
संजय सिन्हा-
मां दुर्गा, किसी स्त्री का मान तोड़ने वालों का सर्वनाश करना
आज मां दुर्गा का दिन है। शक्ति की आराधना का दिन। उस स्त्री शक्ति का दिन, जो अन्याय के सामने झुकती नहीं, बल्कि अन्याय का संहार करती है।
मैं मां दुर्गा का उपासक हूं। आज मेरी प्रार्थना है, मां, उन लोगों का अहंकार चूर-चूर कर देना, जो किसी स्त्री की गरिमा को मिट्टी में मिलाकर अपनी दुकान चलाते हैं। चाहे वे न्यूज चैनल के संपादक हों, कैमरे के पीछे खड़े लोग हों या मोबाइल की स्क्रीन पर किसी महिला का अपमान दिखा और देखकर आनंद लेने वाले लोग।
मैं कोई साधु महात्मा नहीं हूं। मैं कोई भविष्यवक्ता भी नहीं हूं। लेकिन इतना जरूर मानता हूं कि जब किसी बेगुनाह की आंखों से अपमान के आंसू निकलते हैं, तो उस आह की आवाज कहीं न कहीं जरूर पहुंचती है। मां दुर्गा सचमुच हमारी प्रार्थनाएं सुनती हैं, तो मां आज संजय सिन्हा प्रार्थना सुन लीजिए- किसी स्त्री का मान तोड़ने वाला, किसी स्त्री को सार्वजनिक रूप से अपमानित करके तालियां बटोरने वाला, बचकर नहीं निकलना चाहिए।
न्याय के सामने भी नहीं और अपने जमीर के सामने भी नहीं।
मां, इन लोगों को उनके कर्मों का ऐसा फल देना कि भविष्य में किसी स्त्री की गरिमा से खेलने से पहले उनकी रूह कांप उठे।
दो नेहाएं हैं। दोनों के नाम में नेह है, यानी प्रेम। लेकिन इस समाज के कुछ लोगों के भीतर प्रेम नहीं, स्त्री के प्रति घृणा और कुंठा भरी हुई है।
पहले नेहा सिंह राठौर की बात।
एक बड़े न्यूज चैनल, एबीपी न्यूज, पर नेहा सिंह राठौर को लेकर सेक्स रैकेट और वेश्यावृत्ति से जुड़े आरोप प्रसारित किए जाने का मामला सामने आया है। खबर चली। बाद में चैनल ने माफी मांग ली। नेहा ने खुलेआम चैलेंज किया।
जांच ये पता चला कि कहीं के पुराने वीडियो को चैनल ने नेहा सिंह राठौर के नाम से जोड़ कर टीवी पर चला दिया कि नेहा सिंह राठौर वेश्यावृति का धंधा करती हैं।
इतना बड़ा चैनल। इतना प्रतिष्ठित ग्रुप। लेकिन इन लोगों ने अपना हाल ये बना रखा है कि निहायत झूठी खबर को ऑन एयर कर दिया। सिर्फ किसी की मिट्टी पलीद करने के लिए।
किसी महिला के नाम के आगे वेश्या लिख देना कितना आसान है! कोई पुराना वीडियो. किसी के दावे को उठाइए, स्क्रीन पर सनसनीखेज पट्टी चलाइए और लाखों लोगों के सामने एक महिला के चरित्र को कठघरे में खड़ा कर दीजिए।
फिर सफाई कौन देगा? वह महिला। सवालों का सामना कौन करेगा? वह महिला। अपने परिवार और समाज के सामने अपनी प्रतिष्ठा बचाने की लड़ाई कौन लड़ेगा? वह महिला। और आरोप लगाने वाले अगले कार्यक्रम की तैयारी में लग जाएंगे!
बतौर पत्रकार संजय सिन्हा पूछना चाहते हैं कि किसी महिला के बारे में सेक्स रैकेट से जुड़ा आरोप प्रसारित करना क्या इतना मामूली काम है कि बिना पूरी जांच पड़ताल के उसे खबर बना दिया जाए?
न्यूज चैनल को खबर दिखाने की अनुमति है, लेकिन क्या इससे उसे किसी की जिंदगी और प्रतिष्ठा से खेलने का लाइसेंस भी मिल गया है?
अब दूसरी नेहा की बात। नेहा बोरा।
वे दिल्ली में जंतर मंतर आंदोलन कर रही थीं। लेकिन किसी के कैमरे ने उन्हें ऐसे एंगल से शूट किया, जिससे उनकी छाती का अंतरंग हिस्सा दिखाई देने लगा। फिर वह दृश्य सोशल मीडिया पर प्रसारित हुआ। लोगों ने उसे देखा, साझा किया और उस पर अपनी उत्सुकता दिखाई।
सोचिए! एक महिला किसी मुद्दे पर अपनी आवाज बुलंद करने निकली है। वह चाहती है कि लोग उसकी बात सुनें। लेकिन कैमरे की नजर उसकी बात पर नहीं, उसके शरीर पर टिक जाती है। उसकी आवाज पीछे छूट जाती है और उसका शरीर तमाशा बना दिया जाता है।
यह पत्रकारिता है या किसी स्त्री को वस्तु बनाकर बेचने का धंधा?
जिस व्यक्ति ने वीडियो बनाया या उसे प्रसारित किया, उससे मेरा सवाल है कि क्या आंदोलन की खबर दिखाने के लिए किसी महिला के शरीर का ऐसा दृश्य दिखाना जरूरी था? अगर यह अनजाने में हुआ, तो उसे हटाया जा सकता था। अगर यह जानबूझकर किया गया, तो यह और भी गंभीर सवाल खड़े करता है।
सबसे बड़ा सवाल उन लोगों से है, जो ऐसे दृश्य देखकर खुश होते हैं। आखिर क्या हासिल हो गया किसी स्त्री के शरीर का अंतरंग हिस्सा देख लेने से? कौन सा ज्ञान बढ़ गया? कौन सी बेरोजगारी खत्म हो गई? किस गरीब के घर चूल्हा जल गया? किस बच्चे को बेहतर शिक्षा मिल गई?
कुछ भी नहीं! बस कुंठा को थोड़ी देर के लिए खुराक मिल गई।
अमीर आदमी अपनी कुंठित इच्छाओं के लिए दुनिया के महंगे शहरों की सैर कर सकता है। गरीब आदमी मोबाइल की स्क्रीन पर सिर झुका सकता है।
पैसा किसी को सभ्य नहीं बनाता और गरीबी किसी को चरित्रहीन नहीं बनाती। कुंठा का रिश्ता जेब से नहीं, नजर से है।
मुझे यह देखकर दुख होता है कि जिस तकनीक से हम विज्ञान सीख सकते हैं, दुनिया समझ सकते हैं, बच्चों को पढ़ा सकते हैं और अपने जीवन को बेहतर बना सकते हैं, उसी तकनीक का इस्तेमाल हम किसी महिला की गरिमा को कुचलने के लिए भी कर सकते हैं।
अब मीडिया के मालिकों से संजय सिन्हा सवाल है।
आप अपने संस्थान में संपादक किसलिए नियुक्त करते हैं? सिर्फ इसलिए कि वह सत्ता के गलियारों में उठ बैठ सके, मंत्रियों से संबंध बना सके, विज्ञापन जुटा सके और टीआरपी के आंकड़े बढ़ा सके? या इसलिए कि वह खबर और अफवाह के बीच फर्क कर सके?
संपादक का काम किसी महिला को बदनाम करने वाली सामग्री को स्क्रीन पर चढ़ाना नहीं, बल्कि यह तय करना है कि क्या वह सामग्री खबर बनने की बुनियादी शर्तें पूरी करती है। उसे पूछना चाहिए कि प्रमाण कहां हैं, स्रोत कौन है, संबंधित पक्ष का जवाब क्या है और प्रसारण से किसी निर्दोष की प्रतिष्ठा को अनावश्यक नुकसान तो नहीं पहुंचेगा? अगर इन सवालों का जवाब नहीं है, तो खबर रोक दीजिए। दुनिया खत्म नहीं हो जाएगी।
लेकिन जब सनसनी को खबर और किसी की बेइज्ज़ती को मनोरंजन समझ लिया जाए, तब पत्रकारिता अपने ही उद्देश्य के खिलाफ खड़ी हो जाती है।
मैंने पत्रकारिता में लंबा समय बिताया है। खबरों की दुनिया को करीब से देखा है। मैं जानता हूं कि पत्रकारिता कितनी ताकतवर हो सकती है। एक अच्छी खबर किसी कमजोर की आवाज बन सकती है। किसी अन्याय को उजागर कर सकती है। किसी सत्ता को जवाब देने के लिए मजबूर कर सकती है।
लेकिन यही ताकत जब किसी महिला को बिना पर्याप्त प्रमाण के बदनाम करने या उसके शरीर को तमाशा बनाने में इस्तेमाल होती है, तो पत्रकारिता अपने पेशे की गरिमा खो देती है।
नवरात्र में मां दुर्गा के सामने सिर झुकाने वालों से मेरा एक सवाल है। हम मंदिर में देवी की पूजा करते हैं, कन्या के पैर छूते हैं, बेटियों को देवी कहते हैं। लेकिन घर लौटकर किसी महिला का अपमानजनक वीडियो खोजते हैं, उसे दूसरों को भेजते हैं और फिर अपने संस्कारों पर गर्व करते हैं।
यह कैसी भक्ति है? जिस समाज में देवी की पूजा और जीवित स्त्री का अपमान साथ-साथ चलते हों, वहां पूजा के तरीके पर नहीं, पूजा करने वाले की मानसिकता पर सवाल उठना चाहिए।
मैं किसी के लिए अन्याय नहीं चाहता। मैं न्याय चाहता हूं। मैं यह चाहता हूं कि किसी महिला को बदनाम करने से पहले सौ बार सोचना पड़े। किसी की निजी गरिमा को चोट पहुंचाने वाले को यह एहसास हो कि स्क्रीन के उस पार भी एक इंसान है, जिसकी भावनाएं हैं, परिवार है और सम्मान से जीने का अधिकार है।
राक्षस हमेशा दस सिर और बीस हाथ लेकर नहीं आते। कभी वे कैमरे के पीछे होते हैं। कभी न्यूजरूम की कुर्सी पर बैठे होते हैं। कभी मोबाइल की स्क्रीन पर किसी स्त्री का अपमान देखकर मुस्करा रहे होते हैं। और कभी वे हमारे भीतर भी छिपे होते हैं। मां दुर्गा, आज उन राक्षसों का संहार कीजिए। सबसे पहले हमारे भीतर बैठे राक्षसों का।
संजय सिन्हा पत्रकार रहे हैं और आज ये यह कहने में कोई संकोच नहीं कि अगर किसी स्त्री का अपमान देखकर समाज खुश होता है, तो समस्या उन स्त्रियों में नहीं, उस समाज की सोच में है जो स्त्री को इंसान से पहले शरीर और व्यक्ति से पहले चरित्र मानता है।
दोनों नेहाओं के साथ न्याय हो। सच सामने आए। दोषी जवाबदेह हों। और यह देश एक दिन इतना सभ्य ज़रूर बने कि किसी महिला को अपनी गरिमा बचाने के लिए पूरे समाज से लड़ना न पड़े।
दोनों नेहाओं, तुम जीती रहो। सलामत रहो। लड़ती रहो। मेरी प्यारी बहनों, तुम देवी बन कर असुरों का नाश करना। जय मां दुर्गा!


