द टेलीग्राफ में दिलजीत दोसांझ के कार्यक्रम पर दिल्ली पुलिस का यू-टर्न। इसके अलावा आज दो खबरें जरूर हैं – अरुणाचल में चीन या दिल्ली में SIR पर हल्ला बोल; बहानेबाजी कम है। द हिन्दू ने दोनों खबरों को बराबर महत्व दिया है।
संजय कुमार सिंह
दिलजीत दोसांझ के कार्यक्रम पर दिल्ली पुलिस का यू टर्न आज एक सामान्य खबर की तरह छपा है। दि इंडियन एक्सप्रेस में पर्याप्त सरकारी स्पष्टीकरण है लेकिन एक ही दिन में फैसला पलट सकता था तो कल अनुमति नहीं मिलने की खबर क्यों थी? और कल इनकार की खबर के बाद आज अनुमति दिए जाने से लगता है कि दबाव में अनुमति दी गई है या फिर शर्तें पूरी करने का पुलिस का दबाव अनुचित था जो अनुमति नहीं मिलने के कारण आयोजकों को मानना पड़ा होगा। जो भी हो, जब फैसला हो गया तो उसपर दोबारा विचार ही क्यों किया गया और जब दोबारा विचार किया गया तो पाठकों को कैसे पता चलेगा कि खबर गलत थी या पुलिस का रवैया?
सरकारी और सार्वजनिक मामलों में ऐसे यू-टर्न गलत संकेत देते हैं और सरकारी शर्तें पूर्ण करने की आड़ में रिश्वतखोरी के आम मामले पर पत्रकारीय उदासीनता का मामला लगता है। भले कोई न बोले या बोलने वालों के खिलाफ कार्रवाई हो जाए – इस सरकार में सरकारी फैसलों की गंभीरता बहुत कम हो गई है। यह लाल फीताशाही और भ्रष्टाचार के उदाहरणों की तरह लगता है। पश्चिम बंगाल में भाजपा की सरकार बनने के बाद पंडाल में भगदड़ से मौत पहली बार हुई है। कारण व्यवस्था बदलना भी था। इसके अलावा पुलिस और सरकार की कार्रवाई से भी भाजपाई लिजलिजेपन का संकेत मिलता है। समझना मुश्किल नहीं है कि ऐसा क्यों होता है पर वह अलग मुद्दा है।
आज इस खबर के साथ खास बात यह है कि दिलजीत दोसांझ के कार्यक्रम को उड़ाने की धमकील भी आज ही छपी है। नवोदय टाइम्स में प्रमुखता से छपी खबर के अनुसार, मुंबई की महापौर ऋतु तावड़े को शुक्रवार को भेजे गए ई-मेल में उनके कार्यालय, अभिनेता अमिताभ बच्चन के घर और गायक दिलजीत दोसांझ के संगीत कार्यक्रम के आयोजन स्थल पर बम विस्फोट किए जाने की धमकी के बाद सुरक्षा एजेंसियों और मुंबई पुलिस को हाई अलर्ट पर रखा गया है। आज ही खबर है कि अब दिल्ली में भी दिलजीत दोसांझ का कार्यक्रम होगा जिससे कल इनकार किया गया था। आज इसे संयोग माना जा सकता है लेकिन कार्यक्रम में कुछ हो गया तो प्रयोग भी माना जा सकेगा और यह भाजपा के लिए राजनीतिक नुकसान का कारण हो सकता है लेकिन सरकारी कार्यशैली से नहीं लगता है कि उसे इसकी परवाह है। इसका कारण चुनाव चोरी है इसलिए इसका विरोध महत्वपूर्ण खबर है लेकिन कइयों ने पहले पन्ने पर जगह नहीं दी है।
इसके अलावा आज पहले पन्ने की खबरों, लीड और हेडलाइन मैनेजमेंट के मामले में सरकार अब फंस गई लगती है। इसका पता देशबन्धु की खबर – डिजिटल मीडिया पर लगाम लगाने की तैयारी में सरकार शीर्षक खबर से भी चलता है। खबर के अनुसार, सरकार डिजिटल पत्रकारों को मान्यता देने की नई शर्तों पर भी विचार कर रही है। आप जानते हैं कि मुख्य धारा की मीडिया को नियंत्रित करने के बाद सरकार ने डिजिटल और सोशल मीडिया को नियंत्रित करने की हरसंभव कोशिश की है। कई मामलों में खुली मनमानी के लिए मनमाने नियम भी बना लिए हैं। नतीजा यह है कि सरकार के खिलाफ खबरें और खबर करने वालों को तो रोक दिया जा रहा है पर सरकार के पक्ष में झूठ फैलाने वालों पर भी कार्रवाई नहीं है। यू ट्यूबर ध्रुव राठी ने आज सुबह जारी वीडियो में बताया है कि अर्नब गोस्वामी से लेकर भाजपा के अधिकृत हैंडल से भी उसके बारे में गलत खबरें फैलाई गईं। भाजपा और सरकार के लिए स्थिति इतनी खराब बो चुकी है कि तमाम नए समर्थक मैदान में उतर गए हैं और कुतर्क कर रहे हैं। इनमें पूर्व विदेश सचिव कंवल सिबल शामिल हैं जो पूर्व मुख्य चुनाव आयु्क्त एसवाई कुरैशी को ट्रोल कर रहे हैं।
आज ये दो बड़ी खबरें हैं और दोनों सरकार विरोधी हैं। इनमें एक अमर उजाला और कुछ दूसरे अखबारों में लीड है। दूसरा एसआईआर के विरोध में प्रदर्शन दैनिक भास्कर में लीड और कुछ दूसरे अखबारों में प्रमुखता से है। अमर उजाला की लीड का शीर्षक है – अरुणाचल में एलएसी पर अब भी चीन से हो रहीं झड़पें : आईटीबीपी। खबर के अनुसार डीजी शत्रुजीत सिंह कपूर ने कहा है कि गलवां जैसा टकराव रोकने के लिए आधुनिक तकनीक व ड्रोन फोर्स पर जोर देना चाहिए। राहुल गांधी ने कोई साल भर पहले इसकी चर्चा की थी। सरकार ने क्या किया पता नहीं लेकिन आज खबर है, चीन से मुकाबले के लिए ड्रोन पर एक हजार करोड़ खर्च करेंगे।
दूसरी खबर का शीर्षक है – एसआईआर के विरोध में प्रदर्शन, कई लोग हिरासत में लिए गए। यह एलान भी है कि एक नवंबर तक देश के 18 राज्यों के 88 शहरों में प्रदर्शन होगा। देशबन्धु की खबर का शीर्षक है, एसआईआर के खिलाफ लेफ्ट का हल्ला बोल। उपशीर्षक है, 100 प्रदर्शनकारी हिरासत में। इस मौके पर नारे लगे – ज्ञानेश कुमार गद्दी छोड़। आशुतोष रांका के हवाले से यह भी कहा गया है कि जेल के अंदर हों या बाहर, आंदोलन जारी रहेगा। इन दोनों खबरों को महत्व देने से बचने के लिए जो खबरें लीड बनाई गई हैं उनमें नवोदय टाइम्स की लीड उल्लेखनीय है। डबल इंजन वाले हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी के बारे में बताया गया है कि वे बिजली क्षेत्र में निजीकरण के पक्ष में नहीं हैं। खबर के अनुसार, हरियाणा में समानांतर विजली वितरण लाइसेंस के विरोध में दो दिन से चल रही बिजली कर्मचारियों की हड़ताल शुक्रवार देर शाम खत्म हो गई।
दि एशियन एज में लीड का शीर्षक है, दिल्ली अलर्ट पर : सरकार ने 273 सीएपीएफ कंपनियों की तैनाती का विस्तार किया। वैसे, इसका एक फ्लैग शीर्षक है – सीईसी, एसआईआर के खिलाफ सैकड़ों लोगों ने मार्च किया। 100 डीटेन किए गए। चीन से टकराव की खबर सिंगल कॉलम में है। इसका शीर्षक है, चीन के साथ टकराव पर कांग्रेस ने मोदी की आलोचना की। यहां तीन कॉलम की खबर में भाजपा का आरोप है – भाजपा ने राहुल के विदेश दौरे को निशाना बनाया। आप समझ सकते हैं कि चीन सीमा पर गड़बड़ कर रहा है, आईटीबीपी के डीजी ने इसके बारे में कहा है वह खबर नहीं है और कांग्रेस की आलोचना को सिंगल कॉलम जगह दी गई है जबकि राहुल गांधी का विदेश दौरा उनका अधिकार है और भारत विरोधी गतिविधियों के लिए हो तो सरकार को पता लगाकर कार्रवाई करनी चाहिए न कि मीडिया में शोर मचाने से कुछ होने वाला है। जाहिर है, मकसद बदनाम करना है और यह कई साल से चल रहा है।
द टेलीग्राफ ने चीन से टकराव के मुद्दे पर प्रधानमंत्री से कांग्रेस के सवाल को लीड बनाया है। हिन्दुस्तान टाइम्स की लीड तेल की कीमत बढ़ने की खबर है लेकिन एसआईआर की गड़बड़ी और प्रदर्शन की खबर सेकेंड लीड है। इसके साथ छपी एक खबर के अनुसार, सीईसी विरोधी प्रदर्शन के लिए अक्तूबर में 57 एफआईआर दर्ज हुई है। टाइम्स ऑफ इंडिया में एसआईआर के खिलाफ प्रदर्शन की खबर नहीं है लेकिन चीन के कारण सीमा पर तनाव की खबर विदेश मंत्रालय के हवाले से लीड है। इंडियन एक्सप्रेस में भी अरुणाचल प्रदेश का तनाव लीड है लेकिन एसआईआर या सीईसी के खिलाफ आंदोलन की खबर नहीं दिखी। द हिन्दू में दोनों खबरें बराबर हैं। चीन की खबर लीड है तो आंदोलन की खबर तीन कॉलम की। जाहिर है, सरकार चीन सीमा पर और दिल्ली में सीईसी विरोधियों के आंदोलन के कारण फंसी हुई है और निकलने के उपाय नजर नहीं आ रहे हैं। अखबारों ने खबर ही नहीं दी है वह अलग बात है।

मैं रोज चार हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल दस, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। एआई का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।



