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वेब-सिनेमा

आपके पास बहुत पैसा है और आप दूसरों की पीड़ा महसूस नहीं करते तो उस पैसे का क्या मतलब!

यह कैसी अमीरी है, जिसमें आदमी अपने लिए तो स्वर्ग बना लेता है, लेकिन अपने आसपास की दुनिया को नर्क बनते देखता रहता है!

संजय सिन्हा-

तब तुम क्या कर रहे थे?

एक लड़के ने बहुत छोटी सी बात कही। इतनी छोटी कि सुनने में मामूली लगे, लेकिन सोचने बैठो तो पूरी जिंदगी का हिसाब मांगने लगे।

उसने कहा कि बॉलीवुड के शाहरुख खान, आमिर खान, सलमान खान और बहुत से लोग महलों में रहते हैं। उनके पास करोड़ों की गाड़ियां हैं। दुनिया की सारी सुख सुविधाएं हैं। लेकिन जब वे अपने महलों से बाहर निकलते हैं तो उन्हें क्या मिलता है? वही टूटी सड़कें, वही खराब फुटपाथ, वही अव्यवस्था! फिर इतने पैसे का क्या फायदा?

उस लड़के ने आगे कहा कि बाहर निकलो। लोगों की समस्याओं को महसूस करो। लोगों का जीवन बेहतर बनाओ। उनकी तकलीफ में उनके साथ खड़े हो। तब पैसा कमाने का असली मजा है।

उसने यह भी कहा कि उसके पास इतना पैसा है कि वह पूरी जिंदगी आराम से रह सकता है। दुनिया घूम सकता है। उसे किसी से कुछ मांगने की जरूरत नहीं पड़ेगी। लेकिन अगर आपके पास बहुत पैसा है और आप दूसरों की पीड़ा महसूस नहीं करते तो उस पैसे का क्या मतलब?

यह बात कहने वाला लड़का ध्रुव राठी है। ध्रुव राठी को आधी दुनिया प्यार करती है, आधी दुनिया उससे नफरत करती है। यह अपने अपने विचारों की बात है। किसी को उससे सहमति हो सकती है, किसी को असहमति। लेकिन उसकी इस बात से असहमत होना आसान नहीं कि अपने लिए सब कुछ जुटा लेने के बाद भी अगर आपके आसपास की दुनिया बदहाल है तो आपकी संपन्नता का सुख अधूरा है।

संजय सिन्हा बहुत सोचते हैं। वे सोचते हैं कि मान लीजिए आपका घर सोने का बना है। फर्श चांदी का है। छत पर हीरे जड़े हैं। आपके पास दुनिया की सबसे महंगी कार है। बैंक में इतना पैसा है कि सात पुश्तें बैठकर खा लें। लेकिन एक दिन आप अपने उस आलीशान घर से बाहर निकलते हैं। दरवाजा खुलता है और बदबू का एक झोंका भीतर तक चला आता है।

आपकी कार सड़क पर उतरती है। सड़क पर गड्ढे हैं। फुटपाथ पर चलने की जगह नहीं है। ट्रैफिक में आपकी गाड़ी दो घंटे फंसी रहती है। शीशे के बाहर एक बच्चा भूख से बिलख रहा है। एक बूढ़ा आदमी सड़क पार करने के लिए किसी के सहारे का इंतजार कर रहा है। एक औरत अपने बच्चे को गोद में उठाए धूप में बस का इंतजार कर रही है।

आपकी गाड़ी का एसी चल रहा है। बच्चा बाहर पसीने से तरबतर है। आपके पास सब कुछ है। लेकिन क्या आपके पास उस बच्चे की भूख का जवाब है? आपके पास दुनिया की सबसे महंगी कार है। लेकिन क्या आपके पास ऐसी सड़क है जिस पर वह कार बिना झटके के चल सके?

आपके पास महल है। लेकिन क्या आपके पास ऐसा शहर है जहां आपका बच्चा बिना डर के पैदल चल सके? आपके पास पैसा है। लेकिन क्या आपके पास ऐसी व्यवस्था है जहां किसी गरीब को इलाज के लिए अपना घर न बेचना पड़े?

तब संजय सिन्हा सोचते हैं, यह कैसी अमीरी है, जिसमें आदमी अपने लिए तो स्वर्ग बना लेता है, लेकिन अपने आसपास की दुनिया को नर्क बनते देखता रहता है!

मृत्यु के संदर्भ में हमने बहुत सुना है कि सब ठाठ पड़ा रह जाएगा, जब लाद चलेगा बंजारा। आदमी खाली हाथ आया था, खाली हाथ चला जाएगा। लेकिन जीवन के संदर्भ में भी एक बात समझने की जरूरत है।

आप राजा तभी तक हैं, जब तक आपकी प्रजा का जीवन जीने लायक है। वरना सोने के सिंहासन पर बैठकर भी आप एक बदहाल दुनिया के कैदी हैं। और यह बात सिर्फ फिल्मी सितारों पर लागू नहीं होती। उन कारोबारियों पर भी लागू होती है, जिन्होंने लोगों की जरूरतों से अपना कारोबार खड़ा किया। उन उद्योगपतियों पर भी, जिनकी कंपनियां लाखों लोगों के श्रम से चलती हैं। उन नेताओं पर भी, जिन्हें जनता ने अपनी जिंदगी बेहतर बनाने के लिए चुना। उन अधिकारियों पर भी, जिन्हें व्यवस्था सुधारने की जिम्मेदारी मिली।

और उन तमाम लोगों पर भी, जो अपनी दुनिया में इतने मगन हैं कि उन्हें लगता है कि बाहर जो कुछ हो रहा है, उससे उनका कोई लेना देना नहीं।

सवाल यह है कि आखिर कोई अपनी दुनिया में कब तक कैद रह सकता है? आप अपने घर के बाहर की सड़क को साफ रखने के लिए पैसा खर्च कर सकते हैं। अपने घर के भीतर हवा को ठंडा रखने के लिए मशीन लगा सकते हैं। अपने घर की सुरक्षा के लिए पहरेदार रख सकते हैं। अपनी यात्रा के लिए हेलीकॉप्टर खरीद सकते हैं। लेकिन एक दिन तो सबको इसी दुनिया में उतरना है।

बात आपकी अमीरी की नहीं, बात जिम्मेदारी की है, जो आदमी के पास तब आती है, जब उसके पास अपनी जरूरत से ज्यादा हो जाता है। और जिम्मेदारी सिर्फ दान देने से पूरी नहीं होती।

दान देना अच्छी बात है। किसी भूखे को खाना खिलाना अच्छी बात है। किसी गरीब बच्चे की फीस भर देना अच्छी बात है। किसी अस्पताल में मदद कर देना भी अच्छी बात है।

लेकिन संजय सिन्हा सोचते हैं कि भूख पैदा करने वाली परिस्थितियां जस की तस रहें, अगर शिक्षा अमीर और गरीब के बीच की खाई बढ़ाती रहे, अगर सड़कें बदहाल रहें, अगर आम आदमी अपने ही देश में बुनियादी सुविधाओं के लिए परेशान रहे, तो हमें सिर्फ कुछ लोगों की मदद करने से आगे भी सोचना होगा।

हमें पूछना होगा कि ऐसी व्यवस्था क्यों नहीं बनती, जिसमें लोगों को हर कदम पर किसी की दया का इंतजार न करना पड़े। यहीं आकर बात सत्ता तक पहुंचती है।

ध्रुव राठी के कहे का एक बड़ा अर्थ यह भी है कि जो लोग प्रभावशाली हैं, वे अपनी आवाज का इस्तेमाल करें। वे सवाल पूछें। वे गलत को गलत कहें। वे यह न सोचें कि हम अभिनेता हैं, व्यापारी हैं, प्रोफेसर हैं, पत्रकार हैं या किसी बड़ी कंपनी के मालिक हैं। हमारा काम सत्ता से सवाल पूछना नहीं है। क्यों नहीं है?

अगर आप बोलेंगे तो हो सकता है आपका नुकसान हो। हो सकता है आपके काम में मुश्किलें आएं। हो सकता है कुछ लोग आपसे नाराज हो जाएं। सत्ता की आंखों में आंख डालना हमेशा आसान नहीं होता।

लेकिन एक सवाल यह भी है कि अगर आप सब कुछ होते हुए भी नहीं बोलेंगे, तो फिर कौन बोलेगा?

जिसके पास खोने के लिए कुछ नहीं है, उससे तो आप उम्मीद कर ही सकते हैं कि वह जोखिम उठाएगा। लेकिन जिसके पास बहुत कुछ है, जिसके पास संसाधन हैं, पहुंच है, पहचान है, जिसकी एक आवाज लाखों लोगों तक पहुंच सकती है, उसकी जिम्मेदारी भी तो बड़ी होनी चाहिए।

यह जरूरी नहीं कि हर अमीर आदमी राजनीति में आए। यह भी जरूरी नहीं कि हर अभिनेता किसी राजनीतिक दल के खिलाफ बयान दे। किसी की असहमति को देशभक्ति का प्रमाणपत्र और किसी की चुप्पी को अपने आप अपराध नहीं कहा जा सकता।

लेकिन जब नागरिकों की बुनियादी समस्याएं सामने हों, जब सार्वजनिक जीवन की गुणवत्ता लगातार सवालों के घेरे में हो, तब प्रभावशाली लोगों को कम से कम उन सवालों से मुंह नहीं मोड़ना चाहिए।

आखिर जिस समाज ने आपको नाम दिया, पहचान दी, दर्शक दिए, ग्राहक दिए, कारोबार दिया, उसी समाज के प्रति आपकी कोई जिम्मेदारी नहीं है?

आपकी फिल्में देखने वाले लोग इसी देश में रहते हैं। आपके उत्पाद खरीदने वाले लोग इसी देश में रहते हैं। आपकी कंपनियों में काम करने वाले लोग इसी देश में रहते हैं।

फिर उनकी जिंदगी से आपका रिश्ता सिर्फ पैसे के लेनदेन तक कैसे सीमित हो सकता है?

संजय सिन्हा को जंगल में लगी आग की एक पुरानी कहानी याद आती है।

जंगल में आग लग गई थी। सारे जानवर अपनी जान बचाकर भागने लगे। कोई दूर खड़ा होकर आग देख रहा था, कोई कह रहा था कि अब इस आग को कौन बुझा सकता है, कोई अपनी जान बचाने में लगा था।

उसी जंगल में एक छोटी सी चिड़िया भी थी। वह उड़कर नदी तक जाती। अपनी छोटी सी चोंच में पानी भरती। फिर लौटकर आग पर डाल देती।

जानवरों ने उससे कहा, पगली हो गई हो क्या? तुम्हारी चोंच के दो बूंद पानी से इतनी बड़ी आग बुझेगी?

चिड़िया ने कहा, मुझे पता है कि मेरी चोंच के पानी से जंगल की आग नहीं बुझने वाली। लेकिन जब इस जंगल में आग लगने का इतिहास लिखा जाएगा, तब मेरा नाम उन लोगों में नहीं लिखा जाएगा, जो आग लगने पर तमाशा देख रहे थे।

संदेश बहुत सीधा है। हर आदमी पूरी दुनिया नहीं बदल सकता। हर आदमी सत्ता नहीं बदल सकता। हर आदमी व्यवस्था नहीं बदल सकता। हर आदमी करोड़ों रुपये दान नहीं कर सकता। लेकिन हर आदमी अपने हिस्से की जिम्मेदारी तो निभा सकता है।

जिसके पास पैसा है, वह पैसे से मदद करे। जिसके पास आवाज है, वह आवाज उठाए। जिसके पास ताकत है, वह कमजोर के साथ खड़ा हो। जिसके पास पद है, वह अपने पद का इस्तेमाल लोगों की जिंदगी बेहतर बनाने में करे।

और जिसके पास इनमें से कुछ भी नहीं है, वह कम से कम तमाशबीन बनकर खड़े रहने को अपनी नियति न माने।

क्योंकि चुप रहने और कुछ न कर पाने में फर्क होता है। हर आदमी हर लड़ाई नहीं लड़ सकता, लेकिन हर आदमी यह तो तय कर सकता है कि वह अन्याय को सामान्य मानकर जीना नहीं सीखेगा।

आखिर में एक बात और। जिस दिन आप अपने आलीशान घर की खिड़की से बाहर झांककर किसी भूखे बच्चे को देखते हैं, उस दिन आपके पास दो रास्ते होते हैं। आप पर्दा गिराकर अपनी दुनिया में लौट सकते हैं। या फिर यह सोच सकते हैं कि ऐसी दुनिया बनाने में आपका क्या योगदान हो सकता है, जहां किसी बच्चे को भूखे पेट न सोना पड़े।

पहला रास्ता आसान है। दूसरा रास्ता आपको बेचैन करेगा। लेकिन शायद जिंदगी का असली मतलब इसी बेचैनी में छिपा है।

क्योंकि पैसा कमाने का सुख अपनी जगह है। महल में रहने का सुख अपनी जगह है। दुनिया घूमने और महंगी गाड़ियों में चलने का सुख भी अपनी जगह है।

मगर जब आप किसी दूसरे की जिंदगी में थोड़ा सा उजाला पैदा करते हैं, जब आपकी वजह से किसी की तकलीफ कम होती है, जब आपकी आवाज किसी ऐसे आदमी तक पहुंचती है जिसकी आवाज कोई सुनना नहीं चाहता, तब जो सुख मिलता है, उसका कोई बाजार भाव नहीं होता।

वह सुख खरीदा नहीं जा सकता। वह सिर्फ कमाया जा सकता है। इसलिए महलों में रहने वालों, कभी बाहर निकलकर देखो। तुम्हारी बादशाहत के बाहर भी एक दुनिया है। और उस दुनिया को बेहतर बनाए बिना तुम्हारी बादशाहत कभी पूरी नहीं हो सकती।

क्योंकि एक दिन जिंदगी सबका हिसाब मांगेगी। वह पूछेगी कि जब तुम्हारे पास इतना कुछ था, तब तुमने दूसरों के लिए क्या किया? उस दिन तुम्हारे बैंक बैलेंस का कोई गवाह नहीं होगा।

तुम्हारे महलों की ऊंचाई का कोई मतलब नहीं होगा। तुम्हारी गाड़ियों की कीमत कोई नहीं पूछेगा।

बस एक सवाल होगा। जब दुनिया तकलीफ में थी, तब तुम क्या कर रहे थे?

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