अखबारों के कारोबार पर दोहरी मार पड़ रही है। एक तरफ न्यूजप्रिंट यानी अखबारी कागज की कीमतें तेजी से बढ़ रही हैं, तो दूसरी तरफ विज्ञापन से होने वाली कमाई में गिरावट ने प्रकाशकों की चिंता बढ़ा दी है। ऐसे में अखबारों के सामने बढ़ती लागत को संभालने, विज्ञापन से कमाई बढ़ाने और पाठकों के लिए अखबार की कीमत किफायती बनाए रखने की चुनौती है।
देश के बड़े मीडिया समूह डीबी कॉर्प के हालिया वित्तीय नतीजे इस चुनौती की एक तस्वीर पेश करते हैं। कंपनी के डायरेक्टर गिरीश अग्रवाल और डिप्टी मैनेजिंग डायरेक्टर पवन अग्रवाल ने 16 अक्टूबर को निवेशकों और विश्लेषकों के साथ कॉन्फ्रेंस कॉल में बताया कि पिछले साल कंपनी न्यूजप्रिंट के लिए औसतन 47,000 रुपये प्रति टन खर्च कर रही थी, जो अब बढ़कर करीब 57,000 रुपये प्रति टन हो गया है। यानी कंपनी की औसत खरीद लागत में लगभग 20.8 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है।
न्यूजप्रिंट की महंगाई के पीछे भू-राजनीतिक परिस्थितियां, आयातित कागज की बढ़ती कीमतें और माल ढुलाई का खर्च प्रमुख कारण बताए गए हैं। भारत में न्यूजप्रिंट की पूरी जरूरत घरेलू उत्पादन से पूरी नहीं होती, इसलिए अखबार प्रकाशकों को आयात पर भी निर्भर रहना पड़ता है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतें बढ़ने या आपूर्ति प्रभावित होने का असर घरेलू बाजार पर भी पड़ता है।
सरकारी थोक मूल्य सूचकांक के मुताबिक, सितंबर 2026 में न्यूजप्रिंट का मूल्य सूचकांक पिछले साल के इसी महीने की तुलना में 16.38 प्रतिशत अधिक था। वहीं, इंडियन न्यूजपेपर सोसायटी (INS) ने अगस्त में दावा किया था कि मार्च के बाद घरेलू न्यूजप्रिंट की कीमतों में 30 से 40 प्रतिशत तक बढ़ोतरी हुई है। हालांकि, ये अलग-अलग आधार और अवधि के आंकड़े हैं, इसलिए इन्हें सीधे एक-दूसरे के बराबर नहीं माना जा सकता। डीबी कॉर्प की खरीद लागत में हुई बढ़ोतरी भी कंपनी का अपना आंकड़ा है, पूरे उद्योग का औसत नहीं।
घरेलू न्यूजप्रिंट निर्माता भी लागत और आपूर्ति की चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। इंडियन न्यूजप्रिंट मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन ने कोयले की आपूर्ति में अनियमितता का मुद्दा उठाया है। संगठन के मुताबिक, पर्याप्त कोयला नहीं मिलने के कारण कुछ निर्माताओं को खुले बाजार से महंगा ईंधन खरीदना पड़ रहा है, जिससे उत्पादन लागत बढ़ रही है। इसका असर घरेलू बाजार में कागज की उपलब्धता पर भी पड़ सकता है।
अखबार उद्योग की मुश्किलें सिर्फ लागत बढ़ने तक सीमित नहीं हैं। INS की वार्षिक रिपोर्ट के मुताबिक, उसके सदस्य प्रकाशनों का विज्ञापन कारोबार 2024 में 15,316.39 करोड़ रुपये था, जो 2025 में घटकर 14,773.74 करोड़ रुपये रह गया। इस तरह इसमें करीब 3.54 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई। विज्ञापन से कमाई में कमी और न्यूजप्रिंट की बढ़ती लागत एक साथ होने से प्रकाशकों के मुनाफे पर दबाव पड़ सकता है।
डीबी कॉर्प के नतीजों में भी विज्ञापन कारोबार में गिरावट दिखाई दी। कंपनी की दूसरी तिमाही में विज्ञापन से आय 439 करोड़ रुपये से घटकर 411 करोड़ रुपये रह गई, जबकि प्रसार से मिलने वाला राजस्व 121 करोड़ रुपये से घटकर 116 करोड़ रुपये हो गया। हालांकि, कंपनी प्रबंधन ने स्पष्ट किया कि नवरात्र की तारीखों में बदलाव के कारण लगभग 40 करोड़ रुपये का विज्ञापन कारोबार अगली तिमाही में चला गया। इसलिए तिमाही की गिरावट को केवल न्यूजप्रिंट की महंगाई या विज्ञापन बाजार की कमजोरी से जोड़ना सही नहीं होगा।
बढ़ती लागत के बीच अखबारों की कीमत बढ़ाने का सवाल भी अहम है। डीबी कॉर्प के प्रबंधन ने फिलहाल कवर प्राइस बढ़ाने से परहेज करने की बात कही है। कंपनी का मानना है कि अखबार महंगा होने से उसकी प्रसार संख्या पर और असर पड़ सकता है। इसलिए कंपनी कागज की खरीद और दूसरे खर्चों को नियंत्रित करने के साथ विज्ञापन से अधिक कमाई करने के विकल्प तलाश रही है।
इसके तहत विज्ञापनदाताओं को पहले पेज और अन्य प्रमुख पेजों पर विज्ञापन देने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है, ताकि विज्ञापन की बेहतर कीमत मिल सके। कंपनी डिजिटल कारोबार में विज्ञापन, सशुल्क सब्सक्रिप्शन और तकनीकी कंपनियों के साथ साझेदारी के जरिए भी कमाई बढ़ाने की कोशिश कर रही है।
डीबी कॉर्प को उम्मीद है कि वित्त वर्ष की तीसरी और चौथी तिमाही में न्यूजप्रिंट की कीमतों में 2 से 3 प्रतिशत तक नरमी आ सकती है। हालांकि, यह कंपनी प्रबंधन का अनुमान है, कोई निश्चित भविष्यवाणी नहीं। कीमतों का वास्तविक रुख अंतरराष्ट्रीय बाजार, आयात लागत, घरेलू उत्पादन और आपूर्ति की स्थिति पर निर्भर करेगा।
कुल मिलाकर, न्यूजप्रिंट की बढ़ती कीमतों ने अखबार उद्योग के सामने लागत और कमाई के बीच संतुलन बनाने की चुनौती खड़ी कर दी है। प्रकाशकों के लिए एक ओर कागज की बढ़ती कीमतों का सामना करना जरूरी है, तो दूसरी ओर विज्ञापन कारोबार को मजबूत बनाए रखना और पाठकों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ डालने से बचना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
पवन अग्रवाल का वर्जन: राजस्व, मुनाफा और लागत नियंत्रण
डीबी कॉर्प के डिप्टी मैनेजिंग डायरेक्टर पवन अग्रवाल ने वित्त वर्ष 2026-27 की दूसरी तिमाही के वित्तीय नतीजों की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि सितंबर 2026 को समाप्त तिमाही में कंपनी का कुल समेकित राजस्व 614 करोड़ रुपये रहा, जबकि पिछले साल इसी अवधि में यह 635 करोड़ रुपये था।
कंपनी का कर चुकाने के बाद मुनाफा 93 करोड़ रुपये से घटकर 69 करोड़ रुपये रह गया। हालांकि, एबिटा 115 करोड़ रुपये से बढ़कर 124 करोड़ रुपये हो गया।
पवन अग्रवाल के मुताबिक, दूसरी तिमाही में विज्ञापन से कंपनी की आय 439 करोड़ रुपये से घटकर 411 करोड़ रुपये रही। वहीं, अखबारों की प्रसार संख्या से होने वाला राजस्व 121 करोड़ रुपये से घटकर 116 करोड़ रुपये पर आ गया।
उन्होंने बताया कि वित्त वर्ष की पहली छमाही में कंपनी का कुल राजस्व पिछले साल के 1,222 करोड़ रुपये से बढ़कर 1,246 करोड़ रुपये हो गया। इस दौरान विज्ञापन से आय भी 832 करोड़ रुपये से बढ़कर 843 करोड़ रुपये रही। हालांकि, शुद्ध मुनाफा 174 करोड़ रुपये से घटकर 169 करोड़ रुपये रह गया।
पवन अग्रवाल ने कहा कि कंपनी विज्ञापनदाताओं के साथ संबंध मजबूत करने और प्रमुख बाजारों में अपनी स्थिति बनाए रखने पर ध्यान दे रही है। बढ़ती लागत के असर को कम करने के लिए खरीद प्रक्रिया में सुधार, खर्चों पर नियंत्रण और न्यूजप्रिंट के बेहतर प्रबंधन पर भी काम किया जा रहा है।
डिजिटल कारोबार को भविष्य में वृद्धि का महत्वपूर्ण माध्यम बताते हुए उन्होंने कहा कि कंपनी कंटेंट, तकनीक और उपयोगकर्ताओं के अनुभव को बेहतर बनाने पर ध्यान दे रही है।
गिरीश अग्रवाल का बयान: विज्ञापन बाजार, अखबारी कागज और डिजिटल कारोबार
डीबी कॉर्प के डायरेक्टर गिरीश अग्रवाल ने विज्ञापन बाजार की स्थिति, न्यूजप्रिंट की बढ़ती कीमत, अखबारों की प्रसार संख्या और डिजिटल कारोबार की योजनाओं पर अपनी बात रखी। गिरीश अग्रवाल ने बताया कि नवरात्र के समय में बदलाव के कारण दूसरी तिमाही के विज्ञापन कारोबार की सालाना तुलना प्रभावित हुई है। पिछले साल नवरात्र सितंबर में था, जबकि इस बार अक्टूबर में पड़ा। इस बदलाव के चलते लगभग 40 करोड़ रुपये का विज्ञापन कारोबार दूसरी तिमाही से तीसरी तिमाही में चला गया।
उन्होंने कहा कि त्योहारों के दौरान विज्ञापन कारोबार की रफ्तार अच्छी है। कंपनी को उम्मीद है कि पूरे वित्त वर्ष में विज्ञापन राजस्व में एकल अंक की ऊपरी वृद्धि से लेकर शुरुआती दोहरे अंक तक की वृद्धि हासिल की जा सकती है।
हालांकि, उन्होंने मानसून, भू-राजनीतिक परिस्थितियों और कुछ राज्यों में पंचायत चुनावों के कारण लागू आचार संहिता को विज्ञापन कारोबार के लिए चुनौती बताया।
न्यूजप्रिंट की कीमत में 21 प्रतिशत की वृद्धि
गिरीश अग्रवाल के अनुसार, अखबारी कागज की औसत कीमत पिछले साल के लगभग 47,000 रुपये प्रति टन से बढ़कर 57,000 रुपये प्रति टन हो गई है। इस तरह इसकी कीमत में करीब 21 प्रतिशत की वृद्धि हुई है।
उन्होंने इसके लिए भू-राजनीतिक परिस्थितियों, आयातित कागज की महंगाई और माल ढुलाई की बढ़ती लागत को जिम्मेदार बताया।
कंपनी को तीसरी और चौथी तिमाही में न्यूजप्रिंट की कीमतों में 2-3 प्रतिशत तक नरमी आने की उम्मीद है। इसके बावजूद चालू वित्त वर्ष की तीसरी तिमाही में इसकी लागत पिछले साल के मुकाबले 18-20 प्रतिशत अधिक रह सकती है।
अखबारों की प्रसार संख्या लगभग 38 लाख
गिरीश अग्रवाल ने बताया कि डीबी कॉर्प के अखबारों की प्रसार संख्या लगभग 38 लाख प्रतियां है। उन्होंने चर्चा के दौरान इसका आंकड़ा 37.68 लाख बताया। उन्होंने स्वीकार किया कि कोविड के दौरान कम हुई प्रसार संख्या वापस हासिल करने के बाद कंपनी को आगे वृद्धि करने में कठिनाई हो रही है। कंपनी की प्राथमिकता प्रमुख बाजारों में अपनी स्थिति बनाए रखने और पाठकों के साथ जुड़ाव बढ़ाने की है।
अखबारों की कीमत बढ़ाने की योजना पर उन्होंने कहा कि फिलहाल कंपनी ऐसा नहीं करना चाहती। उनके मुताबिक, कीमत बढ़ाने से प्रसार संख्या में और गिरावट आ सकती है और अखबार आम परिवारों के लिए महंगा हो सकता है।
डिजिटल सब्सक्रिप्शन और ऐप पर फोकस
गिरीश अग्रवाल ने बताया कि कंपनी अपने डिजिटल ऐप के सब्सक्रिप्शन मॉडल में भी प्रयोग कर रही है। इसके तहत सब्सक्रिप्शन की कीमत 149 रुपये से बढ़ाकर 199 रुपये करने का परीक्षण किया गया है। अलग-अलग जगहों पर अन्य कीमतों को भी आजमाया जा रहा है।
उन्होंने कहा कि डिजिटल कारोबार में विज्ञापन, पेड सब्सक्रिप्शन और तकनीकी कंपनियों के साथ साझेदारी के जरिए कमाई बढ़ाने की योजना है।
डिजिटल ऐप के मासिक सक्रिय उपयोगकर्ताओं की संख्या में गिरावट के सवाल पर उन्होंने बताया कि कंपनी ने मार्केटिंग पर खर्च कम किया है, जिसका असर उपयोगकर्ताओं की संख्या पर पड़ा है। कंपनी अब अपने कंटेंट और ब्रांड की विश्वसनीयता के आधार पर पाठकों को जोड़ने पर ध्यान दे रही है।
यूपी विधानसभा चुनाव से उम्मीद
गिरीश अग्रवाल ने आगामी उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव को डिजिटल कारोबार के लिए अवसर बताया। उन्होंने कहा कि राज्य में कंपनी की डिजिटल पहुंच और जमीनी समाचार कवरेज का नेटवर्क मजबूत है। चुनाव के दौरान डिजिटल सब्सक्राइबर बढ़ने की उम्मीद है, हालांकि उन्होंने विज्ञापन से होने वाली संभावित कमाई का कोई निश्चित आंकड़ा नहीं दिया। गिरीश अग्रवाल के मुताबिक, डीबी कॉर्प के पास नकदी और बैंक जमा के रूप में करीब 1,120 करोड़ रुपये हैं। कंपनी को अगले चार से पांच तिमाहियों में किसी बड़े पूंजीगत खर्च की जरूरत नहीं दिख रही है। आगे लाभांश देने का फैसला कंपनी का बोर्ड करेगा।

