मीडिया और मनोरंजन उद्योग में नौकरियों का ग्राफ़ फिर ऊपर जाता दिख रहा है, लेकिन इस बढ़त में अख़बारों और टीवी चैनलों में काम करने वालों की हिस्सेदारी नाममात्र की है। स्टाफ़िंग कंपनी टीमलीज़ सर्विसेज़ के आंकड़ों पर हुई एक बातचीत में यह बात खुलकर सामने आई है।
टीमलीज़ की एम्प्लॉयमेंट आउटलुक रिपोर्ट में मीडिया-मनोरंजन क्षेत्र का ‘नेट एम्प्लॉयमेंट चेंज’ 2026-27 की पहली छमाही में 2.9% रहा, जो पिछली छमाही में सिर्फ़ 1.2% था। रिपोर्ट के अनुसार 54% नियोक्ता भर्ती कर रहे हैं, लेकिन 25% अब भी कर्मचारियों की संख्या घटा रहे हैं।
तनख़्वाह के मोर्चे पर भी बढ़त दिखाई गई है। टीमलीज़ के ‘जॉब्स एंड सैलरीज़ प्राइमर 2026’ के हवाले से इस क्षेत्र में वेतन वृद्धि 7.7% से बढ़कर 9.1% बताई गई है। भर्ती के बड़े केंद्र मुंबई (23%), चेन्नई (20%) और पुणे (16%) हैं, जबकि वेतन बढ़ोतरी के अनुमान में जयपुर 9.3% और लखनऊ 9.1% पर हैं।
असल सवाल यह है कि ये नौकरियां किसके हिस्से आ रही हैं। रिपोर्ट जिन उभरती भूमिकाओं का ज़िक्र करती है, उनमें डिजिटल कंटेंट क्रिएटर, गेमिंग, एनिमेशन और वीएफ़एक्स विशेषज्ञ, डेटा एनालिस्ट और परफ़ॉर्मेंस मार्केटर शामिल हैं। रिपोर्टर, उप-संपादक, डेस्क या टीवी प्रोडक्शन से जुड़े पदों का कोई अलग आंकड़ा इसमें नहीं है।
टीमलीज़ सर्विसेज़ के सीनियर वाइस प्रेसिडेंट बालासुब्रमण्यन ए. ने बातचीत में माना कि पीछे छूट रहे लोग ज़्यादातर पारंपरिक प्रिंट और ब्रॉडकास्ट कामकाज से जुड़े हैं। उन्होंने इसकी वजह विज्ञापन से कमाई की धीमी रफ़्तार और पाठकों-दर्शकों का मोबाइल और ऑन-डिमांड माध्यमों की ओर खिसकना बताया। उनके मुताबिक जिन मीडिया घरानों की डिजिटल शाखाएं बढ़ रही हैं, वहां भी प्रिंट और टीवी के लिए नई भर्ती सीमित है। उनका कहना है कि यह पूरे क्षेत्र के सिकुड़ने का नहीं, बल्कि कमाई के ठिकाने बदलने का संकेत है।
रिपोर्ट के मुताबिक मार्केटिंग में फ़्रेशर्स की भर्ती का इरादा करीब 11% से बढ़कर 62% हो गया है और त्योहारी सीज़न में अस्थायी भर्तियां 15-20% बढ़ने का अनुमान है। ऐसे में न्यूज़रूम में बरसों गुज़ार चुके पत्रकारों के लिए ‘रिकवरी’ के ये आंकड़े नौकरी या तनख़्वाह की सुरक्षा की कोई गारंटी नहीं हैं। सवाल यही है कि इस बढ़त में अनुभवी प्रिंट और टीवी पत्रकारों की जगह कहां है।


