मनीष दुबे-
अपने पहले पॉडकास्ट के प्रमोशन के लिए अमन चोपड़ा ने सोशल मीडिया पर दावा किया कि रिकॉर्डिंग के दौरान उन्हें और उनकी टीम को धमकाया गया, कैमरा बंद कराने की कोशिश हुई और सहयोगियों के साथ बदसलूकी की गई। अगर ऐसा हुआ है तो इसकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए और दोषियों पर कार्रवाई भी होनी चाहिए।
लेकिन अमन चोपड़ा का ट्वीट सिर्फ घटना का विवरण नहीं देता, बल्कि उसमें “हामिद अंसारी”, “फारूक अब्दुल्ला” और फिर “अब अभिमुक्तेश्वरानंद” जैसे नाम जोड़कर एक राजनीतिक और वैचारिक नैरेटिव गढ़ने की कोशिश भी दिखाई देती है। इससे सवाल उठता है कि क्या यह सिर्फ पॉडकास्ट का प्रचार है या विवाद पैदा कर दर्शकों का ध्यान खींचने की रणनीति?
पत्रकारिता का मूल उद्देश्य सवाल पूछना और जवाब सामने लाना है। अगर इंटरव्यू में तनाव पैदा हुआ तो उसका पूरा वीडियो सामने आना चाहिए, ताकि लोग खुद तय कर सकें कि किसका व्यवहार कैसा था। केवल एक पक्ष के दावों के आधार पर निष्कर्ष निकालना पत्रकारिता नहीं कहलाता।
अमन चोपड़ा पर पहले भी आरोप लगते रहे हैं कि उनकी प्रस्तुति तथ्यों से अधिक टकराव और ध्रुवीकरण पर आधारित होती है। यही वजह है कि उनके आलोचक कहते हैं कि उनकी पत्रकारिता का केंद्र संवाद नहीं, बल्कि विवाद बन गया है।
अगर इस मामले में वास्तव में धमकी या हिंसा हुई है तो उसकी निंदा होनी चाहिए। लेकिन अगर यह सिर्फ पॉडकास्ट रिलीज से पहले माहौल बनाने की कोशिश है, तो यह भी दर्शकों के भरोसे के साथ न्याय नहीं होगा।
पत्रकारिता की ताकत सवाल पूछने में है, न कि हर बहस को वैचारिक संघर्ष में बदल देने में। दर्शकों को भी किसी एक ट्वीट के बजाय पूरा इंटरव्यू देखकर अपनी राय बनानी चाहिए।
ये अमन चोपड़ा जैसे लोग ना देश का भला चाहते हैं ना हिंदूओं के हितैषी हैं ये सिर्फ सत्ता के गुलाम हैं।
पहले इन्होंने पूर्व उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी को बदनाम किया
फिर फारूक अब्दुल्ला साहब को बदनाम किया
और अब हिंदूओं के शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद को बदनाम कर रहे हैं और इस आदमी की टाइमलाइन पर जाकर देखिए…कैसे अशोक श्रीवास्तव, हर्षवर्धन त्रिपाठी जैसे लोग खुशी में उछल रहे हैं।
मतलब इन लोगों को हिंदुओं से या उनके शंकराचार्य से कोई मतलब नहीं है ये हर उस आदमी के खिलाफ हैं जो सरकार और बीजेपी का विरोधी है।
-सौरभ यादव, पत्रकार


