उर्मिलेश-
रिष्ठ पत्रकार जयशंकर गुप्त Jaishankar Gupta की किताब ‘आपातकाल से अमृतकाल’ का 17 अक्तूबर को दिल्ली के गांधी शांति प्रतिष्ठान के सभागार में लोकार्पण था. सभागार पूरी तरह भरा हुआ था. वक्ता ज्यादा होने के कारण कार्यक्रम लंबा चला फिर भी लोग बने रहे. अभी इस किताब को पढ़ ही रहा हूं. कुछ चुनिंदा अध्याय कल पढ़ गया. किताब पर एक संक्षिप्त परिचयात्मक टिप्पणी:
आपातकाल यानी इमर्जेंसी(25 जून, 1975–21मार्च 1977) तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने लगाई थी. पिछले वर्ष इसके लागू किए जाने के 50 वर्ष पूरे हुए. मौजूदा सत्ताधीशों ने उस दिन को भारतीय लोकतंत्र के इतिहास का सबसे काला और मनहूस दिन बताया. निस्संदेह, आपातकाल भारतीय लोकतंत्र के इतिहास का एक बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण और काला दौर था, जब लोगों के मौलिक अधिकारों का गला घोंट दिया गया था.
लेकिन आज के ‘अमृतकाल’ में क्या हो रहा है? प्रधानमंत्री मोदी की सरकार ने लोगों के मौलिक अधिकारों के साथ क्या सलूक किया है? अगर वह घोषित इमर्जेंसी का दौर था तो ये ‘अमृतकाल’ क्या है? क्या यह ‘अघोषित इमर्जेंसी’ है या उससे कुछ कम या उससे बहुत ज्यादा है?
2025-2026 में इमर्जेंसी पर हिंदी और अंग्रेजी में कई किताबें लिखी गई हैं. कुछ अच्छी और शोधपूर्ण हैं. लेकिन जयशंकर की किताब इन सबमें काफी कुछ अलग है. संभवत: इसलिए कि लेखक ने 50 वर्षों के राजनीतिक इतिहास को व्याख्यायित करने के लिए गंभीर शोध-अध्ययन के साथ अपने अनुभवजन्य ज्ञान और विवेक का भी सहारा लिया है. इमर्जेंसी में स्वयं जयशंकर भी जेल में रहे. बाद में पत्रकारिता में आये. एक समाजवादी कार्यकर्ता और फिर एक पत्रकार के तौर पर वह 50 सालों के इतिहास के मात्र दर्शक नहीं, उसके गंभीर प्रेक्षक और साक्षी भी हैं.
संभवत: इसीलिए किताब में तब और आज के बहुत सारे जटिल राजनीतिक सवालों का जवाब गंभीर शोध और अनुभवजन्य तथ्यों की रोशनी में देने की बेहतरीन कोशिश दिखाई देती है. यह भारत के पिछले 50 वर्षों के राजनीतिक इतिहास का महत्वपूर्ण और मुकम्मल दस्तावेज है. ‘आपातकाल से अमृतकाल'(प्रभाकर प्रकाशन, मेन मदर डेयरी रोड, पांडव नगर, ईस्ट दिल्ली, प्रकाशन वर्ष-2026, मूल्य-750/ पृष्ठ:524) के लिए लेखक और मित्र जयशंकर गुप्त को बहुत-बहुत बधाई.
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