संजय कुमार सिंह-
लिखा हुआ भाषण इतना घटिया, लानत है!
नरेन्द्र मोदी ने एनडीटीवी वर्ल्ड समिट में जो कहा उसे पवन खेड़ा ने शाहरुख खान की शैली में क-क-क-कांग्रेस को लेकर सनक कहा है। आप नरेन्द्र मोदी से या पवन खेड़ा से असहमत हो सकते हैं। मुद्दा यह है कि देश का प्रधानमंत्री एक वर्ल्ड समिट में देश के एक ऐसे नेता के बारे में बोलने को मजबूर है जो उन्हीं के शब्दों में अभी लांच नहीं हुआ है। पहले पप्पू हुआ करता था। लांच करने की कोशिश श्रीहरिकोटा से होने वाले लांच से ज्यादा है आदि। यह सब तथ्यात्मक रूप से सही और बहुत शानदार व बुद्धिमत्ता पूर्ण भी हो तो लिखकर पढ़ा गया।
इसलिए, मेरा मुद्दा दूसरा है। मौका क्या था और प्रधानमंत्री क्या बोल रहे थे। सामान्य तौर पर यह संभव है। आप इसे स्वाभाविक भी कह सकते हैं। कभी-कभी हो जाता है। लेकिन 12 साल कुर्सी तोड़ने के बाद भी? लिखा हुआ भाषण इतना लचर या विषय से अलग? कौन लिख रहा है और अभी तक कैसे लिख रहा है। ठीक है कि राजधर्म का पालन नहीं करना है लेकिन दुनिया के लिए वर्ल्ड समिट में तो गंभीर दिखना चाहिए। इसे सुनकर लग रहा है कि सिस्टम में ही कुछ गड़बड़ है।
प्रधानमंत्री निशिकांत दुबे या गिरिराज सिंह नहीं हैं। अच्छे या बड़े ट्रोल भी नहीं हैं। उनका भाषण मौके और विषय के अनुकूल होना चाहिए। उनका काम मनोरंजन करना या कुंठा निकालना नहीं है। वे जो बोलते हैं वह देश की बात होती है और देश अगर राहुल गांधी में ही उलझा रहेगा तो काम कैसे करेगा। ठीक है कि पीछे मुड़कर देखने पर यही लगता है कि प्रधानमंत्री राहुल गांधी में ही उलझे रह गए हैं। हमलोग समझ रहे थे वे चुनाव जीतने में लगे या लगाए गए हैं पर वे कुर्सी बचाने में लगे थे।
एक अच्छे भाषण लेखक का काम मौका और विषय के संदर्भ में भाषण लिखना होता है। सत्तारूढ़ पार्टी के नेता का चुनावी भाषण वर्ल्ड समिट में पढ़ दिया जाए तो निश्चित रूप से हंसी उड़ेगी और गलती केवल उनकी नहीं है। मामला पूरी टीम या पार्टी या परिवार का है। कुछ तो स्तर हो, शुरू में नहीं था अब 12 साल हो गए हैं। अब तो पार्टी और कुर्सी से ऊपर उठिए, देश का ख्याल कीजिए। घटिया भाषण उनकी नहीं, पूरी टीम की कमजोरी है। राहुल गांधी पर हमला ही था करना था को उसका भी स्तर हो।
सोशल मीडिया पर शेयर होने से बात नहीं बनेगी। सबको पता है कि आपके पास सांसदों का बहुमत है, ट्रोल हैं, समर्थक प्रचारक हैं और किसी से खुश हो जाएं तो उसे माला माल करने के कई उपाय हैं। इसलिए कंटेंट बेहतर होना चाहिए। और उसपर ज्यादा खर्च करने की भी जरूरत नहीं है। हिन्दी में लिखने वाले वैसे भी सस्ते में मिल जाएंगे। जरूरी नहीं है कि भाषण लिखने वाला कोई बड़ा आदमी हो, अच्छा लिखकर बड़ा बने तो देश के लिए बढ़िया होगा।



