नई दिल्ली/अरुणाचल: देशभक्ति, राष्ट्रवाद और चीन को जवाब देने की बातें करने वालों से एक सीधा सवाल पूछा जा रहा है। अगर चीन के खिलाफ लड़ने और देश की सीमाओं की रक्षा करने का इतना ही जज्बा है, तो फिर अरुणाचल प्रदेश जाकर भारतीय सुरक्षा बलों का मनोबल बढ़ाने और देश की सुरक्षा में सहयोग करने की पहल क्यों नहीं की जाती? क्या राष्ट्रवाद का प्रदर्शन केवल दिल्ली की सड़कों पर विरोध करने वालों के खिलाफ ताकत दिखाने तक सीमित है?
यह सवाल ऐसे समय में उठा है, जब भारत-चीन सीमा पर अरुणाचल प्रदेश में तनाव की खबरें सामने आई हैं। दूसरी ओर, दिल्ली के जंतर-मंतर पर प्रदर्शन की कवरेज कर रही तीन महिला पत्रकारों ने पुलिसकर्मियों पर यौन उत्पीड़न और दुर्व्यवहार के आरोप लगाए हैं। इन दोनों घटनाओं के बीच सीधा संबंध नहीं है, लेकिन इनके आधार पर राष्ट्रवाद, नागरिक अधिकारों और पत्रकारों की सुरक्षा को लेकर सवाल जरूर उठाए जा रहे हैं।
अरुणाचल में चीनी सैनिकों के साथ टकराव जारी होने की पुष्टि
भारत-तिब्बत सीमा पुलिस (आईटीबीपी) के महानिदेशक शत्रुजीत कपूर ने 22 अक्टूबर 2026 को राजस्थान के अलवर में आयोजित हिमवीर सम्मान समारोह में कहा कि अरुणाचल प्रदेश में कई स्थानों पर भारतीय और चीनी सैनिकों के बीच टकराव जैसी स्थिति बनी थी, जो अब भी जारी है। उन्होंने कहा कि इस दौरान आईटीबीपी की नवगठित शौर्य कमांडो टीमों ने उल्लेखनीय भूमिका निभाई।
कपूर का यह बयान इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे पहले सीमा पर जारी तनाव की पूरी तस्वीर सार्वजनिक रूप से स्पष्ट नहीं थी। आईटीबीपी के आधिकारिक एक्स हैंडल पर उनके बयान का वीडियो पोस्ट किए जाने के बाद हटा दिया गया। वीडियो हटाए जाने को लेकर सवाल उठे, हालांकि उपलब्ध रिपोर्टों में आईटीबीपी की ओर से इसकी कोई स्पष्ट वजह सामने नहीं आई।
‘द हिंदू’ ने सरकारी सूत्रों के हवाले से बताया कि अरुणाचल प्रदेश के अपर सुबनसिरी जिले के ताकसिंग क्षेत्र में माजा के पास जुलाई के अंत से गतिरोध की स्थिति बनी हुई है। रिपोर्ट के अनुसार, चीनी पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) के सैनिकों ने उस स्थान पर तंबू लगाए हैं, जो भारत की वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) संबंधी धारणा के अनुसार भारतीय क्षेत्र की ओर लगभग छह से सात किलोमीटर अंदर है।
रिपोर्ट में बताया गया कि जुलाई में नियमित गश्त के दौरान भारतीय और चीनी सैनिक आमने-सामने आए थे। शुरुआती टकराव के बाद दोनों पक्ष लौट गए, लेकिन कुछ दिनों बाद चीनी सैनिक अधिक संख्या में वापस आए और उन्होंने वहां तंबू लगा दिए। रिपोर्ट के मुताबिक, भारत ने भी उस क्षेत्र में अपनी तैनाती बढ़ाई है। इन विवरणों का आधार सरकारी सूत्रों की ओर से मीडिया को दी गई जानकारी है; इन्हें स्वतंत्र रूप से स्थापित अंतिम निष्कर्ष के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
पुराने हथियारों और आधुनिक तकनीक की जरूरत पर भी बोले आईटीबीपी प्रमुख
शत्रुजीत कपूर ने आईटीबीपी के हथियारों के आधुनिकीकरण की जरूरत पर भी जोर दिया। उन्होंने कहा कि बल के हथियार करीब 50 साल पुराने हैं और अब उन्हें आधुनिक बनाने की जरूरत है। उन्होंने ड्रोन और ड्रोन-रोधी तकनीक की अहमियत का जिक्र करते हुए कहा कि बदलते युद्ध के तौर-तरीकों में केवल पारंपरिक तरीकों पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं है।
आईटीबीपी प्रमुख के बयान के बाद कांग्रेस ने भी केंद्र सरकार से सवाल किए। पार्टी महासचिव जयराम रमेश ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर सीमा पर जारी टकराव को लेकर चुप्पी साधने का आरोप लगाया। यह कांग्रेस का राजनीतिक आरोप है; सरकार और भाजपा की ओर से इन आरोपों पर तत्काल प्रतिक्रिया उपलब्ध रिपोर्टों में दर्ज नहीं थी।
विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने 23 अक्टूबर को कहा कि चीन की सेनाओं के स्थापित गश्ती तौर-तरीकों से अलग गतिविधियां करने पर भारत-चीन सीमा क्षेत्रों की स्थिति समय-समय पर बिगड़ती है। उन्होंने कहा कि दोनों देश मौजूदा कूटनीतिक और सैन्य व्यवस्थाओं के जरिए लंबित मुद्दों को सुलझाने तथा एलएसी पर गलतफहमी और गलत आकलन से बचने के प्रयास जारी रखे हुए हैं। विशिष्ट सैन्य घटनाक्रम पर उन्होंने रक्षा मंत्रालय से जानकारी लेने को कहा।
जंतर-मंतर पर महिला पत्रकारों के आरोप, जांच की मांग
इसी बीच, 3 अक्टूबर को दिल्ली के जंतर-मंतर क्षेत्र में चुनाव आयोग के खिलाफ एसआईआर से जुड़ी अनियमितताओं के आरोपों पर हो रहे प्रदर्शन की कवरेज कर रही तीन महिला पत्रकारों ने दिल्ली पुलिस के कर्मियों पर यौन उत्पीड़न और दुर्व्यवहार के आरोप लगाए। दिल्ली पुलिस ने शिकायतें मिलने की पुष्टि की और बताया कि निष्पक्ष जांच के लिए उन्हें अपराध शाखा को भेजा गया है।
राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) ने 8 अक्टूबर को इस मामले का स्वतः संज्ञान लिया। आयोग ने दिल्ली पुलिस आयुक्त को नोटिस जारी कर दो सप्ताह के भीतर विस्तृत रिपोर्ट मांगी। आयोग ने कहा कि आरोप सही पाए जाने की स्थिति में वे मानवाधिकारों के उल्लंघन से जुड़े गंभीर सवाल उठाते हैं।
यहां यह अंतर समझना जरूरी है कि महिला पत्रकारों ने पुलिसकर्मियों पर आरोप लगाए हैं और मामले की जांच की मांग हुई है। उपलब्ध रिपोर्टों के आधार पर आरोपों को अंतिम रूप से सिद्ध तथ्य नहीं कहा जा सकता। साथ ही, इन रिपोर्टों में संबंधित पुलिसकर्मियों के आरएसएस से जुड़े होने की पुष्टि नहीं की गई है।
राष्ट्रवाद का मतलब सवालों से बचना नहीं
इन घटनाओं के संदर्भ में उठ रहा बड़ा सवाल यह है कि देशभक्ति का दावा करने वाले संगठनों और लोगों के लिए राष्ट्रवाद का अर्थ क्या है? क्या राष्ट्रवाद केवल राजनीतिक विरोधियों के खिलाफ नारे लगाने, प्रदर्शनकारियों से टकराने या पत्रकारों को डराने तक सीमित हो सकता है? या इसमें देश की सीमाओं की सुरक्षा, जवानों के सामने मौजूद वास्तविक चुनौतियों पर खुलकर चर्चा और नागरिकों के अधिकारों का सम्मान भी शामिल है?
जो लोग आरएसएस और उससे जुड़े संगठनों की राष्ट्रवादी विचारधारा का समर्थन करते हैं, उनसे यह सवाल पूछा जा सकता है कि अरुणाचल में सीमा पर जारी तनाव, पुराने हथियारों और आधुनिक तकनीक की जरूरत जैसे मुद्दों पर वे किस तरह का व्यावहारिक सहयोग देने की बात करते हैं। हालांकि, सीमा पर सैन्य सहयोग का काम प्रशिक्षित सुरक्षा बलों और अधिकृत संस्थाओं के जरिए ही होना चाहिए; आम नागरिकों की भूमिका जिम्मेदार सार्वजनिक विमर्श और संस्थागत सहयोग तक सीमित रहनी चाहिए।
जंतर-मंतर पर महिला पत्रकारों के साथ कथित दुर्व्यवहार की जांच का निष्पक्ष नतीजा सामने आना भी उतना ही जरूरी है। पत्रकारों को अपना काम करते समय सुरक्षा मिलनी चाहिए और किसी भी शिकायत की जांच बिना राजनीतिक पक्षपात के होनी चाहिए।
सवाल सीधा है: अगर राष्ट्रवाद का दावा देश की सुरक्षा और सम्मान के नाम पर किया जाता है, तो उसकी कसौटी सीमा पर वास्तविक चुनौतियों के प्रति जिम्मेदारी और देश के भीतर नागरिकों व पत्रकारों के अधिकारों के सम्मान से भी होनी चाहिए।
ये भी पढ़ें…
भारत में चीन की घुसपैठ पर पूर्वोत्तर का मीडिया मुखर! दिल्ली के बड़े चैनलों का मुँह किसने पकड़ रखा है? देखें वीडियो

