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उत्तर प्रदेश

यदि प्रदीप दुबे किसी पद पर नहीं हैं तो सतीश महाना और सुरेश खन्ना योगी जी को लेकर दुबे का नाम लिखे पत्थर का उद्घाटन क्यों करवा रहे हैं?

यदि माननीय उच्च न्यायालय में प्रदीप दुबे, प्रमुख सचिव, विधान सभा उत्तर प्रदेश की ओर से यह कहा गया है कि वे किसी सार्वजनिक पद पर आसीन नहीं हैं, तो फिर समाजवादी पार्टी के फिरोजाबाद से निर्वाचित विधायक श्री सचिन यादव के निलंबन संबंधी पत्र पर उनके हस्ताक्षर किस अधिकार से किए गए? यह गंभीर प्रश्न है, विशेषकर तब जब प्रदीप दुबे 30 अप्रैल 2019 को सेवानिवृत्त हो चुके हैं और इस पूरे प्रकरण की जानकारी विधानसभा अध्यक्ष को भी है…

Group of Indian officials at a plaque unveiling ceremony with a saffron-robed man holding a chain and flower arrangement nearby

विधानसभा सत्र शुरू होने के पहले योगी आदित्यनाथ इतनी बड़ी गलती कैसे कर सकते हैं! गलती कर दी या जानबूझकर करवाई गई!

Portrait of a man with short black hair and a mustache, wearing a white shirt and dark blazer, looking to the left.

सौरभ सिंह सोमवंशी-

बीते 5 जून को गर्मी की छुट्टी के दौरान लखनऊ हाई कोर्ट के जस्टिस देवेश चंद्र सावंत और जस्टिस राजेश चौहान की बेंच 69 साल के हो चुके और कथित रूप से अवैध तरीके से प्रमुख सचिव विधानसभा के पद पर विद्यमान प्रदीप दुबे की नियुक्ति को चुनौती देने वाली याचिका पर बहस हो रही थी।

क्यो वारंटों यानी अधिकार पृच्छा पर बहस के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से सुप्रीम कोर्ट की एडवोकेट रीना एन सिंह जो इंग्लैंड के वेल्स के अपने आफिस में बैठकर वर्चुअल बहस कर रही थी वह विधानसभा के प्रमुख सचिव प्रदीप दुबे को अंतिम फैसले तक के लिए पद से हटाने और अदालत से याचिकाकर्ता के लिए अंतरिम रिलीफ की मांग कर रही थी। उसका विरोध करते हुए प्रदीप दुबे, जो की अपॉजिट पार्टी नंबर तीन है उनके अधिवक्ता ने याचिका की maintainability पर इस बात पर सवाल उठाया कि प्रमुख सचिव विधानसभा प्रदीप दुबे किसी पब्लिक पोस्ट पर नहीं है। और ना ही कोई सरकारी काम कर रहे हैं।

यह बात कोर्ट ने आदेश में स्पष्ट कर दी है। उनके अधिवक्ता के द्वारा जो कहा गया उसका हिंदी अनुवाद मैं यहां डाल रहा हूं। आप उसे आदेश के पहले पृष्ठ के तीसरे पैरा में देख सकते हैं-

“3. श्री अभिनव त्रिवेदी ने इस रिट याचिका की स्वीकार्यता (maintainability) पर शुरुआती आपत्ति जताई है। उनका तर्क है कि विपक्षी पार्टी नंबर 3 किसी सार्वजनिक पद पर नहीं है और न ही कोई सरकारी या संप्रभु कार्य (sovereign functions) कर रही है; इसलिए, ‘को वारंटो’ (Quo Warranto) की यह रिट याचिका स्वीकार्य नहीं हो सकती। उन्होंने अनुरोध किया है कि उन्हें रिट याचिका की स्वीकार्यता के संबंध में एक संक्षिप्त जवाबी हलफनामा (short counter affidavit) दाखिल करने के लिए थोड़ा समय दिया जाए।”

Page from a High Court writ petition showing header 'HIGH COURT OF JUDICATURE AT ALLAHABAD LUCKNOW' and highlighted lines mentioning Ms. Reena N. Singh and Sri Abhinav Trivedi, with body text of the petition visible.
आदेश का पैरा तीन देखिए
Official Uttar Pradesh Vidhan Sabha letterhead with Devanagari text, dated 28 जुलाई, 2026, consisting of a formal memorandum.

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बड़ा सवाल यह है कि जब प्रदीप दुबे के अधिवक्ता खुले आम लखनऊ हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच में यह कह रहे हैं कि प्रदीप दुबे किसी सार्वजनिक पद पर नहीं है। और यह सारी चीज कोर्ट के आदेश में आ चुकी है। तो सतीश महाना और सुरेश खन्ना मुख्यमंत्री जी को लेकर प्रदीप दुबे के नाम लिखे हुए पत्थर का उद्घाटन क्यों करवा रहे हैं?

मुख्यमंत्री से इस तरह के राजनीतिक पाप कराकर कहीं उनकी राजनीतिक हत्या की साजिश तो नहीं है।

प्रदीप दुबे के द्वारा अपने आप को प्रमुख सचिव बताते हुए विधानसभा सत्र से संबंधित तमाम आदेश नियुक्तियां और तमाम सारे काम किये जा रहे हैं। सर्वदलीय बैठक में भी प्रदीप दुबे प्रमुख सचिव के रूप में बैठे हुए देखे जाते हैं। और अदालत में कहा जाता है कि प्रदीप दुबे किसी सार्वजनिक पद पर नहीं है।

मतलब अदालत को भी अंधेरे में रखा जा रहा है।

उत्तर प्रदेश की विधानसभा में अब तक अब तक के सबसे विवादित शख्सियत के रूप में स्थापित हो चुके प्रदीप दुबे की नियुक्ति से लेकर के अभी तक के तमाम सारे साक्ष्यों को एकत्र करते हुए इनकी नियुक्ति को चुनौती दी गई है पहले ही सुनवाई के दौरान जस्टिस राजेश चौहान के द्वारा 69 साल का हो जाने के बावजूद प्रमुख सचिव के पद पर बने रहने पर आश्चर्य व्यक्त किया गया था।

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