सुप्रिय प्रसाद बने आजतक के मैनेजिंग एडिटर

टीवी टुडे ग्रुप के न्यूज चैनल आजतक के हेड सुप्रिय प्रसाद को कंपनी ने प्रमोशन का तोहफा दिया है। सुप्रिय प्रसाद अब आजतक के मैनेजिंग एडिटर बन गए हैं। अब तक सुप्रिय प्रसाद चैनल में एक्जीक्यूटिव एडिटर के पद पर काम कर रहे थे। चैनलों की गलाकाट प्रतियोगिता में आजतक को लगातार नंबर वन बनाए रखने के चलते ही सुप्रिय को टीवी टुडे ग्रुप ने ये इनाम दिया है। सुप्रिय प्रसाद ने आजतक चैनल में पिछले साल सितंबर महीने में एक्जीक्यूटिव एडिटर के तौर पर ज्वाइन किया था।

उन्हें कंपनी ने आजतक के आउटपुट हेड की जिम्मेदारी सौंपी थी। उन दिनों आजतक की साख गिर रही थी। चैनल तो कई हफ्ते टीआरपी में तीसरे स्थान तक भी पहुंच गया था। सुप्रिय के कार्यभार संभालने के बाद से आजतक भी संभला, पहले नंबर पर पहुंचा। सुप्रिय की अगुवाई में न सिर्फ आजतक की साख लौटी, बल्कि नंबर वन की पोजीशन भी बरकरार रही। आजतक में सुप्रिय की ये दूसरी पारी है। इससे पहले वे करीब 11 साल तक आजतक से जुड़े रहे थे। 2007 में उन्होंने न्यूज 24 में बतौर डायरेक्टर न्यूज ज्वाइन किया था। वहां करीब चार साल की दमदार पारी खेलने के बाद सुप्रिय ने इस्तीफा दिया था। उसके बाद सितंबर में वे फिर आजतक में लौट आए। आजतक के न्यूज डायरेक्टर कमर वहीद नकवी के रिटायर होने के बाद टीवी टुडे प्रबंधन ने सुप्रिय को आजतक चैनल के हेड की जिम्मेदारी सौंपी थी। और अब सुप्रिय प्रसाद मैनेजिंग एडिटर बन गए हैं। उल्लेखनीय है कि सुप्रिय प्रसाद ने अपने इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का करियर भी आजतक से ही शुरू किया था।

 

अनिल सिंह की जमानत 10 सितंबर तक टली

भड़ास4मीडिया के कंटेंट एडिटर अनिल सिंह की जमानत 10 सितंबर तक टल गई है। अनिल को जमानत देने का विरोध करते हुए सरकारी वकील ने दलील दिया कि पुलिस से केस डायरी नहीं मिली है।

वकील ने अदालत से मांग किया कि केस डायरी नहीं मिलने तक अनिल के मामले की सुनवाई न की जाए। इसको देखते हुए अदालत ने जमानत खारिज करते हुए इसे अगली तारीख 10 सितंबर को दी है। गौरतलब है कि अनिल को पिछले दिनों पुलिस ने सूरजपुर कोर्ट से तब गिरफ्तार कर लिया था, जब वो यशवंत सिंह की पैरवी करने अदालत पहुंचे थे। यशवंत सिंह पहले से ही जेल में हैं। यशवंत सिंह के जेल में रहने पर भड़ास4मीडिया का सारा काम अनिल ही संभाल रहे थे।


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जी न्यूज छोड़ने के बाद लाइव इंडिया को हेड करेंगे सतीश के. सिंह

जी न्यूज से एडिटर के पद से इस्तीफा दे चुके वरिष्ठ पत्रकार सतीश के. सिंह ने लाइव इंडिया ज्वाइन कर लिया है। वह चैनल से बतौर एडिटर-इन-चीफ के रूप में जुड़े है। सतीश सिंह ने 1993 में एक अंग्रेजी पत्रिका के साथ अपने पत्रकारिता कॅरियर की शुरुआत की थी। इसके बाद वे नलिनी सिंह के प्रोजेक्ट ‘हेलो जिंदगी’ के साथ जुड़ गए। फिर डीडी न्यूज़ में कुछ दिनों तक काम किया। 1996 में वह ‘ज़ी न्यूज़’ के साथ जुड़ गए, जहां पर वे 2005 तक रहे। एनडीटीवी में वह 2007 तक बतौर सीनियर आउटपुट, एडिटर जुड़े रहे। सतीश के. सिंह ने 2007 में दुबारा ज़ी न्यूज का दामन थामा। तब उन्होंने चैनल में बतौर एडिटर काम संभाला। यहां से हाल में उन्होनें इस्तीफा देकर लाइव इंडिया ज्वाइन किया है। इसी ग्रुप से एक अन्य खबर यह है कि ग्रुप के मराठी चैनल मी मराठी को मंदार परब हेड करेगें। परब ने झी 24 तास के एडिटर-इन-चीफ के पद से इस्तीफा दिया था। एक अन्य खबर में कुछ ही दिन पूर्व लाइव इंडिया से ही इस्तीफा देकर सुधीर चौधरी को जी न्यूज के एडिटर कम बिजनेस हेड बनाया गया है।
 

अब यूपी औऱ एमपी में भी दिखेगा जन टीवी

राजस्थान की कम्प्यूकॉम सॉफ्टवेयर लिमिटेड कंपनी के दो नये न्यूज चैनल जन टीवी और जन टीवी प्लस अब यूपी और एमपी में भी दिखेंगे। प्रबंधन जल्दी ही इन दोनो प्रदेशों में डिस्टिब्यूशन और कंटेट के लिहाज से रिजनल आफिस खोलने का विचार कर रहा है। चैनल पर उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश की खबरों को ज्यादा प्रमुखता दी जाएगी। दोनों चैनल न्यूज और इंफोटेन्मेन्ट पर फोकस करेंगे।

जन टीवी  शिक्षा, रोज़गार, कृषि, स्वास्थ्य एवं पर्यटन पर कई कार्यक्रम दिखा रहा है। इसमें चैनल पर प्रसारित होने वाले मुख्य कार्यक्रमों में न्यूज एक्स्प्रेस, हंसी का पिटारा, आज की सुर्खियां, क्राइम रिपोर्टर, रंग रंगीला राजस्थान, योग से निरोग, कम्प्यूटर शाला, लर्न विद फन आदि कार्यक्रमों को दिखाया जा रहा है। कंपनी के प्रबंध निदेशक एस. के. सुराणा हैं।
 

आईबीएन 7 ने साक्षी जोशी को निकाला

साक्षी जोशी को आईबीएन 7 से निकाल दिया गया है। जोशी आईबीएन 7  में बतौर एंकर नौकरी कर रही थीं। वह इंडिया टीवी के मैनेजिंग एडिटर विनोद कापड़ी की पत्नी हैं। पिछले दिनों भड़ास4मीडिया के संस्थापक यशवंत सिंह पर मुकदमा दर्ज कराने को लेकर वह सुर्खियों में रही थीं। आईबीएन 7 से पहले साक्षी कई अन्य मीडिया संस्थानों से जुड़ी रही हैं।

साक्षी जोशी ने अपने करियर की शुरुआत टोटल टीवी से की थी। यहां इनके पिता उमेश जोशी एडिटर थे। इसके बाद वह तकरीबन डेढ़ साल तक इंडिया टीवी में रही। इंडिया टीवी के बाद वह बीबीसी हिंदी रेडियो व आनलाइन में बतौर प्रोड्यूसर जुड़ी रही। इंडिया टीवी में काम करने के दौरान साक्षी जोशी इसके मैनेजिंग एडिटर विनोद कापड़ी से प्रेम संबंधों को लेकर काफी चर्चा में रहीं थीं। बाद में इन दोनों ने शादी कर ली जो मीडिया जगत की चर्चित शादियों में एक थी।

पिछले दिनों भड़ास4मीडिया के संपादक यशवंत सिंह पर मुकदमा दर्ज करने को लेकर भी साक्षी जोशी और विनोद कापड़ी सुर्खियों में रहे थे। आईबीएन 7 की ‘पूर्व’ हो चुकी एंकर साक्षी जोशी ने यशवंत सिंह पर फोन कर के परेशान करने और धमकी देने का आरोप लगाया था। हालांकि इस मामले में यशवंत को जमानत मिल चुकी है। जहां तक साक्षी जोशी के आईबीएन 7 से निकाले जाने की बात है तो मीडिया जगत में यह भी चर्चा है कि यशवंत प्रकरण के बाद से ही उनपर तलवार लटक रही थी। जिस तरह से यह घटना मीडिया जगत में चर्चा का विषय बनी और इसमें चैनल का नाम भी उछला, उससे आईबीएन 7 का प्रबंधन क्षुब्ध था।


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नहीं हो सकी यशवंत की जमानत, अगली सुनवाई 1 सितंबर को

भड़ास4मीडिया के संपादक यशवंत सिंह को आज (25 अगस्त) को भी जमानत नहीं मिल सकी। यशवंत की जमानत के विरोध में दूसरे पक्ष ने हार्ड डिस्क की जांच करने के लिए वक्त की मांग की है। सरकारी वकील ने कहा कि यशवंत सिंह के हार्ड डिस्क को जांच के लिए नासिक भेजा गया है। अभी उसकी रिपोर्ट नहीं आई है। इसके बाद अदालत ने सुनवाई की अगली तारीख 1 सितंबर को निर्धारित की है।

गौरतलब है कि तकरीबन पंद्रह दिन पहले पुलिस ने यशवंत सिंह के कंप्युटर से उसका हार्ड डिस्क निकाल लिया था। जांच के लिए उसे नासिक भेजा गया है। दूसरी तरफ भड़ास4मीडिया के कंटेंट एडिटर अनिल सिंह भी अभी जेल में ही हैं।


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आजतक से अखिल भल्ला और शाकिब की छुट्टी

आजतक से दो धमाकेदार खबरें हैं। चैनल में एडिटर (आउटपुट) के पद की जिम्मेदारी संभाल रहे अखिल भल्ला ने इस्तीफा दे दिया है। अखिल भल्ला लंबे समय से आजतक से जुड़े हुए थे। वहीं आजतक के डिप्टी एक्जीक्यूटिव प्रोड्यूसर शाकिब खान ने भी इस्तीफा दे दिया है। शाकिब खान आजतक में पैकेजिंग हेड के पद पर तैनात थे। शाकिब भी आजतक से लंबे समय से जुड़े हुए थे।

इन दोनों लोगों ने इस्तीफा दिया या फिर इनसे इस्तीफा लिया गया, इसकी पुष्टि नहीं हो पाई, लेकिन इतनी खबर पक्की है कि दोनों की आजतक चैनल से छुट्टी हो गई है, इन दोनों लोगों ने अपना इस्तीफा सौंप दिया है। सुप्रिय प्रसाद के चैनल हेड बनने के बाद आजतक से आने वाली ये सबसे धमाकेदार खबर है। सूत्रों की मानें तो अभी कई लोगों पर तलवार लटकी है। आने वाले दिनों में कई और लोगों की छुट्टी हो सकती है। अगला नंबर किसका है, इसका तो पता नहीं, लेकिन इसको लेकर कयास लगाए जा रहे हैं। सूत्र ये भी बता रहे हैं कि फिल्म सिटी के अपने नए दफ्तर में जाने से पहले आजतक प्रबंधन कई कड़े कदम उठा सकता है।
 
 

न्यूज एक्सप्रेस के संपादक मुकेश कुमार ने दिया इस्तीफा

न्यूज एक्सप्रेस के चैनल हेड व संपादक मुकेश कुमार ने इस्तीफा दे दिया है। सूत्रों के मुताबिक मुकेश कुमार पिछले कुछ दिनों में चैनल में चल रही गतिविधियों से खुश नहीं थे। इसके बाद उन्होंने चैनल को छोड़ना ही मुनासिब समझा।  मुकेश कुमार ने अपने करियर की शुरुआत ‘समय’  नाम के अखबार से किया था। यहां काम करने के बाद वह सागर विश्वविधालय से पत्रकारिता करने चले गए।

दुबारा उन्होंने 1985 से पत्रकारिता की विधिवत शुरुआत की। मुकेश आदर्श पत्र’ से जुड़ गए। बाद में इलाहाबाद में माया पत्रिका के साथ जुड़ गए। फिर गुवाहटी में ‘हिंदी सेंटिनल’ अखबार के संपादक बने और उसे लांच कराया। मुकेश कुमार ने फ्रिलांसिग भी की है। बाद के दिनों में वो पटना में प्रकाश झा के चैनल ‘मौर्य टीवी’ जुड़े और उसे लांच कराया।
 

सीएनईबी का भोजपुरी म्यूजिक चैनल लांच, खांटी भोजपुरिया म्यूजिक दिखेगा

 कंप्लीट न्यूज़ एंड एंटरटेनमेंट ब्रॉडकास्ट (सीएनईबी) ने लॉन्च पैड के साथ मिलकर नया भोजपुरी म्यूजिक टीवी चैनल, ‘हम्मरा एम’ लांच किया है। हम्मरा एम भारत का पहला अंतरराष्ट्रीय भोजपुरी म्यूजिक चैनल होगा। चैनल मालिकों ने इस नए चैनल को अंतरराष्ट्रीय फील देने का दावा किया है। उनका कहना है कि भोजपुरी संगीत के लिए यह एक श्रद्धांजलि होगी। एक आधिकारिक विज्ञप्ति के अनुसार, ‘हम्मरा एम’ ने लांच होने के पहले सप्ताह में ही बिहार और झारखंड में अपनी पकड़ बनानी शुरू कर दी है।

इस शुरुआत पर ‘सीएनईबी नेटवर्क’ के सीईओ, अमनदीप सरन का कहना है कि सीएनईबी नेटवर्क और लॉन्च पैड ने मिलकर म्यूजिक एंटरटेनमेंट के क्षेत्र में इतिहास रचने का काम किया है। वर्मा ने कहना है  कि चैनल पर विशुद्ध भोजपुरी संगीत का प्रसारण किया जाएगा ना कि मिक्स संगीत का, जैसा कि अन्य रीजनल चैनल नियमित आधार पर करते हैं। चैनल बिहार औऱ झारखंड के दर्शकों को टार्गेट करेगा। इसके अलावा चैनल भोजपुरी संगीत के बारे में जानकारी देने के लिए लोगों को जारूगक भी करेगा, जिससे कि भोजपुरी क्षेत्र के युवाओं को अपनी संस्कृति और इतिहास पर गर्व का अनुभव हो। चैनल की वेबसाइट भी जल्दी ही शुरू हो जाएगी। इसके बाद उस पर लाइव कार्यक्रम देखने की सुविधा सोशल मीडिया जैसे  फेसबुक, ट्विटर और यूट्यूब पर भी दी जाएगी।
 

‘हम पत्रकार है, तुम 15 अगस्त की सुबह नही देख पाओगे..’

एक बार फिर पत्रकारिता का चोला ओढ़ कर अपनी रोटी सेकने वालों के चलते चैथा स्तम्भ लज्जित हुआ है। वाकया यूपी के गाजीपुर जिले का हैं, जहां सरकारी कर्मचारी से मारपीट करने वाले आरोपी की पैरवी करने वाले एक तथाकथित पत्रकार ने कुछ ऐसा ही कदम उठाया। दारू पीकर आये दिन हंगामा करने वाले इस तथाकथित मीडियाकर्मी ने उस पीड़ित सरकारी कर्मचारी से मुकदमा वापस लेने के लिए फोन पर अभद्रता करते हुए जान से मारने की धमकी भी दे डाली। इतना ही नही शहर कोतवाल और सीओ सिटी के साथ भी फोन पर अभद्रता की। जिसकी रिकार्डिंग पुलिस अधिकारी ने कर ली और इसी आधार पर 504, 505 का मुकदमा दर्ज कर उसे हवालात में डाल दिया गया है।

पत्रकारिता का चोला ओढे हिरासत में आया यह व्यक्ति खुद को सहारा पेपर का कैमरामैन बता रहा था किन्तु जब सहारा के ब्यूरो प्रमुख से पुलिस ने बातचीत की तो स्थानीय ब्यूरो प्रमुख ने इस बात से साफ इंकार कर दिया। गौरतलब है कि यह शख्स कुछ सालों पहले फर्जी आरटीओ बन कर लूट करने के मामले में भी जेल जा चुका है। ऐसे लोगों का पत्रकारिता मे होना बड़ा ही शर्मनाक दाग हैं। ऐसे लोग जो कि हाईस्कूल भी ठीक से पास नही होते हैं किन्तु समाज में खुद को पत्रकार बताकर लोगों को ठगने में पीएचडी की डिग्री रखते हैं। आज इन्ही लोगों की बढती संख्या के चलते योग्य पत्रकार जलालत झेलने को मजबूर है।
 एक पत्रकार
 

नेशनल दुनिया के सात नए सप्लीमेंट लांच

नई दुनिया से बनी ‘नेशनल दुनिया’ बाजार में तेजी से अपने कदम बढ़ाने में जुटी है। एक हालिया फैसले में प्रबंधन ने अपनी प्रस्तुति को लेकर कई फेरबदल किया है। ‘नेशनल दुनिया’ के प्रकाशक एसबी मीडिया ने अखबार का ‘लोगो’ बदल दिया है. अखबार अब एक नए लोगो के साथ सामने आ रहा है। मास्ट हेड को भी दुबारा परिवर्तित कर दिया गया है। प्रबंधन दिल्ली-एनसीआर में भी अपने कदम बढ़ाने की जुगत में जुटा है। यहां ज्यादा से ज्यादा पाठकों तक अपनी पहुंच बनाने के लिए अखबार अब स्थानीय खबरों पर ज्यादा जोड़ दे रहा है।

इसके लिए मेट्रो गाजियाबाद, मेट्रो फरीदाबाद, मेट्रो गुड़गांव और मेट्रो नोएडा लांच किया गया है। अखबार के साथ चार पेज का डेली सप्लीमेंट्स सोमवार से शनिवार को मिलेगा। इन सप्लीमेंट्स के नाम – यंग मार्च, इंद्रधनुष, हमसफर, बच्चों की दुनिया, कायाकल्प और रंगोली है। रविवार को समाचारपत्र के साथ मैगजीन सप्लीमेंट्स दिया जाएगा, जिसमें राजनीति, बिजनेस, एंटरटेनमेंट और अन्य समाचार शामिल किए जायेंगे। इस बदलाव का उद्देश्य विज्ञापनदाताओं को आकर्षित करना है। लांचिंग के मौके पर ‘नेशनल दुनिया’ के सीईओ, संदीप बिश्नोई ने विश्वास जताया कि अखबार का नया लुक पाठको को काफी पसंद आएगा। उन्होंने यह भी कहा कि वह पाठकों और विज्ञापनदाताओं की जरूरतों और मांग के अनुसार, परिवर्तन के लिए तैयार हैं।
 

मध्य प्रदेश और हिमाचल प्रदेश से भी लांच होगा इंडिया न्यूज

आईटीवी नेटवर्क अपने विस्तार की प्रक्रिया में जुट गया है। नेटवर्क जल्दी ही दो और चैनल लांच करने की तैयारी में है। यह मध्य प्रदेश और हिमाचल प्रदेश के लिये होगा। इसे सितंबर के आखिर तक लांच करने की योजना है। अपने नए वेंचर के लिए चैनल स्टूडियो बनाने के काम में जुट गया है। यह  ‘इंफॉर्मेशन टेलीविज़न प्राइवेट लिमिटेड' का छठा चैनल है।

इससे पहले आईटीवी नेटवर्क का इंडिया न्यूज नाम से नेशनल चैनल के अलावा, हरियाणा, राजस्थान, बिहार- झारखंड और उत्तर प्रदेश-उत्तराखंड प्रसारित हो रहा है।  इंडिया न्यूज़ यूपी-उत्तराखंड में प्राइम टाइम और नेशनल के ‘विशेष’ कार्यक्रम में भी हल्का फेरबदल किया गया है।

 

लखनऊ के पत्रकारों को मिलेगा घर, होगा मुफ्त इलाज

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में पत्रकारों की चांदी होने वाली है। प्रदेश सरकार ने राजधानी के पत्रकारों के लिए आवासीय योजना शुरू करने की घोषणा की है। पीजीआई में अब पत्रकारों का निशुल्क इलाज भी हो सकेगा। इस मांग को माने जाने के बाद उ.प्र.जर्नलिस्ट्स एसोसिएशन (उपजा) ने मुख्यमंत्री अखिलेश यादव, श्रम मंत्री डॉ. वकार अहमद और समाजवादी पार्टी के प्रवक्ता विधान परिषद सदस्य राजेन्द्र चौधरी का आभार व्यक्त किया है। उपजा ने श्रम दिवस (एक मई) के मौके पर प्रदेश सरकार को 13 सूत्री मांग पत्र दिया था जिसमें ये दोनों मांगें शामिल थीं।

     उपजा द्वारा आयोजित श्रमिक दिवस समारोह में राज्य सरकार के सामने तेरह सूत्री मांगे रखी थी। समारोह के अतिथि श्रम मंत्री डॉ. वकार अहमद शाह तथा समाजवादी पार्टी के प्रवक्ता राजेन्द्र चौधरी ने पत्रकारों को आश्वस्त किया था कि तेरह सूत्री मांग पत्र गंभीरता से विचार किया जाएगा। उन्होंने इस मांग को मुख्यमंत्री अखिलेश यादव से बात कर पूरा कराने का आश्वासन भी दिया था। उपजा के प्रदेश अध्यक्ष रतन कुमार दीक्षित तथा लखनऊ जर्नलिस्ट्स एसोसिएशन के अध्यक्ष अशोक मिश्र ने पत्रकारों की दो महत्वपूर्ण मांगे माने पर प्रदेश सरकार एवं समाजवादी पार्टी का आभार व्यक्त किया है। श्री दीक्षित ने बताया कि तेरह सूत्री मांग पत्र में प्रमुख मांग पीजीआई में मान्यता प्राप्त पत्रकारों के लिए निशुल्क चिकित्सा की सुविधा उपलब्ध कराने संबंधी थी। जबकि राजधानी समेत प्रदेश के सभी जिलों में नई पत्रकार कालोनी की मांग क्रमांक दस पर थी। श्री दीक्षित ने आशा व्यक्त की है कि प्रदेश सरकार यथाशीघ्र मांग पत्र की अन्य 11 मांगों को भी पूरा करेगी।
 
उपजा की तेरह सूत्रीय मांगे-  

1. पत्रकारों को राजधानी के संजय गांधी स्नातकोत्तर एवं चिकित्सा शिक्षा संस्थान (एसजीपीजीआई) तथा समस्त मेडिकल कॉलेजों में नि:शुल्क चिकित्सा सुविधा उपलब्ध करायी जाए। साथ ही समस्त दवाएं नि:शुल्क उपलब्ध कराने की व्यवस्था की जाए। जनप्रतिनिधियों एवं सरकारी कर्मचारियों की भांति ही पत्रकारों के इलाज के लिए पीजीआई में स्थायी निधि की व्यवस्था करायी जाए। इसके लिए सूचना विभाग को नोडल विभाग के रूप में नामित किया जाए।

2. गंभीर बीमारी की स्थिति में राज्य के बाहर प्रख्यात चिकित्सा संस्थानों यथा एम्स नई दिल्ली, टाटा कैंसर इंस्टीट्यूट मुम्बई और मेदान्ता, गुड़गांव में इलाज कराने की स्थिति में पत्रकारों के चिकित्सा व्यय की धनराशि सीधे संस्थानों को भेजी जाए अथवा प्रतिपूर्ति प्राथमिकता के आधार पर तत्काल कराने की व्यवस्था की जाए।

3. जिला मुख्यालयों पर स्थित संयुक्त एवं जिला चिकित्सालयों में पूर्व की भांति नि:शुल्क चिकित्सा, नि:शुल्क प्राइवेट वार्ड आबंटन और दवाओं की लोकल परचेज की व्यवस्था पुन: प्रदान करायी जाए। इस हेतु नवीन शासनादेश जारी कराया जाए।

4.  गैर मान्यता प्राप्त पत्रकारों एवं प्रेस कर्मचारियों की चिकित्सा सुविधा हेतु सूचना एवं जनसम्पर्क विभाग, उ.प्र. एवं स्वास्थ्य विभाग द्वारा संयुक्त रूप से चिकित्सा कार्ड जारी कराया जाए। (उक्त प्रकृति के कार्ड की पूर्व में व्यवस्था थी) मान्यता प्राप्त पत्रकारों के परिचय पत्र पर नि:शुल्क चिकित्सा का उल्लेख किया जाए।
5. पत्रकार उत्पीड़न की घटनाओं को तत्काल रोकने तथा मीडिया और प्रशासन के बीच समन्वय स्थापित करने हेतु जिला स्तर पर सात सदस्यीय सौहार्द समितियों (स्थायी समतियों) का पुन: गठन कराया जाए। समिति में जिलाधिकारी, पुलिस अधीक्षक, सूचना अधिकारी, पत्रकारों की ट्रेड यूनियनों का एक-एक प्रतिनिधि, इलेक्ट्रानिक मीडिया का एक प्रतिनिधि (मान्यता प्राप्त पत्रकार) को शामिल किया जाए।
6. राज्य स्तर पर पत्रकार उत्पीड़न के मामलों के निस्तारण तथा अन्य समस्याओं पर विचार हेतु पत्रकार बन्धु का गठन किया जाए। पत्रकार बन्धु में गृह सचिव, अपर पुलिस महानिदेशक (कानून व्यवस्था), सूचना निदेशक, श्रम सचिव, स्वास्थ्य सचिव, पत्रकारों की राष्ट्रीय मान्यता प्राप्त दोनों ट्रेड यूनियनों के दो-दो प्रतिनिधियों को सम्मिलित किया जाए।
7. उ.प्र.राज्य प्रेस मान्यता समिति एवं उ.प्र.राज्य विज्ञापन मान्यता समिति का तत्काल गठन कराया जाए। प्रेस मान्यता समिति के गठन हेतु पूर्व निर्धारित मानक ही अपनाए जाएं तथा अंतिम अधिसूचित मान्यता नियमावली (2003) को लागू किया जाए।
8. सूचना एवं जनसंपर्क विभाग, उ.प्र. की सूचना निदर्शिनी (सूचना डायरी) का पुन: प्रकाशन आरम्भ कराया जाए।
9. उत्तर प्रदेश के पत्रकारों की पेंशन और जीवन बीमा के लिए प्रेस इंफारमेशन ब्यूरो नई दिल्ली की तर्ज पर राज्य में व्यवस्था की जाए। (केन्द्र सरकार पीआईबी मान्यता प्राप्त पत्रकारों के लिए निशुल्क चिकित्सा, पेंशन और बीमा सुविधा प्रदान करती है। साथ ही कई अन्य राज्यों ने इस दिशा में सार्थक पहल की है।)
10. मीडिया के व्यापक विस्तार को दृष्टिगत रखते हुए श्रमजीवी पत्रकारों के लिए राजधानी में नई पत्रकार कालोनी तथा सभी जिलों में पत्रकार कालोनियों का निर्माण कराया जाए। समस्त आवासीय प्राधिकरणों एवं आवास विकास परिषद की आवासीय योजनाओं में पत्रकारों को जनप्रतिनिधियों, पूर्व सैनिकों की भांति प्राथमिकता एवं रियायती दरों पर आवास एवं भूखण्ड उपलब्ध कराने की व्यवस्था की जाए।
11. उत्तर प्रदेश पर्यटन निगम के प्रदेश में निर्मित अतिथि गृहों एवं होटलों में पत्रकारों को प्रवास के दौरान 75 प्रतिशत रियायत पर अल्पकालिक आवासीय सुविधा उपलब्ध करायी जाए।
12. राज्य के समस्त श्रम न्यायालयों एवं श्रम न्यायाधिकरणों (लेबर ट्रिब्यूनल) में स्थायी एवं पूर्णकालिक पीठासीन अधिकारियों की नियुक्ति की जाए। पीठासीन अधिकारी का कार्यकाल समाप्त होने के पूर्व ही पीठ पर नियुक्ति की जाए। ताकि श्रमिकों से जुड़े मामलों की सुनवाई एवं न्याय में विलंब न हो।
13. मजीठिया वेतन आयोग की सिफारिशों को लागू कराने हेतु त्रि-पक्षीय समिति का अतिशीघ्र गठन कराया जाए। समिति में समाचार पत्र उद्योग के प्रतिनिधि, शासन के प्रतिनिधि एवं पत्रकार यूनियनों के प्रतिनिधियों को सम्मिलित किया जाए।
 
 

मैजिक टीवी होगा रिलांच, एबीसी भारत बनेगा

मैजिक टीवी अब नये कलेवर और तेवर में रीलॉन्च होने की तैयारी में है। इसको ABC भारत के नाम से रिलॉन्च किया जा रहा है। नाम बदलने के पीछे चैनल में जुड़ा मैजिक शब्द है, जिसे अब हटा दिया जाएगा। इस प्रक्रिया में चैनल प्रबंधकों ने मैजिक के लोगो के साथ ABC भारत का भी चलाना शुरू कर दिया है। फिलहाल मंत्रालय से मान्यता मिलने की कार्यवाही आखिरी चरण में हैं। इसको इंटरनेट पर भी लाइव कर दिया गया है। इस बदलाव के बारे में मैजिक टीवी के हेड ऑपरेशंस और एक्जीक्यूटिव एडिटर प्रसून शुक्ला ने पुष्टी की है।

उन्होंने कहा कि खबरों में क्षेत्रीयता के पुट को नेशनल कलेवर में पेश कर सभी चैनलों से अलग दिखने की कोशिश है। शुक्ला ने बताया कि मैजिक टीवी के रीलॉन्च होने की प्रक्रिया चैनल के नाम परिवर्तन के साथ शुरू हुयी है। मैजिक टीवी को अब एबीसी भारत के नाम से जाना जायेगा। हालांकि इसके लुक में फिलहाल कोई परिवर्तन नही किया जा रहा है। प्रसून ने कहा कि न्यूज चैनल में मैजिक शब्द का जुडाव कहीं नही होता, इसलिए अब हम नए ब्रॉन्ड नेम के साथ आ रहे हैं। उन्होंने आने वाले दिनों में चैनल का विस्तार करने की भी बात कही।

सहारा में सनसनी, विजय राय ने चैनल छोड़ा, मनोज मनु मेट्रो एडिटर बने

सहारा समय चैनल के दिग्गज विजय राय सहारा न्यूज से अलग हो गए हैं। विजय राय चैनल में कद्दावर थे और उनके पास सहारा न्यूज के ब्यूरो हेड की जिम्मेदारी थी। सूत्रों से मिली खबर के मुताबिक विजय राय से इस्तीफा ले लिया गया है। हालांकि अभी तक इसका कारण पता नहीं लग पाया है। सूत्रों का कहना है कि विजय राय का जाना वर्चस्व की लड़ाई का नतीजा है। राय पिछले काफी वक्त से सहारा में सक्रिय थे। एक अन्य खबर में मनोज मनु को मेट्रो एडिटर बना दिया गया है।

इससे पहले मनोज मनु सहारा नेशनल और एमपी चैनल के हेड थे। बाद में उनसे नेशनल की जिम्मेदारी ले ली गई थी। फिलहाल उनके पास एमपी की ही जिम्मेदारी थी,जिसे बढ़ाते हुए अब उन्हें मेट्रो एडिटर का अतिरिक्त प्रभार भी दे दिया गया है।

सहाराश्री के सचिवालय से चित्रा का इस्तीफा

चित्रा त्रिपाठी ने सहारा ग्रुप को बॉय बोल दिया है। चित्रा सहाराश्री के सचिवालय का हिस्सा थीं, जहां से वह अलग हो गई हैं। चित्रा पहले सहारा टीवी में एंकर थीं। मगर कुछ समय पहले उन्हें मुंबई में स्थित सहाराश्री के सचिवालय में भेज दिया गया था। तब से वह यहीं काम कर रही थी। सचिवालय में मुख्यधारा की मीडिया जैसा काम नहीं होने के कारण चित्रा ने यह निर्णय लिया है।

हालांकि कुछ लोगों का यह भी कहना है कि चित्रा ने खुद नौकरी से इस्तीफा नहीं दिया है बल्कि उन्हें जाने को कह दिया गया था। सूत्रों के मुताबिक चित्रा अब फिर से मुख्यधारा की पत्रकारिता से जुड़ने की जुगत में हैं।
 

थी..हूं..रहूंगी के लिए वर्तिका नंदा को ऋतुराज सम्मान

डॉ.वर्तिका नंदा को प्रतिष्ठित परम्परा ऋतुराज सम्मान से सम्मानित किया गया है.  वर्तिका जी को यह सम्मान उनके कविता संग्रह 'थी.. हूं… रहूंगी' के लिए मिला। सम्मान समारोह दिल्ली में हुआ। यह कविता संग्रह महिला अपराध पर आधारित है। इस विषय पर लिखा जाने वाले यह अपने तरह का अनूठा कविता संग्रह है। हर साल यह सम्मान दिया जाता है। वर्तिका नंदा को पुरस्कार देने का निर्णय तीन सदस्यी निर्णायक मंडल ने की। इसमें राजनारायण बिसारिया, डा. अजित कुमार और डॉ. कैलाश वाजपेयी शामिल थे।

इससे पहले विजय किशोर मानव, डा. अनामिका, नरेश सक्सेना, बालस्वरूप राही, पवन करण व विष्णु नागर आदि परम्परा ऋतुराज सम्मान से सम्मानित हो चुके हैं। परंपरा ऋतुराज सम्मान के साथ एक लाख रुपये की राशि भी दी जाती है।  डॉ. वर्तिका नंदा इस कविता संग्रह को लेकर पिछले काफी वक्त से उत्साहित रही हैं. अपने कविता संग्रह के बारे में उन्होंने कहा कि, थी ..हूं..रहूंगी की कहानी अपने आप में एक अलग तरह की रचना है. बतौर वर्तिका, "पिछले साल एक मरजानी मर गई और तब यह लगा कि कई बार मरते-मरते कोई औरत जब बच जाती है, तो बदल जाती है। अपराध की रिपोर्टिंग ने यही सिखाया और बताया। इस लिए इस बार अनायास ही कविताएं एक नए भाव के साथ उग आईं। वर्तिका आईआईएमसी की छात्रा रही हैं। मीडिया में लंबे वक्त तक सक्रिय रहने के बाद उन्होंने पढ़ाने के लिए आईआईएमसी को चुना। यहां वह कई सालों तक विद्यार्थियों को टीवी पत्रकारिता पढ़ाती रही हैं।

पश्चिम भारत में भी पहुंचा सहारा समय

देश के तमाम हिस्सों में अपनी पहुंच बनाने के बाद सहारा समय ने पश्चिम भारत में भी दस्तक दे दी है। सहारा न्यूज़ नेटवर्क ने 15 अगस्त को  महाराष्ट्र और गुजरात से भी चैनल शुरू कर दिया है। सहारा इंडिया परिवार के मुख्य अभिभावक सहाराश्री सुब्रत रॉय सहारा ने राजधानी के एक पांच सितारा होटल में अनेक केन्द्रीय मंत्रियों, पूर्व केंद्रीय मंत्रियों व सैकड़ों अतिथियों की मौजूदगी में चैनल का शुभारंभ किया। इस दौरान, सहाराश्री ने अपनी जिम्मेदारी का ईमानदारी से निर्वहन किये जाने की आवश्यकता पर बल दिया।

सहारा ने इस क्षेत्र में हिंदी भाषी दर्शकों की आबादी को देखते हुए कदम रखा है। सहारा को इस क्षेत्र में भी अपने चैनल के सफल होने की पूरी उम्मीद है। वरिष्ठ अधिकारियों की रणनीति लोकल विज्ञापनदाताओं के अलावा सरकारी विज्ञापन को भी ट्रार्गेट करने की है। इस दोनों राज्यों में सहारा के ब्यूरो और रिर्पोटर पहले से ही मौजूद हैं. इसको देखते हुए कंटेट के स्तर पर बहुत ज्यादा काम करने की जरूरत नहीं पड़ेगी। चैनल के लांचिंग समारोह में केन्द्रीय मंत्री सुबोध कांत सहाय, चौ.अजित सिंह, बेनी प्रसाद वर्मा,सलमान खुर्शीद, हरीश रावत, अजय माकन और राजीव शुक्ला, राजद अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव, पूर्व केन्द्रीय मंत्री व लोजपा अध्यक्ष रामविलास पासवान, जैसे दिग्गज मौजूद थे।
 
 

हड़ताल के चलते नहीं हुई सुनवाई, अब 25 अगस्त को होगी

भड़ास4मीडिया के संपादक यशवंत सिंह के मामले की सुनवाई 17 अगस्त को नहीं हो सकी. इस दिन वकीलों की हड़ताल के कारण कोर्ट की कार्यवाही नहीं हो सकी. अब इसकी सुनवाई 25 अगस्त को होगी. इससे पहले विनोद कापड़ी और साक्षी जोशी द्वारा लगाए गए आरोपों पर कोर्ट ने यशवंत सिंह को जमानत दे दी है. फिलहाल दैनिक जागरण द्वारा लगाए गए मामले में जमानत होनी बाकी है. जागरण ने भी यशवंत सिंह पर रंगदारी मांगने का आरोप लगाया था.

देश भर के पत्रकार लगातार यशवंत सिंह से मिलने और भड़ास4मीडिया को अपना समर्थन देने के लिए डासना जेल पहुंच रहे हैं. इधर भड़ास4 मीडिया के कंटेंट एडिटर अनिल सिंह को भी बीते दिनों गिरफ्तार कर लिया गया है. अनिल भड़ास4मीडिया के एडिटर यशवंत  सिंह के मामले की पैरवी करने के लिए कोर्ट गए थे. जहां अदालत परिसर से ही पुलिस ने उन्हें हिरासत में ले लिया. अनिल के मामले पर 28 अगस्त को सुनवाई होनी है.


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Yashwant Singh Jail

हरियाणा न्‍यूज के मालिक गोपाल कांडा फरार, तलाश में छापेमारी

 

: अरुणा चड्ढा को पुलिस ने गिरफ्तार किया : नई दिल्ली। एयर होस्टेस गीतिका शर्मा खुदकुशी मामले में हरियाणा के पूर्व मंत्री गोपाल गोयल कांडा पुलिस के शिकंजे में फंसते नजर आ रहे हैं। दिल्ली पुलिस के नोटिस पर कांडा बुधवार को पूछताछ के लिए हाजिर नहीं हुए बल्कि अग्रिम जमानत पाने के लिए रोहिणी की कोर्ट में उनकी अर्जी पहुंच गई। बुधवार शाम पुलिस ने कांडा की गिरफ्तारी के लिए चार टीमें गठित करके उन्हें हरियाणा रवाना कर दिया। कांडा की सहयोगी अरुणा चढ्डा को गिरफ्तार कर लिया गया है।
 
इससे पहले बुधवार को पुलिस ने कांडा की एयरलाइंस कंपनी एमडीएलआर [मुरलीधर लेखराज ग्रुप] की महिला अधिकारी अरुणा चड्ढा, लीगल एडवाइजर अंकित अहलूवालिया समेत दस कर्मियों से घंटों पूछताछ की। डीसीपी नार्थ-वेस्ट पी करुणाकरण ने बताया कि गोपाल कांडा ने अपने वकील के माध्यम से पुलिस के समक्ष पेश होने के लिए तीन दिन की मोहलत मांगी, पर उन्हें बुधवार को ही जांच में शामिल होने को कहा गया था। इसके बाद भी हाजिर न होने पर कांडा को गिरफ्तार करने के लिए गुड़गांव, सिरसा व कैथल पुलिस टीमें भेजी गई हैं। पता चला है कि इन इन टीमों ने बुधवार रात कांडा के कई ठिकानों पर छापेमारी की है। लेकिन कांडा उनकी पकड़ से बाहर हैं।
 
पता चला है कि मंगलवार को पुलिस कांडा की कंपनी के एक्जीक्यूटिव मंदीप सिंह को गुड़गांव से पूछताछ के लिए दिल्ली लाई थी। मंदीप के नाम पर कांडा ने मोबाइल फोन के तीन सिम कार्ड ले रखे थे, जिससे वह गीतिका व उसके परिजनों को धमकी देते थे। सिम कार्ड की जांच की जा रही है। बुधवार को मंदीप को रोहिणी स्थित महानगर दंडाधिकारी की कोर्ट में बयान दर्ज करवा सरकारी गवाह बना लिया गया है। (जागरण)

वरिष्‍ठ फोटो जर्नलिस्‍ट महेंद्र सिंह का निधन

 

जौनपुर। चार दशकों तक जौनपुर समेत पूर्वांचल में छाया पत्रकारिता करने वाला एक सूरज डूब गया। फोटोग्राफर महेन्द्र सिंह ने रविवार की रात ब्रेन हैमरेज के बाद आखिरी सांस ली। उनकी मृत्यु की जानकारी होते ही पत्रकारों में शोक की लहर दौड़ गयी। अलफस्टीनगंज स्थित उनके आवास पर लोगों का तांता लगा हुआ है। महेंद्र सिंह ने 40 वर्षों तक विभिन्न समाचार पत्रों में छाया पत्रकारिता के साथ-साथ संवाददाता के तौर पर काम किया। जिले में उनकी पहचान छाया पत्रकारिता के भीष्म पितामह के तौर पर थी। इंदिरा गांधी और चंद्रशेखर तक उनके खींची फोटो की प्रशंसा की थी। नगर को तबाह करने वाली सन 84 की बाढ़ का कवरेज महेंद्र सिंह की नायाब उपलब्धि रही है।
 
वाराणसी से प्रकाशित आज, दैनिक जागरण, दैनिक गाण्डीव, इलाहाबाद से प्रकाशित अमृत प्रभात, एनआईपी सहित जनपद से प्रकाशित होने वाले दैनिक मान्यवर के अलावा तमाम दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक समाचार पत्रों तथा स्वतंत्र भारत के वाराणसी प्रकाशन के दौरान लम्बे समय तक के लिये अपनी कलात्मक फोटो देकर ख्याति अर्जित करने वाले श्री सिंह के निधन की सूचना मिलते ही पत्रकारिता जगत से जुड़े तथा समाजसेवी, राजनैतिक व्यापारी आदि वर्गों के लोग अलफस्टीनगंज स्थित उनके आवास पर पहुंचकर उनके पार्थिव शरीर पर श्रद्धा सुमन अर्पित किया। उनकी शवयात्रा जिस समय उनके आवास से चली, जिस रास्ते से भी गुजरी, लोगों ने अश्रुपूरित नेत्रों से पुष्पवर्षा कर उन्हें अंतिम विदाई दिया। 
 
शवयात्रा की समाप्ति आदि गंगा गोमती के पावन तट रामघाट पर हुई जहां मुखाग्नि उनके ज्येष्ठ पुत्र धीरज सिंह गुड्डू ने दिया। जिस समय उनके ज्येष्ठ पुत्र ने उनको मुखाग्नि दी, उपस्थित सभी लोगों की आखें सजल हो गयीं। अपनी वाणी की विनम्रता के चलते वह पूरे जनपद के चहेते बने हुये थे। रामघाट पर ऐसा लग रहा था जैसे पूरा जौनपुर नगर सिमटकर आदि गंगा गोमती के तट पर आ गया है। बताते चलें कि स्व. सिंह के दूसरे नम्बर के पुत्र नीरज सिंह बंटी वर्तमान में अमर उजाला बरेली संस्करण में संवाददाता के तौर पर कार्यरत हैं। बता दें कि स्व. सिंह की कलात्मक फोटो से प्रभावित देश के दो भूतपूर्व प्रधानमंत्री स्व. इंदिरा गांधी व चन्द्रशेखर सिंह ने इनकी पीठ थपथपायी थी।

भूखंड के लिए पीआरओ की चापलूसी पर उतरे पत्रकार

 

श्रीमान, यशवंत सिंह। संपादक, भड़ास4मीडिया। विषय : राजस्थान के श्रीगंगानगर जिले में भूखंडों से वंचित पत्रकारों ने पिछले काफी समय से आंदोलन किया हुआ है, लेकिन कुछ तथाकथित इलेक्ट्रोनिक मीडियाकर्मियों ने अधिकारियों की चापलूसी करनी शुरू कर दी है।
 
मान्यवर, उपरोक्त विषयांतर्गत निवेदन है कि राजस्थान के श्रीगंगानगर जिले के पात्र पत्रकारों ने पिछले पांच सालों से रियायती दरों पर भूखंड की मांग के लिए आंदोलन किया हुआ है। राज्य सरकार ने लगभग तीन माह पहले पत्रकारों की मांग को जायज मानते हुए 62 भूखंड देने का निर्णय लिया और आवेदन जमा करवाने की प्रक्रिया भी शुरू कर दी। हालांकि पूर्व में भी पात्र पत्रकारों के लिए पत्रकार कॉलोनी काटी गई थी, जिनमें नियम कुछ अलग थे, लेकिन वर्तमान में नए नियमों की वजह से पात्र पत्रकार भी भूखंड लेने से वंचित रह सकते हैं। इसके लिए पत्रकारों ने जयपुर में जाकर मुख्‍यमंत्री शोक गहलोत से लेकर मंत्रियों, विधायकों, नगर विकास न्यास अधिकारी तथा वरिष्ठ अधिकारियों से मुलाकात कर नियमों में शिथिलता की मांग की। 
 
31 जुलाई तक लगभग 120 फार्म जमा भी हो चुके हैं, लेकिन गंगानगर के सूचना एवं जन संपर्क अधिकारी (जो फाइनेंस का काम भी करते हैं, और उन्होंने लगभग अढ़ाई सौ से अधिक मुकदमें भी करवा चुके हैं) ने पत्रकारों की हितों की न सोचकर लगातार पत्रकारों के बारे में नेगेटिव सोच पाले हुए हैं। कल पीआरओ ने नगर विकास न्यास अध्यक्ष ज्योति कांडा के सामने एक नया सगूफा छोड़ा दिया। पीआरओ का कहना था पत्रकार वही होता है, जिसे राज्य सरकार ने अधिस्वीकृत कर रखा है, लेकिन हैरानी वाली बात है कि जिले में लगभग सवा सौ से अधिक पत्रकार हैं, वे अधिस्वीकृत नहीं हैं। वे सालों से श्रमजीवी पत्रकार की हैसियत से निरंतर काम कर रहे हैं।
 
कल पीआरओ से मिलने गए क्षेत्र के पत्रकार पहुंचे और सौहार्दपूर्ण बात की, लेकिन पीआरओ के शब्दबाण ऐसे थे, कि लग रहा था कि जैसे प्लॉट सरकार नहीं, बल्कि उन्होंने अपने घर से देने हों। हैरानी वाली बात है कि पीआरओ के खासमखास माने जाने वाले तथाकथित इलेक्ट्रोनिक मीडिया के चंद पत्रकार पीआरओ के सामने ही घुटने टेक गये और उनके पक्ष में उतर आए। हालंकि ये इलेक्ट्रोनिक मीडियाकर्मियों पर कई बार वसूली के आरोप भी लग चुके हैं। इन पत्रकारों के बारे में यही कहा जाता है कि वे छोटे-मोटे कार्यक्रमों की कवरेज करते हैं और पार्टी से कुछ सैटिंग कर लेते हैं। वो बात अलग है कि टीवी पर कवरेज किया हुए कार्यक्रम का प्रसारण ही नहीं होता। जब उनसे पार्टी पूछती है, तो उनका जवाब होता है 'क्या आपने रात दो बजे देखा नहीं, आपके कार्यक्रम की विशेष रिपोर्ट टीवी में प्रसारित की गई थी।'
 
इस तरह से ऐसे इलेक्ट्रोनिक मीडिया के तथाकथित रिपोर्टरों ने अपना धंधा चमकाने के लिए यह फंडा काफी समय से चलाया हुआ है। कल पीआरओ से बातचीत करते समय एक-दो इलेक्ट्रोनिक मीडिया से जुड़े रिपोर्टरों ने सीधे तौर पर पीआरओ का पक्ष किया। ऐसा लग रहा था कि वे मीडिया से नहीं, बल्कि सरकार के सूचना एवं जनसंपर्क अधिकारी से जुड़े हैं। तभी तो बार-बार पीआरओ का ही पक्ष ले रहे थे। पीआरओ भी वो, जिसके खिलाफ पूर्व में मुकदमे हो चुके हैं। जैसे-तैसे वे बहाल हुए। बहाली के बाद उन्होंने फाइनेंस का काम शुरू कर दिया। भोले-भाले लोगों को पांच प्रतिशत ब्याज के हिसाब से कर्जा देते हैं। जो नहीं देते, उन्हें मानसिक, आर्थिक रूप से परेशान करने के अलावा उन्होंने लगभग अढ़ाई सौ से अधिक मुकदमे भी दर्ज करवा चुके हैं। ऐसे में एक जिम्‍मेदार पद पर रहते हुए पीआरओ ने एक ऐसा धंधा चला रखा है, जो नियमों के विरुद्ध है। एक तरह से वे रहते तो पीआरओ ऑफिस में हैं, लेकिन काम फाइनेंस का करते हैं। … और उनका साथ देते इलेक्ट्रोनिक मीडिया से जुड़े चंद तथाकथित पत्रकार।
 
जयप्रकाश मील
 
श्रीगंगानगर
'
75978-27692

पति की हत्‍या के आरोप में महिला पत्रकार प्रेमी संग गिरफ्तार

 

राजकोट। शहर में रह रही पूर्व पत्रकार नीलम को प्रेमी राज लखवा के साथ गिरफ्तार कर लिया गया है। नीलम पर आरोप है कि उसने अपने पति जवेरी महेंद्र सिंह वर्मा की उत्तर प्रदेश के कानपुर शहर में हत्या कर दी थी। पति की हत्या के बाद नीलम राजकोट शहर आकर प्रेमी राज लखवा (मूल निवासी -उज्जैन, मप्र) के साथ पिछले तीन महीनों से यहां रह रही थी। नीलम के माता-पिता भी मीडियाकर्मी हैं।
 
पुलिस से प्राप्त जानकारी के अनुसार नीलम का जवेरी के साथ लगभग 6 वर्ष पहले विवाह हुआ था। इस दरमियान इनके घर एक बच्ची का जन्म हुआ, जो अब 4 वर्ष की है। महेंद्र सिंह वर्मा को 28 अप्रैल को किसी ने फोन करके कहीं बुलाया था और इसके बाद से ही वर्मा लापता हो गए थे। गुम होने के 2 दिन बाद ही उनकी लाश नदी से मिली थी। इसके अलावा महेंद्र सिंह के घर से उनके हाथों लिखा एक पत्र भी मिला था, जिसमें उन्होंने लिखा था कि अगर उनकी हत्या होती है तो पत्नी नीलम दुरे उसकी बहन अनिता और प्रेमी राज लखवा इसके जिम्मेदार होंगे।
 
इसी पत्र के आधार पर महेंद्र के भाई राम वर्मा ने सुलतानपुर जिले के गोसाईगंज पुलिस थाने में शिकायत दर्ज कराई थी। इसके अलावा हत्या के बाद से ही पत्नी नीलम, साली अनिता और नीलम का प्रेमी राज गायब थे। महेंद्र सिंह की हत्या के कुछ दिनों पहले ही नीलम ने घर से 30 हजार रुपए नगद और गहने चोरी होने की शिकायत पुलिस में दर्ज कराई थी। 
 
इसीलिए पुलिस को यह भी शक है कि हत्या करने के बाद भागने के लिए चोरी की झूठी शिकायत दर्ज कराई होगी। यूपी पुलिस इनकी तलाश कर रही थी, लेकिन अब तक इनकी भनक नहीं लग पाई थी। हाल ही में यूपी पुलिस को जानकारी मिली कि नीलम अपने प्रेमी राज के साथ गुजरात के जामनगर शहर में रह रही है। यूपी पुलिस ने गुजरात पुलिस से संपर्क किया, लेकिन इससे पहले कि पुलिस इन तक पहुंच पाती, आरोपियों को इसकी भनक लग गई और वे यहां से राजकोट भाग निकले।
 
पुलिस को अब इनकी जानकारी मिलनी शुरू हो गई थी। कुछ दिनों के प्रयासों के बाद ही गुजरात पुलिस को जानकारी मिली कि आरोपी राजकोट में रह रहे हैं। इस जानकारी के बाद राजकोट पुलिस ने इन्हें सोमवार को गिरफ्तार कर लिया। खबर है कि इन्हें यूपी पुलिस के हवाले कर दिया गया है। हालांकि गिरफ्तारी के बाद अब नीलम और राज का कहना है कि जवेरी की हत्या उन्होंने नहीं की, बल्कि उन्हें झूठे मामले में फंसाया जा रहा है। इसके साथ ही नीलम का तो यहां तक कहना है कि राज के साथ सिर्फ दोस्ती है, उनके बीच पति-पत्नी का रिश्ता नहीं है।
 
फेसबुक से हुआ था परिचय : आरोपी नीलम और राज फेसबुक के माध्यम से एक-दूसरे के परिचय में आए थे। राज के मामा जामनगर में रहते हैं, इसलिए ये दोनों भी जामनगर आ गए थे। यहां इन्होंने 18 अप्रैल 12 को कोर्ट मैरिज कर ली थी।
 
दिल्ली के एक चैनल में पत्रकार थी : नीलम दिल्ली के एक न्यूज चैनल में पत्रकार रह चुकी है। फिलहाल वह सुजुकी कंपनी में सेल्स मैनेजर के रूप में पदस्थ थी। इसके अलावा नीलम के पिता उत्तरप्रदेश में एक न्यूज चैनल के ब्यूरो चीफ हैं तो मां भी एक न्यूज चैनल में कार्यरत है। (भास्‍कर) 

हिंदुस्‍तान विज्ञापन घोटाला : संस्‍करणों में रजिस्‍ट्रेशन संख्‍या बदलकर-बदलकर छापा गया

 

मुंगेर। विश्व के सनसनीखेज दैनिक हिन्दुस्तान के 200 करोड़ के विज्ञापन फर्जीवाड़ा में पुलिस अधीक्षक पी. कन्नन के निर्देशन में आरक्षी उपाधीक्षक अरूण कुमार पंचालर की समर्पित ‘‘पर्यवेक्षण-टिप्पणी‘‘के पृष्ठ -04 पर इस कांड के वादी मंटू शर्मा ने खुलासा किया है कि मेसर्स हिन्दुस्तान मीडिया वेन्चर्स लिमिटेड ने किस प्रकार भागलपुर और मुंगेर के दैनिक हिन्दुस्तान संस्करणों में बार-बार निबंधन संख्या बदलने, फर्जी तरीके से समाचर-पत्रों के मुद्रण, प्रकाशन और वितरण करने और अवैध संस्करणों में सरकारी विज्ञापन छापकर करोड़ों रुपए का फर्जीवाड़ा किया।
 
वादी मंटू शर्मा ने अभियुक्तों के द्वारा किए गए छल, धोखाधड़ी और फर्जीवाड़ा को प्रमाणित करने के लिए डीएवीपी, नई दिल्ली की शर्त्तों का उल्लंघन कर डीएवीपी विज्ञापन दर प्राप्त करने का भी सनसनीखेज खुलासा किया है।
 
हिन्दुस्तान विज्ञापन घोटाला के प्रमुख सरकारी गवाह बने श्रीकृष्ण प्रसाद : पर्यवेक्षण टिप्पणी की पृष्ठ संख्या -04 पर मुंगेर के समाजसेवी, पत्रकार और अधिवक्ता श्रीकृष्ण प्रसाद को इस विश्वव्यापी दैनिक हिन्दुस्तान विज्ञापन घोटाले से जुड़े पुलिस कांड में सरकार की ओर से प्रमुख साक्ष्य के रूप में पेश किया गया है। अभियोजन साक्ष्य (प्रथम) श्रीकृष्ण प्रसाद ने इस पृष्ठ में खुलासा किया है कि दैनिक हिन्दुस्तान के विज्ञापन फर्जीवाड़ा की पुष्टि बिहार सरकार के वित्त विभाग के अंकेक्षण -प्रतिवेदन, जिसकी संख्या- 195/2005-06 है, में भी की गई है। उन्होंने दैनिक हिन्दुस्तान के मुंगेर संस्करण के गलत और अवैध मुद्रण, प्रकाशन और वितरण का भी कानूनी नजर में बारीकियों के साथ खुलासा किया है। खुलासा इतना सरल भाषा में किया गया है कि भारत के किसी कोने के पाठक इसे पढ़कर देश के कारपोरेट प्रिंट मीडिया के सरकारी विज्ञापन घोटाले में अपने स्तर से देश के किसी भी न्यायालय या पुलिस में सीधी कार्रवाई कर सकते हैं।
 
डीएवीपी की भूमिका संदिग्ध : पर्यवेक्षण -टिप्पणी के पृष्ठ-04 के खुलासा से प्रामाणित होता है कि अभियुक्तों ने भागलपुर से अवैध ढंग से प्रकाशित दैनिक हिन्दुस्तान के लिए डीएवीपी विज्ञापन -दर पाने में या तो डीएवीपी के समक्ष गलत सूचनाएं दीं या डीएवीपी, नई दिल्ली के वरिष्ठ पदाधिकारियों की मिलीभगत से गैरनिबंधित दैनिक अखबार हिन्दुस्तान (भागलपुर संस्करण) के लिए डीएवीपी ने विज्ञापन-दर जारी कर दिया और उस विज्ञापन-दर की आड़ में अभियुक्तों ने बिहार सरकार से भी सरकारी विज्ञापन प्राप्त करने का लाइसेंस प्राप्त कर लिया। हिन्दुस्तान विज्ञापन घोटाला का यहां ही सभी कानूनी पेंच है। अब दायित्व पुलिस जांच एजेंसी पर है कि जांच एजेंसी जांच करे कि डीएवीपी विज्ञापन -दर प्राप्त करने में डीएवीपी कार्यालय, नई दिल्ली की सहभागिता है या नहीं? यदि सहभागिता है, तो किस रूप में है? क्योंकि डीएवीपी विज्ञापन दर पर ही दैनिक हिन्दुस्तान ने विगत ग्यारह वर्षों में बिहार सरकार से अरबों-अरब रूपया का विज्ञापन 38 जिलों से बटोर लिया।
 
विश्व के पाठकों की मांग पर आरक्षी उपाधीक्षक की पर्यवेक्षण-टिप्पणी की पृष्ठ संख्या-04 पाठकों के लिए यहां हू-बहू प्रस्तुत कर रहा हूं-‘‘वादी मंटू शर्मा ने अपने बयान में आगे बताया है कि दैनिक हिन्दुस्तान के भागलपुर और मुंगेर संस्करणों में बार-बार निबंधन संख्या बदलते रहने से स्वतः स्पष्ट हो जाता है कि अभियुक्तों द्वारा गलत एवं फर्जी तरीके से उक्त स्थानों से समाचार-पत्र का मुद्रण/प्रकाशन किया जा रहा है तथा अभियुक्तों को अपने कृत्यों को छिपाने के लिए समाचार -पत्र में बार-बर निबंधन संख्या बदलकर प्रकाशित करना पड़ रहा है। उन्होंने अपने बयान में आगे बताया कि अभियुक्तों द्वारा किए गए छल/धोखाधड़ी एवं फर्जीवाड़ा को प्रमाणित करने हेतु प्राथमिकी के साथ आवश्यक दस्तावेज संलग्न किया गया है। उन्होंने अपने बयान में यह भी बताया है कि डीएवीपी की विज्ञापन सूची में किसी दैनिक अखबार का नाम तब दर्ज होगा, जब दैनिक अखबार का प्रकाशन 36 माह तक बिना रूके नियमित रूपसे हो चुका होगा अर्थात 36 माह तक किसी भी अखबार को बिना सरकारी विज्ञापन के ही अखबार निकालना होगा, परन्तु उक्त नियमों की अनदेखी की गई। उन्होंने अपने बयान में आगे बताया कि वे सितम्बर, 2001 से दैनिक हिन्दुस्तान के नियमित पाठक हैं, जिस संबंध में उनके पास दैनिक हिन्दुस्तान के स्थानीय कार्यालय द्वारा निर्गत मासिक ग्राहक विपत्र भी उपलब्ध हैं, जिसे वे आवश्यकता पड़ने पर प्रस्तुत कर सकते हैं।
 
साक्षी श्रीकृष्ण प्रसाद, पे0 काशी प्रसाद, साकीन-मंगल बाजार, थाना-कोतवाली, जिला- मुंगेर का बयान लिया गया। इन्होंने अपने बयान में बताया कि ये एक समाजसेवी हैं तथा वादी के सहयोगी हैं। इन्होंने अपने बयान में प्राथमिकी एवं वादी के बयान का पूर्णरूपेण समर्थन करते हुए आगे बताया कि प्रेस पुस्तक रजिस्ट्रीकरण अधिनियम-1867 के तहत किसी भी समाचार पत्र के प्रकाशन हेतु निम्नांकित नियमों का पालन किया जाना आवश्यक है:-
 
(1) प्रकाशन का कार्य प्रारंभ करने के पूर्व संबंधित जिले के जिला दंडाधिकारी के समक्ष विहित प्रपत्र में घोषणा-पत्र समर्पित करना।
 
(2) तद्नुसार जिला दण्डाधिकारी द्वारा प्रमाणीकरण देना।
 
(3) कंपनी रजिस्ट्रार से अनुमति प्राप्त करना।
 
(4) भारत सरकार के समाचार-पत्र पंजीयक से पंजीयन कराना।
 
इन्होंने अपने बयान में आगे बताया कि उक्त सम्पूर्ण प्रक्रिया का अनुपालन करने के उपरांत ही नियमतः किसी समाचार पत्र का प्रकाशन किया जा सकेगा, परन्तु अभियुक्तों द्वारा उक्त तथ्यों की अनदेखी करते हुए 03 अगस्त, 2001 से दैनिक हिन्दुतान का भागलपुर संस्करण प्रकाशित किया जाने लगा। उसके बाद मुंगेर से भी दैनिक हिन्दुस्तान का संस्करण का प्रकाशन किया जाने लगा, जिसके लिए भी निर्धारित मानकों का पालन नहीं किया गया जिसकी पुष्टि बिहार सरकार के वित्त विभाग की अंकेक्षण प्रतिवेदन संख्या-195/2005-06 से भी होती है। इन्होंने अपने बयान में आगे बताया कि भागलपुर एवं मुंगेर से मुद्रित एवं प्रकाशित होनेवाले दैनिक हिन्दुस्तान में वर्ष 2001 से 30 जून, 2011 तक आरएनआई नं0-44348/86, जो पटना के लिए आवंटित है, का प्रयोग किया गया जबकि 01 जुलाई, 2011 से 16 अप्रैल, 2012 तक आरएनआई नं. के स्थान पर ‘‘आवेदित‘‘छापा जाने लगा। पुनः दिनांक 17 अप्रैल, 2012 को उक्त समाचार पत्र में आरएनआई नं0- बीआईएचएचआईएन/2011/41407 छापा गया।
 
जांच का विषय : प्रेस रजिस्ट्रार कार्यालय, नई दिल्ली ने दैनिक हिन्दुस्तान के भागलपुर संस्करण को पहली बार जो निबंधन संख्या -बीआईएचएचआईएन/2011/41407 आवंटित किया, वह भी जांच का विषय है। दैनिक हिन्दुस्तान के भागलपुर संस्करण के लिए आवंटित इस निबंधन संख्या का प्रकाशन 17 अप्रैल, 2012 से प्रिंट लाइन में शुरू हुआ। परन्तु, इस निबंधन संख्या में निबंधन का वर्ष 2011 दिखाया गया है जो पुलिस अनुसंधान का अलग ही विषय है। अभी भी दैनिक हिन्दुस्तान के भागलपुर से प्रकाशित रविवारीय संस्करण के लिए प्रेस रजिस्ट्रार कार्यालय से निबंधन संख्या प्राप्त नहीं हुआ है। मजे की बात है कि गैर निबंधित दैनिक हिन्दुस्तान के रविवारीय संस्करणों में भी सरकारी विज्ञापन का प्रकाशन और सरकारी विज्ञापन के प्रकाशन के विरूद्ध राशि की वसूली धड़ल्ले से की जा रही है।
 
सभी अभियुक्तों के विरूद्ध प्रथम दृष्टया आरोप प्रमाणित : मुंगेर पुलिस ने कोतवाली कांड संख्या-445/2011 में सभी नामजद अभियुक्त (1) शोभना भरतिया (अध्यक्ष, दी हिन्दुस्तान मीडिया वेन्चर्स लिमिटेड, नई दिल्ली), (2) शशि शेखर (प्रधान संपादक, दैनिक हिन्दुस्तान, नई दिल्ली), (3) अकु श्रीवास्तव (कार्यकारी संपादक, हिन्दुस्तान, पटना संस्करण), (4), बिनोद बंधु (स्थानीय संपादक, हिन्दुस्तान, भागलपुर संस्करण) और (5) अमित चोपड़ा (मुद्रक एवं प्रकाशक, मेसर्स हिन्दुस्तान मीडिया वेन्चर्स लिमिटेड, नई दिल्ली) के विरूद्ध भारतीय दंड संहिता की धाराएं 420/471/476 और प्रेस एण्ड रजिस्ट्रेशन आफ बुक्स एक्ट,1867 की धाराएं 8 (बी),14 एवं 15 के तहत लगाए गए सभी आरोपों को अनुसंधान और पर्यवेक्षण में ‘सत्य‘घोषित कर दिया है।
 
सांसदों से इस विज्ञापन घोटाले को संसद में उठाने की अपील : देश के माननीय सांसदों से इस विज्ञापन घोटाले को आगामी संसद सत्र में उठाने की अपील की गई है। देश की आजादी के बाद यह पहला मौका है कि माननीय सांसद देश के कोरपोरेट मीडिया के अरबों-खरबों के सरकारी विज्ञापन घोटाले को सबूत सदन के पटल पर रख सकेंगे। अब तक अखबार ही देश के भ्रष्टाचारियों को अपने अखबारों में नंगा करता आ रहा है। अब माननीय सांसद भी आर्थिक अपराध में डूबे शक्तिशाली मीडिया हाउस के सरकारी विज्ञापन घोटाले को संसद में पेश कर आर्थिक भ्रष्टाचारियों को नंगा कर सकेंगे।
 
गिरफ्तारी का आदेश और आरोप-पत्र समर्पित होना बाकी है : विश्व के इस सनसनीखेज हिन्दुस्तान विज्ञापन घोटाले में पुलिस अधीक्षक के स्तर से पर्यवेक्षण रिपोर्ट -02 जारी होने के बाद अब कानूनतः इस कांड में सभी नामजद अभियुक्तों के विरूद्ध गिरफ्तारी का आदेश और आरोप पत्र न्यायालय में समर्पित करने की प्रक्रिया शेष रह गई है। देखना है कि मुख्यमंत्री नीतिश कुमार के नेतृत्व में बिहार में आर्थिक अपराधियों के विरूद्ध चले रहे युद्ध में सरकार कब तक इस मामले में गिरफ्तारी का आदेश और आरोप-पत्र न्यायालय में समर्पित करने का आदेश मुंगेर पुलिस को देती है?
 
क्या सरकार अभियुक्तों को सजा दिला पाएगी? : विश्व के पाठक अब प्रश्न कर रहे हैं कि क्या बिहार सरकार दैनिक हिन्दुस्तान के विज्ञापन घोटाले में शामिल कंपनी की अध्यक्ष शोभना भरतिया, प्रधान संपादक शशि शेखर और अन्य संपादकों को सजा दिलाने में भविष्य में सफल होगी?
 
मुंगेर से श्रीकृष्ण प्रसाद की रिपोर्ट. इनसे संपर्क मोबाइल नं0- 09470400813 के जरिए किया जा सकता है. 


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कपूरथला में दैनिक जागरण के पांचवें कार्यालय का चौथा उद्घाटन

 

कपूरथला : हिंदी समाचार दैनिक जागरण कपूरथला उप कार्यालय के पांचवें दफ्तर का चौथा उदघाटन, वरिष्ठ महिला पत्रकार व जागरण प्रदेश प्रभारी मीनाक्षी शर्मा द्वारा मंगलवार को हुआ। लगभग डेढ़ दशक पहले पंजाब में लांच हुय हिंदी समाचार दैनिक जागरण का कपूरथला में 2002 में आगाज़ हुआ था तब कपूरथला जिले की कमान प्रभारी के तौर पर नरोतिया ने संभाली थी, तथा जटपूरा शेत्र में एक छोटी सी दुकान से कार्य प्रारंभ किया गया। 
 
इसके बाद प्रभारी की कमान जल्द ही लखनऊ से सम्बंधित पत्रकार अशोक सिंह भारत के हाथों में चली गई और शुरू हुई उदघाटन की गाथा। इस उप कार्यालय को बदल कर जल्लोखाना क्षेत्र में ले जाया गया और मार्च 2002 में उदघाटन कर विधिवत कार्य आरम्भ हुआ। लेकिन जल्द ही 2005 में यह दफ्तर बदल कर सुल्तानपुर रोड पर बैंक ऑफ़ बड़ौदा के समक्ष अक्टूबर 2005 में उद्घाटन रस्म पुन: कर लिया गया। उसके बाद 27 जुलाई 2009 को यह उप कार्यलय एक नए उदघाटन कार्यक्रम के तहत जमा मस्जिद काम्प्लेक्स में शिफ्ट हो गया। यह तीन उदघाटन अशोक सिंह भारत के ही नेतृत्‍व में ही हुआ। 
 
तब तक जागरण ने कपूरथला में अपना पूरा अस्तित्व कायम कर लिया था लेकिन 2012 शुरू होते ही जैसे जागरण को ग्रहण लग गया हो, ऐसे हालत बन गये कि शुरू में ही जागरण से जुड़े कुछ पत्रकारों पर जनता से आर्थिक लाभ के आरोप चर्चा में आए और जालंधर जागरण जो कि इस क्षेत्र को देख रहा था, के अधिकारिओं ने अपनी साख बचाते हुए दो-तीन पत्रकारों को बाहर का रास्ता दिखा दिया। अशोक सिंह का तबादला नवां शहर में कर दिया और प्रभारी के तौर पर एक के बाद एक रविंदर, देविंदर और फिर फ़रवरी में प्रभुदत्त त्रिपाठी को जिम्मेवारी दी गई। काफी उठापटक के बाद अब प्रभुदत्त की देखरेख में बस स्टैंड के नजदीक जागरण उप कार्यलय का विधिवत चौथा उदघाटन मीनाक्षी शर्मा के हाथों हुआ, जिसमे क्षेत्र के कुछ राजनीतिक व धार्मिक लोगों को अपनी साख प्रदेश प्रभारी के समक्ष पेश करने के लिए बुलाया गया। इस उद्घाटन में आने वाले कुछ मेहमानों की मिन्नत भी जागरण से जुड़े पत्रकारों को करनी पड़ी, ऐसी चर्चा क्षेत्र में है। 

बंसल न्‍यूज के हालात बिगड़े, कई अलविदा कहने के मूड में

 

सहारा, ईटीवी, जी२४ के कई नामचीन पत्रकारों को तोड़कर करीब डेढ़ साल पहले लोकल स्टाइल में शुरू हुआ मप्र-छग का बंसल न्यूज़ चैनल अब औंधे मुहं गिर रहा है. चैनल की ओपनिंग करने करने वाले सीईओ अचल मेहरा और न्यूज़ हेड तरुण गुप्ता बंसल न्यूज़ से पहले ही कन्नी काट चुके हैं. चैनल के मालिक सुनील बंसल ने बड़ी ही तरुणाई से तरुण की जगह शरद द्विवेदी को रखा. फिर शरद द्विवेदी अपनी दुकान ज़माने में अचल मेहरा को ही लील गए. 
 
जिस भरोसे से नामचीन चैनलों से पत्रकार यहा आये और हाड़तोड़ मेहनत कर लोकलछाप चलने वाले इस चैनल को बुलंदियों तक पहुँचाया उन पत्रकारों से ज्यादा बंसल ग्रुप के चेयरमेन न्यूज़ हेड शरद द्विवेदी पर भरोसा कर रहे हैं. अपने १८ साल के पत्रकारिता कैरियर का यशगान करने वाले शरद की औकात विधानसभा बीट देखने वाले दूसरे पत्रकार बेहतर ढंग से जानते हैं. अखबार की दुनिया में चापलूसी भरी खबरें छापने का इनका रिकॉर्ड रहा है. नेता मंत्री तक पकड़ बनाने के लिए ऐसे चापलूस की बंसल समूह भी तलाश कर रहा था, लेकिन मीडिया समूह की रीढ़ शुरुआती पत्रकारों की उपेक्षा इस चैनल को सिर के बल गिरने मजबूर कर रही है.
 
न्यूज़ हेड ने अपने साले को तो चिपकाया ही साथ में लोकलछाप दो दलालों को ज्वाइन कराया ताकि शो-रूम का रूप ले चुकी दुकान ठीक ढंग से चल सके. पिछले दो महीनों में करीब आधा सैकड़ा कर्मचारी न्यूज़ हेड के तौर तरीके और चापलूसी भरी ख़बरों का प्रजेन्टेशन देखकर अलविदा कह चुके हैं. इनपुट, आउटपुट और ब्यूरों कार्यालयों के जिम्मेदार पदों पर न्यूज़ हेड अपने लोगों से सौदेबाजी कर रहे हैं. वहीं सैलरी बढ़ने के आश्वासन के घूंट पीपी कर कई कर्मचारी उकता गए हैं. 
 
एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

कानपुर के संपादकीय प्रभारी बने राघवेंद्र, कई और बदलाव

 

दैनिक जागरण में कई बदलाव किए गए हैं. कानपुर से खबर है कि इनपुट हेड राघवेंद्र चड्ढा की कार्यक्षमता को देखते हुए कानपुर का संपादकीय प्रभारी बना दिया गया है. राघवेंद्र इसके पहले बनारस के संपादक थे. कानपुर के संपादकीय प्रभारी रहे विनोद शील को स्‍टेट हेड बनाकर पानीपत भेज दिया गया है. हिसार के एनई सुनील झा को नोएडा यूनिट बुला लिया गया है.
 
हल्‍द्वानी से आलोक शुक्‍ला को भी नोएडा बुला लिया गया है. इसके अलावा चर्चा है कि पानीपत के स्‍टेट हेड अवधेश बच्‍चन को मेरठ भेजा जा सकता है. पर सूत्रों का कहना है कि अवधेश पटना जाने के लिए प्रयासरत हैं. संभावना है कि आने वाले दिनों में कुछ और बदलाव देखने को मिल सकते हैं. 

शिमला प्रेस क्‍लब का चुनाव 18 अगस्‍त को

शिमला प्रेस क्लब के सालाना चुनाव 18 अगस्त को होंगे। निर्वाचन अधिकारी सुशील कुमार के मुताबिक नामांकन पत्र 8 और 9 अगस्त को प्राप्त किए जा सकते हैं। नामांकन भरने की तारीख 10 अगस्त तय की गई है। 12 अगस्त को उम्मीदवार अपने नाम वापिस ले सकते हैं। शिमला प्रेस क्लब में अध्यक्ष पद को लेकर इस बार मारामारी है। मौजूदा अध्यक्ष धनंजय शर्मा एक बार फिर मैदान में उतरने की तैयारी कर रहे हैं। तीन साल पहले एक साल के लिए उन्हें अध्यक्ष चुना गया था, लेकिन वे कब्जा जमाकर बैठ गए। तीन साल तक उन्होंने चुनाव नहीं कराए, जबकि क्लब के संविधान के मुताबिक हर साल चुनाव कराना लाजिमी है।

    
जनसत्ता के अश्विनी वर्मा, हिमाचल आजकल के भूपिन्दर चौहान, दैनिक ट्रिब्यून के ज्ञान ठाकुर और एक न्यूज चैनल के बीडी शर्मा ने भी अध्यक्ष पद पर ताल ठोंक दी है। यह पहला अवसर है, जब इतने उम्मीदवार अध्यक्ष पद के लिए चुनाव में कूदने पर आमादा हैं। इससे पहले ज्ञान ठाकुर क्लब के महासचिव थे। क्लब के सदस्य तीन साल तक चुनाव न कराने के लिए धनंजय शर्मा और ज्ञान ठाकुर को बराबर दोषी मानते हैं। दोनों के खिलाफ क्लब के सदस्यों में खासा आक्रोश है। बावजूद दोनों ने एक ही पद पर चुनाव लड़ने का मन बना रखा है। महासचिव पद पर अभी तक संजीव शर्मा का अकेला नाम ही सामने आया है। 
 
सदस्यों की बेरूखी को देखते हुए मौजूदा अध्यक्ष धनंजय शर्मा तनाव में हैं। इसी कारण धनंजय शर्मा ने अध्यक्ष पद के एक अन्य उम्मीदवार अश्विनी वर्मा के साथ क्लब में ही धक्कामुक्की कर दी। यह मंगलवार की घटना है। सोमवार को एक अन्य उम्मीदवार ज्ञान ठाकुर के साथ भी धनंजय शर्मा बदतमीजी पर उतर आए। शिमला के कुछ वरिष्ठ पत्रकारों ने निर्वाचन अधिकारी सुशील कुमार और साहिल शर्मा से दखल की गुजारिश की है। क्लब के संस्थापक सदस्यों का कहना है कि क्लब में जो माहौल धनंजय शर्मा अपनी बेजा हरकतों से उत्पन्न कर रहे हैं, उससे क्लब की गरिमा नष्ट हो रही हैं। यदि बाज न आए तो उन्हें चुनाव लड़ने से अयोग्य घोषित कर दिया जाए।
    
याद दिला दें कि वरिष्ठ पत्रकार कृष्णभानु की घुड़की के बाद तीन साल बाद धनंजय शर्मा चुनाव कराने के लिए विवश हुए हैं। कृष्णभानु ने एक-एक करके पांच पत्र धनंजय शर्मा को लिखे, जिनमें वित्तीय एवं अन्य अनियमितताओं के आरोप लगाए गए। कुछ आरोप साबित भी हो गए। भानु ने चेतावनी दी थी कि यदि शीघ्र चुनाव न कराए गए तो अध्यक्ष धनंजय शर्मा के खिलाफ पुलिस थाना में एफआईआर दर्ज कर दी जाएगी। घबराकर धनंजय शर्मा ने दो बार क्लब का साधारण अधिवेशन बुलाया, जिसका सदस्यों ने बहिष्कार कर दिया। विवश होकर चुनाव का फैसला लिया गया।
 
शिमला से राकेश कुमार की रिपोर्ट.

उत्‍तराखंड के मुख्‍य सचिव से मिलकर पत्रकारों ने विज्ञापन नीति का किया विरोध

 

देहरादून। प्रदेश के मुख्‍य सचिव ने कहा कि समाचार पत्रों के लिए किसी भी विज्ञापन नीति पर जल्दबाजी पर निर्णय नहीं लिया जायेगा और सभी पत्रकारों की सहमति ली जायेगी। मुख्य सचिव व आलोक कुमार जैन ने यह बात उत्तराखण्ड प्रिन्ट मीडिया विज्ञापन नियमावली 2012 पर विरोध् जताने के लिए उनसे मिलने आये उत्तराखंड संयुक्त पत्रकार संघर्ष समिति के शिष्टमंडल से कही।
 
उत्तराखंड संयुक्त पत्रकार संघर्ष समिति से जुड़े सैकड़ों पत्रकारों ने आज सचिवालय में मुख्य सचिव श्री जैन से मुलाकात की और सूचना विभाग द्वारा थोपी जा रही प्रस्तावित उत्ताखण्ड प्रिंट मीडिया विज्ञापन नियमावली के विरोध् में ज्ञापन सौंपा। इस मौके पर समिति के संयोजक अनिल वर्मा ने मुख्य सचिव को बताया कि नई विज्ञापन नीति लागू हो गयी तो लघु एवं मझोले समाचार पत्रों और उनसे जुड़े हजारों लोगों के समक्ष रोजी-रोटी का संकट उत्पन्न हो जायेगा। ज्ञापन में पत्रकारों ने प्रस्तावित विज्ञापन नीति को पूरी तरह से निरस्त करने की मांग की।
 
पत्रकारों की बात सुनने के बाद मुख्य सचिव ने आश्वस्त किया कि किसी भी नई विज्ञापन नीति पर सभी पत्राकारों की सहमति ली जायेगी और जल्दबाजी में कोई निर्णय नहीं लिया जायेगा। मुख्य सचिव से मिलने वालों में अनिल वर्मा के साथ ही सुरेन्द्र अग्रवाल, निशीथ सकलानी, संजय श्रीवास्तव, कपिल गर्ग, सोमपाल सिंह, रचना गर्ग, नरेश रोहिला, विवेक वर्मा, राजेश, असन मोगा, कृष्ण गोपाल, मुल्कराज शर्मा, पवन कुमार गुप्ता, राजेश कुमार भटनागर, कमांडर के एस चौहान, नीलेश कुमार आदि पत्रकार शामिल रहे।    

दूसरों को नसीहत, खुद मियां फजीहत

 

: भास्कर प्रबंधन पहले कर्मचारियों का गुटका छुड़वाएं : बठिंडा: दूसरो को नसीहत, खुद मियां फजीहत। यह कहावत दैनिक भास्कर पर बिल्कुल सटीक बैठती है। पंजाब भर में गुटका पर रोक लगाने के लिए अभियान चलाने वाले भास्कर प्रबंधन को चाहिए कि वह सबसे पहले भास्कर में काम करने वाले उन कर्मचारियों व अधिकारियों को गुटका खाना बंद करवाए जो गुटका चबाए बिना एक पल भी नहीं रह सकते। 
 
दैनिक भास्कर ने पंजाब भर में गुटका पर पाबंदी लगाने के लिए हस्ताक्षर अभियान शुरू कर रखा है, भास्कर कार्यालयों में गुटका पर पाबंदी लगाने के लिए समाज सेवी संगठनों की डिवेट करवाई जा रही है। लेकिन हास्यस्पद बात यह है कि लोगों को रोजाना समाचार पत्र के जरिए गुटका छोडऩे का आह्वान करने वाले भास्कर के कई अधिकारी व कर्मचारी गुटका सेवन करने के इतने अभ्‍यस्‍त हैं कि वह एक मिनट भी इसके बिना नहीं रह सकते। हम आपको बठिंडा यूनिट में ले चलते हैं। यहां एक अधिकारी ऐसे हैं जो दिन में दो दर्जन के करीब गुटका की पुड़िय़ा चट कर जाते हैं।
 
अब भई गुटका खाएंगे तो उसे थूकने के लिए भी जगह तो चाहिए न। अब जगह चाहिए तो बनारस की गलियों की याद न आए उस पीकदान को देखकर जो इस अधिकारी के टेबल के नीचे पड़ा होता है, तो लानत है ऐसे गुटका खाने पर। ये अलग बात है कि काम करने वाले अन्य साथी अधिकारी की गुटका खाने का अंदाज देखकर खासे परेशान हैं। गुटका के खिलाफ शुरू हुए अभियान से कर्मचारियों को उम्मीद जगी थी कि शायद यह अधिकारी गुटका खाना बंद कर देंगे लेकिन आज कल वह गुटका तो खाते हैं लेकिन छिप-छिप कर। गुटका खाने की आदत बठिंडा के अलावा पंजाब भर के भास्कर कार्यालयों में अभी भी आम देखी जा सकती है। 

उत्‍तराखंड में विज्ञापन नियमावली की आड़ में लघु समाचार पत्रों की हत्‍या की कोशिश

 

देहरादून। उत्तराखंड में लोकतंत्र के चौथे स्तंभ यानी मीडिया पर विज्ञापन नियमावली की आड़ में अघोषित आपात लगाने की तैयारी में विजय बहुगुणा की सरकार लग गई है। ऑपरेशन गला घोटू की जिम्मेदारी दी गई है भाजपा के मुख्यमंत्री रहे बीसी खंडूड़ी के खासमखास अधिकारियों में शुमार आईएएस अधिकारी दिलीप जावलकर को।
 
हालांकि उत्तराखंड प्रिंट मीडिया विज्ञापन नियमावली-2012 नाम की जो साजिश रची जा रही है उसका पूरा तानाबाना बुना है उत्तराखंड सूचना निदेशालय में अपर निदेशक डा. अनिल चंदोला ने। चंदोला की गिनती राज्य में हरीश रावत के किचन कैबिनेट में शामिल लोगों में की जाती है। डा. चंदोला भाजपा सरकार में भी काफी रसूखदार अधिकारी माने जाते थे। ये जितने भ्रष्‍टाचार के लिए कुख्यात रहे भाजपाई मुख्यमंत्री डा. रमेश पोखरियाल निशंक के करीबी थे, उतने ही तथाकथित ईमानदार मुख्यमंत्री भुवनचंद खंडूरी की भी नजदीकी प्राप्त करने में सफलता प्राप्त की थी। इससे डा. चंदेाला की डिप्लोमेटिक अनुभव का अंदाजा लगाया जा सकता है।
 
चंदोला जी महिला सशक्तिकरण के प्रखर हिमायती भी हैं, तभी तो इन्होंने देहरादून में एक महिला पत्रकार को आज 21 समाचार पत्रों की मालकिन बना दिया। चर्चाओं की माने तो चंदेाला जी जब भी स्टेशन रोड पर स्थित एक प्लाजा के आसपास देखे गए तभी महिला पत्रकार के अखबारों की सूची में एक अखबार की वृद्धि हो गई। खैर चंदोला जी की गुणगाथा के कई अध्याय है जिनका वाचन किया जाएगा तो कई दिन लग जाएंगे। जैसे चंदोला जी बहुत कम बोलते हैं, लोगों को खुश रखते हैं और जिसने इनके कारनामों पर उंगली उठाई उसका बोरिया बिस्तर बंधवाने की महारत भी रखते हैं।
 
लेकिन इनकी जो सबसे बड़ी खूबी है वो है मुख्यमंत्री के साथ साथ इनके विभाग में कोई भी महानिदेशक आए उसे ये तुरंत पटाने में भी माहिर हैं। उससे सारे अच्छे बुरे काम करवाएंगे और उसने अगर जरा भी अपनी वरिष्‍ठता दिखाई तो अपने तलवे चाटने वाले पत्रकारों के माध्यम से उसके खिलाफ ऐसी साजिश रचते हैं कि उसे अपना बोरिया बिस्तर उठाकर भागने के लिए विवश होना पड़ता है। इसके उदाहरण हैं पूर्व महानिदेशक अरविंद सिंह हयांकी, आईएएस अक्षत गुप्ता, आईएएस सुबर्द्धन, विनोद शर्मा और शायद इसी कड़ी में जल्द ही आईएएस और राज्य में ईमानदार अधिकारी होने की छवि बना चुके दिलीप जावलकर का नाम भी इस जुड़ जाए।
 
जी हां आईएएस दिलीप जावलकर की छवि राज्य में ईमानदार अफसर की है और उन्होंने पौड़ी और देहरादून में जिलाधिकारी के रूप में अपने आप को ईमानदार और तेजतर्रार साबित भी किया है। लेकिन जैसे ही राज्य में निजाम बदला और जावलकर को अपर सचिव मुख्यमंत्री के साथ साथ महानिदेशक सूचना की जिम्मेदारी मिली डा. अनिल चंदोला ने इनके आगे पीछे घूमना शुरू कर दिया। लेकिन दिलीप जावलकर के सामने जब इनकी नहीं चली और उन्होंने इनसे साफ कह दिया कि मैं इस विभाग की छवि को सुधारने के लिए दृढ़ प्रतिज्ञ हूं और अब यहां पर पुराने ढर्रे में बदलाव किया जाएगा तो चंदोला के पैरों तले जमीन खिसक गई। 
 
चंदोला को जब लगा कि अब जावलकर के रहते उनका काम धाम बंद होने वाला है तो उन्होंने तुंरत अपने दिमाग को सक्रिय कर दिया और अपने हमराज अधिकारियों वित्त अधिकारी ओमप्रकाश पंत, व्यवस्था अधिकारी कलमसिंह चौहान, प्रशासनिक अधिकारी चंद्रसिंह तोमर, रमेशराम आर्य जैसे लोगों की एक गुप्त बैठक बुलाई, जिसमें दिलीप जावलकर के इरादों को बताया। बताया जा रहा है कि लंबी चर्चा और विचार विमर्श के बाद इन लोगों ने एक ऐसा रास्ता निकाला जिससे जावलकर की तेजी धरी की धरी रह गई और वे फंस गए अपने ही लोगों के एक ऐसे जाल में जिससे निकलना शायद उनके लिए मुश्किल ही नहीं बल्कि नामुमकिन है। जी हां जो उत्तराखंड प्रिंट मीडिया विज्ञापन नियमावली-2012 भाजपा के पांच साल के शासन में धूल खा रही थी उसे बहुगुणा के छह माह के कार्यकाल में ही निकाला और जावलकर को ऐसी पट्टी पढ़ाई कि वे इसे लागू करने के लिए अड़ गए हैं।
 
अब जैसे ही दिलीप जावलकर ने इस नियमावली को इंप्लीमेंट करने की घोषणा की देहरादून के पत्रकार जगत में आग लग गई। क्योंकि इस नियमावली में जो प्रावधान किए गए है वह न सिर्फ यहां के लघु समाचार पत्रों का गला घोंट देंगे बल्कि आठ सौ से अधिक समचार पत्रों में काम करने वाले तकरीबन ढाई हजार लोगों को एक झटके में बेरोजगार भी कर देंगे। बेरोजगारी के इस दौर में जो सड़क पर आएगा तो वह न तो विजय बहुगुणा की सरकार को बख्शेगा और न ही अभी तक अच्छे अधिकारी की छवि बना चुके दिलीप जावलकर को। अब इस नियमावली के लागू होने पर नुकसान न केवल लघु समाचार पत्रों को होगा बल्कि की विषम परिस्थितियों में सरकार चला रहे विजय बहुगुणा की कुर्सी भी हिलनी तय है। इसका विरोध शुरू भी हो गया है। 
 
जिस दिन नियमावली बनने की खबर देहरादून के पत्रकारों को लगी उसी दिन उन्होंने उत्तराखंड संयुक्त पत्रकार संघर्ष समिति का गठन कर अपना नेतृत्व आरटीआई एक्टिविस्‍ट और राष्‍ट्रीय स्वरूप अखबार के ब्यूरोचीफ सुरेन्द्र अग्रवाल को सौंप दिया। उज्जवल रेस्टोरेंट में पत्रकारों की आपात बैठक हुई उसमें तय किया गया कि इसके विरोध में सूचना दिनेशालय पर धरना दिया जाए। धरना भी अपने नियत समय पर हुआ और पत्रकारों ने वहां पर न सिर्फ दिलीप जावलकर का पुतला फूंका बल्कि व्यस्ततम ईसी रोड को ढाई घंटे जाम कर दिया, जिसके चलते सीओ डालनवाला मणिकांत मिश्रा को भारी पुलिस बल के साथ आना पड़ा लेकिन उनके कहने पर भी पत्रकारों ने जाम नहीं खोला तो अंत में खुद महानिदेशक सूचना दिलीप जावलकर को धरना स्थल पर आना पड़ा। दिलीप जावलकर आए तो सीधे पत्रकारों के बीच पहुंच गए। बातचीत हुई लेकिन जावलकर ने नियमावली में ढील देने से मना किया, जिससे दोनों पक्षों से बातचीत के रास्ते बंद हो गए और आन्दोलित पत्रकारों ने फिर जावलकर के खिलाफ मोर्चा खोल दिया।
 
हालांकि इसमें एक उल्लेखनीय और निंदनीय बात यह रही कि ढाई सौ पत्रकारों के धरने को अपने आप को लोक मीडिया कहने वाले चार प्रमुख समाचार पत्रों दैनिक जागरण, अमर उजाला, हिन्दुस्तान और राष्‍ट्रीय सहारा ने अपने यहां कोई स्थान नहीं दिया। हालांकि इन समाचार पत्रों का दावा है कि हम किसी के दबाव में नहीं आते और सच को सच कहने की हिम्मत रखते हैं लेकिन जिस दिन पत्रकारों का धरना हुआ उस दिन सूचना के भगवान यानी डा. चंदोला ने इन सभी समाचार पत्रों को खुद फोन किया और अपने ढंग से समझा दिया कि इन पत्रकारों की खबर यदि छपती है तो उसका इनको क्या नुकसान हो सकता है और नहीं छपती है तो क्या फायदा हो सकता है। हालांकि चंदोला ने ऐसा इसलिए नहीं किया कि खबर छपेगी तो बात मुख्यमंत्री तक पहुंचेगी बल्कि उन्होंने ऐसा शायद इसलिए किया कि अगर मुख्यमंत्री को पता चला तो वे इस नियमावली को रद्द करने का आदेश दे देंगे। 
 
खैर इस बात को दिलीप जावलकर जैसा अधिकारी नहीं समझ रहा होगा ये मानना भी थोड़ा मुश्किल है। इससे लगता है कि वे खुद इस विभाग के लोगों से उब गए हैं और चाह रहे है कि उन्हें यहां से जल्दी हटा दिया जाए। बहरहाल मुख्यमंत्री कई दिनों से आपदा को लेकर दिल्ली में हैं और पत्रकार संघर्ष समिति ने दिलीप जावलकर के खिलाफ मोर्चा खोलते हुए कैबिनेट मंत्री डा. हरक सिंह रावत, पूर्व मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी, मुख्य सचिव आलोक जैन और सचिव सूचना आईएएस एमएच खान से मुलाकात कर अपना दुःख इन अधिकारियों को सुनाया है और लिखित में ज्ञापन भी दिया है। कैबिनेट मंत्री डा. हरक सिंह रावत ने जहां तुंरत अपने मोबाईल से मुख्यमंत्री से बात कर इसका विरोध किया है वहीं एनडी तिवारी और मुख्य सचिव आलोक जैन ने भी पत्रकारों को उनके साथ अन्याय न होने देने का आश्‍वासन दिया है। रिपोर्ट लिखे जाने तक जहां पत्रकारों ने अपनी लड़ाई को और व्यापक रूप देते हुए मुख्यमंत्री आवास घेरने का फैसला किया है साथ ही इन पत्रकारो ने डा. अनिल चंदोला की कुटिल चाल को समझते हुए उन पर निशाना लगाने का निर्णय लिया है। पत्रकारों ने डा. अनिल चंदोला की कुछ सालों में जमा की अकूत संपत्ति का आरटीआई के माध्यम से खुलासा करने की योजना भी बनाई है। बहरहाल इस लड़ाई का अंजाम क्या होगा ये तो आने वाला वक्त ही बताएगा।
 
देहरादून से एक पत्रकार द्वारा भेजी गई रिपोर्ट. 

फोन हैकिंग मामले में एक और पत्रकार गिरफ्तार

 

लंदन : ब्रिटेन में फोन हैकिंग विवाद की जांच के तहत आज सुबह एक पत्रकार और एक पुलिस अधिकारी को गिरफ्तार कर लिया गया। इस विवाद में न्यूज ऑफ द वर्ल्ड टैबलायड शामिल था जिसे गत जुलाई में प्रमुख मीडिया व्यवसायी रूपर्ट मडरेक ने बंद कर दिया था। दोनों गिरफ्तारियां आपरेशन एल्वेडेन के तहत की गई। इस जांच के तहत पत्रकारों की ओर से सूचनाएं प्राप्त करने के लिए सरकारी अधिकारियों को किये गए भुगतानों की जांच की जा रही है ताकि उसका खबरों में इस्तेमाल किया जा सके।
 
स्काटलैंड यार्ड ने गिरफ्तार किये गए लोगों के नाम नहीं बताये लेकिन कहा कि 37 वर्षीय पत्रकार को उत्तर लंदन स्थित उसके आवास से जबकि 29 वर्षीय पुलिस अधिकारियों को उसके ससेक्स स्थित आवास से गिरफ्तार किया गया। (एजेंसी)

सड़क हादसे में सहारा के दो पत्रकार घायल

 

औरंगाबाद जिले युवा पत्रकार गणेश प्रसाद और संतोष कुमार एक सड़क हादसे में घायल हो गए. यह हादसा उस समय हुआ जब वे कार्यालय से न्‍यूज भेजने के बाद अपनी बाइक से घर वापस लौट रहे थे. उनकी बाइक के सामने अचानक एक पशु आ गया, जिससे टकराने के बाद दोनों लोग गिर गए. उन्‍हें गंभीर चोटें आईं. उन्‍होंने इसकी सूचना अपने परिचितों को दी. दोनों का इलाज औरंगाबाद के सदर अस्‍पताल में कराया गया. 
 
दोनों पत्रकार खतरे से बाहर बताये जा रहे हैं. गणेश प्रसाद राष्‍ट्रीय सहारा तथा संतोष कुमार सहारा समय के लिए काम करते हैं. डाक्‍टरों ने उम्‍मीद जताई है कि दोनों लोग जल्‍द ठीक हो जाएंगे. दुर्घटना की सूचना मिलने पर दोनों पत्रकारों के कई शुभचिंतक अस्‍पताल पहुंच गए. 

डेन केबल के आने से डिजी केबल में इस्तीफों का दौर जारी

 

आगरा से जल्द ही एक नए केबल डेन का प्रसारण होने जा रहा है, जिसके कारण डिजी केबल में इस्तीफों का दौर जारी है. अभी हाल में ही यहाँ से तेज तर्रार पत्रकार राहुल ठाकुर, एंकर मीनू व पत्रकार जीतेन्द्र, एंकर आशियाँ खान आदि  ने इस्तीफा दे दिया है.  बताया  गया है कि वह जल्द ही आगरा से प्रारंभ होने जा रहे डेन केबल से अपनी नई पारी प्रारंभ कर सकते हैं.
 उधर जल्द ही आगरा की एक अन्य केबल मून टीवी में से भी इस नए केबल के लिए इस्तीफे देखने को मिल सकते हैं. क्योंकि मून ट्रेनिंग स्कूल के नाम से विख्यात यह केबल कभी पूरे उत्तर प्रदेश में ठेके हासिल करने वाले सरदार मोहन सिंह के पुत्र सुरजीत सिंह का है. जहाँ वेतन अत्यंत ही न्यूनतम है. इसलिए यहाँ से जल्द ही लोगों का पलायन हो सकता हैं. जिसकी सेटिंग में मून केबल के पत्रकार लगे हुए हैं.

मुकेश बने संपूर्ण माया के झारखंड ब्‍यूरो प्रमुख

 

राजनाम पोर्टल के संचालक-संपादक मुकेश भारतीय ने अब एक और नई जिम्मेवारी संभाली है। वे नई दिल्ली से प्रकाशित राष्ट्रीय समाचार पत्रिका संपुर्ण माया के झारखंड ब्यूरो प्रमुख ( मुख्य संवाददाता) के रुप में कार्य भार संभाल लिया है। श्री भारतीय को यह जिम्मेदारी पत्रिका के प्रकाशक संदीप मित्रा ने सौंपी है। पत्रिका के प्रिंट लाइन में मुकेश भारतीय को राष्ट्रीय समाचार पत्रिका संपुर्ण माया के झारखंड ब्यूरो प्रमुख ( मुख्य संवाददाता) के नाम उल्लेखित है।
 
हाल ही में उनके बेबसाइट www.raznama.com पर प्रसारित कुछेक खबरों को लेकर एक अंग्रेजी दैनिक के बिल्डर संपादक द्वारा सत्ता की सांठ-गांठ से 15 लाख की रंगदारी मांगने के आलावे कई मन गढ़ंत-गंभीर आरोप लगा कर पुलिस ने उन्हें आनन-फानन में जेल भेज दिया था। लेकिन 12 दिनों बाद उन्हें आसानी से जमानत मिल गई। इस संदर्भ में प्रकाशित राष्ट्रीय समाचार पत्रिका संपुर्ण माया के झारखंड ब्यूरो प्रमुख (मुख्य संवाददाता) के रुप में कार्य भार संभालने के बाद मुकेश भारतीय ने कहा कि उनका लक्ष्य झारखंड के चप्पे-चप्पे में तथ्य परक सत्य सूचनायें पहुंचानी है। उन्होंने यह भी कहा कि किसी भी परिस्थिति में राजनामा.कॉम का प्रसारण जारी रहेगा।

खूबसूरती का बदसूरत “अंत”,आखिर क्यों?

 

गीतिका शर्मा और अनुराधा बाली उर्फ फिज़ा। दोनो ही खूबसूरत, बेबाक। मगर अंत दोनों का ही दर्दनाक। एक ने मौत को गले लगा लिया। दूसरी (फिज़ा) की लाश लावारिश हाल में उसी की देहरी के अंदर मिली। सड़ी-गली हालत में। फिज़ा जीते-जी जिस कदर खूबसूरत थी। संदिग्ध मौत के बाद उनकी लाश उतनी ही डरावनी मिली। लाश को देखकर अच्छे अच्छों की घिग्घी बंध जाये। कमोबेश गीतिका की भी मौत ने सबको हिला दिया। उसकी लाश भी अपनी ही देहरी के भीतर फंदे पर लटकी मिली।
 
अब सवाल यह पैदा होता है, कि आखिर इतनी उच्च शिक्षित, खूबसूरत महिलाओं की इतनी बुरी और अकाल मौत क्यों? क्या अपनी मौत के लिए एक हद तक यह भी जिम्मेदार हैं? या फिर गोपाल कांडा और चंद्र मोहन उर्फ चांद मोहम्मद या फिर किसी और के ही सिर इनकी मौत का ठीकरा फोड़ देना चाहिए? यहां मेरी इस सोच या सवाल का ताल्लुक, इससे कतई नहीं है, कि फिज़ा और गीतिका की मौत का ठीकरा इन्हीं के सिर फोड़ देना चाहिए। मुद्दा बहस और खुलकर बात करके कोई बेहतर कारण या तर्क खोजने का है।
 
कहते हैं कि किसी की मौत के बाद उस पर सवाल नहीं खड़े करने चाहिए। मैं भी इससे सहमत हूं। जब किसी की मौत के बाद समाज में से ही सवाल पैदा होने लगें, तो उन सवालों को “ज़िंदा दफन”कर देना भी तो किसी “भ्रूण-हत्या”से कम नहीं आंका जायेगा। मात्र तीन साल की नजदीकियों में एक एअर होस्टेस एक कीमती फ्लैट और एक कीमती कार की मालकिन बन जाती है। कैसे? एक एअर होस्टेस तीन साल की नौकरी में ही कंपनी के एक्जीक्यूटिव डायरेक्टर बना दी जाती है। कैसे? जब कीमती फ्लैट और कार मिलती है? तब समाज पड़ोसी, परिवार में से कोई भी किसी को नहीं बताता है। आखिर क्यों?
 
क्यों नहीं उसी वक्त दुत्कार दी जाती है वो कीमती कार। वो कीमती फ्लैट। और उस क्रूर इंसान को, जो देता है कीमती फ्लैट और कीमती कार। क्या अगर ऐसा हो जाता, तो भी गोपाल कांडा की इतनी औकात हो सकती थी, कि वो गीतिका के घर में घुस पाता? परिवार के लोगों के साथ फोटोग्राफी करा पाता। गोपाल कांडा के दफ्तर की कोई कर्मचारी अरुणा चड्ढा धमका पाती गीतिका को। जबरदस्ती फोन पर दफ्तर बुलाकर कुछ दस्तावेजों पर दस्तखत कराने के लिए। क्या गीतिका को सामना करने की नौबत आती उन हालातों से, जो उसकी अकाल मौत का कारण बन गये। शायद कभी नहीं। बशर्ते, आज जिस गोपाल कांडा को कटघरे में खड़ा किया जा रहा है, उसी गोपाल कांडा के पैर शुरुआत में ही उखाड़ दिये गये होते। तो उसके पैरों को जमने के लिए ज़मीन ही नहीं बन पाती। लेकिन ऐसा हुआ नहीं। इसके लिए जिम्मेदार दोनो बराबर के हैं। गीतिका शर्मा और गोपाल कांडा। हो सकता है, हर कोई मेरे मत से सहमत न हों, लेकिन यह मेरा मत है। सबका मत नहीं।
 
अब बात करते हैं फिज़ा की। अच्छी खासी कानून की पढ़ाई करके इज्जतादर नौकरी कर रही थीं। निजी ज़िंदगी में चंद्र मोहन आये। खुशियां लेकर आये। जब चंद्र मोहन, फिज़ा की ज़िंदगी में “चांद” बनकर चमके, उस वक्त कल्पना करना भी बेईमानी होगा फिज़ा के लिए, कि यह चांद जब उनकी ज़िंदगी में डूबेगा, तो अंधेरे के अलावा कुछ नहीं दिखाई देगा। हुआ भी वही। जिस चंद्र मोहन ने फिज़ा के लिए धर्म बदल लिया। वही चंद्र मोहन उर्फ चांद मोहम्मद पलट गया। उसे अपनी पुरानी बीबी और असली बच्चे याद आने लगे। अब बताइये इसे क्या कहेंगे? चंद्र मोहन उर्फ चांद मोहम्मद की गद्दारी या फिर अनुराधा बाली उर्फ फिज़ा की कम-अक्ली या इंसान को पहचानने में ज़िंदगी की सबसे बड़ी भूल? जो भी हो, कहीं न कहीं कुछ न कुछ तो कमजोरी रही फिज़ा की। बहरहाल अंत फिज़ा का भी जिसने देखा, उसे काठ मार गया। फिज़ा की लाश के फोटो देखकर। हर किसी के मुंह से यही निकला- हे भगवान ऐसी मौत किसी को मत देना।

 
इस सबको लिखने के पीछे बस मकसद इतना सा है, कि हर मौत अपने पीछे सवाल छोड़ती है। हर मौत के सवाल का जबाब कोई किसी से मांगता भी नहीं है। लेकिन जब किसी “खूबसूरत” की “बदसूरत” मौत होती है। शोर तभी ज्यादा मचता है। और सवाल भी तभी ज्यादा निकलकर सामने आते हैं। आखिर क्यों?
 
लेखक संजीव चौहान की गिनती देश के जाने-माने क्राइम रिपोर्टरों में होती हैं. वे पिछले दो दशक से पत्रकारिता से जुड़े हुए हैं. इन दिनों न्‍यूज एक्‍सप्रेस चैनल में एडिटर (क्राइम) के रूप में सेवाएं दे रहे हैं. ये लेख इनके ब्‍लॉग क्राइम वॉरियर पर प्रकाशित हो चुका है, वहीं से साभार लिया गया है. इनसे संपर्क patrakar1111@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.

महेश भट्ट ने दी पत्रकार कुलदीप मिश्र को धमकी

 

दैनिक भास्‍कर, चंडीगढ़ के सीनियर जर्नलिस्‍ट कुलदीप मिश्र से फिल्‍मकार महेश भट्ट ने बदतमीजी की, धमकी दी. महेश अपनी फिल्‍म जिस्‍म 2 को लेकर मीडिया से मुखातिब थे. घटना शुक्रवार की है. कुलदीप ने उनसे कुछ सवाल पूछे तो महेश भट्ट उखड़ गए. तू तड़ाक तो किया ही कुलदीप को धमकी भी दी कि तू बाहर मिल तो तेरी नेट सर्फिंग करता हूं सारी. कुलदीप ने इस घटना का विरोध करते हुए अपने ब्‍लॉग पर भी लिखा है. जिसे नीचे प्रकाशित किया जा रहा है.
 
महेश भट्ट ने मुझे कहा, बाहर मिल तेरी नेट सर्फिंग चेक करता हूं
 
मुझे अंदाजा नहीं था कि महेश भट्ट ऐसे घटिया तर्क देंगे और इतनी जल्दी सवालों से असहज हो जाएंगे। मेरे कुछ सवालों पर वह तू-तड़ाक पर उतर आए। धमकी भी दी कि 'बाहर मिल'। हाहाहा। मैं उपलब्धि समझता हूं इस बातचीत को। कि मेरे सवाल उन्हें उनके कम्फर्ट ज़ोन से बाहर लेकर आए। माफ़ कीजिएगा मैं गुडी गुडी जर्नलिस्ट नहीं हो पाऊंगा जो चाशनी में भिगोकर सवाल पूछता रहे।
 
 'पब्लिक टेस्ट और सेक्सुएलिटी का गेटकीपर कौन है? ऑडियंस कामुक चीजें देखना पसंद करती है। उन्हें यही चाहिए, जितना ज्यादा हो सके उतना चाहिए। इंडिया में सांस्कृतिक दोगलापन है।' 
 
 ऐसे कितने फिल्ममेकर होंगे, जो रिपोर्टर के सवालों का जवाब तू-तड़ाक की भाषा में दें। पर महेश भट्ट उनमें से एक हैं। शुक्रवार को जब थिएटर में जिस्म-2 रिलीज हो रही थी, वह अपनी पूरी टीम के साथ चंडीगढ़ के एक क्लब में प्रेस कॉन्फ्रेंस करने पहुंचे। साथ में पूजा भट्ट, सनी लियोनी, रणदीप हुड्डा और अरुणोदय सिंह भी थे। समाज और सिनेमा के रिश्ते से बात शुरू हुई थी, फिर यलो जर्नलिज्म तक गई और अभद्रता पर ख़त्म हुई। महेश ने मुझसे कहा, 'बाहर मिल, देखता हूं तुझे। तेरी नेट सर्फिंग चेक करता हूं सारी।'
 
महेश भट्ट से पूरी बातचीत इस तरह थी
 
– आप जब न्यूज चैनलों पर बोलते हैं तो समझदारी भरी सोशल-पॉलिटिकल बातें करते हैं। वहां आपका अलग रूप दिखता है, पर आपकी फिल्मों में वो बात नहीं आ पाती। खास तौर से जैसी फिल्में आप पिछले कुछ सालों से बना रहे हैं। जिस्म-2 जिस समाज के बारे में है, क्या आप उसी समाज की बात करते हैं और वैसा ही समाज बनाना चाहते हैं?
 
— आप तोते की तरह रटकर तो सवाल पूछ रहे हैं। 40 साल से ये पूछा जा रहा है। मैं फिल्मों से रोजी कमाता हूं। जब 'अर्थ' और 'सारांश' बनाता हूं तो आप तारीफ करते हैं, देखते नहीं हैं। देखते आप सिर्फ 'मर्डर' और 'जिस्म' हैं। हॉल बुक हो जाते हैं जब जिस्म-2 बनाता हूं। मतलब साफ है कि ऑडियंस ऐसी ही फिल्में चाहती है। पॉर्न इंडस्ट्री 100 बिलियन डॉलर की है, यानी कोई तो उसके लिए जेब ढीली कर रहा है। मैं फिल्में बनाता हूं, भारतीय कानून के दायरे में रहकर। क्या कोई फिल्म देखकर आपका जेहन खराब हुआ। सेंसर बोर्ड ने ए, यू, यूए जैसे सर्टिफिकेट किस लिए बनाए हैं। संविधान मुझे ऐसी फिल्में बनाने की इजाजत देता है। और अगर आपका कल्चर इतना कमजोर है कि एक फिल्म से टूट जाए तो मुझे आप पर तरस आता है।
 
– सवाल कल्चर नहीं, सोसाइटी का था। ये तो चीजें बेचने की बौद्धिकता हुई। लोग जो चाहते हैं, हम वही परोसते हैं, इसी तर्क से लोग यलो जर्नलिज्म को भी जायज ठहराते हैं। आप उनसे सहमत हैं?
 
— आप और कर क्या रहे हैं। आप वैसा ही जर्नलिज्म कर रहे हैं। आप समझते हैं कि भरी भीड़ में मुझे नीचा दिखा देंगे?
 
– मेरा बिल्कुल ऐसा मकसद नहीं है। मेरी बात ख़त्म हो जाएगी, आप बस इतना बता दीजिए कि इसी तर्क से दुनिया की बहुत सारी सनसनीखेज चीजें जायज ठहरा दी जाती हैं। आप उन सबसे सहमत हैं?
 
— भैया हम बहुत बुरे लोग हैं। हम ऐसी ही समाज खराब करने वाली फिल्में बनाएंगे। मैंने शैतान को पूजने की कसम खाई है, तुम ईश्वर को पूजते रहो। बरसों पहले एक बूढ़ा रिपोर्टर मिला था। वो भी ऐसा ही कह रहा था। तेरे जैसे बहुत देखे हैं। तू मिल मेरे को बाहर जरा। मैं देखता हूं। तेरी नेट सर्फिंग चेक करता हूं सारी।

कश्‍मीर में आतंकियों ने पत्रकारों को दी धमकी

 

कश्मीरी पंडितों को वादी छोड़ने की धमकी देने के चार दिन बाद आतंकियों ने पत्रकारों को फरमान सुनाया है कि वे कश्मीर में आतंकी हिंसा व अलगाववाद के प्रति अपना नजरिया बदलते हुए इसे सकारात्मक ढंग से लोगों को तक पहुंचाएं, अन्यथा गंभीर परिणाम भुगतने के लिए तैयार रहें। आतंकियों ने यह धमकी भरा फरमान किसी पोस्टर के जरिये नहीं, बल्कि वादी में कुछ समाचारपत्र कार्यालयों और पत्रकारों को खत भेजकर किया है।
 
हाथ से लिखे खत में आतंकी कमांडर अबु इरफान ने मीडियाकर्मियों से कहा कि वह कश्मीर में जारी उनकी जिद्दोजहद और जेहाद को पत्रकार भारतीय एजेंसियों के कहने पर नकारात्मक तरीके से पेश कर रहे हैं। इससे जेहाद और कश्मीर में आजादी की तहरीक को नुकसान पहुंच रहा है। हम ऐसे पत्रकारों और टीवी चैनलों को खबरदार करते हैं कि वह अपना तौर तरीका बदल लें और कश्मीर की तहरीक व जेहाद को नुकसान पहुंचाने के बजाय उसे बेहतर तरीके से लोगों तक पहुंचाएं। वह मुजाहिदों के कारनामों को अच्छे ढंग से दिखाएं। अगर ऐसा नहीं करते हैं तो फिर वह अपने अंजाम के लिए खुद जिम्मेदार होंगे।
 
इसके साथ ही समाचारपत्रों के संपादकों से इस फरमान को प्रकाशित करने को भी कहा गया है। इस संदर्भ में आइजीपी कश्मीर एसएम सहाय ने कहा कि हमारे पास अभी तक किसी भी समाचारपत्र अथवा मीडियाकर्मी की तरफ से कोई शिकायत नहीं आई है। हम अपने स्तर पर जांच करेंगे। चार दिन पहले बडगाम जिले में कश्मीर से पलायन न करने वाले कश्मीरी पंडितों के लिए बनाई गई शेखपोरा कॉलोनी में भी जैश-ए-मुहम्मद मुजाहिदीन नामक आतंकी गुट का धमकी भरा खत आया था। इस खत में कश्मीरी पंडितों को कश्मीर खाली करने का फरमान सुनाया गया था। (पी7)

दैनिक नवज्योति में पत्रकारों के बीच लात-घूंसा चला

 

जयपुर। राजस्थान की राजधानी जयपुर के सबसे प्राचीन समाचार पत्र दैनिक नवज्योति के स्टेशन रोड स्थित कार्यालय में सोमवार को सम्पादकीय कार्यालय में पत्रकारों के बीच लात-घूंसा जंग छिड़ गई। दो पत्रकारों की आपसी तू-तू मैं-मैं की लड़ाई इस कदर बढ़ी कि पूरे सम्पादकीय कार्यालय में जूतम-पैजार का दौर शुरू हो गया। 
 
सोमवार 6 अगस्त को दोपहर साढ़े तीन बजे करीब नवज्योति एक्सप्रेस के रिपोर्टर पुलकित और सब एडीटर रघुवीर जांगिड़ के बीच किसी मामले को लेकर बहस शुरू हो गई, जिसमें गाली-गलौच का प्रयोग शुरू होते ही दोनों आपस में भिड़ गए। इतने में ही मौके पर मौजूद अन्य पत्रकारों ने भी अपने चहेते व्यक्ति की नुमाइंदगी करते हुए एक-दूसरे पर जमकर लात-घूंसों की बारिश की। बाद में मामला उच्च प्रबंधन तक पहुंचा। हालांकि अभी भी दोनों पक्षों के बीच तनावपूर्ण माहौल बना हुआ है। 

पत्रकार सीमा आजाद को हाई कोर्ट से मिली जमानत

 

इलाहाबाद : सामाजिक कार्यकर्ता और पत्रकार सीमा आज़ाद को इलाहाबाद हाइकोर्ट से ज़मानत मिल गई है। देशद्रोह के आरोप में निचली अदालत ने सीमा आजाद को उम्रकैद की सजा सुनाई थी। सीमा को फरवरी 2010 को दिल्ली से इलाहाबाद पहुंचने पर स्टेशन पर ही गिरफ्तार किया गया था। पुलिस ने सीमा आज़ाद और उनके पति विश्व विजय पर देशद्रोह का मामला बनाया था और उनके पास से बड़ी संख्या में नक्सली साहित्य बरामद होने का दावा किया था। सीमा आजाद की रिहाई के लिए मानवाघिकार संगठनों ने आंदोलन भी चलाया था।
 
पत्रकार और मानव अधिकार कार्यकर्ता सीमा आज़ाद और उनके पति विश्व विजय पर पुलिस ने देश द्रोह का मामला बनाया था। उन्हें एक निचली अदालत ने इस आरोप में उम्र कैद की सज़ा सुना दी। इलाहाबाद हाइकोर्ट ने उन्हें ज़मानत देकर इंसाफ़ का भरोसा बनाए रखा है। सालों से सीमा गरीबों की आवाज उठा रही थीं। सीमा लोगों की आवाज उठाने के लिए दस्तक नाम की एक मैग्जीन भी निकाल रही थी। सीमा ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से साइकोलॉजी में एमए किया था और एक हमख्याल साथी से विश्वविजय से शादी की।
 
गिरफ्तारी के बाद पुलिस ने दोनों पर इल्जाम लगाया था भारत सरकार से युद्ध छेड़ने का। पुलिस का कहना है कि दोनों मिलकर केंद्र तख्तापलट कर माओवादी सरकार बनाना चाहते हैं। इसलिए दोनों देशद्रोही हैं। सीमा आजाद के वकील रवि किरण का कहना है कि पुलिस की दलील है कि जो झोले के अंदर से साहित्य मिला उसे पढ़ने से पता चलता है कि ये लोग आतंकवादी है, गैरकानूनी गतिविधियों में लिप्त हैं, आतंकवादी हैं और देशद्रोही हैं। किरण का कहना है कि पुलिस दोनों के खिलाफ एक भी अपराध साबित नहीं कर पाई। जो साहित्य अदालत में पेश किया गया उसकी सील टूटी हुई थी।
 
सीमा के साथियों का कहना है कि सीमा से सत्ता से जुड़े लोग नाराज थे। क्योंकि सीमा जबरन जमीन अधिग्रहण के खिलाफ, गैरकानूनी खुदाई और मायावती के गंगा एक्सप्रेसवे जैसी योजनाओं के खिलाफ अपनी मैग्जीन में मुहिम चला रही थीं। सीमा के पिता एमपी श्रीवास्तव का कहना है कि यह यब पुलिसिया साजिश थी और उसकी गिरफ्तारी अन्याय है। (एनडीटीवी)

सीरिया में सरकारी टीवी चैनल के इमारत में विस्‍फोट, कई घायल

 

बेरूत : सीरिया की राजधानी दमिश्क में स्थित देश के सरकारी टीवी चैनल की इमारत में बम विस्फोट में कई लोग घायल हो गए। सेना द्वारा राजधानी के बागियों के कब्जे वाले अंतिम इलाके पर कब्जा किए जाने की घोषणा के दो दिन बाद इमारत के तीसरे तल पर विस्फोट की यह सूचना सीरिया के सरकारी टीवी चैनल द्वारा जारी की गई।
 
वाणिज्यिक राजधानी अलेप्पो में सेना ने बागियों के ठिकानों पर बम बरसाए। इससे पूर्व सरकारी सुरक्षा अधिकारियों ने कहा था कि सेना ने अपनी तैयारी पूरी कर ली है और 20 हजार का मजबूत सैन्य दस्ता जमीनी हमले के लिए तैयार है। सूचना मंत्री उमरान अल जाओबी ने बताया कि सुबह हुए विस्फोट में किसी के मरने की सूचना नहीं है। उन्होंने कहा, यह स्पष्ट है कि किसी विस्फोटक पदार्थ से धमाका किया गया। हमारे कई साथी घायल हुए हैं, लेकिन कोई गंभीर घायल नहीं है और किसी की मौत भी नहीं हुई है।
 
खबर के मुताबिक, इस बम हमले में कम से कम तीन लोग घायल हुए। यह इमारत दमिश्क की घनी आबादी वाले इलाके में उमावीईंन में स्थित है। सूचना के अनुसार विस्फोट से इमारत की तीसरी मंजिल को नुकसान पहुंचा। सीरिया में गृहयुद्ध भड़कने से पिछले कुछ महीनों से आत्मघाती हमलों और बम विस्फोटों का दौर जारी है। सरकार की ओर झुकाव रखने वाले सीरिया के एक निजी टीवी चैनल ने विस्फोट का जायजा लेते और घायल सहकर्मी को संभालते टीवी इमारत के कर्मचारियों की तस्वीरें जारी कीं। इमारत में विस्फोट के बावजूद सरकारी टीवी का प्रसारण जारी रहा। (एजेंसी)

गोपाल कांडा : जूतों की दुकान से अरबपति बनने का सफर

 

सिरसा : गोपाल कांडा की सफलता की कहानी भी सपनों सरीखी है। 29 दिसंबर 1965 को जन्मे गोपाल कांडा केवल स्कूल लेवल तक पढ़े हैं। उनके पिता मुरलीधर कांडा एडवोकेट थे तो मां मुन्नी देवी गृहिणी हैं। पिता के देहांत के बाद घर-परिवार की जिम्मेदारी गोपाल कांडा और उनके भाई गोबिंद कांडा के कंधों पर आ गई।
 
दोनों भाइयों ने जूतों की दुकान खोली। यह वो समय था जब सिरसा शहर में गोपाल कांडा नामक युवक को बहुत कम लोग जानते थे। और जो जानते थे वह भी केवल इतना कि यह युवक अपने छोटे भाई के साथ जूते-चप्पल की दुकान चलाता है। इसके बाद दोनों भाइयों ने जूतों की फैक्ट्री खोल ली। आज वो फैक्ट्री तो नहीं है मगर जूतों का शोरूम आज भी हिसारिया बाजार में है। यही शोरूम आज कांडा बंधुओं का कैंप कार्यालय है।
 
ऐसा खड़ा किया एंपायर : कांडा के पास बिजनेस की कोई डिग्री नहीं है लेकिन किसी कारोबार को करने से नफा होगा या नुकसान, यह वे तुरंत भांप लेते हैं। एक बारगी तो उनकी संपत्ति कुर्क करने की नौबत भी आ गई थी लेकिन आज कांडा बंधु अकूत संपत्ति के मालिक हैं। फिर धीरे-धीरे दोनों राजनीति में आ गए। शुरू में दोनों इनेलो के करीब आए लेकिन जब वहां ज्यादा समय तक दाल नहीं गली तो दोनों भाइयों ने इनेलो छोड़ दी। 1998-99 में गोपाल कांडा गुड़गांव गए और प्रॉपर्टी डीलिंग के कारोबार से जुड़ गए। यह धंधा उन्हें खूब रास आया। एक के बाद एक संपत्ति जोड़कर वह आम से खास आदमी की श्रेणी में पहुंच गए।
 
एयरलाइंस बनाई : गोपाल कांडा ने 14 मार्च 2007 को एमडीएलआर एयरलाइंस बनाई। तीन साल घाटा उठाने के बाद डेढ़ साल पहले उन्होंने इसे बंद कर गोवा में कैसिनो खोला।
 
तारा बाबा के भक्त : गोपाल कांडा खुद को तारा बाबा का अनन्य भक्त बताते हैं और कहते हैं कि उन्हीं की कृपा और आशीर्वाद से वह आज इस मुकाम पर हैं। तारा बाबा सिरसा के ही संत थे। कांडा ने 2004-05 में करोड़ों रुपये खर्च कर तारा बाबा कुटिया का पुनर्निर्माण कराया और उसे धार्मिक स्थल का रूतबा दिला दिया। गोपाल कांडा श्री तारा बाबा चैरिटेबल ट्रस्ट के चेयरमैन हैं। उनके भाई गोबिंद कांडा कुटिया के मुख्य सेवक हैं।
 
2010 में बना महल : सिरसा में रानियां रोड पर तारा बाबा कुटिया से लगती जमीन में कांडा ने अपना आलीशान महल बनवाया है। यह महल देखने में किसी राजा का किला लगता है। इसकी दीवारें इतनी ऊंची हैं कि अंदर क्या चल रहा है, ये कोई देख तक नहीं सकता। कुटिया से लगती जमीन पर कांडा बंधुओं ने इसी सत्र से एमडीके इंटरनेशनल स्कूल भी शुरू किया है। यहां अस्पताल भी बनाया जा रहा है। साभार : भास्‍कर 

पहले भी विवादों से जुड़े रहे हैं गोपाल कांडा

 

गुड़गांव सिविल लाइन स्थित प्रदेश के गृह राज्य मंत्री और हरियाणा न्‍यूज के मालिक गोपाल कांडा की कोठी पर रविवार सुबह से ही मीडियाकर्मियों का जमावड़ा लगा रहा। दिल्ली की एयर होस्टेस के सूइसाइड के बाद ही यहां पर मीडिया वालों के अलावा लोगों का जुटना शुरू हो गया। हर कोई कांडा का पक्ष जानने को उत्सुक था। बाद में पता चला कि मंत्री अपनी कोठी पर नहीं हैं। इसी बीच दिल्ली पुलिस की टीम के आने की चर्चा हुई। इसी इंतजार में कई घंटों तक मीडिया वाले मंत्री जी की कोठी के सामने डटे रहे। वहां से गुजरने वाले लोगों में भी यह जानने की उत्सुकता हुई कि मंत्री के साथ क्या हुआ? 
 
इससे पहले भी प्रदेश के गृह राज्य मंत्री गोपाल कांडा विवादों के चलते चर्चाओं में रहे हैं। कांडा का दिल्ली की आर्थिक अपराध शाखा से भी दुर्व्यवहार की चर्चा सुर्खियों में रही है। देर शाम तक गुड़गांव के सिविल लाइन स्थित उनकी कोठी व ओल्ड तहसील स्थित उनकी एयरलाइंस के ऑफिस के सामने लोगों का जमावड़ा रहा। बता दें कि कांडा एमडीएलआर एयरलाइंस के एमडी भी हैं। इसी कंपनी में दिल्ली की एक एयर होस्टेस भी काम करती थी। रविवार को उसने दिल्ली के अशोक विहार में सूइसाइड कर लिया। सूइसाइड नोट में उसने कांडा को आत्महत्या के लिए उकसाने और मानसिक रूप परेशान करने का आरोप लगाया है। परिजनों का आरोप है कि कांडा युवती को मानसिक रूप से परेशान कर रहे थे। (एनबीटी)

गीतिका शर्मा आत्‍महत्‍या मामला : हरियाणा न्‍यूज के मालिक गोपाल कांडा ने दिया मंत्री पद से इस्‍तीफा

 

चंडीगढ़ : हरियाणा के विवादास्पद गृह राज्यमंत्री और हरियाण न्‍यूज चैनल के मालिक गोपाल कांडा ने रविवार शाम नई दिल्ली में मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा को अपना इस्तीफा सौंप दिया। एक एयर होस्‍टेस को आत्‍महत्‍या करने के लिए उकसाने के आरोपी बनाए गए कांडा इसके बाद से ही विवादों में आ गए थे। कांडा ने गुड़गांव में संवाददाताओं से कहा कि मैंने कोलकाता से लौटे मुख्यमंत्री को आज शाम अपना इस्तीफा सौंप दिया है।
 
पूर्व एयर होस्‍टेस गीतिका शर्मा ने रविवार को नई दिल्ली में आत्महत्या कर ली। अपने सुसाइड नोट में गीतिका ने आरोप लगाया है कि कांडा ने प्रताड़ित कर उसे आत्महत्या के लिए विवश किया। जिसके बाद पुलिस ने उनके खिलाफ मामला दर्ज कर लिया।

पत्रकार चंद्रेश की हत्‍या के मामले में पांच आरोपी गिरफ्तार

 

रायसेन : रायसेन जिले की पुलिस को छतरपुर के एक पत्रकार चंद्रेश खरे ओर अमित श्रीवास्तव की हत्या के मामले में पाँच आरोपियों को पकड़ने में सफलता मिली है। आरोपियों में एक सुल्तान एमसीए है तथा उसकी पत्नी अस्पताल में नर्स के पद पर कार्यरत है। जिला पुलिस अधीक्षक श्री आईपी कुलश्रेष्ठ ने बताया कि नूरगंज थाना क्षेत्र में विगत 10 जुलाई 2012 को इस दोहरे हत्याकांड को अंजाम दिया गया था। पुलिस को कोलार मार्ग पर झिरी ग्राम के पास बेतवा पुल के पास एक युवक कि क्षत विक्षत लाश वरामद हुई थी। जांच के दौरान मृतक की पहचान छतरपुर के एक पत्रकार चंद्रेश खरे के रूप में हुई थी। 
 
घटना स्थल से 500 किलो मीटर दूर छतरपुर के पत्रकार की लाश मिलना पुलिस के लिए चुनौती बन गया था। एसपी ने बताया कि प्रकरण की विवेचना में यह तथ्य सामने आया कि मृतक चंद्रेश खरे अपने अन्य साथियों अमित श्रीवास्तव्, सुल्तान सिंह आदि के साथ भोपाल में बेरोजगार युवकों को नौकरी तथा संविदा शिक्षकों की नियुक्ति दिलाने के मामले में दलाली का काम करते थे। इसी दौरान पैसे के लेन देन पर चंद्रेश खरे ओर सुल्तान सिंह का विवाद हो गया।  दोस्तों के बीच हुए रुपयों के इस लेन देन के विवाद में सुल्तान सिंह ने अपने साथियों मुकेश, राहुल शाही, सोनू के साथ मिलकर चंद्रेश का रस्सी से गला घोंटकर तथा चाकू से गला काट उसकी हत्या कर दी। लाश कोलार मार्ग पर झिरी ग्राम के पास बेतवा पुल के पास फेंक दी।
 
इसी बीच में पुलिस से अमित श्रीवास्तव के परिजनों ने संपर्क कर बताया कि अमित श्रीवास्तव भी इसी घटना के बाद से लापता है। पुलिस ने जब सुल्तान सिंह से कड़ाई से पूछताछ की तो सुल्तान ने बताया कि वह और उसके साथी चंद्रेश के साथ अमित को भी बेतवा पुल के पास लेकर गए थे, जहां उनकी हत्या कर दी थी।  सुल्तान की निशादेही पर झिरी ग्राम के पास बेतवा पुल के पास अमित श्रीवास्तव का शव सड़ी गली हालत में बरामद कर लिया गया है। अमित का शव ज्यादा खराब हो जाने के कारण उसके परिजनों के साथ उसका डीएनए टेस्ट कराया जा रहा है। पुलिस एक फरार आरोपी प्रमोद चोहान की तलाश कर रही है।
 
रायसेन से राजकुमार सोनी की रिपोर्ट.

दैनिक सवेरा से जुड़े प्रदीप ठाकुर

पंजाब की शक्ति से संबंध खतम होने के बाद प्रदीप ठाकुर ने जालंधर से प्रकाशित दैनिक सवेरा से अपनी नई पारी शुरू की है. प्रदीप को फिलहाल जिला के ब्‍यूरो के कोआर्डिनेशन की जिम्‍मेदारी सौंपी गई है. प्रदीप ठाकुर उस समय विवादों में घिर गए थे जब उनके खिलाफ पंजाब की शक्ति प्रबंधन ने मामला दर्ज कराया था. फिलहाल समझा जा रहा है कि प्रदीप ठाकुर पंजाब की शक्ति को झटका देने में सक्षम होंगे. 

भाजपा की बैठक के दौरान आपस में भिड़े पत्रकार

 

आगरा में भाजपा की बैठक के दौरान पत्रकार आपस में ही भिड गए. यह घटना जब घटी जब आगरा में एएनआई के पत्रकार ब्रिजेश सिंह ने डीएलए के फोटोग्राफर को बुरा भला कह दिया. बस इतना कहते ही डीएलए का फोटोग्राफर ब्रिजेश सिंह से भड़क उठा तब इस मामले को वहां पर उपस्थित पत्रकारों ने जैसे तैसे संभाला. इस दौरान बात पुराने दिनों पर आ गयी, जिसमें एएनआई के ब्रिजेश सिंह ने विनोद अग्रवाल से दो टूक कह दिया कि तू अपनी औकात भूल गया बस इस पर जमकर बहस चली. 
 
उधर इस मामले में नए पत्रकारों में इस बात को लेकर काफी खुशी है कि किसी ने तो ब्रिजेश सिंह का विरोध किया अन्यथा किसी में भी हिमाकत नहीं है कि वह ब्रिजेश सिंह को सबक सिखा सके. इस घटना का दूसरा सबसे बड़ा कारण यह भी है कि जब बैठक के दौरान भाजपा ने सभी पत्रकारों को वहां से जाने के लिए कह दिया था, लेकिन ब्रिजेश सिंह वहां जमे हुए थे, जिस पर जागरण के फोटो ग्राफर राजू ने विरोध जताया था. तब विनोद अग्रवाल ने ही ब्रिजेश सिंह को बाहर का रास्ता दिखाया था, इसलिए इसको लेकर दोनों आपस में भिड गए. काफी समय से देखा गया है कि ब्रिजेश सिंह व सहारा के ब्यूरो चीफ सुशील तिवारी पत्रकारों से कवरेज के दौरान अभद्रता करते हैं, जिसको अब पत्रकारों ने सबक सिखाने की योजना बना डाली है. बहरहाल अब पत्रकार भी दो गुट में बन गए हैं व पत्रकारों ने ब्रिजेश सिंह व सहारा के ब्यूरो को सबक सिखाने की रणीनीति तैयार की है. 

झारखंड के युवा पत्रकार अमरनाथ सम्‍मानित

 

झारखण्ड के उग्रवाद प्रभावित राज्य गिरिडीह में आज महुआ न्यूज़ के लिए स्ट्रिंगर का काम करनेवाले युवा पत्रकार अमरनाथ सिन्हा को निर्भीक और बेहतर पत्रकारिता के लिए सम्मानित किया गया है. यह सम्मान सामाजिक सगठन लायस क्लब का २६वां पदस्थपना कार्यक्रम में दिया गया. झारखण्ड सरकार में भू-राजस्व मंत्री मथुरा प्रसाद महतो और क्लब के अंतरराष्‍ट्रीय पदाधिकारियों की उपस्थिति में अमरनाथ को दिया गया. 
 
लाइन्स क्लब गिरिडीह के पीआरओ अरविन्द कुमार ने बताया कि अमरनाथ सिन्हा पिछले ११-१२ वर्षो से पत्रकरिता के क्षेत्र से जुड़े हुए हैं. प्रभात खबर से पत्रकारिता की सुरुआत करनेवाले इस युवा पत्रकार ने हमेशा ही जमीनी स्तर की पत्रकारिता की. गावं-गावं जाकर खबरों को संग्रह किया और सही और सटीक खबरों को लोगो तक पहुचाया .खबर के लिए समर्पण और विवाद से परे रहने के कारन ही इनका चयन बेस्ट पत्रकार के तौर पर किया गया. इधर अमरनाथ सिन्हा ने इस सम्मान पर ख़ुशी जाहिर की है और कहा की उनकी ईमानदारी का फल है यह सम्मान.

फर्जी इंपेक्‍ट व गलत खबरें छाप रहा बठिंडा भास्‍कर

 

दैनिक भास्‍कर की बठिंडा यूनिट के बठिंडा सिटी एडिशन में एक तरफ गलतियों की भरमार है तो दूसरी तरफ अखबार का दम दिखाने के चक्‍कर में फर्जी इंपेक्‍ट लिया जा रहा है। सिटी टीम में पहले ही रिपोर्टरों का टोटा हो रखा है, ऐसे में काम के बोझ से भारी मानसिक दबाव में काम कर रहे पञकारों से खबर लिखने में गलतियां हो रही हैं। 27 जुलाई के अंक में रिपोर्टर गुरप्रेम लहरी के नाम से छपी कारगिल शहीद संदीप सिंह व कैप्‍टन अजय आहूजा की खबर में रिपोर्टर ने अजय आहूजा की पत्‍नी अलका आहूजा को शहीद संदीप सिंह की पत्‍नी बता दिया। 
 
खबर पढ़कर साफ पता चलता है कि रिपोर्टर जब शहीद अजय आहूजा के बारे में लिखने लगा तो दो लाइनों के बाद वह फिर संदीप सिंह के बारे में लिखने लगा और बाद में तो अविवाहित संदीप सिंह को अलका आहूजा का पति बता दिया। हैरानी है कि यह खबर आगे डेस्‍क पर गई और फिर छप भी गई। इतनी भारी भरकम फौज के बावजूद गलती पर किसी का ध्‍यान नहीं गया। अगले दिन जब अखबार बाजार में गया तो खबर पढ़कर लोगों ने इसकी खूब थूथू की। कई पाठकों ने पत्रकार व सिटी इंचार्ज को फोन कर शहीदों का अपमान करने पर लताड़ भी लगाई। 
 
उधर, खुद को तीस मार खां साबित करने के चक्‍कर में भास्‍कर फर्जी इंपेक्‍ट प्रकाशित कर रहा है। 24 जुलाई को स्‍थानीय निकाय विभाग की विजिलेंस टीम ने यूनीपोल गड़बड़ी मामले में छापामारी की तो 25 जुलाई को दैनिक जागरण व दैनिक सवेरा ने उसे प्रकाशित किया। भास्‍कर की यह खबर छूट गई। अगले दिन सिटी इंचार्ज नरिंदर शर्मा ने 26 जुलाई के अंक में इसे प्रकाशित किया। जो कि एक फालोअप था। इसके बाद 3 अगस्‍त को इसका इंपेक्‍ट लेते हुए दावा किया कि भास्‍कर की 26 जुलाई की खबर पर इंपेक्‍ट हुआ। इसको लेकर बाजार में भास्‍कर की साख लगातार गिरती जा रही है। वहीं, भास्‍कर के अंदरुनी सूत्रों के मुताबिक जल्‍द ही यहां कुछ फेरबदल की तैयारी है ताकि बठिंडा भास्‍कर में कुछ सुधार हो सके। पिछले कुछ दिनों से लिए गए फैसलों से लगातार ऐसी संभावना जताई जा रही है।

एचबीसी न्‍यूज के चेयरमैन सतीश कट्टा के ठिकानों पर आईटी का छापा

 

खबर राजस्थान से है.. जहाँ एचबीसी न्यूज़ के चेयरमैन सतीश कट्टा के ठिकानों पर कुछ समय पहले इनकम टैक्स विभाग ने छापा मारा है.. लगभग ५० लोगों की टीम ने छापेमारी की है. विभाग को कट्टा द्वारा टैक्स चोरी किए जाने का पता चला था. सूत्रों के मुताबिक दो दिन तक चली इस कार्रवाई से घबरा कर सतीश कट्टा ने लघभग दस करोड़ की अघोषित आय सरेंडर कर दी.
 
राजस्थान के मीडिया में तरह तरह की अटकलें लगाई जा रही हैं.. पहली बार राजस्थान के मीडिया हाउस के चेयरमैन पर यह इस तरह की कार्रवाई की गयी है.. गौरतलब है कि कट्टा चैनल चलाने के अलावा टेक्सटाइल में भी कारोबार करते हैं. नीचे दैनिक भास्‍कर में प्रकाशित खबर. 


टैक्सटाइल व्यवसायी से २५ लाख नकद मिले, 9.40 करोड़ की अघोषित आय 

टैक्सटाइल व्यवसायी के घर और व्यापारिक प्रतिष्ठानों से 25 लाख रु. नकद व जेवरात जब्त किए गए। टेक्सटाइल ग्रुप ने 9.40 करोड़ रु. की अघोषित आय सरेंडर की है। टेक्सटाइल व्यवसाय से जुड़े ग्रुप का घर दुर्गापुरा में है। प्रॉपटी व्यवसाय के अलावा एक न्यूज चैनल में भी निवेश है। इसके अलावा सरावगी मेंशन और गणपति प्लाजा आदि जगहों पर दुकानें हैं। 

 

यूपी संवाददाता समिति के चुनाव में 41 लोग मैदान में

: 5 को स्‍क्रूटनी और 6 को वापसी के बाद 12 को होगा मतदान : कई प्रत्‍याशियों के दामन पर पड़े हैं कई गंभीर विवादों के कीचड़ : लखनऊ: बहुप्रतीक्षित उत्‍तर प्रदेश राज्‍य मुख्‍यालय मान्‍यताप्राप्‍त संवाददाता समिति के चुनाव में अब करीब 15 फीसदी सदस्‍य चुनाव लड़ रहे हैं। समिति की 15 सदस्‍यीय कार्यकारिणी के लिए 41 लोग मैदान में हैं। मजेदार बात तो यह है कि इनमें से कई ने तो एकाधिक पदों के लिए नामांकन कराया है। पांच अगस्‍त को नामांकन पत्रों की स्‍क्रूटनी और नामांकन वापस करने के बाद सीधे 12 तारीख को मतदान होगा। वोटों की गणना के बाद चुनाव का परिणाम उसी दिन घोषित कर दिया जाएगा।

 
समिति की कार्य‍कारिणी में अध्यक्ष पद के लिए एक, उपाध्‍यक्ष के लिए दो, सचिव के लिए एक, संयुक्‍त सचिव के लिए दो, कोषाध्‍यक्ष के लिए अलावा कार्यकारिणी सदस्‍य पद के लिए आठ पद के लिए चुनाव होना है। अब तक मिली खबरों के मुताबिक किसी भी दलित ने अपना नाम किसी भी सदस्‍य के लिए दावा नहीं किया है। केवल कोषाध्‍यक्ष और कार्यकारिणी सदस्‍य के पद के लिए एक-एक मुस्लिम उम्‍मीदवार का परचा दाखिल कराया गया है। करीब पचास फीसदी ब्राह्मणों ने समिति के पदों विभिन्‍न के लिए नामांकन कराया है। इसके बाद सर्वाधिक नामांकन कायस्‍थ सदस्‍यों से हुए हैं। मौजूदा अध्‍यक्ष हिसाम सिद्दीकी इस बार चुनाव नहीं लड़ रहे हैं। दिलचस्‍प बात तो यह है कि इस चुनाव के लिए अपना नामांकन पत्र पेश करने वाले कई लोगों का दामन पर कई गंभीर विवादों के छींटें पड़ चुके हैं।
 
चुनाव संचालन के लिए किशोर निगम, दीपक गिडवाणी और राजकुमार सिंह को नामित किया गया है। नामांकन पत्र दायर करने की आज अंतिम तारीख थी। चुनाव अधिकारी राजकुमार सिंह ने एक बातचीत में बताया कि अध्‍यक्ष पद के लिए चार, सचिव के लिए तीन, कोषाध्‍यक्ष के लिए चार, संयुक्‍त सचिव के लिए पांच के साथ ही साथ कार्यकारिणी सदस्‍य के लिए 18 लोगों ने अब तक अपना नामांकन पत्र पेश किया है। राजकुमार सिंह के अनुसार मनमोहन, प्रभात त्रिपाठी, शिवशंकर गोस्‍वामी और हेमंत तिवारी का पर्चा अध्‍यक्ष पद के लिए मिला है। सचिव पद के लिए प्रांशू मिश्र, सिद्धार्थ कलहंस और अरविंद शुक्‍ल चुनाव लडेंगे, जबकि उपाध्‍यक्ष पद के लिए सतवीर सिंह, देवकीनंदन मिश्र, रूद्रदत्‍त घिल्डियाल, नरेंद्र कुमार श्रीवास्‍तव, विजय उपाध्‍याय, जितेंद्र तिवारी और जितेंद्र शुक्‍ल चुनाव लडेंगे। कोषाध्‍यक्ष पद पर नासिर खां, नीरज श्रीवास्‍तव, केसी विश्‍नोई और दिलीप सिन्‍हा का परचा दाखिल हुआ है। संयुक्‍त सचिव पद के लिए अविनाश चंद्र मिश्र, देवकीनंदन मिश्र, राजेश शुक्‍ल, अजय श्रीवास्‍तव, दिलीप कुमार सिंह चुनाव लडेंगे।
 
कार्यकारिणी शरत प्रधान, राजेश शुक्‍ल, श्रीधर अग्निहोत्री, मुदित माथुर, संजय चतुर्वेदी, अशोक मिश्र, तेज बहादुर सिंह, नासिर खां, अमृतांशु मिश्र, अजय श्रीवास्‍तव, विजय कुमार निगम, जुरैर अहमद आजमी, अरूण कुमार त्रिपाठी, दिलीप सिन्‍हा, शेखर श्रीवास्‍तव, हरीश कांडपाल, दिलीप कुमार सिंह और अनिल त्रिपाठी का परचा दाखिल कराया गया है। नामांकन पत्र दाखिल करने की तारीख खत्‍म होने के बाद अब कई प्रत्‍याशियों ने अपना प्रचार बाकायदा शुरू कर दिया है। इनमें अध्‍यक्ष पद के लिए मनमोहन और प्रभात त्रिपाठी, उपाध्‍यक्ष पद के लिए सतवीर सिंह, विजय उपाध्‍याय, जितेंद्र शुक्‍ल, आरडी घिल्डियाल, सचिव पद के लिए प्रांशु मिश्र, सिद्धार्थ कलहंस, अरविंद शुक्‍ल, संयुक्‍त सचिव के लिए राजेश शुक्‍ल और अनिनाश चंद्र मिश्र आदि प्रमुख हैं। लेकिन हैरत की बात  तो यह है कि शेखर श्रीवास्‍तव ने अपने प्रचार के लिए जो ईमेल सभी सदस्‍यों को जारी किया है, इसका विषय है Low & Order meeting- 04-08-2012.
 
लखनऊ से वरिष्‍ठ पत्रकार कुमार सौवीर की रिपोर्ट. 

सिटी भास्‍कर छोड़ने वाले आई नेक्‍स्‍ट से जुड़े

 

इंदौर सिटी भास्कर की हालत बुरी तरह ख़राब है, फिर भी प्रबंधन सलोनी अरोरा के खिलाफ कोई उचित करवाई नहीं कर रहा है. यहाँ से एक-एक करके रिपोर्टर नौकरी छोड़ रहे हैं. सिटी भास्कर रिपोर्टर रचना सिंह, मंदीप, गजेन्द्र विशकर्मा, अभिषेक ने सिटी भास्कर को अलविदा कह के जागरण समूह के जल्द शुरू हो रहे टैबलाइड आई नेक्‍स्‍ट से नाता जोड़ लिया है.
 
सुना जा रहा है कि इन सभी रिपोर्टर ने सिटी भास्कर इंचार्ज सलोनी के अपमानजनक व्यवहार और प्रबंधन के गैर जिम्मेदार रवैया के कारण दुखी मन से यहाँ से विदा होना ही ठीक समझा. ये लोग दिन-रात एक किये हुए थे सिटी भास्कर को मजबूती देने में. इस मामले मैं नेशनल एडिटर कल्पेश याग्निक क्यों पत्रकारों की बात नहीं सुन रहे हैं यह समझ से परे हैं. एक अपुष्‍ट खबर यह भी आ रही है कि भास्कर की मजबूत और वरिष्ठ पत्रकार रूमनी घोष भी जल्दी ही नई दुनिया से जुड़ने वाली हैं.

राजीव सचान जी, आपने मेरे विचारों की चोरी की है : अरविंद

 

राजीव सचान जी, नमस्कार. मैंने दो दिन पहले आपको संलग्न लेख भेजा था. आपको लेख भेजने के लिए श्री शशांक शेखर त्रिपाठी ने आदेश किया था. जिसे मेरे खुद के ब्लॉग में लिंक http://kanpurianajaria.blogspot.in/2012/08/blog-post.html पर प्रकाशित किया जा चुका है.
 
मैं आपको ये बताते हुए अपार कष्ट महसूस कर रहा हूँ कि आज के दैनिक जागरण में "राजनीतिक भंवर में अन्ना" का कंटेंट और थीम मेरे लेख का है, जो आपके पास पहले से ही था. चूंकि विचारों की चोरी की जांच की कोई प्रक्रिया नहीं होती, फिर भी मुझे आपसे ऐसी उम्मीद ना थी. ईश्वर आपको ऐसे कामों से ही उन्नति प्रदान करे.
 
 धन्यवाद.
 
अरविन्द त्रिपाठी
 
कानपुर
 
नीचे अरविंद त्रिपाठी का लेख 


….लो खुल गयी….मुट्ठी !!

अन्ना हजारे के नेतृत्व वाले सोलह महीने के जन-लोकपाल की मांग के आंदोलन के कई चरण देश ने देखे हैं. परन्तु पिछले साल के रामलीला मैदान के हाउसफुल और मुम्बई के एम.सी.आर.डी. ग्राउंड के सुपर फ्लॉप से होते हुए जंतर-मंतर मैदान तक टीम अन्ना के आंदोलन के तरीके में कोई बदलाव नहीं आया. आज़ादी के आंदोलन में अंग्रेजों के खिलाफ गांधी जी का सफल तरीका, “अनशन” अन्ना हजारे के नेतृत्व में चली भ्रष्टाचार विरोधी इस मुहिम को ताकत देने का हथियार बन कर उभरा. देश के राजनेताओं के तमाम आरोपों और आक्षेपों को सहते हुए इस टीम ने अपने लक्ष्य यानी जन-लोकपाल कानून की मांग के प्रति समर्पण तो जाहिर कर दिया है पर उसे लागू करवा पाने के लिए अपनाया गया रास्ता अभी भी बहुत धुंधला और पथरीला है. टीम अन्ना के द्वारा ‘व्यवस्था परिवर्तन’ का नारा लगाते-लगाते ‘सत्ता-परिवर्तन’ और सत्ता को अपने हाथ में लेने का निर्णय एक अंधी सुरंग में प्रवेश कर जाने जैसा आभास देता है, जहां से लक्ष्य के और दूर होते जाने की संभावना बढ़ती जाती है. सरकार और दूसरे राजनीतिक दल इस पूरी टीम को इसी चुनावी जाल में फंसाने में सफल रहे क्योंकि इस टीम के सवाल सभी दलों को घेरे में ले रहे थे. आजादी के बाद जयप्रकाश नारायण के कद के राजनेता ने भी नए राजनीतिक दल का निर्माण कर सत्ता में अपने जिन शिष्यों को बिठाया वो भी उसी राजनीतिक अपसंस्कृति का शिकार हुए थे. ऐसे में अन्ना हजारे के समक्ष उनके शिष्यों के राजनीतिक दल बनाने के बाद राजनीतिक शुचिता बनाए रखने चुनौती और बढ़ जाती है. दूसरी तरफ डी-एस-4 जैसे आंदोलन से शुरू होकर बहुजन समाज पार्टी का विकास, आंदोलन से राजनीतिक दल पैदा हो सकने का प्रमाण भी हैं.

 
अन्ना हजारे  के द्वारा राजनीतिक दल बनाने  और राजनीतिक प्रक्रिया में  हिस्सा लेने की घोषणा से राजनीतिक दलों और राजनेताओं के प्रति  क्षोभ और हताशा का चरम  साफ़-साफ़ जाना और समझा जा सकता है. अब ऐसा लगता है 42 बरस  से संसद के चौखट पर लुंज-पुंज पड़े लोकपाल को सशक्त क़ानून  में तब्दील करने के लिए  टीम अन्ना ने देश की समूची राजनीति के खिलाफ ताल ठोंक दी है. इसकी वजह ये है कि संसद की मंशा के प्रति इनकी स्पष्ट राय है कि ये राजनीतिक लोग और ये राजनीतिक दल न तो कारगर लोकपाल लाने वाले हैं और न ही भ्रष्टाचार को मिटाने की पहल में साथ देने वाले हैं. लेकिन राजनीतिक तौर-तरीकों  पर सवाल खड़े करने की जल्दी में इस टीम ने तमामों गलतियां की हैं. इस पूरे आंदोलन में ‘हिसार-कांड’ वो टापू बनकर उभरा, जब इस टीम की राजनीतिक समझ बहुत अपरिपक्व साबित हुई. अब अन्ना सहित इस पूरी टीम की इसी ‘राजनीतिक समझ’ की वास्तविक परीक्षा का समय आ गया है. इस आंदोलन के प्रारम्भ में जुड़े तमाम नामचीन लोग ‘कोर कमेटी’ से ‘आतंरिक-लोकतंत्र’ ना होने का आरोप लगाकर किनारा कर चुके हैं. ऐसे में जन-लोकपाल की मांग के लिए विदेशी धन से पोषित समाजसेवी संस्थाओं के संरक्षण के आरोपों वाले आंदोलन से ऊपर उठकर राजनीतिक दल बनाने का निर्णय कहीं आत्मघाती साबित न हो. 2014 के आम चुनावों तक जातीय, सांप्रदायिक, भाषाई और क्षेत्रीय आधार पर बनते देश भर के मतदाता के समक्ष अपनी बात पहुंचाना बहुत कठिन काम है.
 
टीम अन्ना  के द्वारा इस राजनीतिक दल के निर्माण के निर्णय की हड़बड़ी  का कारण ये भी है की सरकार  ने इस बार पूरे आंदोलन को खास तवज्जो नहीं दिया. प्रणव  मुखर्जी सहित उन्नीस केन्द्रीय  मंत्रियों को हटाने और उनपर मुकदमा करने की मांग को लेकर जंतर-मंतर पर शुरू किये गए अनशन में गत वर्ष के आंदोलन जैसी धार नहीं थी. अन्ना  हजारे के खुद अनशन में  उतरने के बाद आयी गति  ने भी वो जन-सैलाब नहीं पैदा किया जो विगत वर्ष के राम-लीला मैदान के आंदोलन के समय  उत्पन्न हुआ था. वास्तव में टीम अन्ना की सबसे बड़ी रणनीतिक भूल थी, अब तक के आंदोलन में उमड़ी भीड़  का कृत्रिम मूल्यांकन. इस टीम को यह भ्रम हो गया था की जब भी वे तख़्त बिछा देंगे, जहां भी माइक लगा देंगे, सारा देश अपना काम-धाम छोड़कर  मोमबत्ती जलाने लगेगा. लेकिन  उन्हें यह नहीं मालूम था की मोमबत्तियों से शुरू हुआ  आंदोलन मशाल बनकर जब धधका तब आग कहाँ से आई ? ये इसे कैंडल  के पैकटों की देन समझते  रहे, जबकि लोगों ने भ्रष्टाचार के विरुद्ध अन्ना की आवाज में सारे राजनीतिक और संगठनात्मक बंधन को ध्वस्त कर आमूल-चूल  परिवर्तन की आशा में एक नयी मशाल जलाई थी. देश के मध्य वर्ग और खासकर युवा वर्ग ने इस आंदोलन में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया. लेकिन टीम  अन्ना ने इस भीड़ को मदारी  के डमरू पर इकट्ठा हुए तमाशबीनों के अलावा और कुछ नहीं समझा, साथ ही उन्हें अपने इस डमरू पर इस कदर विश्वास हो गया की मानो वही एकमात्र कुशल मदारी हों. सरकार और राजनीतिक दलों में प्रमुख पदों पर बैठे लोगों की चालों और जनता की समझ पर उन्होंने कोई रणनीति नहीं बनायी थी. अब अन्ना हजारे के सामने सवाल था, इस बार के नौ दिन के अनशन को घोषित रूप से असफलता को स्वीकारने के बजाय उससे शेष ऊर्जा को बचाकर आंदोलन के आगे के चरणों के लिए संघर्ष जारी रखने के लिए यह जरूरी हो गया था की कोई भविष्य का कार्यक्रम घोषित किया जाता.
 
अब देश भर में इस टीम अन्ना के उद्देश्यों के सन्दर्भ में सवालों के घेरे गढे जाने शुरू हो चुके हैं. अन्ना की ये नवगठित पार्टी किस विचारधारा की राजनीति करेगी, पार्टी चलने के लिए धन कहाँ से आयेगा, धन क्या कार्पोरेट सेक्टर से लिया जाएगा, पार्टी का संगठन कैसे तैयार किया जाएगा, चुनाव लड़ने लायक ईमानदार प्रत्याशियों का चयन कैसे किया जायेगा, पार्टी की जीत का आधार क्या होगा, पार्टी सरकार न बना पाने की स्थिति में गठ-बंधन की राजनीति करेगी या नहीं, शराब और रुपयों का वितरण करके चुनाव जीत लेने वाले बाहुबली और अपराधियों के सामने पार्टी की क्या रणनीति होगी, पार्टी का ग्रामीण भारत में क्या पैंतरा होगा और सबसे बढ़कर सवाल यह है की इस पार्टी के लड़ने से किस पार्टी को सबसे ज्यादा लाभ या हानि होगी ? ऐसे समय में जब देश की जनता सत्तासीन कांग्रेसनीत गठबंधन की सरकार के घोटालों और भ्रष्टाचार से आजिज आ चुकी है और देश भर में इस सरकार के विरोध में जन-मानस तैयार हो चुका है इस नए राजनीतिक दल के निर्माण का निर्णय और उसके परिणाम भविष्य के गर्भ में छुपे हैं परन्तु इतना अवश्य है की सरकार इस जन-लोकपाल के आंदोलन को बिना शक्ति-प्रयोग करे ही दिशा-हीन करने में सफल रही. साथ ही बाबा रामदेव के नौ अगस्त के आंदोलन के प्रति भी स्पष्ट संकेत देने में पूरी तरह सफल रही की उसपर भ्रष्टाचार विरोधी ऐसे आन्दोलनों का कोई असर नहीं पड़ता है, जबकि यह समय इस सरकार का सबसे नाजुक आत्मविश्वास का है.

डायरिया से पत्रकार भोला का निधन

 

राजपुरा : डायरिया के चलते राजपुरा के एक पत्रकार की मौत हो गई। पत्रकार स्वर्ण सिंह भोला जालंधर से प्रकाशित होने वाले एक पंजाबी दैनिक से जुड़े हुए थे। डायरिया से पीडि़त होने के बाद उन्हें बीती शाम राजपुरा के सिविल अस्पताल में दाखिल कराया गया था। वहां से डाक्टरों ने उन्हें चंडीगढ़ के सेक्टर-32 स्थित अस्पताल में रेफर कर दिया, जहां बीती देर रात उनका निधन हो गया। स्वर्गीय भोला अपने पीछे माता जगीर कौर, धर्मपत्नी अमरजीत कौर, बहन जसविंदर कौर व इकलौते बेटे गुरकीरत सिंह को छोड़ गए हैं। शनिवार को उनका अंतिम संस्‍कार किया गया। इकलौते बेटे गुरकीरत सिंह ने मुखाग्नि दी।
 
अंतिम संस्कार के समय पार्थिव शरीर पर उप मुख्यमंत्री की ओर से एसजीपीसी के सदस्य सुरजीत सिंह गढ़ी और सूचना व लोक संपर्क मंत्री की ओर से मार्केट कमेटी बनूड़ के चेयरमैन जसविंदर सिंह जस्सी, लोक संपर्क विभाग की ओर से डीपीआरओ ईशविंदर सिंह ग्रेवाल व डीपीआरओ मोहाली सुरजीत सिंह सैनी ने रीथ रखकर श्रद्धासुमन अर्पित की।

नईदुनिया से छजलानी परिवार बाहर

 

नईदुनिया का पर्याय बन चुका छजलानी परिवार अब अपनी पहचान पूरी तरह खो चुका है २ अगस्त से नईदुनिया कि प्रिंट लाइन से विनय छजलानी का नाम हट गया। इस नाम के हटने के साथ ही हिंदी पत्रकारिता का एक स्वर्णिम अध्याय समाप्त हो गया। करीब ६५ साल से नईदुनिया से जुड़ा छजलानी परिवार अब अखबारी पत्रकारिता से पूरी तरह बाहर हो गया। ५ जून १९४६ को पहली बार प्रकाशित हुए इस अखबार को छजलानी परिवार के बाबू लाभचंद छजलानी ने अपने दो साथियों बसंतीलाल सेठिया और नरेन्द्र तिवारी के साथ निकाला था। 
 
बाबू लाभचंद छजलानी के बाद अभय छजलानी इससे जुड़े। १९८८ मे नरेन्द्र तिवारी इस टीम से बाहर हो गए, लेकिन, बसंतीलाल सेठिया और उनके बेटे महेंद्र सेठिया ने अभय छजलानी का साथ दिया। बसंतीलाल जी के निधन के बाद अभय छजलानी इसके सर्वेसर्वा बने और अखबार को हिंदी पत्रकारिता मे स्थापित किया। २००६ मे अभय छजलानी के बेटे विनय छजलानी ने अपने पिता अभय छजलानी और महेंद्र सेठिया को किनारे करके नईदुनिया की लगाम थामी और इसे पटरी पर लाने की कोशिश की, लेकिन बात बनी नहीं। क्योंकि उन्हें न तो पत्रकारिता आती थी और उनके सलाहकार ही इस तरह के थे।
 
इसका नतीजा ये हुआ कि नईदुनिया के कई संस्करण निकालने के बाद भी ६० साल पुराना अखबार डगमगाने लगा। हालात बिगड़ते देख नईदुनिया को इस साल जागरण को बेच दिया गया। १ अप्रैल से इसका संचालन जागरण करने लगा और श्रवण गर्ग इसके प्रधान संपादक बन गए। इस पर भी तकनीकि कारणों से मुद्रक और प्रकाशक के तौर पर विनय छजलानी का नाम जाता रहा, जो २ अगस्त से हट गया है। अब यदि छजलानी परिवार का नाम नईदुनिया में कहीं है तो वो अखबार के पते में (बाबू लाभचंद छजलानी मार्ग), जो कि ज्यादा दिन शायद नहीं रहे। क्योंकि, नईदुनिया का दफ्तर भी जल्द यहाँ से खाली हो जाएगा।    

मशहूर गीतकार सुरेन्द्र नाथ ‘नूतन’का निधन

 

इलाहाबाद। मशहूर गीतकार सुरेंद्र नाथ‘नूतन’का शनिवार की सुबह निधन हो गया। सन 1930 में इलाहाबाद के फूलपुर कस्बे के एक कायस्थ परिवार में जन्मे श्री नूतन ने उच्च शिक्षा इलाहाबाद विश्वविद्यालय से हासिल की और हिन्दी साहित्य सम्मेलन से ‘साहित्य रत्न’की भी उपाधि अर्जित की। वे इलाहाबाद विश्वविद्यालय के वालीबॉल कैप्टन बने और कालान्तर में प्रदेश और देश का भी प्रतिनिधित्व किया। 
 
1962 में इनका काव्य संग्रह ‘मधूलिका’प्रकाशित हुआ। अमेरिका निवास के दौरान उन्होंने खंड काव्य ‘वीरांगना झलकारी’लिखा, वर्ष 2000 में काव्य संग्रह ‘तैरते दीप’,2003 में खंड काव्य ‘वीर मंगल पांडेय’2005 में मुक्तक संग्रह ‘मोगरे के फूल’,2007 में गीत संग्रह ‘पंख खोलते गीत’और 2010 में उनका समग्र साहित्य ‘चलती है पीछे-पीछे परछाईं मेरी’प्रकाशित हुआ। साहित्यि पत्रिका ‘गुफ्तगू’का अक्तूबर-दिसंबर-2011 अंक श्री सुरेन्द्र नाथ ‘नूतन’विशेशांक रूप में प्रकाशित हुआ है। खंड काव्य ‘वीर मंगल पांडेय’इंदौर विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम में भी कई वर्षों तक शामिल रहा। 
 
श्री नूतन कवि सम्मेलनों में भी कवि लोकप्रिय रहे, उन्हें लालकिले से भी काव्य पाठ करने का गौरव हासिल था। लगभग बीस दिन पहले ही उनकी पत्नी श्रीमती कुसुम श्रीवास्तव का भी निधन हुआ है, श्रीमती कुसुम भी एक कवयित्री थीं। श्री नूतन के दो पुत्र और एक पुत्री है, एक पुत्र अमेरिका और दूसरा दिल्ली में रहता है। ‘गुफ्तगू’ के मुख्य संरक्षक इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी, संपादक नाज़िया ग़ाज़ी, जय कृश्ण राय तुशार, वीनस केसरी, डा. सूर्या बाली, यश मालवीय, सुधांशु उपाध्याय, तलब जौनपुरी, एहतराम इस्लाम, अजय कुमार पांडेय साहित तमाम साहित्यकारों और समाजसेवियों इनके निधन पर गहरा दुख जाहिर किया है।

नागपंचमी पर इंडिया टीवी ने दिखाई फर्जी खबर

अपनी खबरों को लेकर हमेशा संदिग्‍ध विश्‍वसनीयता में रहने वाले इंडिया टीवी ने एक बार फिर फर्जी और गलत खबर चलाई है. मामला 24 जुलाई का है. इंडिया टीवी ने 24 जुलाई को खून के प्‍यासे गांव नाम से खबर चलाई थी. खबर यूपी के चंदौली जिले का था. इस खबर पर जो फुटेज चलाई गई वो एक साल पुराना था. जबकि इस साल ऐसा कोई आयोजन हुआ ही नहीं. 

 
दरअसल मामला चंदौली जिले के दो गांवों का था, जहां सदियों से परंपरा चली आ रही थी कि इन दो गांवों के लोग नागपंचमी के दिन एक दूसरे पर पत्‍थरबाजी करते थे. और जब तक किसी को खून नहीं निकल आता था तब तक यह पत्‍थरबाजी चालू रहती थी. ये सारा खेल प्रशासन के सामने चलता था. इस अंधविश्‍वास के बारे में मान्‍यता थी कि अगर पत्‍थरबाजी का खेल नहीं हुआ तो गांव में महामारी फैल जाएगी, फसल अच्‍छी नहीं होगी या सूखा पड़ जाएगा. 
 
लिहाजा नामपंचमी पर यह खेल हमेशा चलता आ रहा था, परन्‍तु इस बार कुछ बुद्धिजीवियों ने सदियों से चले आ रहे इस अंधविश्‍वास को खतम करने का फैसला किया. इस कुप्रथा का अंत करवाने के लिए प्रवचन का कार्यक्रम रखा गया, जिसके लिए दोनों गांवों के लोग तैयार हो गए. इसलिए इस साल पत्‍थरबाजी की कोई घटना नहीं हुई, लोग प्रवचन सुनकर नागपंचमी का त्‍योहार मनाया, लेकिन इंडिया टीवी ने पत्‍थरबाजी की फर्जी खबर दिखाकर ना सिर्फ दर्शकों के साथ छल किया बल्कि खुद की विश्‍सनीयता पर भी सवाल खड़ा किया.
 
 
 
 
एक पत्रकार द्वारा भेजा गया पत्र. 

हमार-फोकस वेतन विवाद : अब भूख हड़ताल की तैयारी में मीडियाकर्मी

हमार तथा फोकस टीवी में वेतन तथा पीएफ की मांग को लेकर चल रहा आंदोलन चौथे दिन भी जारी है. कर्मचारी हिसाब किताब क्‍लीयर होने तक फ्लोर छोड़ने को तैयार नहीं हैं. पर प्रबंधन के सेहत पर इससे कोई फर्क नहीं पड़ रहा है. प्रबंधन ने 11 अगस्‍त की तिथि मामला सुलझाने के लिए तय की है, उससे पहले वे कर्मचारियों की कोई बात सुनने को तैयार नहीं है. इसके बाद हमार-फोकस के कर्मचारी भूख हड़ताल करने की तैयारी कर रहे हैं. 

 
सूत्रों का कहना है कि प्रबंधन केवल बकाया वेतन देने का आश्‍वासन दिया है जबकि कर्मचारी बकाया वेतन के अलावा पीएफ तथा अन्‍य बकाया देयों की मांग कर रहे हैं. इसको लेकर ही टकराव है. मीडियाकर्मी अब डीएम को आवेदन देकर भूख हड़ताल करने की इजाजत मांगी है. डीएम ने मामले पर विचार करने का आश्‍वासन दिया है. समझा जा रहा है कि भूख हड़ताल की इजाजत मिलते ही कर्मचारी भूख हड़ताल पर बैठ जाएंगे. 
 
मीडियाकर्मी पीसीआई अध्‍यक्ष जस्टिस काटजू समेत तमाम संस्‍थानों को पत्र लिखकर अवगत भी करा चुके हैं. आंदोलन करने वालों में पंकज कुमार, दिलीप सिंह, अमल कुमार सिंह, अमर सिंह, बंदना गुप्‍ता, रचना ठाकुर, मनीष मासूम, नवनीत सिंह, राजेश मिश्रा, विकास राज तिवारी, मृत्‍युंजय साधक, राजीव तिवारी, सौरभ उपाध्‍याय, पुनीत पुष्‍कर समेत कई अन्‍य कर्मचारी भी शामिल हैं. 
 
 

अनिल त्रिपाठी चला रहे पत्‍नी के नाम पर करोड़ों का समाचार उद्योग

 

अनिल त्रिपाठी द्वारा अपनी पत्नी के नाम से अनेक समाचार पत्रों का प्रकाशन कर समाचार उद्योग चलाया जा रहा है। अनिल त्रिपाठी द्वारा सालाना लगभग चार से पांच करोड़ रुपया केवल कागजों, स्याही और समाचार पत्रों के संचालन पर व्यय किया जाता है जिसकी पुष्टि भारत सरकार के समाचार पत्र के पंजीयक कार्यालय में अनिता त्रिपाठी द्वारा प्रेषित वार्षिक विवरणी से की जा सकती है। 
 
अनिल त्रिपाठी द्वारा अपनी पत्‍नी के नाम से करोड़ों का समाचार उद्योग स्थपित कर कारोबार कर रहे हैं और पत्रकारिता का उददेश्य केवल अपने समाचार पत्रों में विज्ञापन लेना है, जिसके लिये दिन भर राजनीतिक पार्टियों के चक्कर लगाते रहते हैं और सचिवालय एनेक्सी में किसी न किसी अधिकारी के पास बैठे रहते हैं। सूत्रों से यह भी ज्ञात हुआ है कि अनिल त्रिपाठी के इस व्यवसाय में सतीश प्रधान की भी बराबर की हिस्सेदारी है और सतीश प्रधान द्वारा भी अनेक समाचार पत्रों के प्रकाशन किया जा रहा है। उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव 2012 से पूर्व विभिन्न राजनीतिक पार्टियों से अनिल त्रिपाठी और सतीश प्रधान ने मिलकर लाखों का विज्ञापन लिया है और अनेक सम्पितयों विभिन्न नामों से अर्जित की है।
 
अनिल त्रिपाठी और सतीश प्रधान की साझेदारी में जहां एक बड़ा समाचार उद्योग चलाया जा रहा हैं वही समस्त सरकारी सुविधाओं को लेने में भी दोनों की हिस्सेदारी रहती है। सतीश प्रधान और अनिल त्रिपाठी ने सरकारी आवास लेने की जुगत बैठा कर अपने अपने नाम सरकारी आवास आवंटन करा लिया, परन्तु दोनो धुरन्दरों ने अपने आवास आंवटन से पूर्व क्या श्रीधर अग्निहोत्री, योगेश श्रीवास्तव, जितेन्द्र शुक्ला, उमेश मिश्रा, प्रकाश चन्द्र अवस्थी, सुरेन्द्र अग्निहोत्री, 
ताविषी श्रीवास्तव, एस0पी0सिंह, राजेश कुमार सिंह, विवेक तिवारी, मोहसिन हैदर रिजवी, विपिन कुमार चौबे, अवनीश विद्यार्थी, अजीत कुमार खरे, सुरेन्द्र सिंह, अविनाश शुक्ल, राजेन्द्र कुमार गौतम, राज कुमार सिंह, शेखर श्रीवास्तव, शशिनाथ दुबे, जितेन्द्र यादव, मुकेश यादव, सुरेश यादव, केके सिंह, राजकुमार, जुरैर अहमद आजमी, महेन्द्र मोहन गुप्ता आदि की सिफारिश अथवा आवास दिये जाने में कोई मदद की।
 
अधिक से अधिक विज्ञापन की प्राप्ति ही आज अनिल त्रिपाठी और सतीश प्रधान का असल लक्ष्य हो चुका है। और इसके लिये यह दोनों किसी भी हद तक जाने को तैयार रहते हैं। इन दोनो की जुगल जोड़ी के किस्से विकास दीप में चर्चित है, जहां रात में दोनों बैठकर चियर्स करते हैं और आने वाले कल के शिकार की रणनीति बनाते हैं। अपनी इसी रणनीति के चलते आज सतीश प्रधान और अनिल त्रिपाठी पत्रकारिता की आड़ में प्रदेश में एक बड़े समाचार पत्र व्यवसायी बन गये है और सालाना करोड़ों का व्यवसाय कर रहे हैं।
 
अर्चना यादव
 
पत्रकार, लखनऊ 

राणा यशवंत का नाम और बदलाव की चाह ने महुआ न्‍यूजलाइन पहुंचा दिया था

 

नवंबर 2011 में जनसंदेश छोड़कर महुआ न्यूज़लाइन ज्वाइन करने से पहले मैं थोड़ा असमंजस में था। ढाई साल से जनसंदेश में काम कर रहा था, नौकरी सुरक्षित थी और थोड़े ही समय पहले इंक्रीमेंट भी हुआ था। इसके अलावा मीडिया से जुड़े कई शुभचिंतक महुआ को डूबता जहाज बताते हुए यूपी चैनल ना ज्वाइन करने की सलाह दे रहे थे। लेकिन राणा यशवंत जी का नाम और संस्थान बदलने की चाह ने मुझे महुआ न्यूज़लाइन पहुंचा दिया। 
 
ज़्वाइन करने के दूसरे ही महीने सैलरी का चेक बाउंस हुआ तो लगा, कि ग़लती हो गई। यूपी इलेक्शन नज़दीक था…चैनल की पूरी टीम जान लगाकर काम कर रही थी। लेकिन सैलरी का लेट आना और चेक का बाउंस होना ख़तरे का इशारा था। मेरे समेत ज़्यादातर लोग नई नौकरी की तलाश में थे… इसी बीच दूसरे संस्थान से ऑफ़र मिला और तुरंत ज्वाइन करने के लिए बोला गया… लेकिन बीच इलेक्शन नौकरी छोड़कर मैं किसी को धोखा नहीं देना चाहता था… नई ज़्वाइनिंग कुछ दिन के लिए टाल दी… इलेक्शन जैसे ही ख़त्म हुए चाचा की तबीयत ख़राब होने की वजह से मैं निजी तौर पर परेशान रहा… बाद में लाख कोशिशों के बावजूद उन्हें बचाया भी ना जा सका। उसी दौरान मैने महुआ न्यूज़लाइन को टाटा बोलकर श्री न्यूज़ ज़्वाइन कर लिया।
 
ये फ़ैसला भी थोड़ा मुश्किल था… लोगों ने सलाह दी, कि कुछ भी हो महुआ ब्रांड है… और श्री न्यूज़ नया चैनल… डूब जाएगा, तो क्या करोगे… लेकिन मुझे ख़ुदा पर भरोसा था… एक बार फिर मैने दिल की ही सुनी। न्यूज़लाइन के बुरे हश्र के बाद लगा, कि फ़ैसला कितना सही था। लेकिन उन सभी साथियों के लिए बेहद अफ़सोस है, जिनकी नौकरी एक झटके में ख़त्म हो गई।
 
बात केवल एक संस्थान की नहीं है। कोहराम मचा है, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पेशेवरों में… ख़ासकर उन पत्रकारों में जो छोटे और मीडियॉकर ऑर्गनाइजेशन में काम करते हैं। महुआ न्यूज़लाइन के 120 पत्रकार, सीएनईबी के 150, फ़ोकस और हमार के 105 और जनसंदेश की छंटनी में शहीद हुए 30 पत्रकारों को जोड़ें, तो कुल जमा 405 पत्रकार साथियों पर पिछले कुछ महीने में गाज गिरी है। सोचकर देखिए इनमें से ज़्यादातर के पास अभी भी जॉब नहीं है। क्या करेंगे, कहां जाएंगे, बेशक़ नौकरी तो मिलेगी, आज नहीं तो कल, लेकिन जब तक हाथ में नया ऑफ़र लेटर नहीं आ जाता, ज़िंदगी तनाव में ही गुज़रेगी।
 
प्रबंधन के दबाव में जनसंदेश में अगर छंटनी हुई, तो वहां हक़ किसी का नहीं मारा गया… उस चैनल में सैलरी हमेशा पहली तारीख़ को आती है, तो किसी की भी पेंडिंग नहीं थी और निकाले गए लोगों को बिना किसी आंदोलन के नोटिस पीरियड की सैलरी दी गई… भले ही उस महीने वो ऑफ़िस आए या नहीं आए। महुआ न्यूज़लाइन के पत्रकारों ने लड़कर अपना वाजिब हक़ लिया… लेकिन सीएनईबी के लोगों को तो सीधे सलाम कर दिया गया। फ़ोकस और हमार वाले भी आंदोलन कर रहे हैं, देर-सवेर उन्हें भी बकाया मिलने की उम्मीद है।
 
ख़ैर… महुआ न्यूज़लाइन के साथियों ने हक़ की आवाज़ बुलंद की इसके लिए वो बधाई के पात्र हैं। बुज़ुर्ग शायर मेराज़ फ़ैज़ाबादी का एक शेर याद आ रहा है-

 
“ज़िंदगी भीख है, तो ना मिलना बेहतर
और अगर हक़ है, तो इतनी शराफ़त से ना मांग”
 
न्यूज़लाइन के लोगों ने दृढ़ता, साहस और वीरता के साथ पूरे गर्व से अपना हक़ हासिल किया है। इसके लिए अनुराग त्रिपाठी सर, उमेश सर और बाक़ी सभी साथियों की लड़ाई क़ाबिलेतारीफ़ है। गलत राह पर जाते प्रबंधन को झुका कर आप सभी ने वाकई मिसाल क़ायम की है।
 
शोऐब अहमद ख़ान
 
प्रोड्यूसर-श्री न्यूज़

न्‍याय मिलने तक लड़ाई जारी रहेगी : प्रियभांशु

निरूपमा पाठक को आत्महत्या के लिए प्रेरित करने के आरोपी प्रियभांशु ने जेल से बाहर आने के बाद पत्रकारों से कहा कि वह निर्दोष है और निरूपमा को न्याय मिलने तक संघर्ष जारी रखेगा। निरूपमा पाठक का मामला ऑनर किलिंग या आत्महत्या का मामला है, के सवाल पर उसने कहा कि अब मामला न्यायालय में है, इसलिये वह इसपर कुछ नहीं कहना चाहता परन्तु इस मामले में नाहक उसे घसीटा गया है, उसे न्यायालय पर भरोसा है। न्याय जरूर मिलेगा।

 
अनुसंधान में नहीं हुआ खुलासा : पुलिस अनुसंधान बेमानी साबित हुआ। अनुसंधान में दूध का दूध और पानी का पानी नहीं हो सका। दोनों परिवारों को आरोपी सिद्ध कर पुलिस ने भले हीं अपनी पीठ थपथपा ली है, पर आज भी कई सवालों पर से पर्दा नहीं उठ सका है। कभी हत्या कभी आत्महत्या तो कभी आत्महत्या के लिए उकसाने के चक्रव्यूह में सिमटी रही पुलिस। ठोस नतीजे पर अनुसंधान के दौरान अनुसंधानकर्ता नहीं पहुंच पाया। यही कारण है कि आज भी इस मामले में दुविधा की स्थिति दोनों परिवारों के बीच बनी हुई है। अभी भी इस पूरे मामले का खुलासा होना बाकी है।
 
कोडरमा जेल से बाहर आने के बाद प्रियभांशु
 

दो महीने बाद कोडरमा जेल से रिहा हुआ प्रियभांशु

: निरूपमा पाठक मामले में हाइकोर्ट से तीन दिन पहले मिली थी जमानत : पत्रकार निरूपमा पाठक हत्याकांड में प्रियभांशु रंजन गुरुवार को दो महीने बाद कोडरमा मंडल कारा से रिहा हो गया। झारखंड हाइकोर्ट से गत सोमवार को जमानत मिलने के बावजूद तीन दिन बाद उसकी रिहाई संभव हो पायी। निरूपमा हत्याकांड में पुलिस ने प्रियभांशु को भी अभियुक्त बनाया था। दो साल पुराने और बहुचर्चित निरुपमा पाठक की मौत के मामले में उसके प्रेमी प्रियभांशु रंजन ने 5 जून को स्थानीय अदालत में आत्मसमर्पण कर दिया था। कोर्ट ने आत्मसमर्पण के बाद उसे न्यायिक हिरासत में भेज दिया था। 

 
प्रियभांशु पर निरुपमा को आत्महत्या के लिए उकसाने का आरोप है और इस बाबत भादवि की धारा 306 के तहत आरोप पत्र भी दाखिल किया गया है। ज्ञात हो कि बिजनेस स्टैंडर्ड की पत्रकार निरुपमा का शव 29 अप्रैल 2010 को कोडरमा जिले के झुमरीतिलैया स्थित चित्रगुप्त नगर कॉलोनी में उसके निवास स्थान पर मिला था। प्रियभांषु रंजन ने निरुपमा के परिजनों पर उसकी हत्या का आरोप लगाया था। इस बाबत पुलिस ने निरुपमा की मां सुधा पाठक को गिरफ्तार किया  था। सुधा पाठक को तीन महीने बाद जमानत पर रिहा किया गया था। वहीं निरुपमा के परिजनों का आरोप था प्रियभांशु ने निरुपमा को आत्महत्या के लिए उकसाया था। घटना के बाद कई महीनों तक मौत की गुत्थी हत्या और आत्महत्या के बीच उलझी रही। मामले में पिछले वर्ष एक नया मोड तब आया जब पुलिस ने अनुसंधान के दौरान निरुपमा के प्रेमी के अलावा उसके माता, पिता धर्मेंद्र पाठक और भाई समरेन्द्र पाठक पर आत्महत्या के लिए प्रेरित करने का मामला सही पाया और इसी आरोप में चारों के विरुद्ध न्यायालय में भादवि की धारा 306 के तहत अंतिम प्रपत्र समर्पित किया।
 
इस मामले में जहां निरुपमा की मां सुधा पाठक जमानत पर है, वहीं उसके पिता धर्मेद्र पाठक और समरेंद्र पाठक को अदालत से राहत मिली हुई है, जबकि प्रेमी प्रियभांशु की अग्रिम जमानत याचिका सर्वोच्च न्यायालय ने खारिज कर दी, जिसके बाद उसने कोडरमा न्यायालय में आत्मसमर्पण कर दिया। प्रियभांशु की ओर से अदालत को बताया गया कि इस मामले में उनका कोई संबंध नहीं है। पुलिस के पास उनके खिलाफ किसी प्रकार का साक्ष्य नहीं है। इस मामले में उसे घसीटा जा रहा है। सुनवाई के बाद झारखंड हाई कोर्ट में जस्टिस एचसी मिश्र की अदालत ने सोमवार को जमानत याचिका मंजूर कर ली और उसे जमानत पर रिहा करने का आदेष दिया।
 
कोडरमा से समीर की रिपोर्ट.

यशवंत की जमानत याचिका पर नहीं हुई सुनवाई, 8 अगस्‍त की तिथि निर्धारित

भड़ास4मीडिया के संपादक यशवंत सिंह की जमानत याचिका पर शुक्रवार को भी सुनवाई नहीं हो सकी. 3 अगस्‍त को जमानत अर्जी पर सुनवाई तय थी, परन्‍तु वकीलों के हड़ताल की वजह से सुनवाई नहीं हो सकी. अदालत का कामकाज शुरू होने के बाद ही मेरठ में हाई कोर्ट की बेंच की स्‍थापना को लेकर वकीलों ने हड़ताल शुरू कर दी, जिसके बाद जिला जज ने जमानत पर सुनवाई की अगली तिथि 8 अगस्‍त निर्धारित कर दी है. 

 
अब आठ अगस्‍त को ही विनोद कापड़ी तथा दैनिक जागरण मामले में जमानत याचिका पर सुनवाई होगी. गौरतलब है कि दोनों मामलों में सुनवाई 20 जुलाई को ही तय होनी थी, परन्‍तु इस दिन भी वकीलों की हड़ताल की वजह से जमानत याचिका पर सुनवाई 3 अगस्‍त को निर्धारित की गई थी.  


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Yashwant Singh Jail

 

जय हिंद टीवी चैनल पर पाबंदी लगाने की मांग

अमृतसर : एसजीपीसी के अध्यक्ष जत्थेदार अवतार सिंह मक्कड़ ने पिछले दिनों 100 वर्षीय प्रसिद्ध सिख धावक फौजा सिंह का कार्टून बनाकर सिखी से भद्दा मजाक करने वाले 'जय हिंद' टीवी चैनल के एंकर सुमित राघवन की निंदा करते हुए इनके खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग की है।

 
फौजा सिंह ने बड़ी आयु के बावजूद विदेशों में अपना व सिखी का नाम चमकाया है। फौजा सिंह द्वारा मेराथन दौड़ में स्वर्ण पदक जीतने से सिखों की विदेश में अलग पहचान बनी है। अफसोस है कि सांप्रदायिक सोच वाले टीवी चैनल 'जय हिंद' व इसके एंकर सुमित राघवन को यह सब कुछ हजम नहीं हो रहा है। जत्थेदार मक्कड़ ने कहा कि मीडिया का रोल सृजनात्मक रहता है। पर जय हिंद टीवी चैनल के प्रबंधक सांप्रदायिक सोच के धारणी है जो देश की शांति को भंग करने की कोशिश में है। उन्होंने कहा कि प्रसारण मंत्रालय को चाहिए कि ऐसे टीवी चैनल पर पाबंदी लगाई जाए। (जागरण)

वेणु राजमणि बने प्रणव मुखर्जी के प्रेस सचिव

 

राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी की नयी मीडिया टीम की आज घोषणा कर दी गई है. भारतीय विदेश सेवा के अधिकारी वेणु राजमणि उनके नये प्रेस सचिव बनाए गए हैं. राजमणि ने अर्चना दत्त का स्थान लिया है. जिन्हें सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय में भेजा गया है. पेशे से राजनयिक और 1986 के आईएफएस अधिकारी राजमणि संयुक्त सचिव थे तथा वित्त मंत्रालय के आर्थिक मामले विभाग में अक्टूबर, 2010 से मल्टीलेटरल इंस्टीट्यूशन डिवीजन के प्रमुख थे.
 
प्रेस सूचना कार्यालय अधिकारी शमीमा सिद्दिकी राष्ट्रपति भवन में नयी उप प्रेस सचिव होंगी. उन्होंने नितिन वाकणकर का स्थान लिया है. वाकणकर एपीजे अब्दुल कलाम और प्रतिभा पाटिल के राष्ट्रपति रहने के दौरान अपनी सेवाएं दे चुके हैं. एक अखबार में बतौर संवाददाता काम करने के बाद राजमणि भारतीय विदेश सेवा से जुड़े थे. उन्होंने हांगकांग में भारतीय मिशन तथा बीजिंग में भारतीय दूतावास में नौ साल तक अपनी सेवाएं दी थीं. वह संयुक्त राष्ट्र, अमेरिका में भी अपनी सेवा दे चुके हैं. साभार : सहारा

जागरण के अवैध प्रकाशनों को भी मिलता है सरकारी विज्ञापन

जैसे-जैसे आरटीआई से सूचना मिल रही है वैसे-वैसे जागरण के फर्जीवाड़े तथा आर्थिक अपराधों की पोल खुलती जा रही है. आरटीआई से मांगी कई एक सूचना में जानकारी मिली है कि बिहार विज्ञापन प्राधिकृत समिति ने 2008 में दैनिक जागरण के भागलपुर तथा मुजफ्फरपुर के अवैध संस्‍करणों को भी राज्‍य विज्ञापन स्‍वीकृत सूची में शामिल किया है. जाहिर है कि जागरण के इन अवैध संस्‍करणों को पिछले कई सालों में करोड़ों रुपये के सरकारी विज्ञापन मिल चुके हैं. 

 
उल्‍लेखनीय है कि जागरण सालों से पटना के रजिस्‍ट्रेशन नम्‍बर पर भागलपुर तथा मुजफ्फरपुर संस्‍करणों का प्रकाशन किया जा रहा है, जो पीआरबी एक्‍ट के तहत गलत है. शिकायत के बाद जागरण प्रबंधन ने पिछले दिनों मुजफ्फरपुर के रजिस्‍ट्रेशन के लिए आवेदन किया है, जिसका प्रकाशन अखबार में किया जा रहा है.
 

इंडिया न्‍यूज के रिसर्च टीम से 11 किए गए बाहर

इंडिया न्‍यूज से खबर है कि प्रबंधन ने रिसर्च टीम को बाहर का रास्‍ता दिखा है. प्रबंधन के इस निर्णय से ग्‍यारह कमर्चारी बेरोजगार हो गए हैं. प्रबंधन बीस हजार से ज्‍यादा सैलरी पाने वालों को भी बाहर का रास्‍ता दिखाने की तैयारी में हैं. सूत्रों का कहना है कि न्‍यूज एक्‍स का अधिग्रहण करने के बाद प्रबंधन को इंडिया न्‍यूज की रिसर्च टीम औचित्‍यहीन लगने लगी थी. जिसके बाद रिसर्च टीम से ग्‍यारह लोगों को बाहर कर दिया गया. अब न्‍यूज एक्‍स की रिसर्च टीम ही ग्रुप के सभी चैनलों को सेवाएं देगी. 

 
दूसरी तरफ यह भी खबर आ रही है कि प्रबंधन न्‍यूज एक्‍स का अधिग्रहण करने के बाद कंपनी का रनिंग कास्‍ट कम करने की तैयारी कर रहा है. इसके लिए बीस हजार से ज्‍यादा पाने वालों लोगों की लिस्‍ट तैयार की जा रही हैं. इसमें सभी विभागों के लोग शामिल हैं. इस लिस्‍ट के बाद तय किया जाएगा कि किसे रखा जाए और किसे बाहर का रास्‍ता दिखाया जाए. खबर है कि इस सूचना के बाद से बीस हजार से ज्‍यादा सैलरी पाने वाले सहमे हुए हैं. वैसे भी समूह में इस समय सैलरी लेट लतीफ ही चल रही है. 

हमार-फोकस वेतन विवाद : तीसरे दिन भी न्‍यूज रूम में डंटे हैं कर्मचारी

मतंग सिंह के फोकस टीवी और हमारा टीवी से खबर है कि कर्मचारी बकाए वेतन, पीएफ की मांग को लेकर तीसरे दिन भी न्‍यूज रूम में जमे हुए हैं. हमार तथा फोकस टीवी के लगभग सौ कर्मचारी धरने पर हैं. प्रबंधन कर्मचारियों के बीच फूट डालकर उनकी एकता को तोड़ना चाह रहा है. खबर है कि कुछ चुनिंदा कर्मचारियों को अकेले में बुलाकर प्रलोभन भी दिया जा रहा है. प्रबंधन पिछली बार हुए आंदोलन में भी यही रणनीति अपना चुका है. इनमें से ज्‍यादातर तब प्रबंधन के साथ खड़े हो गए थे. अब इन्‍हें इसी बात कर डर सता रहा है कि कुछ साथी इनके आंदोलन को धोखा दे सकते हैं. 

 
खैर, आंदोलन रत कर्मचारी किसी भी कीमत पर वेतन और पीएफ का पैसा पाना चाहते हैं. महुआ के कर्मचारियों को एकता के बाद सफलता मिलने से हमार तथा फोकस के कर्मचारी भी उत्‍साहित हैं. मैनेजमेंट ने आंदोलनरत पत्रकारों के बीच अपने कुछ भेदिए भी छोड़ रखे हैं जो इनकी हर रणनीति की जानकारी प्रबंधन तक पहुंचा रहे हैं. आंदोलनरत कर्मचारी मीडिया रेगुलेशन से संबंधित विभागों को भी पत्र लिखकर अपने साथ हो रहे अन्‍याय से अवगत करा रहे हैं. कर्मचारी इस बार आरपार की लड़ाई के लिए तैयार हैं. 
 
गौरतलब है कि चैनल लम्‍बे समय से ब्‍लैक आउट चल रहा है. प्रबंधन कर्मचारियों को झूठा आश्‍वासन देकर चार महीने तक ऑफिस आने को विवस करता रहा है. चार महीने से वेतन नहीं मिलने के बाद भी कर्मचारी उम्‍मीद में उधार-नगद करके ऑफिस आता रहा. अब सबके सामने भूखमरी की नौबत आ गई है. आश्‍वासनों से बुरी तरह परेशान होने के बाद ही कर्मचारी पंकज कुमार नेतृत्‍व में आंदोलन कर रहे हैं. धरना देने वालों में पंकज के अलावा मनीष मासूम, राजेश मिश्रा, विकास राज तिवारी, मृत्‍युंजय साधक, रचना ठाकुर, राजीव तिवारी, सौरभ उपाध्‍याय, पुनीत पुष्‍कर, अमर सिंह, गोपाल कृष्‍ण समेत कई अन्‍य कर्मचारी भी शामिल हैं. 

दो और मामलों में कोर्ट में हाजिर हुए पीके तिवारी

 

: जेल में हुई भुप्‍पी की सामान्‍य प्रक्रिया पर समूह प्रमुख से भेंट : नोएडा : महुआ समूह के मुखिया पीके तिवारी को दो और मामलों में कोर्ट में हाजिर करा दिया गया है। यह मामले मौजूदा उस मामले से अलग है, जिसमें उन्‍हें पहले से सीबीआई की तरह से जेल भेजा जा चुका है। उधर खबर है कि महुआ के सलाहकार भूपेंद्र नारायण सिंह उर्फ भुप्‍पी ने आज तिहाड़ में बंद पीके तिवारी से भेंट की। हालांकि इस भेंट का ब्‍योरा अब तक पता नहीं चला है। लेकिन इतना तो बताया जाता है कि इस बातचीत का मकसद महुआ में आये ताजा संकट के लेकर ही हुआ। कहा गया है कि समूह में तोपची-चूहे के तौर पर मशहूर बैडमैन की विवादित सितारगंज चुनावी यात्रा और उसमें उनके संगी-साथी रहे लोगों के साथ ही लखनऊ में उनकी एक करीबी की करतूतों पर लम्‍बी से चर्चा हुई। वैसे एक और खबरों के मुताबिक महुआ समूह के पुराने कर्मचारियों की एक बैठक समूह के प्रबंधन के साथ अगले 20 तारीख को होनी है और उसके तहत अब यह समूह अपने लोगों को एकजुट करना चाहता है। जाहिर है कि प्रबंधन का मकसद महुआ समूह को अब बंदी की ओर बढ़ाना नहीं है।
 
तो, पहले खबर अब तिहाड़ में बंद पीके तिवारी और उनके बेटे से हुई मुलाकात से। सूत्रों के मुताबिक आज दोपहर पीके तिवारी से भुप्‍पी की तिहाड़ जेल में मुलाकात हुई। यह मुलाकात जेल के नियमों के तहत हुई। बताते हैं कि भुप्‍पी ने सामान्‍य प्रचलित नियमों के तहत बाकायदा मुलाकाती वालों से मुलाकात करने वालों की प्रकिया में पर्ची लगायी। यह भी नहीं पता चल पाया है कि यह पर्ची खुद भुप्‍पी ने अपने नाम से तैयार किया थी, या किसी और के नाम पर मुलाकात की है। खैर, काफी समय बाद भुप्‍पी को तिहाड़ जेल के भीतर इंट्री मिली। पीके तिवारी से भेंट में, बताते हैं कि, भुप्‍पी ने करीब 17 मिनट तक बातचीत की। भेंट का पूरा ब्‍योरा तो नहीं मिल पाया है कि लेकिन बताते हैं कि इस भेंट में यशवंत राणा को लेकर हुई चर्चा ही केंद्र में रही। बताते हैं कि पीके तिवारी को लेकर महुआ के प्रति उनके रवैये, उनके पहले और जेल जाने के बाद हुए घटनाक्रमों को लेकर खुल कर बात की।
 
तिहाड़ के दौरान बातचीत में सितारगंज यात्रा के दौर को लेकर महुआ के कई बड़े लोगों द्वारा की गयी दलाली, महुआ से निकाले गये लोगों को वहां के भाजपा विधायक से गाड़ी मांगने के लिए महुआ के न्‍यूज डायरेक्‍टर के तौर पर पेश करने, उत्‍तराखंड के ब्‍यूरो प्रमुख को इस पूरे मामले में हटाने लगाने, खबरों को लेकर इस बीच अचानक हुए महुआ के तौर-तरीके और तेवर में आये बदलाव पर चर्चा की गयी। चर्चा हुई ऐसे लोगों की, जिन्‍होंने महुआ प्रबंधन को लगातार शुरू से ही न केवल धोखा किया और न केवल उन्‍हें खुद को एक राणा-सांगा की तरह किसी विजेता जैसा पेश किया। बताया गया कि कैसे उत्‍तराखंड में कैसे 28 लाख की नकद उगाही की गयी। कैसे वहां के ब्‍यूरोचीफ के साथ बदतमाजी की गयी। कैसे दो लाख बीस हजार रूपयों का बकाया किस तरह बांट-बट्टे में निजी समूह के लोगों को चूना लगाया गया। कैसे नोएडा इनक्‍लेव में किसके साथ उन लोगों ने किन लोगों की रात रंगीन किये जिन पर महुआ न्‍यूज लाइन में चटखारे में चर्चाएं हर दरवाजे में खूब चलती हैं। इन्‍हीं लोगों ने ही तो ठीक उसी रात रंगीन किया था कि जिस ही दिन इस चैनल की बंदी का ऐलान राणा यशवंत ने किया था। 
 
कर्मचारी जब महुआ आफिस में भूख-प्‍यास-आशंकाओं से जूझ रहे थे, उसी ही रात तो महंगी दारू और बिरयानी कट रही थी। शराब के साथ शबाब के बीच। इन्‍हीं लोगों ने ही तो यूपी चैनल की इस बदतमीज पत्रकार के साथ अपनी इश्‍कबाजी में इस करीबी के चलते ही महुआ को ताजमहल बताने की साजिशें की थीं, बावजूद सारे कर्मचारी इस महिला के व्‍यवहार से बेहद खफा थे। बताते हैं कि बातचीत के पहले ही पीके तिवारी ने इस कांड का खुलासा करते हुए इस बैडमैन को कम्‍पनी से बाहर निकाल कर दिया था। 
 
बहरहाल, खबर है कि महुआ समूह प्रबंधन ने पीके तिवारी पर दो और भी लंबित मुकदमों में हाजिर कराने का फैसला किया है। यह दोनों ही मामले पीके तिवारी पर पहले से दर्ज थे और उन पर तिवारी जी को पहले से वांछित किया गया था। बताते है कि पीके तिवारी के करीबी और कलेक्‍शन चीफ मनोज दुबे इस पूरे मामले की गंभीरता के साथ देख रहे थे। लेकिन बताते हैं कि इन नयी इस हाजिरी का मकसद था कि पीके तिवारी को जमानत के दौरान किसी भी दिक्‍कत से रोकने का मकसद था। इन लोगों का मकसद था कि ऐसा न हो कि किसी जमानत पर छोड़ते ही पीके तिवारी को नये या पुराने किसी मामले में वांछित कर उन्‍हें फिर जेल की यात्रा करा दी जाए।
 
सूत्र बताते हैं कि महुआ समूह अब उन सभी उन लोगों से फिर नये से बात करना चाहता है कि जो इस समूह में पुराने हैं। यह सभी 

लोग ऐसे हैं जिन्‍हें हाल ही में  कम्‍पनी से निकाल दिया गया था। साफ है कि प्रबंधन का मकसद इस समय चैनल को चलाना ही है, न कि उसे बंद करना है। अब यह सब लोग अगले 20 तारीख को प्रबंधन के साथ एकजुट होंगे, बातचीत होगी और रणनीति तैयार की जाएगी।
 
लेखक कुमार सौवीर सीनियर जर्नलिस्‍ट हैं. वे कई अखबारों तथा चैनलों में वरिष्‍ठ पदों पर काम कर चुके हैं. इन दिनों स्‍वतंत्र पत्रकार के रूप में सक्रिय हैं. इनसे संपर्क 09415302520 के जरिए किया जा सकता है.

कुमार्ग के राह पर रांची सन्मार्ग, तीन माह का वेतन बकाया

 

सन्मार्ग, रांची के कर्मियों का वेतन बकाया फिर तीन माह का हो गया है. जुलाई में अप्रैल माह का भुगतान करते वक़्त डाइरेक्टर प्रेम ने एक सप्ताह के अन्दर एक माह का और भुगतान करने का आश्वासन दिया था लेकिन फिर इसकी कोई सुगबुगाहट नहीं हुई. काफी मान-मंनौवल के बाद पुनर्वापसी के कारण सम्पादक बैजनाथ मिश्र प्रबंधन के प्रति कटु वचन बोलने में संकोच नहीं कर रहे और वेतन रोकने की प्रवृति की खुलेआम निंदा कर रहे हैं, लेकिन इस मुद्दे पर प्रेम से सीधे दो टूक बात करने से हिचक रहे हैं. 
 
मॉर्निंग इंडिया के प्रभारी विष्णु राजगढ़िया प्रेम के गुड बुक में आने के लिए औरों की शिकायत से लेकर हर तरह के हथकंडे अपना रहे हैं. लेकिन उन्हें पता नहीं कि उनकी तमाम बातें न सिर्फ टेप की जा रही हैं बल्कि सम्बंधित लोगों को सुनाई भी जा रही हैं. तमाम चाटुकारिता के बावजूद राजगढ़िया साहब और मॉर्निंग इंडिया की उनकी टीम के लोगों का वेतन भी दो माह से रुका हुआ है. ज्वाइनिंग के बाद उन्हें एक पैसे का भी दर्शन नहीं हुआ है. वेतन बकाया होने का कारण वित्तीय संकट नहीं बल्कि प्रबंधन की प्रवृति है. संस्थान के पास विज्ञापन का पैसा आ रहा है. लाभ हो रहा है. किसी खर्च में कटौती नहीं की जा रही है. 
 
हिंदी और उर्दू के बाद अंग्रेजी अखबार भी छपना शुरू हो चुका है. जानकार लोगों का कहना है कि डाइरेक्टर प्रेम लगातार कर्मियों की छंटनी करते जा रहे हैं और वेतन रोककर अन्य लोगों को भी संस्थान छोड़ने को विवश करना चाहते हैं, ताकि छोटी सी टीम के जरिये फ़ाइल कॉपी छापें और सरकारी विज्ञापनों के जरिये ऐश करें. ज्यादा छापने और बाजार में भेजने में उन्हें कोई लाभ नहीं दिख रहा है. जब सौ-दो सौ अखबार छापकर लाखों के विज्ञापन लुटे जा सकते हैं तो ज्यादा छापने से क्या लाभ. संपादकों को बार-बार बदलने के पीछे भी यही मानसिकता है. कर्मियों के अन्दर आक्रोश बढ़ता जा रहा है लेकिन उन्हें कोई रास्ता नहीं सूझ रहा है. ऐसी चर्चा है कि प्रेम माडिया के प्रति कोई खुन्नस निकाल रहे हैं.

रांची में न्‍यू इस्‍पात मेल का कार्यालय खुला

 

रांची से खबर है कि जल्‍द ही न्‍यू इस्‍पात मेल का प्रकाशन होने जा रहा है. गुरुवार को रांची में अखबार के कार्यालय का उद्घाटन हुआ. न्‍यू इस्‍पात मेल का प्रकाशन झारखंड के जमेशदपुर से होता है. खबर है कि झारखंड के वरिष्‍ठ पत्रकार संजय समर को रांची में अखबार लांचिंग की जिम्‍मेदारी सौंपी गई है. फिलहाल अखबार को दूसरे अखबार के प्रिंटिंग यूनिट से प्रिंट काने की योजना है. बाद में प्रबंधन अपना प्रिंटिंग यूनिट स्‍थापति कर सकता है. संजय समर को अखबार के प्रकाशन के साथ टीम गठन का दायित्‍व भी सौंपा गया है. 

अजमद सलीम ने आई नेक्‍स्‍ट के पेड न्‍यूज की शिकायत की

 

पेड न्‍यूज के लिए बदनाम दैनिक जागरण समूह के अखबार आई नेक्‍स्‍ट की शिकायत प्रेस काउंसिल के अध्‍यक्ष जस्टिस मार्कंडेय काटजू से की गई है. बरेली में जागरण कांग्रेस से मेयर पद के प्रत्‍याशी रहे अमजद सलीम एडवोकेट ने यह शिकायत की है. अजमद सलीम ने अपने पत्र लिखा है कि आई नेक्‍स्‍ट के लोगों ने उनसे छह लाख रुपये की मांग की. पैसे देने पर असमर्थता जताने पर पचास लाख रुपये लेकर दूसरे प्रत्‍याशी आईएस तोमर के पक्ष में बैठने को कहा गया. 
 
एडवोकेट सलीम ने आरोप लगाया है कि पेड न्‍यूज के लिए उनके खिलाफ आई नेक्‍स्‍ट एवं जागरण में उनके खिलाफ खबरें प्रकाशित की गईं. उन्‍होंने जस्टिस  काटजू से इस प्रकरण में उचित कार्रवाई करने की मांग की है. नीचे एडवोकेट सलीम द्वारा जस्टिस काटजू को लिखा गया पत्र.    
 
 

ईटीवी, आगरा से मुकेश कुमार का इस्‍तीफा

 

आगरा में ईटीवी को बड़ा झटका लगा है. यहाँ के तेज तर्रार संवाददाता मुकेश कुमार ने ईटीवी से इस्तीफ़ा दे दिया है. छह साल से मुकेश कुमार ने ईटीवी को तमाम बड़ी ख़बरों में आगे रखा. माया सरकार के समय एमजी रोड पर दंगे की लाइव तस्‍वीरें हो या फिर आगरा में बम धमाके की घटना मुकेश कुमार की धमाकेदार रिपोर्टिंग ने ईटीवी को हमेशा आगे रखा. हाल ही के नगर निकाय चुनाव में आगरा में पुलिसिया तांडव की खबर पर यूपी विधान सभा में हंगामा भी मुकेश कुमार की खबर के बाद ही हुआ, लेकिन ईटी वी प्रबंधन ने मुकेश के प्रमोशन की ओर ध्‍यान नहीं दिया, जिससे नाराज होकर मुकेश ने इस्‍तीफा दे दिया. खबर है कि मुकेश कुमार ने राजधानी लखनऊ में सी न्यूज़ उत्तर प्रदेश में बतौर सीनियर रिपोर्टर ज्वाइन कर लिया है.

खबर चोर दैनिक प्रभात?

 

गाजियाबाद : गाजियाबाद के नवयुग मार्केट इलाके से प्रकाशित दैनिक प्रभात ने पत्रकारिता की तमाम मर्यादाओं को तारतार कर दिया है। दैनिक प्रभात ने गाजियाबाद से प्रकाशित स्थानीय सांध्य अखबारों की बासी व झूठन खबरों को अपने यहां हू-ब-हू छापना शुरू कर दिया है, यहां तक कि अखबार के करामाती सम्पादक चुराई गई खबर का शीर्षक बदलना भी उचित नहीं समझते। 
 
दैनिक प्रभात ने 11 जुलाई 2012 के अंक मे पेज चार पर’क्रिकेटर राहुल ने बताया मांसी के परिवार को जान का खतरा’शीर्षक से खबर प्रकाशित की थी, खास बात यह है कि यह खबर एक दिन पहले यानी 10 जुलाई 2012 को गाजियाबाद से प्रकाशित सांध्य दैनिक राष्ट्रीय आईना में प्रथम पेज पर इसी शीर्षक से प्रकाशित हो चुकी है। इन दोनों समाचार पत्रों की स्कैंड कतरन हम पाठकों के लिए हूबहू यहां दे रहें हैं। इसके बाद आप खुद अंदाजा लगा सकते हैं कि अखबार का सम्पादक किस प्रकार 68 वर्ष पुराने दैनिक प्रभात का तबला बजा रहा है। यह घटना तो महज एक बानगी है, दैनिक प्रभात में आये दिन इस प्रकार की अमर्यादित घटनाएं घटित होती रहती हैं। 
 
इस समाचार पत्र के संस्थापक स्वर्गीय विस विनोद ने कभी यह नहीं सोचा होगा कि उनके इंतकाल के बाद इस अखबार की ऐसी दुर्गति होगी। कुछ वर्ष पहले इस अखबार को सुभारती विश्वविद्यालय मेरठ की मीडिया विंग सुभारती मीडिया लि0 ने टेक ओवर कर लिया था। अखबार में नान प्रोफेसनलस की थेाक में भर्ती के चलते यह संस्थान दिन प्रतिदिन गड्ढे में गिरता जा रहा है। दैनिक प्रभात के नोएडा कार्यालय से जुडे़ एक सूत्र की माने तो इस संस्करण में ज्यादातर स्थानीय खबरें लोकल अखबारों से ही चुराकर काम चलाया जाता है। 
 
मजे की बात यह है कि दैनिक प्रभात में स्थानीय सम्पादक के पद पर तैनात अवनिंद्र ठाकुर कभी किसी दैनिक अखबार में नहीं रहे वह नोएडा के माडर्न व लॉर्ड महावीरा जैसे स्कूलों में संगीत के अध्यापक थे। यह तो उन्‍होंने भी कभी नहीं सोचा होगा कि सुभारती का नौसिखिया प्रबंधन आंख मिच कर इतनी बडी़ जिम्‍मेदारी दे देगा।
 
एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित. 

मीडियाकर्मियों पर हमले की सुनवाई शुरू

 

इटानगर : अरुणाचल प्रदेश में मीडियाकर्मियों पर हमले के मामले की सुनवाई शुरू हो गई है। इसके लिए विशेष तौर पर प्रथम श्रेणी के दंडाधिकारी तालो पोटोम को नियुक्त किया गया है। मुख्यमंत्री नबाम तुकी ने मीडियाकर्मियों को आश्वासन दिया था कि उनपर हुए हमले की निष्पक्ष सुनवाई की जाएगी। 15 अप्रैल को अरुणाचल टाइम्स के कार्यालय पर तोड़फोड़ करने के मामले में गिरफ्तार 10 अभियुक्तों को गत शनिवार को कोर्ट में पेश कर उनका बयान दर्ज किया गया।

आपके धंधे का क्‍या हालचाल है मिस्‍टर न्‍यूजमैन?

 

नोएडा : तोतले से करा दिया विजय बहुगुणा का इंटरव्‍यू। भड़के बहुगुणा ने सुना दीं खरी-खरी। भागे न्‍यूजमैन सितारगंज में अपने के चेले के साथ। भाजपा की गाड़ी में मौज लिया, दर्जनों इंटरव्‍यू किया, गांधीछाप लाल नोटों वाली गड्डियां समेटीं और फर्जी फोनो स्‍टूडियो से दिया। तो यह सचाई है इस बड़े चैनल के बैड-मैन की, जिसके चलते ही इस चैनल का बंटाधार हो गया। और दिलचस्‍प बात यह है कि यही बैड-मैन अब खुद को न्‍यूजमैन बताते हुए पत्रकारिता और पत्रकारों का हितैषी बनने का डंका बजाता है। बहरहाल, सवाल तो अब उठेंगे ही कि आखिर इस चैनल को किसन तोड़ने की साजिशें कीं और डेढ़ सैकड़ा कर्मचारियों का खून किसने बहाया। 
 
लेकिन पहले एक हल्‍की सी पृष्‍ठभूमि दिखा दिया जाए। तो आइये, दिखाते हैं आपको कुछ तथ्‍य, जो आपके दिमाग को चक्‍करघिन्‍नी नचा कर सकते हैं। वो सवाल हैं जिनका जवाब आप खुद ही इस बैड-मैन से पूछ लीजिए ना। मेरा दावा है कि इनमें से किसी भी सवाल का जवाब इस न्‍यूज-मैननुमा बैड-मैन से आपको हर्गिज नहीं मिलेगा। मसलन, रूद्रपुर रोड स्थित होटल में लगातार एक हफ्ते तक कौन-कौन रूके थे, भाजपा के विधायक की ईनोवा गाड़ी में किसने और किस लिए मौज मारी। क्‍यों उत्‍तराखंड के ब्‍यूरोचीफ को सितारगंज जाने से मना किया और किससे यह आदेश दिया। जब ब्‍यूरोचीफ मौजूद था, तब एक बाहरी दलाल को इस चैनल की तरफ से बहुगुणा का साक्षात्‍कार लेने क्‍यों दिया गया। सात दिन पहले ही इस चैनल से बर्खास्‍त किये गये शख्‍स को आखिरकार अपने साथ होटल में रखा और आखिर उसका परिचय बहुगुणा और उनके लोगों से इस चैनल के न्‍यूज डायरेक्‍टर के तौर क्‍यों कराया। मोटी रकम की खबरें तो अब छनकर आ ही रही हैं।
 
पूछने वाले लोग तो अब पूछने ही लगे हैं कि आखिर जब २३ जून से १ जुलाई तक इस चैनल की खबरों ने विजय बहुगुणा को ख़ासा परेशान कर दिया, तो आखिर फिर इस चैनल ने खुद का पाला क्‍यों और कैसे बदल लिया। ऐसी ही खबरों से परेशान होकर सरकार ने सितारगंज में इस चैनल के प्रसारण को रोकवा दिया भी था। लेकिन जन-विरोध का ज्‍वर का उमड़ा और लोगों के खासे विरोध के बाद इस चैनल का प्रसारण प्रशासन द्वारा दुबारा शुरू कराया। दरअसल, इस चैनल ने एक जबरदस्त खबर तान दी कि मुख्यमंत्री का वादा या छलावा। जाहिर है कि जनता छलावा के खिलाफ हो गयी और बैडमैन ने जनता के प्रति अपना वादा तोड़ दिया। इसके साथ ही अचानक बैडमैन बॉस की एंट्री हुई जो शायद पत्रकारों के लिए किसी भद्दी गाली से कम नहीं रही। दलाली की थाली पर नोटों की गड्डियां परोसने-जीमने का खेल शुरू हो गया। 
 
विजय बहुगुणा और उनके करीबियों पर खूब आरोप थे। इस न्‍यूज चैनल ने इस पर सैकड़ों खबरें चलायीं। इस पर ब्‍यूरोचीफ को धमकियां भी मिलीं, लेकिन खबरें चलती रहीं। कि अचानक ही डील हो गयी। और बीच में सीधे पिच पर आ गये बैड-मैन। स्‍वादिष्‍ट मलाई-रबड़ी की खुशबू नासिका-रंध्र को बेहाल कर रही थी। जुगाड़ खोजा जाने लगा कि अचानक दलाली के लिए कुख्‍यात एक स्‍थानीय पत्रकार ने बैडमैन को सब्‍जबाग दिखा ही दिया। बहुगुणा और बैडमैन के बीच डील का दौर चला और कहने की जरूरत नहीं कि झांसा बिलकुल सटीक बैठा। बहुगुणा के बेटे साकेत बहुगुणा ने अगले तीन दिनों तक इस बैड-मैन से फोन पर लम्‍बी-लम्‍बी बातें कीं। नतीजा, बैडमैन ने साकेत का इंटरव्‍यू के लिए मौका तय किया। लेकिन दलाल पत्रकार को देखते हुए बहुगुणा बिदक गये। अब चूंकि अब तक शूटिंग शुरू होनी ही थी, इंटरव्‍यू हो ही गया। पहली जुलाई को ही चैनल ने दिन पर इस इंटरव्‍यू को झक्‍कास और विशेष खबर के तौर चलायी। लेकिन इसी बीच बहुगुणा का फोन फिर आ गया। बताते हैं कि बहुगुणा ने बैडमैन से कड़ी शिकायत की कि यह इंटरव्‍यू है या मजाक। अगर किसी तोतले से यह इंटरव्‍यू क्‍यों कराया। दलाल के चरित्र से बखूबी परिचित बहुगुणा के करीबियों के मुताबिक बहुगुणा ने बैडमैन से साफ कह दिया कि अगर इसी तरह काम होगा तो डील खटाई में हो सकती है।
 
बताते हैं कि इस धमकी को सुनते ही बैडमैन बदहवास हो गये। चूंकि मामला जल्‍दी से निपटाने वाली बड़ी डील का था, इसलिए बैडमैन आननफानन भागकर सीधे उत्‍तराखंड के सितारगंज पहुंच गया। उसके साथ उसका एक चेला भी था जो 25 जून को ही इस चैनल से बर्खास्‍त कर गेट से बाहर निकाला गया था। रूद्रपुर रोड पर बने एक होटल में पहली जुलाई को अपने चेला-चपाटियों के साथ पहुंचा। बैडमैन ने अपने चेले का परिचय इस चैनल के न्‍यूज डायरेक्‍टर के तौर पर कराया और एक भाजपा के विधायक की ईनोवा कार की सेवाएं अपने लिए हासिल कर ली। हां हां, फ्री में। और क्‍या यह बैडमैन कार का किराया देता।
 
लेकिन इसी बीच, सूत्रों के मुताबिक, बैडमैन ने अपनी इस डील को गुपचुप रखने के लिए इस ब्‍यूरोचीफ को पहले ही सितारगंज जाने से मना कर दिया था। बताते हैं कि फोन पर ब्‍यूरोचीफ को सख्‍त हिदायत दी गयी थी कि वह हर्गिज भी सितारगंज न पहुंचे। जबकि डे-प्‍लान के मुताबिक सितारगंज का कवरेज इसी ब्‍यूरोचीफ के जिम्‍मे था। बहुगुणा के इंटरव्‍यू के बारे में जब ब्‍यूरोचीफ ने बात करनी चाही तो उसे जमकर डांट दिया। बोले: जितनी औकात हो, उतना ही बोला  करो। बहरहाल, बैडमैन ने अगले तीन दिनों यानी चार जुलाई की शाम तक सितारंगज का दौरा किया। निजी बातों को क्‍या सुनाया जाए, लेकिन इस दौरान धकाधक इंटरव्‍यू, वाक थ्रू, वन टू वन और फोनो की तो झड़ी ही लगा दी गयी। वापसी नोएडा तक बैडमैन की बांछें खिल चुकी थीं। यानी जगजाहिर हो चुका था कि नोएडा-सितारगंज-नोएडा की यात्रा में कमाल का गुल खिल चुका था। लेकिन बात इतनी तक ही नहीं रही। अगले दिन बैडमैन ने अपना राजनीतिक नमक ऐन-केन-प्रकारेण अदा करने के लिए अपना फोनो जारी रखा। लेकिन इसके लिए अपनी लोकेशन नोएडा स्थित आफिस नहीं बताया गया। जानकार बताते हैं कि नोएडा स्‍टूडियो में बैठकर सितारगंज का आंखोंदेखी खबरें सुनाने वाले इन फोनोज में क्‍या-क्‍या नहीं बोला इस बैडमैन ने। आप भी सुनिये ना:- जी जी, हम और हमारी टीम अभी तक सितारगंज में मौजूद है। यहां की सड़कों पर घूमते समय मैं साफ तक देख सकता हूं कि यहां जन-सैलाब है। हर शख्‍स खुश है, उसके मन में उमंग है, हर शख्‍स की जुबान पर केवल नाम है। और वह नाम है केवल बहुगुणा का। जी हां, बहुगुणा-बहुगुणा। मैं आपको बताऊं कि यहां अगर 

यहां कोई लहर है, तो वह है यकीनन बहुगुणा की है। और मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि इस चुनाव में मतदाताओं के दिल और दिमाग में केवल और केवल बहुगुणा का ही नाम है और इस बार तो चुनावी फलक पर यहां केवल बहुगुणा की जीत का ही परचम दिखेगा।
 
लेखक कुमार सौवीर सीनियर जर्नलिस्‍ट हैं. वे कई अखबारों तथा चैनलों में वरिष्‍ठ पदों पर काम कर चुके हैं. इन दिनों स्‍वतंत्र पत्रकार के रूप में सक्रिय हैं. इनसे संपर्क 09415302520 के जरिए किया जा सकता है.

महुआ : ये जीत के जश्न का नहीं…सोचने का वक़्त है

गरदन इज़्ज़त पर दिए फिरो..तब मज़ा यहां जीने का है/ तनकर बिजली का वार सहे..यह गर्व नए सीने का है। अगर…महुआ न्यूज़लाइन के पत्रकारों की टीम की सोच इन पंक्तियों जैसी नहीं होती… तो फिर जो नतीजे सामने आए वो कभी नहीं आते। अगर ये टीम कलम की धार से जनता के हक की आवाज बुलंद करने वाले तेवर की नहीं होती…स्वाभिमान से लबरेज न होती…हर जिम्मेदारी को प्राण-प्रण से पूरी करने वाली नहीं होती तो वो अपने अधिकारों की आवाज़ कभी नहीं उठा पाती। इस आंदोलन में किसकी जीत हुई किसकी हार..अब ये तय करना बड़ा मसला नहीं। मसला ये है कि क्या वाकई अब कोई मीडिया घराना ऐसा करने की हिम्मत नहीं करेगा? जवाब निराशाजनक ही मिलेगा…ऐसे में मुद्दा ये है कि क्या आगे भी पत्रकार अपने हक की आवाज को अपने दम पर उठाएंगे? इस बात की परवाह किए बिना क्या वे मिलकर लड़ेंगे ..कि कोई साथ आए न आए हम जीतकर रहेंगे। वो भी अपने दम पर?

 
न्यूज़लाइन के कर्मचारियों की जीत यूं ही नहीं हो गई। प्रबंधन अगर झुका तो संगठित विरोध की वजह से। कोई और रास्ता नहीं होने की वजह से। जबर्दस्त दबाव की वजह से। नहीं तो 29 तारीख की शाम 5 बजे का फरमान तो ये था कि हम आपको अब पैसे नहीं दे सकते। ऑफिस खाली करिए और महीने भर बाद आइएगा पैसे की पहली किस्त लेने। बकाए वेतन की अगली किस्त उसके अगले महीने लेने आइएगा। कोई क्षतिपूर्ति नहीं। कोई सुनवाई नहीं। अगर सामूहिक प्रतिरोध का बवंडर नहीं उठा होता और हर स्तर पर यहां के पत्रकारों ने चट्टानी एकता नहीं दिखाई होती तो फिर तो हो गया था। पूरी तरह से पैदल थे सभी 120 लोग।  
 
 
न्यूज़लाइन के पत्रकार तब तक चैन से बैठने को तैयार नहीं जब तक 15 सितंबर 2012 की तारीख का क्षतिपूर्ति का एक अहम चेक भुन न जाए। क्योंकि इसमें एक बड़ा ‘झोल’है। संस्थान के वायदे पर एक हद तक भरोसा करना परिस्थिति की मांग थी इसलिए तमाम रणनीति तैयार होने के बावजूद सभी पत्रकार इस पर आंशिक तौर पर सहमत हुए..और मसला तात्कालिक तौर पर सुलझ गया। लेकिन इस ‘झोल‘की प्राथमिक रिपोर्ट के तथ्य चौंकानेवाले हैं। अभी अंतिम रिपोर्ट के लिए थोड़ा इंतज़ार किया जा रहा है। अगर इस चेक को 16 सितंबर या फिर उसके बाद की तारीख में बैंक की तरफ से भुनाए जाने से इनकार किया गया। तो अगली रणनीति तैयार है। पहले ही कहा जा चुका है कि ये आर-पार की लड़ाई थी और ये संघर्ष शर्तों के पूरा होने तक जारी रहेगी।
 
महुआ न्यूज़लाइन के पत्रकारों का आंदोलन एक नई लकीर इसलिए खींच पाया क्योंकि ये कामयाब रहा। और कामयाबी की वजहों पर गौर करना जरूरी है। न्यूज़रूम में तीन दिनों तक चौबीसों घंटे लगातार धरने और आक्रामक लेकिन मर्यादित और संयमित विरोध ने महुआ प्रबंधन के सामने कोई विकल्प बाकी नहीं छोड़ा। उसके सामने सिवाय मांग पूरी करने के कोई रास्ता ही नहीं बचा था। रविवार को आंदोलन शुरू हुआ…और मंगलवार को डेढ़ बजे दिन में प्रबंधन ने हर मांग कबूल करने का ऐलान किया। साथ ही प्रबंधन को अपनी गलती के लिए माफी भी मांगनी पड़ी। एचआर की प्रमुख सन्निहिता ने कहा –‘जो भी हुआ..दुखद हुआ हमें इसका बहुत खेद है, हमने आपकी सभी मांगों को जायज़ समझा है। और इसे पूरी तरह मानने का फैसला किया है‘। इस ऐलान के बाद 120 के करीब कर्मचारियों के कागजात और चेक तैयार करने में करीब 6 घंटे का वक्त लगा। तकरीबन 8 बजे इस बात का ऐलान किया गया कि आप अपना चेक और बाकी औपचारिक दस्तावेज कलेक्ट कर सकते हैं।
 
 
इसके तुरंत बाद अंग्रेजी के प्रख्यात पत्रकार  प्रॉंजय गुहा ठकुराता यहां महुआ न्यूजलाइन के कर्मचारियों को बधाई देने पहुंचे, उन्होंने कहा कि ऐसी जीत इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में शायद ही कभी हुई हो। प्रॉंजय ने कहा कि भारत का मीडिया जगत संक्रमण के दौर से गुजर रहा है और पत्रकारों की हालत मीडिया घरानों ने बद से बदतर कर दी है। प्रॉंजय ने कहा कि पिछले दिनों सीएनईबी और अब महुआ न्यूज़लाइन में जो कुछ हुआ है उसके बाद तो तमाम पत्रकार संगठनों को सड़कों पर उतरना चाहिए था लेकिन ऐसा नहीं हुआ। एनबीए और बीईए का नाम लिए बगैर प्रॉंजय ने कहा कि ऐसे मुद्दे पर सबको एकजुट होना चाहिए क्योंकि सवाल लोकतंत्र के चौथे खंभे की गरिमा और पत्रकारों के आत्मसम्मान का है। उन्होंने कहा कि आप सबकी जीत से सभी पत्रकारों को एक नया हौसला मिलेगा। और शांतिपूर्ण ढंग से वो अपने हक के लिए हर जगह आवाज़ उठाना सीखेंगे।
 
प्रॉंजय ने महुआ न्यूज़रूम में संगठित विरोध के अगुआ रहे वरिष्ठ पत्रकार अनुराग त्रिपाठी को बधाई दी और कहा कि हमें आप पर गर्व है। इस मौके पर महुआ न्यूज के समूह संपादक राणा यशवंत ने कहा कि हमारी टीम हर मापदंड पर कामयाब साबित हुई है, उन्होंने कहा कि हमारे सपने अधूरे रहे हैं लेकिन टूटे नहीं हैं।
 
महुआ न्यूज़लाइन के पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

12 अगस्‍त को होगा यूपी मान्‍यता प्राप्‍त संवाददाता समिति का चुनाव

 

: चुनाव कार्यक्रम घोषित : पिछले काफी समय से विवाद के चलते टल रहे उत्‍तर प्रदेश राज्‍य मुख्‍यालय मान्‍यता प्राप्‍त संवाददाता समिति का चुनाव कार्यक्रम घोषित कर दिया गया है. 2से 4 अगस्‍त तक नामांकन होगा. 5 अगस्‍त को नामांकन पत्रों की जांच होगी तथा 6 अगस्‍त को नामांकन पत्रों की वापसी होगी. मतदान तथा मतगणना 12 अगस्‍त को होगा. चुनाव किशोर निगम, दीपक गिडवाणी और राजकुमार सिंह की देखरेख में होंगे. नीचे चुनाव कार्यक्रम की कॉपी. 
 
उत्तर प्रदेश राज्य मुख्यालय मान्यता प्राप्त संवाददाता समिति निर्वाचन-2012
 
कार्यक्रम
 
नामांकन प्रारम्भ           –  02 अगस्त (गुरुवार)
नामांकन अंतिम तिथि      –  04 अगस्त (शनिवार)
नामांकन पत्रों की जांच      –  05 अगस्त (रविवार)
नामांकन पत्रों की वापसी     –  06 अगस्त (सोमवार)
मतदान                  –  12 अगस्त (रविवार)
मतगणना                –   12 अगस्त (रविवार)
 
नोट-
 
1. नामांकन पत्र 02 अगस्त प्रातः 11 बजे से एनेक्सी स्थित प्रेस रूम से रजनीश से निःशुल्क प्राप्त किए जा सकते हैं।
 
2. नामांकन पत्र 02 से 04 अगस्त के बीच सायं 04 से 06 बजे के बीच सचिवालय एनेक्सी स्थित प्रेस रूम में निर्वाचन अधिकारी के समक्ष जमा किए जाएंगे।
 
3. मान्यता प्राप्त संवाददाता अपना सदस्यता शुल्क रुपया 100/- (एक सौ) 10 अगस्त सायं 06 बजे तक सचिवालय स्थित प्रेस रूम में श्री रजनीश के पास जमा कर रसीद प्राप्त कर सकते हैं। चुनाव लड़ने एवं मतदान  करने के लिए सदस्यता शुल्क अनिवार्य है। सदस्यता शुल्क जमा न करने वाले मान्यता प्राप्त संवाददाता मतदान में भाग नहीं ले सकेंगे।
 
4. वर्ष 2012-13 के लिए राज्य मुख्यालय से मान्यता प्राप्त सभी संवाददाता (चुनाव प्रक्रिया) में भाग ले सकेंगे।
 
5. नामांकन पत्र के साथ उम्मीदवार को वर्ष 2012-13 के लिए मान्यता कार्ड की छायाप्रति लगाना अनिवार्य होगा।
 
6. मतदान के समय सदस्यों को वर्ष 2012-13 के लिए जारी राज्य मुख्यालय मान्यता कार्ड एवं सदस्यता शुल्क रसीद दिखाना होगा। इन दोनों दस्तावेजों के बिना मत पत्र नहीं दिया जाएगा।
 
7. निर्वाचन अध्यक्ष 01, उपाध्यक्ष 02, सचिव 01, संयुक्त सचिव 02, कोषाध्यक्ष 01 एवं कार्यकारिणी सदस्यों के 08 पदों के लिए होंगे।
 
 
    किशोर निगम                दीपक गिडवाणी         राजकुमार सिंह
मुख्य चुनाव अधिकारी         चुनाव अधिकारी        चुनाव अधिकारी
 
दिनांक- 01 अगस्त, 2012    

ईमानदारी और सच्‍चाई के साथ अपनी भूमिका निभाई : राणा यशवंत

 

महुआ न्‍यूजलाइन को बंद करने की घोषणा के बाद उठा विवाद प्रबंधन के लचीले रुख के बाद लगभग समाप्‍त हो गया है. संस्‍थान ने कर्मचारियों को दो माह की बकाया सैलरी और एक महीने का कंपनसेशन चेक सौंप दिया है. शायद यह टीवी इंडस्ट्री का पहला चैनल है, जहां पर बकाया वेतन और कंपनशेसन दोनों दिया गया और पूरा मामला स्‍मूथली निपटा लिया गया. इस मसले पर महुआ के समूह संपादक राणा यशवंत की भूमिका भी काफी सराहनीय रही है. भड़ास4मीडिया ने राणा यशवंत से बातचीत की. पेश है बातचीत के प्रमुख अंश :
 
– एक दुखद अध्‍याय, सैकड़ों मीडियाकर्मी बेरोजगार, आप इसे कैसे देखते हैं और फिलहाल क्‍या स्थिति है? 
 
 — दुखद है, लेकिन कई बार परिस्थितियां हाथ में नहीं होती हैं. जितना ज्यादा संभव हो सकता था संस्‍थान ने मीडियाकर्मियों के साथ इंसाफ करने की कोशिश की . प्रबंधन ने न्‍यूजलाइन के 110 कर्मचारियों को दो महीने की सैलरी और एक महीने का कंपेनसेशन का चेक दे दिया है. मुझे याद नहीं कि टीवी न्यूज इंडस्ट्री में किसी संस्थान ने मीडियाकर्मियों के साथ ऐसा सराहनीय न्याय किया हो. मौजूदा हालात के चलते यह एक चैनल के लिये ठहराव की स्थिति है और सही वक्त पर यही चैनल फिर आपको चलता हुआ दिखेगा. 
  
 – विवाद के क्‍या कारण रहे? प्रबंधन ने पहले ही यह कदम क्‍यों नहीं उठाया?
 
 — कोई विवाद नहीं था. संस्थान की सेहत औऱ बेहतरी के लिये यूपी उत्तराखंड न्यूज चैनल को रोकना मैनेजमेंट को जरुरी लग रहा था. दूसरी तरफ कर्मचारियों को अपना वाजिब हक चाहिए था. ऐसे नाजुक मसले चुटकियों में हल नहीं होते. इसमें कई जरुरी बातों पर विचार करना पड़ता है. इसके लिये वक्त की जरूरत होती है औऱ वही लगा. मेरे लिये सुकून की बात ये है कि सभी साथियों ने संयम औऱ मर्यादा का परिचय दिया औऱ प्रबंधन ने अपने फैसले से टीवी न्यूज इंडस्ट्री में इंसाफ की नई मिसाल गढ़ी. ऐसे हालात में संपादक की भूमिका कई तरह की कसौटी के सामने होती है. मैंने फर्ज औऱ उसूल दोनों लिहाज से खुद को खरा साबित करने की हर मुमकिन कोशिश की. 
 
– चैनल ठीक ठाक चल रहा था फिर उसे बंद करने का कठोर फैसला क्‍यों करना पड़ा?
 
— मैं फिर से साफ करना चाहूंगा कि चैनल को बंद नहीं किया गया है, बल्कि ये अस्‍थाई फैसला है औऱ हालात जैसे ही दुरुस्त होंगे चैनल फिर अपनी रफ्तार पकड़ लेगा. चैनल चलाने के लिये कुछ बुनियादी चीजों को समझना जरुरी है. पीसीआर, एडिट, असाइनमेंट, आउटपुट औऱ ग्राफिक्स जैसे विभागों में तमाम काट छांट के बाद भी एक खास तादाद में लोगों को रखना ही पड़ता है. ड्रिस्ट्रीब्यूशन औऱ न्यूज गैदरिंग कॉस्ट की भारी भरकम रकम इससे इतर है- अगर मैं दूसरे खर्चों को परे रख दूं तब भी. चैनल चलाने का मतलब अगर किसी तरह औऱ कुछ भी चलाना है – भले लोग उसे देखें या नहीं, तो बात दीगर है. वैसे इसमें जर्नलिस्ट का प्रोफेशनल नुकसान होता है औऱ इसकी तकलीफ मैंने अपनी उस टीम में महसूस की है. प्रबंधन ने सबकुछ सोच विचारकर ही ये फैसला लिया – ऐसा नहीं है कि इसकी तकलीफ मैनेजमेंट को नहीं है.
 
– कई मीडियाकर्मी आपके महुआ से जुड़ने के बाद संस्‍थाने से जुड़े थे. आपको नहीं लगता कि वे मुश्किल में आ गए हैं?
 
— देखिए मेरा अपनी टीम के साथ बहुत ही भरोसा और समझ का रिश्‍ता था. यह रिश्‍ता अब भी बना हुआ है. सभी साथी बेहतर थे, बेहतर करने आए थे औऱ उनका कल भी बेहतर रहेगा, यह यकीन है. मैंने एक परिवार बनाया था. एक नया संसार रचने की ताकत बटोरी थी. मुझमें सबका यकीन था और आज भी है. लेकिन अचानक आए संकट पर किसी का वश नहीं होता. यह भी सही है कि हर दीवार में एक दरवाजा होता है, बंद गली से भी राह निकलती है. मेरी टीम के लोग प्रतिभाशाली हैं और निकट भविष्‍य में सभी मीडिया इंडस्‍ट्री में नई ऊंचाइयों पर होंगे. 
 
– किस तरह से बड़ा ही स्‍मूथली इस मामले का हल संभव हुआ?
 
 — ऐसे मसलों में नीति औऱ नीयत दोनों की दरकार होती है. कर्माचारी नीतिगत तरीके से दो महीने का वेतन औऱ एक महीने की क्षतिपूर्ति मांग रहे थे औऱ मैनेजमेंट की नीयत उनके साथ इंसाफ करने की थी. मैंने टीम लीडर होने के नाते अपनी जरुरी भूमिका निभाई. बात बन गयी और इतिहास रच गया.
 
– फिर महुआ न्यूज (बिहार-झारखंड) चैनल को घाटा सहकर भी क्‍यों चलाया जा रहा है? 
 
— महुआ न्यूज बिहार-झारखंड दोनों प्रदेशों का नम्‍बर वन न्यूज चैनल है. उसके कांटेंट औऱ क्रेडिबिलिटी को चुनौती देना किसी के लिये आसान नहीं है. इसीलिये वो पिछले 30 से ज्यादा हफ्तों से नंबर वन न्यूज चैनल बना हुआ है. उस चैनल की खबरें समाज औऱ सियासत दोनों में हलचल पैदा करती हैं. महुआ न्यूज एक ब्रैंड है औऱ कमोबेश वो अपने पैरों पर खड़ा है. महुआ न्यूजलाइन का भी अगर पूरा ड्रिस्ट्रीब्यूशन हुआ होता तो मेरा दावा है कि वो दो महीने के भीतर अपनी टेरिटरी का नंबर वन न्यूज चैनल होता. लेकिन एक नये चैनल को खड़ा करने औऱ बड़ा करने के लिये जो जरुरी संसाधन चाहिए उन्हें पूरा करने की इजाजत मौजूदा हालात नहीं दे रहे थे. लिहाजा प्रबंधन ने वो फैसला लिया जो उसे संस्थान के हित में मुनासिब लगा. यहां ये बात मैं जरुर कहूंगा कि कोई भी प्रबंधन न्यूज चैनल पर करोड़ों रुपये बंद करने के लिये नहीं लगाता. लिहाजा जो लोग ऐसा सवाल करते हैं उन्हें इसपर भी जरा गौर करना चाहिए. 

अवैध भारतीय चैनलों को यथाशीघ्र बंद किया जाए

 

इस्लामाबाद : पाकिस्तान के रक्षा प्रतिष्ठान ने सरकार ने मांग की है कि वह ‘पाकिस्तान के खिलाफ भारत के शत्रुतापूर्ण एजेंडे’को नियंत्रित करने के लिए अवैध भारतीय चैनलों को यथाशीघ्र बंद करे। मीडिया में आयी खबरों के मुताबिक, रक्षा प्रतिष्ठान ने ‘भारतीय दुष्प्रचार के हमले’ पर ‘पाकिस्तान इलेक्ट्रॉनिक मीडिया नियामक प्राधिकार’और सूचना मंत्रालय से लगातार ‘गंभीर चिंता’जाहिर की है, विशेष तौर पर उन कार्यक्रमों पर जो युवा पीढ़ी, पाकिस्तानी संस्कृति और राष्ट्रवाद को निशाना बनाते हैं।
 
‘द न्यूज डेली’ने सूचना मंत्रालय के सूत्रों के हवाले से कहा है कि रक्षा प्रतिष्ठान अवैध टीवी चैनलों के माध्यम से भारत के कथित‘पाकिस्तान और उसके प्रतिष्ठानों के खिलाफ शत्रुतापूर्ण एजेंडे’के बारे में भी चिंता जताई है। रक्षा मंत्रालय प्रतिबंधित भारतीय कार्यक्रमों का प्रसारण करने वाले चैनलों को तुरंत बंद करवाने के लिए वर्ष 2008 से अभी तक तीन बार ‘पीईएमआरए’और सूचना मंत्रालय के कह चुका है। उसका कहना है कि अर्थव्यवस्था के बारे में बहुत ज्यादा विचार किए बगैर इन चैनलों को बंद कर देना चाहिए क्योंकि यह राष्ट्रीय हित के विरूद्ध जा सकते हैं।
 
खबर में एक आधिकारिक पत्र के हवाले से लिखा गया है, भारत के शत्रुतापूर्ण एजेंडे को पाकिस्तान के कमजोर निगरानी और क्रियान्वयन प्रणाली के कारण लाभ मिल रहा है। पत्र में कहा गया है कि इन चैनलों ने पाकिस्तान के सभी शहरों में गहरी पैठ बना ली है। प्राधिकार को एक पत्र जुलाई 2009 में और एक अन्य पत्र दिसंबर 2011 में मिला है। खबर के अनुसार, प्राधिकार को तीसरा पत्र इस वर्ष के आरंभ में मिला जिसमें स्थिति के प्रति‘गंभीर चिंता’जताई गई है।
 
रक्षा और सुरक्षा प्रतिष्ठानों ने सम्बद्ध प्राधिकार को कई मौकों पर सूचित किया है कि केबल ऑपरेटर भारतीय चैनलों का प्रसारण कर रहे हैं। पाकिस्तान में मीडिया के लिए मौजूदा कानून मीडिया को ऐसे किसी भी कार्यक्रम का प्रसारण करने से रोकता है जो ‘मूलभूत सांस्कृतिक मूल्यों, नैतिकता और अच्छे व्यवहार के खिलाफ हों’और जिनमें ‘पाकिस्तान की विचारधारा के खिलाफ कोई भी सामग्री हो। पत्र में दावा किया गया है कि भारतीय मनोरंजन चैनल एक ‘छुपा हुआ दुष्प्रचार अभियान’चला रहे हैं जो विशेष तौर पर युवा पीढ़ी, संस्कृति और राष्ट्रवाद को निशाना बना रहा है । (एजेंसी)

कौन सुनेगा महुआ के स्ट्रिंगरों का दर्द?

यह पढ़ कर अच्छा लगा कि महुआ प्रबंधन ने नॉएडा में आंदोलनरत कर्मचारियों की मांगें मान ली है और वे उन्हें लंबित भुगतान करने को तैयार है. लेकिन इस खबर ने एक दर्द को भी महसूस कराया. हम सब स्ट्रिंगर्स का दर्द. वही स्ट्रिंगर्स जिनके दम पर महुआ न्यूज़ लाइन ने अपनी पहचान बनाई, लेकिन जब बारी आई इनसे सम्बंधित दिक्कतों की तो पहले तो किसी ने न सुनी, दबाव ज्यादा बढ़ा तो किसी को एक चेक दो हजार, किसी को चार हज़ार का थमा आगे जल्द ही पेमेंट मिलने की बात कही गई. 

 
अपने काम के प्रति ईमानदार स्ट्रिंगर्स झांसे में आकर फिर से उसी शिद्दत के साथ स्टोरी करने में जुट गए. धीरे-धीरे छह महीने का वक़्त बीत गया और जुलाई के आखिरी दिनों में बुरी खबर आने लगी कि महुआ खात्‍में की तरफ है, जिसकी वजह बेहतर प्रबंधन का न हो पाना और मालिक का जेल में होना है. स्ट्रिंगर्स का पेमेंट पिछले साल जुलाई से नहीं हुआ था, जब यह महुआ न्यूज़ में काम कर रहे थे. इसके बाद एक पेमेंट जनवरी का बताकर महज कुछ रूपए दिए गए. 
 
खबरों को लेकर दबाव बनाया जाता था, तो वहीं डे प्लान के लिए बाकायदा मेल भेजे जाते थे. अब स्ट्रिंगर्स की सुनने वाला कोई नहीं है. भले ही आंदोलनरत कर्मचारियों को न्याय मिल चूका हो लेकिन इन स्ट्रिंगर्स को कौन न्याय दिलवाएगा. इन स्ट्रिंगर्स के पास इतने पैसे भी नहीं हैं कि वे नॉएडा जाकर अपनी बात रख सकें. कल राखी है लेकिन इनके पास राखी खरीदने के पैसे नहीं हैं. कुछ दिन बाद ईद है लेकिन यह भी इस बार स्ट्रिंगरों को पुराने कपड़ो में ही बितानी पड़ेगी, अगर प्रबंधन ने पेमेंट को लेकर कोई प्रभावी कदम नहीं उठाया तब. अगर पेमेंट हुआ तो यकीनन इन संवादाताओ के परिवार वालो के लिए भी यह किसी बड़े त्योहार से कम न होगा.
 
आज पैसा न हो पाने के कारण स्ट्रिंगर्स की ज़िन्दगी दयनीय है. हर कोई यही सोचने को मजबूर है कि उनसे क्या खता हुई कि समाज को आईना दिखने वाले खुद ही परेशान हैं. वो कौन सा दिन था जब उन्होंने बेहद शुभ पत्रकारिता के पेशे को अपनाया. आज इनकी ज़िन्दगी दिहाड़ी मजदूर से भी बदतर है. प्रबंधन से इस पत्र के ज़रिये यही मांग है कि स्ट्रिंगर्स के कुछ पैसों का भुगतान किया जाये वरना इनके और परिवार की दयनीय स्थिति की ज़िम्मेदारी महुआ न्यूज़ लाइन प्रबंधन की होगी. वैसे सुना यही गया है कि मीना तिवारी जी अत्यन्‍त नरम स्वभाव की है और सात्विक भी हैं. उम्मीद है कि वे इस पत्र और स्ट्रिंगर्स पर दया ज़रूर करेगी.  
 
एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

प्रदेश टुडे ने उड़ाई भास्‍कर की खिल्‍ली

 

भोपाल से प्रकाशित प्रदेश टूडे ने दैनिक भास्कर को आईना दिखाया है. इससे पहले यह खबर भड़ास पर भी प्रकाशित हो चुकी है. दैनिक भास्कर की एक ही खबर को अलग अलग एडिशनों में अलग जानकारी के प्रकाशन की प्रदेश टुडे ने खिल्‍ली उड़ाई है. सूत्रों से पता चला है कि भास्कर प्रबंधन इस मामले में कोई भी कार्रवाई नहीं कर रहा है. क्योंकि हरदा जिले में बीते कुछ समय से भास्कर को एक अदद ब्यूरो की तलाश खत्म नहीं हो रही है. फिलहाल इटारसी के शैलेश
जैन ब्यूरो का काम देख रहे हैं.  

हिंदुस्‍तान, बरेली को लेकर प्रबंधन असमंजस में, सर्कुलेशन पर प्रभाव

 

बरेली हिंदुस्‍तान प्रबंधन के लिए मुश्किलों का सबब बन गया है. चर्चाओं तथा अफवाहों से जूझ रहे इस यूनिट की हालत लगातार बिगड़ती जा रही है. प्रबंधन इस तरह की डाइलेमा की स्थिति में है कि उसे समझ नहीं आ रहा है कि क्‍या किया जाए. पुख्‍ता खबर है कि स्‍थानीय संपादक आशीष व्‍यास जा चुके हैं. इसके बाद भी प्रबंधन इस महत्‍वपूर्ण यूनिट में किसी संपादक की नियुक्ति नहीं कर सकता है. रोज नए नए नाम के संपादक की चर्चा बरेली में हो रही है. ऐसी खबरों का असर अखबार के सर्कुलेशन के साथ टीम पर भी पड़ रहा है. 
 
बताया जा रहा है कि कुछ समय पहले अलीगढ़ के संपादक मनोज पमार को अलीगढ़ का स्‍थानीय संपादक बनाए जाने की पूरी तैयारी कर ली गई थी. इसके लिए आगरा से रामकुमार शर्मा को अलीगढ़ भेजा गया ताकि उन्‍हें संपादक की जिम्‍मेदारी सौंपी जा सके. रामकुमार शर्मा भी आगरा से अलीगढ़ में जम चुके हैं. यानी अलीगढ़ में इस समय दो दो संपादक काम कर रहे हैं और बरेली में प्रबंधन को खोजे संपादक नहीं मिल रहा है. 
 
इस बीच अमर उजाला तथा दैनिक जागरण के पत्रकारों के संपादक बनने की खबरें भी चर्चा में आईं पर कोई चर्चा पुख्‍ता खबर नहीं बन सकी. बरेली के इस माहौल से अखबार पर भी असर पड़ रहा है. कभी संजीव द्विवेदी के समय में लगभग डेढ़ दर्जन रिपोर्टरों की बैठक और प्‍लानिंग होती थी, अब वह मुश्किल से आधा दर्जन के आसपास रह गई है. पूरा यूनिट मनमौजी हो गया है. समाचार संपादक योगेंद्र रावत के बारे में भी कहा जा रहा है कि वे यहां घुटन महसूस कर रहे हैं. मौका मिलते ही वे हिंदुस्‍तान को नमस्‍कार भी कर सकते हैं.
 
बरेली का संपादक बनाए जाने की सबसे मजबूत दावेदारी मनोज पमार की मानी जा रही थी और रामकुमार शर्मा को आगरा से अलीगढ़ भेजकर प्रबंधन ने लगभग इस फैसले पर मुहर भी लगा दी थी, परन्‍तु बीच में कुछ और नामों की चर्चा होने तथा लंबे समय से अलीगढ़ में दो संपादकों की तैनाती ने अनिश्‍चय की स्थिति पैदा कर दी है. सूचना है कि किसी का दबाव ना होने से पत्रकार भी मनमाने तरीके से काम कर रहे हैं. बुधवार की मीटिंग में मात्र आधा दर्जन रिपोर्टर पहुंचे. चर्चा है कि केके उपाध्‍याय द्वारा तैयार किए गए हिंदुस्‍तान, बरेली को बरबाद करने की तैयारी चल रही है. सर्कुलेशन भी लगातार कम होता जा रहा है. 

यशवंत-जेल : गिरफ्तारी के विरोध में फरीदाबाद में पत्रकारों ने धरना दिया

: डरपोक हैं बड़े संस्‍थानों के पत्रकार – कुमार मधुकर : फरीदाबाद : पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के तहत आज भड़ास4मीडिया के संपादक यशवंत की गिरफ़्तारी के विरोध में दर्जनों पत्रकारों ने जिला मुख्यालय के सामने धरना दिया. कार्यक्रम का नेतृत्व कर रहे भांडा फोड़ इंडिया के ग्रुप एडिटर कुमार मधुकर ने खेद प्रकट करते हुए कहा बड़े संस्‍थानों में काम करने वाले पत्रकार नम्बर वन डरपोक हैं. तभी वे इस आन्दोलन में खुलकर सामने नहीं आ रहे. 

उन्होंने कहा कि बड़े संस्‍थानों में काम करने वाले पत्रकारों को समझ में आनी चाहिए कि जब उन्हें संस्‍थानों से बाहर का रास्ता दिखाया जाता है, तो इसी भड़ास4मीडिया के संपादक यशवंत उनके साथ चट्टान की तरह खड़े होते हैं. धिक्कार है उन पत्रकारों को जो यशवंत के समर्थन एक शब्द बोलने कि हिम्मत नहीं जुटा पाते. भांडा फोड़ इंडिया के ग्रुप एडिटर ने कुछ डरपोक पत्रकारों से कहा जब वे खुद कि लड़ाई नहीं लड़ सकते तो वे दूसरों कि लड़ाई खाक लड़ेंगे. उन्होंने सलाह दी इन पत्रकारों को इस रोजगार को छोड़कर सब्जी बेचना चाहिए.  
 
कुमार मधुकर  ने पुनः लोहा लेने वाले पत्रकारों से आह्वान किया कि भड़ास4मीडिया के संपादक यशवंत की गिरफ़्तारी के विरोध चल रहे आन्दोलन को और भी समर्थन दें. पत्रकार अजेश कुमार ने दोहराया कि जब तक भड़ास4मीडिया के संपादक यशवंत को न्याय नहीं मिल जाती तब तक कुमार मधुकर के नेतृत्व में चल रहे आन्दोलन को समर्थन जारी रखेंगे. पत्रकार संदीप कुमार, विनय सिंह, राजकुमार, निधि, अस्रीन रिजवी, अजय कुमार, हरि शंकर, परमेश ठाकुर, रवि शंकर, श्याम सिंह, रामबीर शर्मा, गगन, त्रिपुरारी सिंह के अलावा अन्य दर्जनों पत्रकारों ने जिला मुख्यालय पर पत्रकारों को संबोधित किया. 


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राणा-भूप्‍पी के चलते ही डेढ़ सौ पत्रकार हुए बेरोजगार

 

नोएडा : लगातार दो रात-दिन तक महुआ समूह के सैकड़ों कर्मचारी नोएडा मुख्‍यालय में जमे रहे। भूखे-प्‍यासे। आशंकाओं के बीच झूलते। लेकिन महुआ मालिकों के साथ राणा-भुप्‍पी की जुगलबंदी चलती रही। और अब राणा-भुप्‍पी की इस जुगलबंदी ने एक नया राग छेड़ दिया है कि वे न्‍यूजमैन हैं और चाहे कुछ भी हो जाए, हमेशा पत्रकारों के साथ ही रहेंगे।
 
लोगों के गले तक राणा की यह बात किसी भी तरह नहीं उतर रही है। महुआ के मौजूदा हालातों के मद्देनजर उत्‍तेजित कर्मचारियों का आरोप है कि राणा-भुप्‍पी की यह रणनीति मुंह में राम, बगल में छूरी की तरह मानी जा रही है। आलोक उपाध्‍याय का नाम खास तौर पर उल्‍लेखनीय है, जिनका एक दुर्घटना के चलते हाथ टूट गया था। छुट्टी की अर्जी पड़ी तो भद्दी-भद्दी गालियां देते हुए जवाब दिया गया कि यह महुआ है, विकलांग-असहाय लोगों का आश्रम नहीं है। आरोप तो यहां तक हैं कि राणा-भुप्‍पी की जुगलबंदी के चलते ही डेढ़ सौ कर्मचारियों का ही भविष्‍य अंधकारमय हुआ है, बल्कि इन दोनों लोगों के चलते पूरा महुआ समूह प्रबंधन भी आम की तरह चूसा जा चुका है। जाहिर है कि इसका खामियाजा अब पूरा समूह बुरी तरह भुगतेगा।
 
राणा-भुप्‍पी की जुगलबंदी की करतूतें दिल्‍ली में आम हैं। घोटालों से लेकर रंगदारी मांगने जैसे अनेक मामलों के किस्‍से बूटा-पत्‍ता तक को पता है। आजतक न्‍यूज चैनल के नाम पर हिमाचल प्रदेश के मुख्‍यमंत्री से दस करोड़ की घूस मांगने की सीडी सार्वजनिक रूप से जारी करते हुए इस चैनल के मुखिया ने इन लोगों को बाकायदा लतियाते हुए चैनल के दफ्तर से निकाल कर बाहर किया था। इसके बाद से इनकी हांडी महुआ में चढ़ गयी तो बल्‍ले-बल्‍ले ही हो गयी। कर्मचारियों के हितैषी बनने का ढोंग तो इन लोगों ने पहले ही शुरू कर दिया जब महुआ समूह में इन लोगों की शुभ-चरण-धूलि पड़ गयी। बस हो गया इस समूह के बंटाधार होने का श्रीशगुन। न्‍यूजमैन बनने का ढोंग करने वाले इन लोगों ने समूह से सबसे पहले ऐसे पुराने लोगों को बेइज्‍जत करते हुए निकाला, जिन लोगों ने अपने खून-पसीने से इस समूह को सींचा था। वह भी तब, जब इन लोगों के वेतन बेहद कम थे और समूह ने इन लोगों को जरूरी संसाधन तक नहीं मुहैया कराया था। लेकिन इसके बावजूद यह कर्मचारी लगे रहे, डटे रहे। हर घर तक महुआ का डंका बजने तक।
 
लेकिन अचानक अभी सवा साल पहले यशवंत राणा और भूपेंद्र नारायण सिंह उर्फ भुप्‍पी की जुगलबंदी ने शुरू किया अपनी साजिशों के साथ समूह को नोंचने-खींचने की तबाही का। पीके तिवारी को इन लोगों ने लालच दिया कि वे अपने राजनीतिक हितैषियों से महुआ को भारी आर्थिक और प्रतिष्‍ठा कमाने में समक्ष होंगे। पीके तिवारी ज्‍यादा हासिल करना चाहते थे, इसीलिए इनके झांसे में आ गये। पीके तिवारी को समझाया गया कि पहले महुआ में जमे लोग महुआ के नये तेवर के सामने बाकायदा कीड़ा-मकोड़े हैं, इसलिए पहले इन्‍हें लतियाकर बाहर निकाला जाए। बड़े संख्‍या में ऐसे लोगों को महुआ से निकाला गया जिन्‍होंने अपने खून-पसीने से महुआ को सींचते हुए महुआ को पुष्पित-पल्‍लवित किया था। निकाले गये लोगों को निकालने के दौरान न तो उन्‍हें वाजिब बकायों का भुगतान किया गया और न ही उनकी किसी भी तरह की जिम्‍मेदारी संस्‍थान ने निभायी। रामपुर कोर्ट में चल रहे महुआ वाले मुकदमे पर राणा यशवंत ने मुझे साफ कहा कि उस मामले में संस्‍थान का कोई मतलब नहीं है और आप लोग अपने मामले खुद निपटायें। जबकि रामपुर कोर्ट का मुकदमा पीके तिवारी के खिलाफ था, जिससे अकेले मैं जूझ रहा था।
 
खैर। राणा-भुप्‍पी। इन दोनों लोगों ने बाकायदा अपना गिरोह बनाया और इधर-जिधर से सारे नमूनानुमा पत्रकारिता के नाम ढोते-बटोर लोगों को महुआ में घुसेड़ लिया। इनमें से ज्‍यादातर लोगों की तनख्‍वाहें एक-एक लाख से ऊपर ही थी। सूत्र बताते हैं कि महुआ में अपनी पैठ बनाने की साजिशों के चलते ही चैनल का कामधाम तो नहीं हुए, लेकिन इसके बल पर ज्‍यादातर लोगों ने अपने स्‍थाई आशियाने तैयार करने लगे। इसी के चलते ही किसी ने देहरादून में तो किसी ने पटना ने अपने निजी पत्रकारिता संस्‍थान खड़े कर लिए। मूर्खतापूर्ण खबरें चलनीं लगीं जिनका मकसद केवल खास लोगों को लाभ पहुंचता। बाकी लोगों ने भी बहती गंगा में हाथ धो लिया। जिसके मन जो आया, उसने वही किया। मन नहीं हुआ, तो काम किया ही नहीं। जो आउटपुट इंचार्ज थे, उन्‍हें पिछले साल तक कोई खबर ही नहीं दिखी। जो इनपुट थे, उन्‍हें किसी रिपोर्टर से बात ही नहीं की। 
 
अपनी अभद्रता के चलते महुआ से निकाले गये एक दबंग को नये निजाम ने वापस घुसेड़ने के लिए एक नायाब तरीका अपनाया। एक फर्जी टाइप चैनल का बड़ा पत्रकार बनाकर इस शख्‍स को इस जुगलबंदी ने पेश किया और महुआ में बड़ा पद नवाज दिया। इस जुगलबंदी का यह सिपहसालार अब इस आंदोलन का नेतृत्‍व करते हुए महुआ प्रबंधन को गालियां देता घूमता है। किस्‍साकोताह यह कि महुआ में भेंडियाधसान शुरू हो गया। महुआ कर्मचारियों में चल रहीं चर्चाओं के मुताबिक इस जुगलबंदी ने पीके तिवारी को मकड़े की तरह फंसाया। शुरूआत बिजनेस बढ़ाने के नाम पर महुआ का पैसा लुटाया गया, फिर पीके तिवारी पर पड़े संकट से बचाने के लिए नोटों की गड्डियां लुटाईं गयीं और जब पीके तिवारी के सामने इन लोगों की पोल खुलने लगी और उनके पेंच पीके तिवारी ने कसने शुरू कर दिये, तो उनके खिलाफ मामला भड़काने की साजिशें कर उन्‍हें जेल बंद करा दिया।
 
तो, यह रही हैं राणा और भुप्‍पी की यह कारतूतें। न जाने कितने लोगों की नौकरी खा जाने वाले ये शख्‍स किस मुंह से खुद को 

पत्रकार और न्‍यूजमैन कहते हैं, समझ से परे है। शर्मनाक यह कि पत्रकार के हित और पत्रकारिता का वास्‍ता दिया जाता है, लेकिन लगातार दो दिनों से चल रहे इस श्रमिक असंतोष और अनशन के दौरान लगातार दूसरों को भड़काया जा रहा है।  
 
लेखक कुमार सौवीर सीनियर जर्नलिस्‍ट हैं. वे कई अखबारों तथा चैनलों में वरिष्‍ठ पदों पर काम कर चुके हैं. इन दिनों स्‍वतंत्र पत्रकार के रूप में सक्रिय हैं. इनसे संपर्क 09415302520 के जरिए किया जा सकता है.

अरिदमन सिंह के घर चोरी : आगरा की पत्रकारिता में उभरा जातिवाद

 

आगरा उत्तर प्रदेश के परिवहन मंत्री अरिदमन सिंह के यहाँ की चोरी अब जातिवाद के रूप में उभर कर सामने आने लगी है, जिसमें आगरा के एसएसपी सुनील चन्द्र वाजपेयी व उनके बीच वर्चस्व की जंग छिड गयी है. वैसे भारतीय संविधान के अनुसार देश से राजा महाराजाओं का अस्तित्व बहुत पहले ही समाप्त हो गया है, लेकिन इक्कीसवीं शताब्दी में भी अखिलेश सरकार के कुछ ऐसे मंत्री हैं जो कि राजशाही ठाठ आज भी बरकरार रखे हुए हैं. 
 
राजा के निर्वाचन क्षेत्र में ब्राह्मण वर्सेज ठाकुर का जंग है, जिसकी बदौलत राजा अपनी ही सल्तनत में दो बार हार का सामना कर चुके हैं, परन्तु अब एक बार फिर राजा को एमएलए बनने के बाद दलित व ब्राह्मण विरोधी होने के बाबजूद अखिलेश सरकार द्वारा लाल बत्ती के साथ नवाजा गया है. वर्तमान में राजा विवादों के घेरे में हैं, जिसमें जीतने के विवाद दलित प्रधान पति की हत्या, पत्नी को टिकट मिलने की समीक्षा पर समर्थकों का हंगामा व मारपीट, अपने घर के बाहर स्थित दुकानदारों का मानसिक उत्पीडन, चालक के द्वारा नशे में धुत्त होकर हंगामा काटना, अपनी ही बहन को अपने मकान में हिस्सेदारी न देना व भयंकर जातिवाद आदि आरोप अब तक लग चुके हैं. परन्तु अभी हाल में ही चोरी में भी जातिवाद खुलकर सामने आने लगा है, क्योंकि आगरा के एसएसपी सुनील चन्द्र वाजपेयी को मुलायम सिंह के संगी साथी आगरा के एक ब्राहमण का आशीर्वाद प्राप्त है, जिसे हटाना राजा के बलबूते का रोग नहीं है, परन्तु फिर भी चोरी की घटना में एसएसपी को दोषी करार देते हुए परिवहन मंत्री ने अखिलेश यादव से गुहार लगाई है. 
 
शायद राजा को यह नहीं पता कि एसएसपी को अखिलेश के अब्बा का आशीर्वाद प्राप्त हैं तो फिर उसमें बेचारे अखिलेश क्या कर सकते हैं. उधर इस मामले में आगरा की पत्रकारिता में भी जातिवाद खुलकर सामने आने लगा है, जिसमें डीएलए व सी एक्सप्रेस राजा का बचाव कर रहा है, क्योंकि इसमें वरिष्ठ पदों पर भानु प्रताप व एसपी सिंह ठाकुर विराजमान हैं. सी एक्स्प्रेस के बचाव का यह भी कारण है कि राजा अपनी ताकत इस अखबार के मालिकान को दिखा चुके हैं, जिसमें यह जेल की हवा खाने से भी बच चुके हैं. जबकि अमर उजाला राजा की लगातार बैंड बजा रहा है, क्योंकि इसमें वरिष्ठ पदों पर ब्राह्मण का बोलबाला है इसलिए कल बहन वाले मामले में अमर उजाला ने राजा की जमकर खबर लिखी है. अभी जागरण व हिन्दुस्तान ने अपने पत्ते नहीं खोले हैं, लेकिन यहाँ भी उच्च पदों पर ब्राह्मणों का बोलबाला है, इसलिए मामला रोमांचक दौर में पहुँच गया है, जिसके चलते यह मामला ब्राह्मण व ठाकुरों के बीच होता दिखाई दे रहा है. राजा के आवास पर जाने वाले पत्रकारों से उनका आगे का नाम पूछकर ही तवज्जो दी जा रही है, जिसमें ब्राह्मण व दलितों का जमकर अपमान भी किया जा रहा है, लेकिन समझदार ब्राह्मण बजाय राजा के यहाँ अपमानित होने के सपा के सूत्रों के अनुसार कार्यालय में बैठे बैठे ही राजा की बखिया उधेड़ रहे हैं. अब देखना होगा कि पाला किसका भारी पड़ता है.      
 
एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

बीएस लाली के खिलाफ क्‍लोजर रिपोर्ट दाखिल

 

नई दिल्‍ली : सीबीआई ने प्रसार भारती के पूर्व सीईओ बीएस लाली से संबंधित एक मामले में एक कोर्ट में क्लोजर रिपोर्ट दाखिल की है। सीबीआई ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि उसे लाली के खिलाफ धोखाधड़ी और कॉमनवेल्थ गेम्स के लिए प्रसारण अधिकार देने में साजिश संबंधी कोई पुख्ता सबूत नहीं मिले है। एजेंसी ने सीबीआई के विशेष जज तलवंत सिंह की कोर्ट में क्लोजर रिपोर्ट दाखिल की। इस रिपोर्ट पर 4 अगस्त को विचार किया जाएगा। सीबीआई ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि उसे लाली और दिल्ली स्थित जूम कम्युनिकेशन के एमडी वसीम देहलवी के खिलाफ पुख्ता सबूत नहीं मिले हैं। देहलवी ब्रिटेन स्थित सिस लाइव के रेजीडेंट डायरेक्टर भी है।
 
सीबीआई ने पिछले साल लाली और देहलवी पर 120 बी (आपराधिक साजिश) और 420 (धोखाधड़ी) के दंडनीय अपराधों के तहत आरोप लगाए थे। जांच एजेंसी ने लाली पर 2010 में हुए कामनवेल्थ गेम्स के दौरान प्रसार भारती के लिए प्रोडक्शन और कवरेज के अधिकार यूके स्थित सिस लाइव को 246 करोड़ और जूम कम्युनिकेशन को 176 करोड़ रुपये में अधिकार देने का आरोप लगाया था। इसकी वजह से सरकारी खजाने को करीब 100 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ था। सीबीआई ने अपनी एफआईआर में आरोप लगाया था कि सिस लाइव के पक्ष में कई शर्तों में राहत दी गई थी। (एजेंसी)

कीमती विदेशी संपत्तियों पर सहारा की नजर

 

वैश्विक हॉस्पिटैलिटी उद्योग को कारोबार के प्रति अपनी गंभीरता का एहसास कराने के लिए सहारा समूह को महज दो सौदे करने पड़े। करीब 130 करोड़ डॉलर में दुनिया की दो प्रतिष्ठित होटल परिसंपत्तियां खरीदकर समूह ने हाई ऐंड हॉस्पिटैलिटी कारोबार में काफी हद तक व्यवस्थित दिख रहा है। लंदन में ग्रोजवेनर हाउस और न्यूयॉर्क में प्लाजा खरीद चुके सहारा समूह की नजर अब फ्रांस में महल परिसंपत्ति की तलाश में जुटा है। माना जा रहा है कि सुब्रत राय की अगुआई वाला सहारा समूह ब्रिटेन में मैरियट होटल का पोर्टफोलियो खरीदने के लिए भी बात कर रहा है। हालांकि इस बारे में भेजे गए सवालों का सहारा समूह ने कोई जवाब नहीं दिया।
 
प्रतिष्ठित संपत्तियां हैं पसंद : विशेषज्ञों का कहना है कि प्रतिष्ठित परिसंपत्तियां खरीदने की वजह महज रुतबा दिखाना नहीं है बल्कि ऐसी परिसंपत्तियां अपने पास रखना है, जिनकी कीमत बढ़ती रहे। एचवीएस ग्लोबल हॉस्पिटैलिटी सर्विसेज इंडिया के प्रबंध निदेशक कौशिक वरदराजन ने कहा, 'प्रतिष्ठिïत परिसंपत्तियों की कीमत बरकरार रहती है जैसा मुख्यधारा की होटल परिसंपत्तियों के साथ नहीं होता है। उनकी नकल या उन्हें दोबारा नहीं बनाया जा सकता है। ऐसी परिसंपत्तियों की कीमत पर आर्थिक मंदी का असर भी नहीं पड़ता है। जिसके पास पैसा है, उसके लिए ऐसी परिसंपत्तियां खरीदने का यही सबसे सही समय है क्योंकि बाजार में अभी खरीदार नहीं हैं।' सूत्रों ने बताया कि समूह द्वारा किए गए दो सौदों के कारण अब उसके पास देश-विदेश के कई विक्रेताओं की कतार लग गई है। सूत्रों का कहना है, 'वह बाजार में मौजूद चुनिंदा लोगों में से हैं, जिनके पास पैसा है और वह सौदे करने में कामयाब रहे हैं।'
 
खरीदो और बनाओ : कंपनी पोर्टफोलियो खरीदने की संभावनाएं भी तलाश रही है। सहारा समूह के सूत्रों ने बताया कि वह मैरियट समूह से यूरोप में उसके 15 होटल खरीदने के लिए बात कर रहा है। नाम नहीं छापने की शर्त पर उद्योग के एक विशेषज्ञ ने बताया, 'कंपनी उन पोर्टफोलियो को खरीदने में दिलचस्पी दिखा रही है, जो आकार में बड़े हैं और खराब दौर से गुजर रहे हैं। बाजार के मौजूदा हालात देखते हुए उन्हें अच्छे दाम में परिसंपत्तियां मिल सकती हैं।'  हालांकि भारत में अभी तक समूह को ऐसी कोई प्रतिष्ठिïत परिसंपत्ति नहीं मिल पाई है। मुंबई में अपने होटल सहारा स्टार के साथ समूह भारतीय हॉस्पिटैलिटी बाजार का गहन अध्ययन कर रहा है, जिससे वह यह तय कर सके कि वह कौन सी श्रेणी में सही बैठता है। साभार : बीएस 

सहारा खरीदेगा न्‍यूयार्क के प्‍लाजा होटल में मालिकाना हिस्‍सेदारी

 

सहारा ग्रुप न्यूयार्क के प्रतिष्ठित प्लाजा होटल में मालिकाना हिस्सेदारी 57 करोड़ डॉलर में खरीदने पर राजी हो गया है। इजरायल की अचल संपत्ति क्षेत्र की कंपनी एलाद प्रापर्टीज के मुताबिक प्लाजा होटल 105 साल पुराना लक्जरी होटल है और यह न्यूयार्क के सेन्ट्रल पार्क के पास है। होटल का मालिकाना हक फिलहाल एलाद प्रापर्टीज और सउदी कंपनी किंगड़ा होल्डिंग्स कंपनी के पास संयुक्त रुप से है। एलाद पर इजरायल के कारोबार यितझाक शुवा का नियंत्रण है। 
 
कंपनी को इस सौदे में उसकी 60 प्रतिशत हिस्सेदारी के लिए 1.6 अरब सिकेल्स प्राप्त होंगे जबकि शेष राशि सउदी कंपनी किंगड़ा को मिलेगी। सउदी कंपनी किंगड़ा सउदी अरबपति राजकुमार अलवालीद बिन तलाल की निवेश इकाई है। यह सौदा पूरा हो जाने पर उसके पास होटल में 25 प्रतिशत हिस्सेदारी रहेगी। एलाद की तरफ से बताया गया कि सउदी राजकुमार के स्वामित्व वाली फेयरमोंट होटल्स ऐंड रिसरेट्स इंक 1999 से होटल का रखरखाव कर रही है। 
 
सउदी कंपनी ही होटल का आगे भी परिचालन करती रहेगी। शुवा ने आठ साल पहले होटल को 67 करोड 50 लाख डॉलर में खरीदा था। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार एलाद नवीकृत होटल में लक्जरी अपार्टमेंट 1.5 अरब डॉलर में बेचे थे। अपार्टमेंटों की बिक्री से ही एलाद समूह को 50 करोड़ डॉलर का फायदा हुआ था। (एजेंसी)