
पंकज शुक्ल-
“पंकज, ये ख़बर छपी तो अख़बार में हर रोज़ छपने वाला एक पन्ने का विज्ञापन बंद हो जाएगा, फ़ैसला तुम्हें करना है कि ख़बर छपे या नहीं!” ये कहने वाले थे ‘अमर उजाला’ अख़बार के मालिकों में से एक अतुल माहेश्वरी और मेरी किस ख़बर के चलते ये बात यहाँ तक पहुँची, इसका खुलासा मैं करने जा रहा हूँ, ‘मझेरिया से मेक्सिको’ सीरीज़ की इस 30 वीँ कड़ी में।
‘मझेरिया से मेक्सिको’ सीरीज़ पढ़ने के बाद मुझे ख़ूब फ़ोन और ख़ूब संदेश आते हैं। आप सभी लोगों का ये स्नेह और संबल ही इस सीरीज़ को यहाँ तक ले आया है। पत्रकारिता की बात चल रही है और उस पत्रकारिता की बात चल रही है, जिसे मानव संसाधन (एचआर) की भाषा में पूर्णकालिक पत्रकारिता कहते हैं। मुझे याद है जब मैंने ‘अमर उजाला’ में नौकरी शुरू की थी तो हमारे रिश्ते के एक मामा मुझे मिले और पूछने लगे कि क्या कर रहे हो आज कल? मैंने कहा कि पत्रकारिता। उनका अगला सवाल था, “वो सब तो ठीक है लेकिन नौकरी क्या कर रहे हो?”
पूर्णकालिक पत्रकार होने की सबसे बड़ी चुनौती ये है कि आपको घर, परिवार, रिश्तेदार, परिचित-इन सबके साथ ज़्यादा समय बिताने को मिल नहीं पाता है। लेकिन, अगर आपने इन चुनौतियों से निकलकर अपनी धुन में लगे रहने का साहस पा लिया तो आपको आगे बढ़ने से भी कोई रोक नहीं सकता।
मुरादाबाद में क्राइम रिपोर्टिंग के दिनों में ही एक बार मुझे एक वरिष्ठ पत्रकार ने बताया कि ये ईद वाले दिन ईदगाह में जो खुत्बा पढ़ा जाता है, उसमें बहुत सारी सांप्रदायिक बातें कही जाती हैं। मुझे यक़ीन नहीं हुआ कि इतने पाक मौके पर भला कोई इमाम क्यों इस तरह की बात करेगा? मैंने कहा, ठीक है मैं इस बार का खुत्बा ख़ुद सुनूंगा।
तो ईद वाले दिन मैं मोटरसाइकिल ईदगाह से दूर खड़ी करके भीड़ में शामिल हो गया। सिर पर एक रूमाल बाँध लिया और जाकर एक कतार में खड़ा हो गया। दिल बहुत ज़ोर ज़ोर से धड़क रहा था। माथे पर पसीना ही पसीना। ख़ैर मैंने किसी तरह अगल-बगल के लोगों के मुद्राएं देखकर नमाज के उपक्रम पूरे किए और उसके बाद खुत्बा सुनने लगा। कहीं कुछ मुझे अटपटा मिला नहीं। और, मुझे भड़काने की कोशिश करने वाले पत्रकार को ख़ूब ख़री ख़री सुनाई।
मेरी कौन सी ख़बर छापने या न छापने को लेकर अतुल जी ने मुझे फ़ोन किया था? उसकी बात करने से पहले मुरादाबाद का ही एक क़िस्सा और। पुलिस ने शहर के टॉप 10 हिस्ट्रीशीटर्स की एक लिस्ट जारी की थी और उसमें पहले नंबर पर जिस शख़्स का नाम था, उसके ख़िलाफ़ दर्ज मुकदमों पर मैंने एक फॉलोअप किया। ख़बर छपी तो शाम को उसका फ़ोन आ गया। कहा गया, मुझे आपसे मिलना है। मैंने पूछा कहाँ? तो बोले कि कटघर के आगे रामगंगा पर जो रेलवे पुल है, उस पुल के फलां नंबर पिलर के पास। मैं अगले दिन चला गया। मोटरसाइकिल किनारे खड़ी की और रेल की पटरियों के साथ साथ चलने लगा। पिलर नंबर पढ़ना शुरू किया तो समझ आया कि जो नंबर मुझे बताया गया है, वह अभी सौ कदम और आगे होगा! नीचे रामगंगा नदी बहती दिखी। किसी भी तरफ़ से रेलगाड़ी आने की आशंका की सोचकर ही मेरी रूह काँप गई।
मैंने सोचना शुरू ही किया था कि अगर रेलगाड़ी आई तो मैं क्या करूंगा? तभी बताए गए पिलर नंबर के पहले ही एक लोहे के गर्डर के पीछे से एक दानवाकार इंसान प्रकट हुआ! हाथ में उसके गड़ांसा जैसा कुछ था! भीतर ही भीतर तो मेरे जान सी निकल गई थी, लेकिन मैंने चेहरे पर वैसा कोई भाव आने नहीं दिया। उसने छूटते ही पूछा, तुम्हीं हो शुक्ला? अमर उजाला वाले? मेरे हाँ कहने पर उसने बहुत कुछ उल्टा सीधा कहा। कहा कि अगर मुझे काटकर वहाँ से नदी में फेंक दिया गया तो किसी को पता नहीं चलेगा।
मैंने उसे बताया कि मैं थाना कटघर प्रभारी को इस मुलाक़ात के बारे में बोलकर आया हूँ और आधे घंटे में मैं वापस नहीं गया तो वह फ़ोर्स के साथ यहाँ आते ही होंगे! मेरे इतना कहने पर बात थोड़ा संभली, वह बोला, “मुरादाबाद में आज तक किसी ने मेरी इतनी लंबी तफ़्तीश की नहीं। लेकिन, तुम यहाँ तक चले आए अकेले? इस बात की मैं दाद देता हूँ और तुम्हें जाने देता हूँ।”
इतना कहकर वह उसी लोहे के गर्डर के पीछे फिर लुप्त सा हो गया। मैं इतनी रफ़्तार में वहाँ से वापस लौटा हूँ कि मुझे ख़ुद अब सोचकर अचरज होता है।
और, अब मेरी वो पहली एक्सक्लूसिव इन्वेस्टिगेटिव ख़बर..! मुलायम सिंह यादव की सरकार गई तो मायावती की सरकार बनी। उस सरकार के दौरान प्रशासन में एक ख़ास वर्ग की तूती बोलती थी, और दूसरे वर्ग का अपमान भी गाहे-बेगाहे होता रहता था।
मुरादाबाद में मंडल स्तर पर तैनात एक अधिकारी ने मुझे एक दिन रात के समय बुलाकर एक जानकारी साझा की और काग़ज़ों का एक बंडल पकडा दिया। जानकारी चौंकाने वाली थी। उन अधिकारी के मुताबिक एक नंबर की उत्तर पूर्व राज्य की एक लॉटरी की छपाई, बिक्री आदि को लेकर एक बड़ा रैकेट सक्रिय था और उसमें प्रशासन के ही कुछ लोग शामिल थे। मैंने घर लाकर कागज़ पढ़े तो मामला सेल्स टैक्स की इतनी बड़ी चोरी का था, कि मैंने इसके कुछ और सबूत जुटाने शुरू किए।
पता चला कि इस मामले के तार देश के उस सबसे बड़े लॉटरी किंग से जुड़ते हैं जिसका दफ़्तर दिल्ली के कनॉट प्लेस में हनुमान मंदिर के पास है। मैंने अपने साप्ताहिक अवकाश के दिन दिल्ली जाने का प्लान बनाया। एम के सुब्बा उर्फ़ एम एस सुब्बा के दफ़्तर तक मैं जाने में सफल रहा और अधिकारी ने जिस सू्त्र का नाम बताया था, उससे भेंट भी हो गई। उसने बताया कि लॉटरी की टिकटें वहीं मुरादाबाद में ही छप रही हैं और वहीं से घोटाले की असली शुरूआत होती है। मैंने दिल्ली से लौटकर ये भी पता कर लिया। और, ख़बर लिखी।
मुरादाबाद के स्थानीय संपादक नर नारायण गोयल ने ये ख़बर पढ़ी तो उनका जवाब था, “मैं तो इसे पास नहीं कर सकता, बरेली भेजनी पड़ेगी।” ख़बर तब हाथ से ही लिखी जाती थी, तो काग़ज़ों का वह पुलिंदा मुरादाबाद से बरेली गया। वहाँ भी इसे सामान्य से बड़ा प्रकरण माना गया और वहाँ से ख़बर मेरठ भेजी गई। मेरठ में जब अतुल माहेश्वरी जी ने पूरी ख़बर पढ़ी तो दो-तीन दिन बाद उनका फ़ोन आया।
अतुल जी ने कहा, “पंकज, ये ख़बर छपी तो अख़बार में हर रोज़ छपने वाला एक पन्ने का विज्ञापन बंद हो जाएगा, फ़ैसला तुम्हें करना है कि ख़बर छपे या नहीं!”
उन दिनों सारे अख़बारों में एक से लेकर दो पन्ने तक लॉटरी के नतीजों के विज्ञापन छपा करते थे। मैंने मन ही मन दोनों विकल्पों पर विचार किया। अगर मैं कहूँ कि नहीं, भाई साब, ख़बर छपनी चाहिए और तब भी न छपी तो? और, अगर मैं कह दूँ कि अख़बार का हित पहले है। ख़बर से अगर संस्थान को नुक़सान हो रहा है तो रहने देते हैं तो? आप समझ सकते हैं कि मेरा जवाब क्या रहा होगा? ये बात साल 1997 के शुरू की है।
इसके कुछ अरसा बाद मेरा तबादला अमर उजाला, बरेली के लिए हो गया। लेकिन, बरेली में मेरी यात्रा के कुछ और रोचक पड़ाव मेरा इंतज़ार कर रहे थे। मेरा नाम हॉलीवुड के स्टूडियोज़ तक पहुँचने की भूमिका वहीं से बननी थी और शुरू होनी थी हॉलीवुड फ़िल्मों पर लेखन की एक ऐसी यात्रा, जिसके चलते मुझे दुनिया के करीब दो दर्जन देशों की यात्रा करने का सौभाग्य मिला। ऐसी ही एक यात्रा मेक्सिको की भी कुछ साल पहले हुई, जहाँ एक दिन मुझे सुबह सुबह इस सीरीज़ को लिखने का विचार कौंधा, ‘मझेरिया से मेक्सिको’, तो पढ़ते रहिए यात्रा जारी है, जै जै..!
फ़ोटो – दुधवा नेशनल पार्क में हुए संगमन – 4 की है.. (सबसे ऊपर)



