शंभु दयाल बाजपेयी-
अमर उजाला और टाइम्स आफ इंडिया जैसे अग्रणी अखबारों ने आज दैनिक जागरण और इसके प्रधान संपादक श्री संजय गुप्ता का नाम नहीं छापा।
श्री गुप्ता कल राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के नागपुर मुख्यालय में विजया दशमी पर हुए वार्षिक कार्यक्रम में मुख्य अतिथि थे। इन अखबारों ने संघ प्रमुख मोहन भागवत का इस अवसर पर हुआ भाषण तो बड़े सम्मान और प्रमुखता से प्रकाशित किया है लेकिन कार्यक्रम के मुख्य अतिथि का नाम और व्याख्यान पूरी तरह गोल कर गए।
यह कैसी पत्रकारिता और पत्रकारीय नीति- दृष्टि है ? मुख्य अतिथि इनके लिए इतना अस्पृश्य है तो इन अखबारों को कल के कार्यक्रम का ही बहिष्कार देना चाहिए था। और, कारण बता कर बहिष्कार करते तो साहसिक पत्रकारिता पर एक राष्ट्रव्यापी चर्चा का आधार भी बनता। क्या यह संघ के महत्वपूर्ण कार्यक्रम की अधूरी कवरेज देना नहीं है? दैनिक जागरण और संजय गुप्ता की पहचान पर इससे क्या फर्क पड़ेगा ? ऐसा कर इन अखबारों ने अपनी कुंठा ही जाहिर की है। इसे स्वस्थ संपादकीय सोच नहीं कहा जा सकता ।
संघ हर वर्ष किसी प्रमुख व्यक्ति को इस कार्यक्रम के मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित करता है। संभवत: यह पहला अवसर होगा जब कार्यक्रम के मुख्य अतिथि को किनारे कर अधूरी खबर दी गयी।
पोस्ट पर आए कुछ चुनिंदा कमेंट्स भी देखिए…
महेश शर्मा-
भले ही एक लाइन में छपे, पर नाम छापना चाहिए था।
हां, यह तो देना ही चाहिए था कि कौन मुख्य अतिथि था। न देने का आधार व्यावसायिक प्रतिद्वंदिता भी नहीं बनता।
-शंभु दयाल बाजपेयी
संजय त्रिपाठी-
खबर सर संघचालाक का अभिभाषण ही है। अब चूंकि मुख्य अतिथि देश के प्रतिदिन सर्वाधिक बिक्री वाले दैनिक जागरण हिंदी दैनिक से ही हैं, संभवतः संपादन में एडिट कर दिया गया, रिपोर्टर ने जरूर रिपोर्ट फाइल की होगी।
अजय मिश्रा-
आप वर्तमान पत्रकारिता के स्याह पक्ष को सामने लाए है इस दौर में तथ्यपरक निरपेक्ष पत्रकारिता कहीं पीछे छूट गई है। अब नफा नुक़सान का आकलन किए बिना समाचार पत्रों में यथार्थ और साहसिक लेखन विरले ही देखने को मिलता है!
कमल दुबे-
घटिया सोच है मालिकानो की, मुझे याद है कि क़रीब तीस साल पहले कानपुर के गीत होटल में एक नेता ने जागरण के एक पत्रकार पर एक ट्रक ईंट मुफ्त में मांगने का आरोप लगाया था। उस वक्त प्रमोद तिवारी जी जागरण के लोकल चीफ थे। उन्होंने न केवल उस नेता की प्रेस अटेंड की बल्कि जागरण में खबर भी छापी। ऐसे ही पूर्व प्रधान मंत्री अटल बिहारी वाजपेयी जी जब लखनऊ में राष्ट्रधर्म समचार पत्र के संपादक थे तो लखनऊ के चौक में मुसलमानों का बड़ा सम्मेलन था। जिसमें राष्ट्रधर्म को नहीं आमंत्रित किया गया था क्योंकि यह संघ का अखबार था। अटल जी ने किसी तरह आमंत्रण पत्र का जुगाड़ किया और सम्मेलन को वह खुद कवर करने गए। उन्होंने मुस्लिम समाज के इस सम्मेलन को प्रमुखता से राष्ट्रधर्म में प्रकाशित किया। जिसकी खूब तारीफ हुई। यह थी जीवंत पत्रकारिता। अब तो पत्रकारिता मर चुकी है।
मूल खबर…
RSS के विजयादशमी कार्यक्रम में खाकी पैंट में दिखे दैनिक जागरण वाले संजय गुप्त!

