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अडानी-अंबानी समेत 21 मीडिया संस्थानों ने मोदी सरकार के इस कानून को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी!

डीएनपीए में शामिल हैं 21 मीडिया संस्थान, नेटवर्क18, एनडीटीवी, इंडियन एक्सप्रेस और टाइम्स इंटरनेट जैसे नाम भी शामिल; एसोसिएशन ने कानून के विवादित प्रावधान रद्द करने की मांग की है…

भारत के डिजिटल न्यूज पब्लिशर्स एसोसिएशन (डीएनपीए) ने केंद्र सरकार के निजता कानून को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है। एसोसिएशन का कहना है कि कानून में पत्रकारों और मीडिया संस्थानों के लिए स्पष्ट छूट का प्रावधान नहीं है। इससे खोजी पत्रकारिता, समाचारों के प्रकाशन और प्रेस की स्वतंत्रता पर असर पड़ सकता है। न्यूज एजेंसी रॉयटर्स के मुताबिक, 21 मीडिया संस्थानों का प्रतिनिधित्व करने वाले डीएनपीए की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट मंगलवार, 27 अक्टूबर को सुनवाई कर सकता है।

डीएनपीए में देश के कई बड़े मीडिया संस्थान शामिल हैं। इनमें मुकेश अंबानी के नेतृत्व वाले रिलायंस समूह से जुड़ा नेटवर्क18, गौतम अदाणी का एनडीटीवी, इंडियन एक्सप्रेस और टाइम्स इंटरनेट जैसे नाम शामिल हैं। अब तक इस कानून को चुनौती देने वालों में मुख्य रूप से अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के पक्षधर कार्यकर्ता और छोटे समाचार संस्थानों के समूह शामिल थे। बड़े मीडिया संस्थानों के इस मामले में उतरने से निजता कानून को लेकर बहस और तेज हो गई है।

सरकार से आश्वासन के बावजूद मीडिया संस्थानों की चिंता

मीडिया कंपनियों ने अगस्त 2026 में केंद्र सरकार के साथ इस कानून को लेकर बैठक की थी। बताया गया कि बैठक में उन्हें भरोसा दिलाया गया था कि कानून प्रेस की स्वतंत्रता की रक्षा करेगा। हालांकि, डीएनपीए का कहना है कि यूरोपीय संघ, सिंगापुर और ब्रिटेन जैसे देशों की तरह भारत में पत्रकारों के लिए स्पष्ट और लिखित सुरक्षा प्रावधान नहीं किए गए हैं।

रॉयटर्स के अनुसार, डीएनपीए ने 698 पन्नों की याचिका में मांग की है कि कानून के अधिकांश विवादित प्रावधानों को रद्द किया जाए। ये प्रावधान मई 2027 से लागू होने हैं। मामले में डीएनपीए, संबंधित मीडिया समूहों और केंद्रीय इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने रॉयटर्स के टिप्पणी संबंधी अनुरोधों का जवाब नहीं दिया।

पत्रकारों को जांच के लिए संबंधित व्यक्ति की सहमति लेनी पड़ सकती है?

डीएनपीए की प्रमुख आपत्तियों में से एक यह है कि निजता कानून की कुछ व्यवस्थाएं पत्रकारों के लिए जांच-पड़ताल और खबरें जुटाने की प्रक्रिया को मुश्किल बना सकती हैं। एसोसिएशन को आशंका है कि कानून की व्याख्या के आधार पर पत्रकारों को किसी व्यक्ति से जुड़ी जानकारी जुटाने या उसका इस्तेमाल करने से पहले उसकी सहमति लेनी पड़ सकती है।

डीएनपीए का तर्क है कि अगर किसी पत्रकार को जांच शुरू करने से पहले संबंधित व्यक्ति की अनुमति लेनी पड़े, तो उस व्यक्ति को सबूत नष्ट करने या गवाहों को प्रभावित करने का मौका मिल सकता है। इससे भ्रष्टाचार और अन्य सार्वजनिक हित के मामलों की पड़ताल प्रभावित होने की आशंका है।

कानून के तहत लोगों को अपनी दी हुई सहमति वापस लेने और अपने डेटा को हटाने की मांग करने का अधिकार भी मिलता है। डीएनपीए का कहना है कि इन प्रावधानों के कारण मीडिया संस्थानों पर प्रकाशित रिपोर्टें हटाने का दबाव पड़ सकता है। एसोसिएशन को यह भी आशंका है कि कानून के तहत मिलने वाली शक्तियों का इस्तेमाल पत्रकारों से उनके गोपनीय स्रोतों की जानकारी मांगने के लिए किया जा सकता है।

सरकार को व्यापक छूट, प्रेस के लिए स्पष्ट संरक्षण नहीं होने का दावा

रॉयटर्स के मुताबिक, डीएनपीए ने अगस्त में सरकार को लिखे एक पत्र में कहा था कि कानून के तहत सरकार को व्यापक छूट दी गई है, लेकिन पत्रकारिता के लिए वैसा स्पष्ट संरक्षण मौजूद नहीं है। एसोसिएशन का तर्क है कि इससे भ्रष्टाचार और अन्य अनियमितताओं से जुड़ी जानकारी देने वाले लोग पत्रकारों से दूरी बना सकते हैं।

पत्रकारिता में गोपनीय सूत्रों की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। कई बार सार्वजनिक हित से जुड़े मामलों में जानकारी देने वाले लोग अपनी पहचान उजागर होने के डर से सामने नहीं आते। डीएनपीए की आशंका है कि यदि पत्रकारों को अपने स्रोतों की जानकारी सार्वजनिक करने का खतरा महसूस हुआ, तो इसका असर खोजी पत्रकारिता पर पड़ सकता है।

हालांकि, कानून को लेकर अंतिम स्थिति उसके प्रावधानों की न्यायिक व्याख्या और सुप्रीम कोर्ट के फैसले से स्पष्ट होगी। डीएनपीए की आपत्तियां फिलहाल याचिका में पेश किए गए तर्क हैं।

नेटवर्क18 और एनडीटीवी भी कानून के खिलाफ

इस मामले का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि निजता कानून को चुनौती देने वालों में नेटवर्क18 और एनडीटीवी जैसे बड़े मीडिया समूह भी शामिल हैं। इन संस्थानों पर विपक्षी दल अक्सर केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार के प्रति नरम रुख अपनाने और सरकार से पर्याप्त सवाल नहीं पूछने के आरोप लगाते रहे हैं। हालांकि, केंद्र सरकार और संबंधित मीडिया संस्थान इन आरोपों को खारिज करते हैं।

अब निजता कानून को लेकर इन मीडिया समूहों की कानूनी चुनौती ने यह स्पष्ट किया है कि इस मुद्दे पर मीडिया संस्थानों की चिंताएं उनकी राजनीतिक छवि या सरकार के साथ उनके संबंधों से अलग भी हो सकती हैं। उनका मुख्य तर्क यह है कि निजता की सुरक्षा के लिए बनाए गए कानून में पत्रकारिता और सार्वजनिक हित में की जाने वाली जांच के लिए स्पष्ट सुरक्षा उपाय होने चाहिए।

भारत में प्रेस की स्वतंत्रता पर फिर चर्चा

यह मामला ऐसे समय में सुप्रीम कोर्ट के सामने आ रहा है, जब भारत में प्रेस की स्वतंत्रता और पत्रकारों की सुरक्षा को लेकर लगातार बहस हो रही है। हाल में एसआईआर के विरोध में हुए प्रदर्शनों के दौरान दिल्ली पुलिस द्वारा कई पत्रकारों को हिरासत में लिए जाने की घटनाएं भी सामने आई थीं।

रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स के वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम इंडेक्स में भारत 2026 में 157वें स्थान पर बताया गया है, जबकि 2014 में देश 140वें स्थान पर था। हालांकि, केंद्र सरकार इस सूचकांक और इसकी आकलन पद्धति पर सवाल उठाती रही है।

सरकार का कहना है कि भारत में सैकड़ों समाचार पत्रों और टेलीविजन चैनलों वाला एक जीवंत मीडिया तंत्र मौजूद है और प्रेस की स्वतंत्रता का सम्मान किया जाता है। दूसरी ओर, आलोचकों का आरोप है कि कई प्रमुख मीडिया संस्थान सरकार की पर्याप्त पड़ताल नहीं करते।

अब सुप्रीम कोर्ट में डीएनपीए की याचिका पर होने वाली सुनवाई से यह तय करने की दिशा में महत्वपूर्ण बहस आगे बढ़ सकती है कि निजता की सुरक्षा और पत्रकारिता के सार्वजनिक हित वाले दायित्वों के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए। इस मामले का असर डिजिटल मीडिया, खोजी पत्रकारिता और समाचार प्रकाशकों की कार्यप्रणाली पर पड़ सकता है।


Two men in business suits smiling for the camera in a modern office lobby.

बड़ी खबर आ रही है अडानी और अंबानी के मीडिया हाउसेज एनडीटीवी और न्यूज 18 समेत 21 मीडिया हाउस मोदी सरकार के खिलाफ कोर्ट में भारत के प्राइवेसी कानून को चुनौती दे रहे हैं। उनका कहना है कि इससे इन्वेस्टिगेटिव जर्नलिज्म का काम दब जाएगा और नई दिल्ली को पत्रकारों के सोर्स पहचानने का मौका मिल जाएगा।
सरकार वो कानून लाने जा रही हैं जिससे पत्रकारों को खबरों का सोर्स सरकार को बताना होगा। दरअसल सरकार मीडिया के आक्रामक तेवर से भयभीत है और यह सोच राशि है कि कहीं मीडिया रिज़ीम चेंज की मुहिम को और बढ़ा न दे।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार ने पिछले साल यूज़र्स के डिजिटल पर्सनल डेटा को सुरक्षित रखने के लिए प्राइवेसी कानून लागू करने की घोषणा की थी , जिससे मेटा और गूगल जैसे प्लेटफॉर्म के लिए कम्प्लायंस की ज़रूरतें बढ़ गई थीं।
पब्लिशर्स ने कहा है कि चूंकि मीडिया आउटलेट्स को छूट नहीं दी गई थी, इसलिए यह कानून प्रेस की आज़ादी पर हमला था।
-आवेश तिवारी, पत्रकार

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