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महाराष्ट्र

भाजपा समर्थित पत्रकार सबको मैनेज करने की बात कर रहा है; फिर महाराष्ट्र के अखबार खामोश क्यों हैं?- सुषमा अंधारे

Woman in a colorful sari raising her right hand while speaking at a podium, gesture of greeting or pledge.

विक्रांत पाटील-

मुंबई: मराठा आरक्षण आंदोलन के नेता मनोज जरांगे पाटील द्वारा जारी की गई 30-32 मिनट की कथित ऑडियो क्लिप को लेकर शिवसेना प्रवक्ता (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) प्रो. सुषमा अंधारे ने आज एक तीखी प्रतिक्रिया दी है। अंधारे ने कहा कि उन्होंने दो दिन पहले डेढ़ मिनट का हिस्सा सुना था, आज पूरी ऑडियो सुनी तो स्तब्ध रह गईं।

अपने सोशल मीडिया पोस्ट में अंधारे ने आरोप लगाया है कि इस ऑडियो में पत्रकार सुशील कुलकर्णी, भाजपा नेता अतुल भातखळकर और भाजपा की परसेप्शन टीम से जुड़ी श्वेता शालिनी समेत कई लोग चर्चा कर रहे हैं कि –

  1. उद्धव ठाकरे के खिलाफ फेक नैरेटिव कैसे बनाया जाए।
  2. उदयनराजे भोसले जैसे नेता को भी मैनिपुलेट किया जा सकता है।
  3. वाधवन बंदरगाह जैसे प्रोजेक्ट्स का विरोध करने वालों को देश-विरोधी बताकर, उन्हें अमेरिका या चीन से फंडिंग मिल रही है, ऐसा नैरेटिव अखबारों के जरिए कैसे फैलाया जाए।

अंधारे ने सवाल उठाया, “सुशील कुलकर्णी जिस आत्मविश्वास से कहता है कि हम विभिन्न अखबारों को मैनिपुलेट कर सकते हैं, उसके खिलाफ अखबारों को ही मोर्चा खोलना चाहिए था, क्योंकि यह उनकी विश्वसनीयता का सवाल है। भाजपा का एक पत्रकार सबको मैनेज करने की बात कर रहा है, फिर महाराष्ट्र में अखबारों की चुप्पी क्यों है?”

अंधारे ने यह भी कहा कि इस ऑडियो में उनका भी नाम लेकर चरित्रहनन की कोशिश की गई है। उन्होंने लिखा, “जब किसी महिला को किसी हमले से हराया नहीं जा सकता, तो उसके चरित्र पर हमला करना इस पुरुषवादी मानसिकता का रामबाण इलाज होता है।”

इस ऑडियो में सबसे गंभीर दावा श्वेता शालिनी द्वारा किया गया है, जिसमें वह कहती हैं कि “जरांगे को शिंदे ने 500 करोड़ रुपये दिए, वो 500 करोड़ भाजपा से लेकर दिए।” इसी 500 करोड़ वाले दावे पर अब मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने फॉरेंसिक जांच के आदेश दिए हैं, जबकि शिवसेना सांसद श्रीकांत शिंदे ने कहा है कि “यह पैसा अभी तक मेरे पास पहुंचा ही नहीं, मैं भी इसकी तलाश कर रहा हूं।”

अंधारे ने अंत में कहा कि यह ऑडियो बताता है कि कैसे एक बड़े जन आंदोलन को बदनाम करने के लिए सुपारी लेकर नैरेटिव सेट किया जाता है। “कुल्हाड़ी में लकड़ी का हत्था होता है, वही इतिहास दोहराया जा रहा है।”


सुषमा अंधारे की मूल पोस्ट (मराठी से हिंदी अनुवाद) पढ़िए-

दो दिन पहले मैंने सिर्फ डेढ़ मिनट की एक ऑडियो क्लिप सुनी थी। आज पूरी 30-32 मिनट की ऑडियो सुनी… सुनकर ऐसा लगा जैसे मैं बहरी हो गयी हूं।

उदयनराजे को भी हम अपने हिसाब से प्रभावित कर सकते हैं, उन्हें अपने मुताबिक इस्तेमाल कर सकते हैं, ऐसा सोचने की हद तक बेहद घटिया मानसिकता वाले सुशील कुलकर्णी की हिम्मत पहुंच गई है। यह कुलकर्णी का घमंड है या उदयनराजे का अपमान? उदयनराजे या उनके समर्थक इस पर बिल्कुल भी प्रतिक्रिया नहीं दे रहे हैं। आखिर उनकी ऐसी क्या मजबूरी है? उदयनराजे की जिस तरह की छवि सोशल मीडिया पर उनके समर्थकों की ओर से पेश की जाती है, उसे देखकर तो ऐसा लगता था कि अब तक मराठा समाज के लोग सुशील कुलकर्णी का स्टूडियो तोड़कर उसकी अच्छी-खासी पिटाई कर चुके होते।

इस ऑडियो क्लिप में सुशील कुलकर्णी और अतुल भातखलकर बेहद बेशर्मी से उद्धव साहब के खिलाफ फर्जी नैरेटिव कैसे तैयार किया जाए, इस पर चर्चा करते हैं। उद्धव साहब जैसे शांत, सज्जन और सीधे-सादे व्यक्ति को बदनाम करने के लिए किस तरह की साजिशें रची जा सकती हैं, इस पर वे हंसते हुए और बेफिक्र होकर बात करते हैं। यह कितनी गुस्सा दिलाने वाली बात है!

सुशील कुलकर्णी कहता है कि बालासाहेब तुम्हारे पिता होंगे, मेरे पिता तो बापूसाहेब हैं। दरअसल, शुरुआत में यह सुशील रेणापुरकर उपनाम लगाता था। लेकिन जब उसे लगा कि रेणापुरकर उपनाम के साथ उसे कुलकर्णी उपनाम से मिलने वाला विशेषाधिकार नहीं मिल पाएगा, तो इस बेहद चालाक व्यक्ति ने अपना उपनाम रेणापुरकर से बदलकर कुलकर्णी कर लिया।

वाढवण बंदरगाह हो या बारसू रिफाइनरी जैसी कई परियोजनाओं के नाम पर लोगों को विस्थापित करने का मामला, इन मुद्दों पर जो भी विरोध में खड़ा होगा, उसे देशविरोधी करार दिया जा सकता है। उसे अमेरिका या चीन से फंडिंग मिलती है, ऐसा नैरेटिव हम लोगों के मन में बैठा सकते हैं और इसके लिए अलग-अलग अखबारों को अपने हिसाब से प्रभावित कर सकते हैं। कुलकर्णी जिस आत्मविश्वास से यह सब कहता है, वह चौंकाने वाला है।

दरअसल, अखबारों को उसके खिलाफ आवाज उठानी चाहिए थी, क्योंकि यह उनकी अपनी विश्वसनीयता का भी सवाल है।

इस पूरे मामले में मेरे नाम का भी उल्लेख है। जब कोई महिला किसी भी हमले से हार नहीं मानती, तो यहां की पुरुषवादी मानसिकता के लोग उसके चरित्र पर हमला करना ही सबसे कारगर उपाय समझते हैं। कुलकर्णी जैसी घटिया प्रवृत्ति के लोगों के लिए ऐसा करना आसान लगता है।

हालांकि, इस पूरे मामले में एक बात अच्छी भी महसूस हुई। दूसरे लोगों को तो आप अपने हिसाब से प्रभावित कर सकते हैं, लेकिन अंधारे को प्रभावित करना संभव नहीं है। जब कोल्हे को अंगूर खट्टे लगने लगें, तो वह क्या करे? अगर अंधारे आपके विचारों, आपकी साजिशों और आपकी योजनाओं में शामिल होने को तैयार नहीं हैं, तो उनका चरित्रहनन करने में आपको क्या जाता है?

सुशील कुलकर्णी के अब तक के कई वीडियो देख लीजिए। अपने असफल करियर का दर्द दिल में लिए यह व्यक्ति बेहद घटिया स्तर की पत्रकारिता के सहारे भाजपा का पट्टा गले में बांधे घूमता है। वह खुद को भाजपा प्रवक्ताओं का गुरु कहलवाता है और भाजपा का प्रवक्ता भी रोटी का टुकड़ा खाते हुए कई लोगों से बैठकों में कहता है कि कुलकर्णी जी मेरे गुरु हैं।

कुल मिलाकर, ये सभी लोग अपनी असलियत और अपनी हैसियत खुद ही दिखा रहे हैं।

श्वेता शालिनी जैसी महिला, जो भाजपा के लिए लोगों के बीच धारणा बनाने का काम करती हैं, बैठक में कहती हैं कि अब तक आप लोग फर्जी नैरेटिव पर बात कर रहे हैं, लेकिन हमें एक वास्तविक बात भी कहनी चाहिए।

इसके बाद वह गंभीर आरोप लगाते हुए कहती हैं कि एकनाथ शिंदे ने मनोज जरांगे को 500 करोड़ रुपये दिए। ये 500 करोड़ रुपये भाजपा से लेकर दिए गए।

यह एक गंभीर आरोप है।

शिंदे की ओर से जरांगे को 500 करोड़ रुपये दिए गए या नहीं, इस पर शिंदे खेमे के कई लोग चर्चा कर रहे हैं। भाजपा के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस कहते हैं कि हम इस ऑडियो क्लिप की जांच करेंगे। लेकिन वे स्पष्ट रूप से यह नहीं कहते कि हमने पैसे दिए ही नहीं।

आखिर कौन किसका खेल बिगाड़ रहा है?

बिना किसी संबंध के भी लोगों को बार-बार यह बताया जाए कि मनोज जरांगे का आंदोलन शरद पवार चलाते हैं या उसे उद्धव ठाकरे का समर्थन प्राप्त है, और अलग-अलग यूट्यूब चैनलों के जरिए इस झूठ को लगातार फैलाया जाए—इस तरह की रणनीति खुलेआम बनाई जाती है।

मराठों! क्या आपको एक बात समझ में आती है? सुशील कुलकर्णी हो, अतुल भातखलकर हो, श्वेता शालिनी हो या अतुल लिमये—ये तथाकथित लोग, जो खुद को वर्ण व्यवस्था में श्रेष्ठ समझने की मानसिकता से ग्रस्त हैं, इस पूरी कवायद के जरिए यह संदेश देना चाहते हैं कि मराठा भले ही शक्तिशाली हों, लेकिन वे अपना दिमाग इस्तेमाल नहीं कर सकते।

वे यह दिखाना चाहते हैं कि हम मराठों के दिमाग को भ्रमित कर सकते हैं और उन्हें उनके अपने नेताओं के खिलाफ आसानी से खड़ा कर सकते हैं।

दुर्भाग्य से, इस साजिश को रचने में वे कुछ हद तक सफल भी हुए हैं।

लगभग 30 मिनट की इस ऑडियो क्लिप को सुनने के बाद समझ में आता है कि एक बहुत बड़ा आंदोलन खड़ा होने के बाद उसे बदनाम करने के लिए पैसे लेकर काम करने वाले लोग सामने आ जाते हैं। यह बात एक बार फिर स्पष्ट होती है कि कुल्हाड़ी का हत्था भी अपने ही कुनबे का होता है और वही अपने लोगों का विनाश करता है।

कितनी गंदी मानसिकता है!

मनोज जरांगे ने पैसे खाए, यहां तक कि जरांगे के फार्महाउस पर औरतें आया करती थीं—इस तरह की बातें करने वाली महिलाएं भी मराठा समाज से ही तैयार की जाती हैं। आखिर वे अपने इस पाप का प्रायश्चित कहां करेंगी?

जब हमला बाहर से होता है, तो व्यक्ति साहस के साथ उसका मुकाबला करने की हिम्मत रखता है। लेकिन जब भीतर से ही विद्रोह और विश्वासघात होने लगे, तो व्यक्ति टूट जाता है।

इस ऑडियो क्लिप से यही स्पष्ट होता है कि पुष्यमित्र शुंग की प्रवृत्ति अब तक समाप्त नहीं हुई है। एकनाथ शिंदे और देवेंद्र फडणवीस के मुखौटे उतर गए हैं और उनके भयावह चेहरे सामने आ गए हैं।

अब तो जाग जाइए, भाइयों!

ऑडियो क्लिप सुनकर हर किसी को समझ में आ जाता है कि यह क्लिप असली है। इसमें किस-किसकी आवाज है, यह भी लोगों की समझ में आ जाता है। लेकिन सत्ताधारी लोगों के लिए इस ऑडियो क्लिप को झूठा साबित करने में एक पल भी नहीं लगेगा।

अब आपको तय करना है कि आप इस साजिश को भूल जाना चाहते हैं या इसे याद रखना चाहते हैं।

लेकिन एकनाथ शिंदे और देवेंद्र फडणवीस, आप दोनों एक बात जरूर याद रखिए…

मूल खबर…

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