह तरह के हथकंडे अपनाते हैं, जो ठीक नहीं है। उन्होंने खाना खाने से पूर्व अन्नदाता सुखी भव मंत्रोचारण का सुझाव दिया। कहा कि जो किसान हमें अन्न उपजाकर देते हैं, अगर वह सुखी नहीं हो तो हम कैसे सुखी रह सकते हैं।

उन्होंने कहा जिस देश में व्यापारी दुखी है वह देश कभी तरक्की नहीं कर सकता। अगर व्यापारी सुखी होगा तो देश समृद्ध होगा। इससे पूर्व चार्टर विमान से विराटनगर पहुंचे श्री श्री रविशंकर पहले स्थानीय यूरो किड्स पहुंचे, जहां गोलछा परिवार के सदस्यों तथा विद्यायालय के छात्र छात्राओं ने उनका जोरदार स्वागत किया। इस मौक पर आध्यात्मिक गुरु ने छात्र छात्राओं को शिक्षा के कई गुर भी सिखाये। कहा कि बच्चे को शरारती होना चाहिए। इस मौके पर गोलछा आर्गेनार्इजेशन के वरिष्ठ सदस्य ज्ञानचन्द्र दुग्गड़, उद्योग संगठन मोरंग के अध्यक्ष दिनेश गोलछा ने उन्हें शाल ओढ़ाकर सम्मानित किया। बच्चों को देख प्रभावित आध्यात्मिक गुरु ने छात्र छात्राओं से बातचीत भी की तथा पढ़ाई में रुचि के संबंध में पूछा। उन्होंने बच्चों को टीवी से परहेज करने का सुझाव भी दिया। इस मौके पर विद्यालय के प्रेक्षा गोलछा सहित शिक्षक-शिक्षिका अभिभावक व अन्य लोग मौजूद थे।

अरुण कुमार वर्मा की रिपोर्ट.

हिंदुस्‍तान ने आयोजित किया महराजगंज में किसान मेला

 

महराजगंज में हिन्दुस्तान अखबार ने अंबेडकर पार्क में वृहस्पतिवार को किसान मेले का आयोजन किया। जिसमें खेती से संबन्धित सुझाव एवं वैज्ञानिक ढंग से खेती करने की जानकारी दी गई। कम लागत में अधिक पैदावार एवं जैविक खादों के उपयोग पर विशेष ध्यान केन्द्रित किया गया। मेले का उद्घाटन जिलाधिकारी श्रीमती सौम्या अग्रवाल ने किया। कृषि वैज्ञानिक एवं उप कृषि निदेशक अविनाश चन्द्र और राष्ट्रीय खाद्य मिशन के जिला सलाहकार ताहिर अली ने प्रगतिशील किसानों को उत्तम खेती के लिये पुरस्कृत भी किया। 
 
मेले में विभिन्न सरकारी विभागों और कम्पनियों के स्टाल प्रमुख आकर्षण रहे। इसमें सरकारी विभागों में कृषि विभाग, पंचायती राज विभाग, नगर पालिका परिषद, भूमि संरक्षण विभाग, जिला उद्यान विभाग, सिचाई विभाग तथा वन विभाग के स्टाल आकर्षक रहे। स्वयंसेवी सस्थाओं में शाश्वत एस.एम.एस. स्कूल आफ मैनेजमेंट के छा-छात्रओं ने अपनी प्रतिभा का हुनर दिखया। हिन्दुस्तान के तरफ से यूनिट हेड दीपक महेश्वरी, डिप्टी मैनेजर प्रशान्त वर्मा तथा जिला प्रभारी अजय कुमार श्रीवास्तव, वरिष्ठ संवाददाता आरएन शर्मा, ओमकार पटेल आदि मौजूद रहे।
 
महराजगंज से ज्ञानेन्द्र त्रिपाठी की रिपोर्ट.

वर्धा यूनिवर्सिटी में अध्‍यापक ने की छात्रा से छेड़छाड़, प्रबंधन मामला दबाने में जुटा

 

: कानाफूसी : हमेशा विवादों में रहनेवाले महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा में आजकल एक अध्यापक द्वारा एक छात्रा के यौन-उत्पीड़न का मामला दबे मुंह चर्चा में है। साहित्य विभाग के एक युवा असिस्टेंट प्रोफेसर ने स्त्री अध्ययन विभाग की एक छात्रा को पढ़ाने के बहाने अपने घर बुलाकर उसके साथ कई बार शारीरिक छेड़छाड़ की और चुप रहने की धमकी भी दी। यहीं नहीं इस अध्यापक ने अपने प्रभावों का इस्तेमाल करके उस लड़की को एम.ए. कोर्स में फेल भी करा दिया। 
 
यह अध्यापक इसी विश्वविद्यालय में साहित्य विभाग का पूर्व छात्र रहा है और छात्र जीवन से ही अपनी लंपटई और कुकर्मों के लिए बदनाम है। सूत्रों की माने तो इसके पहले भी यह कई लड़कियों के साथ ऐसे कुकृत्य कर चुका है। यह अध्यापक आए दिन लड़कों के हॉस्टल जाकर उनके साथ शराब-सिगरेट पीता हुआ पाया जाता है। सबसे मज़ेदार बात यह है कि यह आदमी अपने विभाग में स्त्री-विमर्श का टॉपिक पढ़ाता है। भुक्तभोगी लड़की द्वारा शिकायत करने के बाद महिला सेल में अभी इसकी जांच चल रही है। लेकिन पूरे कैंपस को पता है कि विश्वविद्यालय के कुलपति, जो अपने स्त्री-विरोधी और दलित-विरोधी रुख के लिए जाने जाते हैं, उन्होंने लगातार पड़ते बाहरी दबाव के बाद महिला सेल को यह निर्देश दिया है कि इस मामले को रफा-दफा कर दिया जाए। 
 
महिला सेल की चल रही ढुलमुल जांच-प्रकिया को देखते हुए यह बात सच लग रही है। कैंपस में सबको यह पता है कि आरोपी अध्यापक कुलपति के सामने जाकर अपनी गलती स्वीकार कर चुका है और पैर पकड़कर माफी भी मांग ली है। लड़की अल्पसंख्यक समुदाय की है और गरीब परिवार से है, जबकि आरोपी ब्राह्मण वर्ग से है और इसका श्वसुर इस यूनिवर्सिटी में कर्मचारी रह चुका है। वह भी इस केस को खत्म करवाने के काम में जुटा हुआ है। कुछ लोग पैसे के लेन-देन की बात भी कह रहे हैं। बाकी इस वक्त विश्वविद्यालय के अधिकांश ब्राह्मण प्राध्यापक, कर्मचारी और छात्र आरोपी अध्यापक के समर्थन में खड़े हैं। कुछ प्रगतिशील छात्र-छात्राओं ने लड़की के पक्ष में हस्ताक्षर अभियान भी चलाया है। लेकिन कुलपति या महिला सेल पर उसका कोई असर नहीं है। 
 
महिला सेल की अध्यक्षा साहित्य विभाग की हैं और गर्ल्स हॉस्टल की वार्डेन भी हैं। वार्डेन साहिबा केवल लड़कियों को परेशान करने और उनको सताने के लिए जानी जाती हैं। इस कैंपस में लड़कियां पहले से ही सुरक्षित नहीं हैं और इस घटना के बाद उनमें और डर व्याप्त है। आरोपी अध्यापक के खिलाफ जांच जारी है लेकिन वह अभी भी कक्षाएँ ले रहा है, जो कि गैर-कानूनी है। इस बीच वह जांच कमेटी के कुछ सदस्यों के घर जाकर चाय-नाश्ता भी कर चुका है। इस घटना से आम छात्र-छात्राओं में काफी आक्रोश है। कैम्पस के बाहर भी माहौल गरम है। लेकिन इस विश्वविद्यालय में केवल एक ही कानून चलता है और वह है कुलपति विभूति नारायण राय का और उनकी कृपा आरोपी अध्यापक पर है। सो मामला अब तक ठंडे बस्ते में है। 
 
2010 दिसंबर में भी साहित्य विभाग के एक बूढ़े प्रोफेसर, जो विभागाध्यक्ष और डीन भी था, ने एक युवा महिला कर्मचारी को अपने घर बुलाकर उसके साथ रेप करने की असफल कोशिश की थी। चूंकि वो प्रोफेसर कुलपति का पुराना दोस्त और 'वर्तमान साहित्य' में इनके साथ संपादक मण्डल में था, रोज शाम को कुलपति के साथ दारू पीता है, मॉर्निंग वाक करता है। सो वह बच गया। कुलपति ने पीड़ित लड़की को झांसा दिया की वह चुप हो जाएगी तो उसको परमानेंट नौकरी दे देंगे। वो डरकर चुप हो गई, फिर उसको ही नौकरी से निकाल दिया गया। इसके अलावा भी यहाँ यौन उत्पीड़न के कई किस्से हैं, लेकिन कोतवाल साहब के आतंक के चलते किसी की हिम्मत नहीं कि कोई शिकायत करे या आवाज़ उठाए। जो बोलेगा वो मारा जाएगा।  
 
भड़ास के पास आई एक मेल पर आधारित. 

दबंग दुनिया से अरविंद तिवारी का इस्‍तीफा, कीर्ति राणा को अतिरिक्‍त जिम्‍मेदारी

इंदौर से खबर है कि दबंग दुनिया से वरिष्‍ठ पत्रकार अरविंद तिवारी ने इस्‍तीफा दे दिया है. वे एडिटर कोआर्डिनेटर के पद पर कार्यरत थे. वे फिलहाल नोटिस पीरियड पर चल रहे हैं तथा 31 मार्च के बाद से संस्‍थान के हिस्‍सा नहीं रहेंगे. अरविंद तिवारी टाइम्‍स ऑफ इंडिया से इस्‍तीफा देकर दबंग दुनिया से जुड़े हुए थे. इसके पहले वे दैनिक भास्‍कर तथा पत्रिका में वरिष्‍ठ पदों पर कार्यरत रह चुके हैं. उनकी राजनीति एवं प्रशासनिक हलकों में अच्‍छी पकड़ मानी जाती है. अरविंद तिवारी का दबंग दुनिया से जाना बड़ा झटका माना जा रहा है. वे इंदौर प्रेस क्‍लब मे महासचिव भी हैं. 

दूसरी तरफ खबर है कि भोपाल के संपादक कीर्ति राणा को रायपुर भेजा जा रहा है. हालांकि उन्‍हें भोपाल के अतिरिक्‍त यह जिम्‍मेदारी दी जा रही है. परन्‍तु खबर है कि कीर्ति राणा अब इस समूह के साथ लंबे समय तक रहने के इच्‍छुक नहीं हैं. इसके पहले भी उन्‍होंने समूह संपादक पंकज मुकाती से अनबन होने के बाद इस्‍तीफा दे दिया था, लेकिन अखबार के मालिक किशोर वाधवानी के आग्रह पर वे रूक गए थे. अब देखना है कि वे रायपुर की जिम्‍मेदारी संभालते हैं या इस्‍तीफा दे देते हैं.
 
बताया जा रहा है कि अखबार के अंदर राजनीति तेज चुकी है. काम करने का माहौल नहीं रह गया है. सूत्रों का कहना है कि ठीक ठाक चल रहे अखबार में इस तरह की जो स्थितियां पैदा हुई हैं उसके लिए मालिक किशोर वाधवानी खुद जिम्‍मेदार हैं. उनके फैसलों और निर्णयों ने अखबार की आंतरिक और बाह्य दोनों स्थितियों को खराब कर दिया है. जिस तरह का माहौल है उससे समझा जा रहा है कि आने वाले दिनों में कुछ और लोग भी इस्‍तीफा दे सकते हैं. 

दीपक धीमान बने सीपीएच2 के एडिटर, कई और बदलाव

दैनिक भास्‍कर के नार्थ रीजन में व्‍यापक परिवर्तन होने जा रहा है. चंडीगढ़ के स्‍थानीय संपादक दीपक धीमान को प्रमोट करके सीपीएच2 (चंडीगढ़-पंजाब-हरियाणा-हिमाचल) का संपादक बना दिया गया है. पहले इस पद पर कमलेश सिंह को जिम्‍मेदारी दी गई थी, जिनका कुछ महीने पहले भोपाल तबादला कर दिया गया था. इसके बाद से ही यह पद खाली चल रहा था, जिस पर दीपक धीमान को नियुक्‍त कर दिया गया है. 

 
टीओआई से जुड़े शमशेर सिंह चंदेल को लुधियाना का संपादक बनाया जा रहा है. लुधियाना में अभी स्‍थानीय संपादक की भूमिका निभा रहे अभिजीत मिश्रा को कहां भेजा जाएगा यह तय नहीं हुआ है. अमृतसर के स्‍थानीय संपादक अमित गुप्‍ता को पटियाला भेजा जा रहा है. पटियाला के संपादक रमन मीर को जालंधर भेजा जा रहा है. इसके साथ ही चर्चा है सिटी भास्‍कर के एडिटर, लुधियाना सौरभ द्विवेदी को बठिंडा का एडिटर बनाया जाएगा वहीं बठिंडा में संपादक की भूमिका निभा रहे मयंक कुशवाहा को अमृतसर भेजा जा सकता है. 

मीनाक्षी लेखी ने कहा – ओपन ट्रायल फेयर ट्रायल होता है

बीते साल 16 दिसंबर को दिल्‍ली में हुए गैंग रेप मामले में ट्रायल कोर्ट की सुनवाई ओपन कोर्ट में किए जाने की याचिका पर हाई कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रख लिया है। इस दौरान याचिकाकर्ता ने दलील दी कि इस मामले की सुनवाई के दौरान मीडिया को अदालत में जाने और इस केस को कवर करने की इजाजत मिलनी चाहिए। मीडियाकर्मियों की ओर से पेश एडवोकेट मीनाक्षी लेखी ने पत्रकारों का पक्ष रखते हुए कहा कि ओपन ट्रायल फेयर ट्रायल होता है और यह आरोपियों का भी अधिकार है। हम पब्लिक को सच्चाई बताने से डर क्यों रहे हैं। 

 
ट्रायल कोर्ट ने 7 जनवरी को इस मामले में इन कैमरा सुनवाई का निर्देश दिया था और कहा कि सुनवाई से संबंधित रिपोर्ट न तो दिखाई जाए और न ही छापी जाए। कुछ मीडियाकर्मियों की ओर से याचिका दाखिल करके कहा गया कि उनका राइट टु स्पीच एंड एक्सप्रेशन का अधिकार प्रभावित हो रहा है, इसलिए उन्‍हें मामले के कवरेज की इजाजत दी जाए। अधिवक्‍ता लेखी ने दलील दी कि रोक के चलते एक जिम्मेदार मीडिया रिपोर्ट के अधिकार का हनन हो रहा है। 
 
इस मामले में दिल्‍ली पुलिस ने कहा था कि सीआरपीसी के प्रावधानों के तहत रेप से संबंधित मामलों की रिपोर्टिंग नहीं हो सकती। पुलिस के इस एडवाइजरी के खिलाफ दलील देते हुए लेखी ने कोर्ट के समक्ष कहा कि समाज के जिम्मेदार वर्ग व मीडिया को इस मामले की सुनवाई को कवर करने की इजाजत होनी चाहिए। उन्होंने दलील दी कि इस मामले में मीडिया ने पहले दिन से ही जिम्मेदार तरीके से रिपोर्टिंग की और विक्टिम का नाम सामने नहीं आया। विक्टिम फैमिली ने भी नाम उजागर कर दिया लेकिन मीडिया ने नाम उजागर नहीं किया। 
 
सुनवाई के दौरान दिल्ली पुलिस की ओर से पेश दयान कृष्णन ने मीडिया की अर्जी का विरोध किया और कहा कि यह मामला रेप से जुड़ा हुआ है और प्रत्येक रेप केस के ट्रायल इन कैमरा किए जाने का प्रावधान है। इस मामले में तमाम गवाहों के बयान हुए हैं और अभी कइयों के बयान होने बाकी हैं। निचली अदालत ने मामले की सुनवाई इन कैमरा कर रखी है। उन्होंने दलील दी कि राइट टु रिपोर्ट पूर्ण अधिकार नहीं है। मीडिया इस केस में पार्टी नहीं है। लीगल प्रावधान आरोपी और विक्टिम पर लागू होता है। दोनों पक्षों की दलील के बाद हाई कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रख लिया।

मतगणना के दौरान प्रशासन ने देवरिया के पत्रकारों के साथ की बदसलूकी

 

: मीडियाकर्मियों ने किया बहिष्‍कार : देवरिया में भाटपाररानी विधान सभा उपचुनाव की मतगणना का कवरेज करने गए मीडिया कर्मियों को पास होने के बावजूद सुरक्षा कर्मियों ने मतगणना स्थल से बाहर खदेड़ दिया। एक प्रशासनिक अधिकारी ने भी पत्रकारों से अभद्रता की, जिसको लेकर मीडियाकर्मियों से उसकी तीखी नोंकझोंक हुई। पत्रकारों ने मौके पर फोन से चुनाव आयुक्त को शिकायत दर्ज कराई तथा प्रशासनिक व्‍यवस्‍था का बहिष्कार करते हुए बाहर सड़क से ही सूचनाएं जुटाईं।
 
आधे चक्र की मतगणना समाप्ति के बाद अधिकारियों की ओर से पत्रकारों के मान-मनौव्वल का दौर भी चला। मतगणना को लेकर इस दौरान मतगणना की शुचिता को लेकर प्रशासन की कार्यशैली पर सवाल उठते रहे। उपचुनाव में मतदान व मतगणना के लिए प्रशासन ने डेढ़ सौ से अधिक पत्रकारों को पास जारी किए थे। मतदान सकुशल संपन्न हुआ, लेकिन मतगणना के दौरान प्रशासनिक अधिकारियों ने अपनी मनमानी शुरू कर दी।  
 
एसएसबीएल इंटर कालेज में सुबह आठ बजे मतगणना का कार्य शुरू हुआ। कवरेज के लिए पासधारी पत्रकार भी पहुंचे। कुछ छायाकार कैमरे के साथ अंदर दाखिल हुए, तो पुलिस कर्मियों ने उन्हें बाहर निकाल दिया। डीएम का फरमान हुआ कि कोई भी पत्रकार मतगणना स्थल तक नहीं जाएगा। इसके बाद सुरक्षा कर्मियों ने मोर्चा संभाल लिया। पत्रकारों तथा छायाकारों ने इसका विरोध किया, तो एक प्रशासनिक अधिकारी ने उनसे अभद्रता तक दी। पत्रकारों को मतगणना स्‍थल के लिए प्रवेश नहीं दिया गया। नाराज पत्रकारों ने चुनाव आयुक्त से मामले की शिकायत की। मतगणना का 12वां दौर समाप्त हो जाने के बाद एसडीएम के बाद एडीएम व सीडीओ और अंत में डीएम और एसपी ने बाहर निकल कर मान-मनौव्वल शुरू किया, जिस पर पत्रकारों ने प्रशासन का बहिष्कार किया। 
 
देखना यह है कि चुनाव आयुक्त इस मामले में कया कार्रवाई करते हैं। उधर भाटपाररानी विधान सभा उपचुनाव की मतगणना के बाद गुरुवार अपराह्न भासपा समर्थित निर्दल उम्मीदवार सभाकुंवर कुशवाहा ने जिला प्रशासन पर लोकतंत्र का गला घोंटने का आरोप लगाते हुए सुभाष चौक पर धरना शुरू कर दिया। मतगणना समाप्ति के बाद मौके पर पहुंचे एसडीएम सदर दिनेश कुमार को ज्ञापन सौंपा। केंद्रीय चुनाव आयुक्त को भेजे ज्ञापन में श्री कुशवाहा ने कहा कि सपा प्रत्याशी के पक्ष में चुनाव परिणाम को प्रभावित करने के लिए बड़े पैमाने पर धांधली की गई है। कई ईवीएम के सील टूटे पाए गए। धांधली को छिपाने के लिए मतगणना टेबल पर सीसीटीवी कैमरे तक नहीं लगाए गए। एजेंटों को ईवीएम का डिस्प्ले तक नहीं दिखाया गया। इसी के चलते प्रशासन ने मीडिया कर्मियों को मतगणना स्थल पर नहीं जाने दिया। मतदान के दिन पड़े वोटो के अनुसार ईवीएम में कम वोट दिखाए गए। उन्होंने मांग की कि विधान सभा चुनाव परिणाम को शून्य कर दोबारा आयुक्त की मौजूदगी में चुनाव कराया जाए। लोगो का आरोप है कि धांधली करने के लिए ही पत्रकारों को बाहर किया गया। 

भीड़ ने महिला पत्रकार सुधा जैन को गिराकर पीटा

 

मेरठ : चकला घर का विरोध करने एसएसपी दफ्तर आई महिलाओं का गुस्सा उस वक्त फूट पड़ा जब पुलिस आफिस में खड़ी एक महिला पत्रकार ने आरोपी महिला के पक्ष में बयानबाजी कर दी। इस पर प्रदर्शनकारी महिलाओं ने महिला पत्रकार को गिरा-गिराकर पीटा।
 
नई बस्ती में एक महिला पर चकलाघर चलाने का आरोप लगाकर गुरुवार को वहां की महिलाएं और पुरुष भाजपा महानगर अध्यक्ष रितुराज जैन के नेतृत्व में शिकायत करने एसएसपी कार्यालय पहुंचे। नई बस्ती की महिलाओं ने जब पुलिस आफिस में मौजूद एक महिला पत्रकार सुधा जैन को समस्या बताई तो उसने आरोपी महिला के पक्ष में बयानबाजी कर दी। इससे आक्रोशित प्रदर्शनकारी महिलाओं ने महिला पत्रकार को खींच कर जमीन पर गिरा दिया और पीटना शुरू कर दिया। शोर शराबा सुनकर सीओ एलआइयू तृप्ता शर्मा अपने दफ्तर से बाहर आ गई और उन्होंने महिला पुलिसकर्मियों की मदद से महिला पत्रकार को बचाया। इसके बाद महिलाएं नारेबाजी करती हुई वहां से चली गई।
 
जिस वक्त यह घटना हुई उस समय एसएसपी दफ्तर से जा चुके थे। जानकारी मिलने पर एसएसपी ने प्रशिक्षु एएसपी स्वप्निल ममगई को जांच के लिए नई बस्ती भेज दिया। जांच रिपोर्ट में बुधवार रात को बाहरी व्यक्तियों की आवाजाही को लेकर मारपीट की बात कही गई है। एसएसपी ने दोनों पक्षों को मुचलकों में पाबंद करने के निर्देश एसओ टीपी नगर को दिए हैं। उधर, पीड़ित महिला पत्रकार ने एसएसपी दीपक कुमार से शिकायत कर कार्रवाई की मांग की है। इंस्पेक्टर सिविल लाइन आलोक सिंह ने बताया कि तहरीर मिलने पर मुकदमा दर्ज कर लिया जाएगा। (जागरण)