सुभाष सिंह सुमन-
रिपोर्टर्स कलेक्टिव ने एक बड़ा बढ़िया गणित किया है। परसों (29 जुलाई को) उन्होंने इसपर रिपोर्ट पब्लिश की। हालाँकि रिपोर्ट फुल प्रूफ है नहीं। क्यों नहीं है, उसकी चर्चा बाद में करेंगे। पहले ये देख लेते हैं कि रिपोर्ट में छनकर निकल क्या रहा है!
रिपोर्ट की पहली फाइंडिंग है कि सरकार के इथेनॉल प्रेम के चक्कर ने 3 साल में आम लोगों की जेबों पर 88,234 करोड़ रुपये का डाका डाला है। मतलब कार-बाइक से चलने वाले लोगों को इथेनॉल के कारण 3 साल में 88,234 करोड़ रुपये एक्स्ट्रा खर्च करने पड़े हैं। 2023-24 में 20,184 करोड़ रुपये, 2024-25 में 30,207 करोड़ रुपये और 2025-26 में 37,843 करोड़ रुपये। कुल मिलाकर 88,234 करोड़ रुपये।

इस फाइंडिंग के बाद हमारे मन में सबसे पहला सवाल उठना चाहिए कि इस गणित का आधार क्या है? किस फॉर्मूले से रिपोर्टर्स कलेक्टिव इस नतीजे पर पहुँचा है? इसका जवाब खोजेंगे, उसी में यह भी पता चलेगा कि क्यों मैंने शुरू में ही इस रिपोर्ट को फुल प्रूफ मानने से इनकार कर दिया। अच्छी बात ये है कि रिपोर्टर्स कलेक्टिव ने सारा गणित उन्हीं आँकड़ों के आधार पर किया है, जो या तो सरकार ने खुद जारी किया है या सरकार ने अपने बयानों-अपनी सफाइयों में यूज किया है।
सरकार ने बहुत समय तक अड़े रहने के बाद इधर कुछ हफ्ते पहले पहली बार यह माना कि पेट्रोल में इथेनॉल मिलाने से माइलेज/एवरेज पर फर्क पड़ा है। सरकार इस बात को मानने पर राजी हुई है कि इथेनॉल की कैलोरिफिक वैल्यू पेट्रोल के मुकाबले 33% कम है। सरल शब्दों में इसका अर्थ है कि पेट्रोल की तुलना में इथेनॉल में 33% कम एनर्जी मिलती है। 1 लीटर पेट्रोल से जितनी एनर्जी मिलेगी, उससे 33% कम एनर्जी 1 लीटर इथेनॉल से मिलेगी। सरकार का दावा है कि अभी 20% ही इथेनॉल की मिलावट हो रही है, जो संदिग्ध है। लेकिन रिपोर्टर्स कलेक्टिव ने सरकार की ही बात मान ली है। इस हिसाब से माइलेज 6.7% कम होना सिद्ध होता है।
अब सरकार ने इथेनॉल की मिलावट तो बढ़ा दी है, लेकिन मिलावटी पेट्रोल का भाव कम नहीं हुआ है। आम आदमी नॉर्मल पेट्रोल का जो भाव दे रहा था, वही भाव 20% इथेनॉल वाले पेट्रोल के लिए भी दे रहा है। माइलेज कम होने का मतलब है फ्यूल की ज्यादा खपत। तो सिर्फ 6.7% खपत बढ़ना मानें, तो आम लोगों को 2023-24 में 14.8 लाख टन, 2024-25 में 22.6 लाख टन और 2025-26 में 28.3 लाख टन ज्यादा फ्यूल खरीदना पड़ा। इस ज्यादा फ्यूल खरीदने पर जो पैसे लगे, वो आम लोगों पर एक्स्ट्रा बोझ बनकर गिरा।
सरकार और सरकार के कुछ अँधे समर्थकों को छोड़कर बाकी सब जान रहे हैं कि मिलावटी पेट्रोल के बाद माइलेज 6.7% ही कम नहीं हुआ है। लोकल सर्किल्स ने इसपर एक सर्वे किया। उसमें 44 हजार से अधिक लोगों से बातें की गयीं और उनका अनुभव जाना गया। सर्वे में लोगों ने बताया कि मिलावटी पेट्रोल से माइलेज में 15-20% गिरावट आ रही है। मेरा व्यक्तिगत अनुभव भी इसी रेंज में गिरावट का है। अब इसकी वजह जो भी हो। दो वजहें ही हो सकती हैं। एक वजह, कि सरकार ने भले ही 20% मिलाने के लिए कहा है, लेकिन मिलावट ज्यादा हो रही है।
कई एक्सपर्ट बता रहे हैं कि हायर ब्लेंड मने 25-30% इथेनॉल वाले पेट्रोल की साइलेंट टेस्टिंग हो रही है। खबरें ऐसी भी हैं कि देश में मिलावट माफिया सक्रिय है। दैनिक भास्कर ने इसपर इन्वेस्टिगेटिव रिपोर्ट पब्लिश की थी। दूसरी वजह कि कागजी कैलकुलेशन में भले ही माइलेज की गिरावट 6-7% की ही हो, लेकिन रियल लाइफ सिचुएशन में असर अलग हो रहा है। यह संभव भी है, क्योंकि अभी भारत की सड़कों पर 25 करोड़ से अधिक कार-बाइक ऐसी दौड़ रही हैं, जो ई20 पर चलने के लिए तैयार नहीं हैं। मैंने इसी आधार पर रिपोर्टर्स कलेक्टिव के गणित को गलत कहा। अब यदि 15-20% माइलेज ड्रॉप के हिसाब से कैलकुलेट करेंगे, तब 3 साल में हमारी जेब काटे जाने का आँकड़ा एक-डेढ़ लाख करोड़ रुपये पर पहुँच जायेगा, जो पूरे इथेनॉल इकोसिस्टम के टोटल इन्वेस्टमेंट से ज्यादा है।
अब सोचकर देखिये। क्या वजह है कि सरकार इस तरह आम लोगों को लूटने और मूर्ख बनाने पर आमादा है? क्या इस देश का एक साधारण व्यक्ति खून जलाकर और पसीना बहाकर इसीलिए कमा रहा है कि उसे हर तरह से लूट लिया जाये। हमारे मगध में एक कहावत चलती है। खस्सी के जान जाय औ खवैय्या के स्वाद नैय। मतलब बकरी के बच्चे की जान चली गयी और खाने वाला कह रहा स्वाद नहीं आया। सरकार उसी खवैय्ये की तरह है और आम जनता बना दी गयी है खस्सी। सरकार रोज-रोज नये प्रयोग से खस्सियों को काट रही है। कटते समय गलती से किसी की चीख निकल जाये, सरकार और सरकार के पालतू उसे एंटी-नेशनल सर्टिफाई कर देते हैं।


