संजय कुमार सिंह
आज सभी अखबारों में बांकीपुर में भाजपा की हार को प्रमुखता मिली है। तीन उपचुनावों में भाजपा को एक जीत और दो हार मिली है। भांति-भांति के इसके शीर्षक में दैनिक भास्कर का फ्लैग शीर्षक है, तीन उपचुनाव – बिहार और मध्य प्रदेश में सत्ता में होने के बावजूद भाजपा हारी, गुजरात में सफल। मुख्य शीर्षक है, भाजपा के लिए एक फूल दो कांटे। अमर उजाला का फ्लैग शीर्षक है, विधानसभा उपचुनाव – जेन जी आंदोलन के बाद हुए चुनाव में तीन में से दो सीटें भाजपा हारी। मुख्य शीर्षक है, नवीन के गढ़ में पीके (प्रशांत किशोर) का चमत्कार। सोशल मीडिया पर किसी ने लिखा है, शराब बंदी वाले बिहार में कोई पीके जीत गया। उपशीर्षक है, दतिया (मध्य प्रदेश) में कांग्रेस और गुजरात में भाजपा जीती। नवोदय टाइम्स में यह खबर लीड नहीं है। लीड के साथ टॉप पर चार कॉलम का बॉक्स है। इसका शीर्षक है – बांकीपुर में पीके, मांजलपुर में भाजपा की जीत। देशबन्धु की लीड का फ्लैग शीर्षक है, विधानसभा उपचुनावों में बीजेपी को बड़ा झटका। मुख्य शीर्षक है, बीजेपी के बॉस का किला ढहा। उपशीर्षक है – नितिन नवीन की सीट पर प्रशांत किशोर जीते, दतिया में कांग्रेस, मांजलपुर में बीजेपी जीती। अंग्रेजी अखबारों में इंडियन एक्सप्रेस की लीड का शीर्षक हिन्दी में कुछ इस तरह होगा – भाजपा प्रमुख का पटना किला ढहा, पीके का सदन में तूफानी प्रवेश। हिन्दुस्तान टाइम्स में यह पहले पन्ने से पहले के अधपन्ने पर लीड है। इसका शीर्षक है, भाजपा बांकीपुर गढ़ हारी। टाइम्स ऑफ इंडिया में यह खबर सेकेंड लीड है। शीर्षक है, (प्रशांत) किशोर ने भाजपा की 31 साल पुरानी पकड़ तोड़ी, पार्टी अध्यक्ष की खाली सीट को जीता। द हिन्दू की लीड का शीर्षक है, प्रशांत किशोर ने बांकीपुर में भाजपा का किला भेदा। पूर्व राजनीतिक रणनीतिकार ने भाजपा प्रमुख नितिन नवीन की खाली हुई बिहार विधानसभा सीट का उपचुनाव 19,324 वोटों के अंतर से जीता; भाजपा ने गुजरात में मंजलपुर सीट बरकरार रखी जबकि कांग्रेस ने मध्य प्रदेश में दतिया सीट अपने पास बनाए रखी। दि एशियन एज की लीड का शीर्षक है, किशोर के बांकीपुर जीतने से बिहार में भाजपा को बड़ा झटका लगा। दो बुलेट फ्लैग शीर्षक हैं – 1) कांग्रेस और भाजपा ने मध्य प्रदेश, गुजरात में सीट बचा ली और 2) भाजपा प्रमुख नवीन और बिहार के मुख्यमंत्री के लिए बड़ा झटका। कोलकाता के अंग्रेजी दैनिक, द टेलीग्राफ की लीड का शीर्षक है, जेनजी (आंदोलन) के बाद उपचुनाव : (प्रशांत) किशोर, कांग्रेस ने बीजेपी को चौंका दिया।
ऊपर मेरे 10 अखबारों में से आठ की लीड और दो की सेकेंड लीड की खबर और शीर्षक से स्पष्ट है कि इस उपचुनाव में भाजपा की हार बड़ी है। प्रशांत किशोर या कांग्रेस की जीत नहीं। जीतने वाले कांग्रेस उम्मीदवार का तो नाम ही नहीं है और गुजरात के चुनाव क्षेत्र का नाम भी बहुत कम आया है। प्रशांत किशोर का नाम कुछ ज्यादा ही है और यह सब अकारण नहीं है। इन खबरों और सुर्खियों से साफ है कि प्रशांत किशोर का नाम, कद या उनकी उम्मीदवारी बड़ी थी और इसलिए जीत भले बड़ी न हो भाजपा की हार का पूरा प्रचार है। बेशक, भाजपा की हार ही बड़ी खबर है और यह सही भी है लेकिन भाजपा इसका उपयोग यह बताने, कहने या साबित करने के लिए कर सकती है और करती रही है कि चुनाव में गड़बड़ी संभव होती तो हम हारते? चुनाव हारने वाले भाजपा की जीत पर तो उंगली उठाते हैं लेकिन खुद जहां जीतते हैं उस पर कुछ नहीं कहते। इस क्रम में याद आता है कि 2024 के लोकसभा चुनाव के नतीजे आने के बाद प्रधानमंत्री ने कहा था, …. मैंने पूछा ईवीएम जिन्दा है कि मर गया। एआई गूगल जेमिनाई से प्राप्त (संपादित) प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का पूरा बयान इस तरह है : “साथियों, 4 जून को जब नतीजे चल रहे थे, तो मैं अपने काम में कुछ व्यस्त था। बाद में फोन आना शुरू हो गए, तो मैंने किसी को पूछा – ‘यार यह तो ठीक है आंकड़े-वांकड़े, मुझे यह बताओ कि ईवीएम जिंदा है कि मर गया?’ क्योंकि यह लोग तय करके बैठे थे कि भारत के लोकतंत्र और लोकतंत्र की प्रक्रिया के प्रति विश्वास ही लोगों का उठ जाए और लगातार ईवीएम को गाली देना। मुझे तो लगता था कि शायद इस बार वे ईवीएम की अर्थी का जुलूस निकालेंगे, लेकिन 4 जून शाम आते-आते उनके मुंह पर ताले लग गए। ईवीएम ने उनको चुप कर दिया। यह ताकत है भारत के लोकतंत्र की।” मुझे लगता है कि यह भारत के लोकतंत्र की ताकत नहीं मीडिया की गुलामी की कीमत है और उसी का नतीजा है कि इसके बाद एसआईआर हुए, सुप्रीम कोर्ट ने होने दिया और लाखों लोग वोट नहीं दे पाए। सत्तारूढ़ दल ने घुसपैठियों का मुद्दा उठाया यह नहीं बताया कि कितने घुसपैठिये मिले। खबरों से यह जरूर पता चला था कि जिन्हें जबरन बांग्लादेश भेज दिया गया था उन्हें (सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर) वापस लाना पड़ा। जब ईवीएम की कार्यप्रणाली संदिग्ध है, मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति और उनकी निष्पक्षता पर आरोप हैं तब एसआईआर उसपर खर्च और सुप्रीम कोर्ट का रुख बताता है कि चुनाव नतीजे सही नहीं होते हैं। ऐसे में एक सीट पर भाजपा की हार को इतना प्रचारित करना चुनाव की स्वतंत्रता और निष्पक्षता को प्रचारित करना है जबकि यह हार कई अन्य कारणों से हुई है और चाहे जितनी बेईमानी की जाए हर सीट से, हर बार किसी खास उम्मीदवार को जितवाना संभव नहीं है। बाकी चुनाव आयोग लेवल प्लेइंग फील्ड नहीं देता है, भाजपा के सांप्रदायिक प्रचार पर रोक नहीं है आदि मुद्दे हैं। चुनाव लड़ने वाले को ही चुनाव की निष्पक्षता सुनिश्चित करनी होगी तो जो हो रहा है वह चलता रहेगा और ऐसी हार का लाभ सत्तारूढ़ दल को मिलता रहेगा।
तथ्य है कि बांकीपुर में हार-जीत का अंतर तीसरे नंबर पर रहे उम्मीदवार को मिले वोट से ज्यादा है इसलिए जीत प्रतीकात्मक नहीं है। न ही हार साधारण है। उपचुनाव था इसलिए प्रशांत किशोर यहां से लड़े वरना राज्य विधानसभा चुनाव के समय बांकीपुर से वंदना कुमारी जनसुराज की उम्मीदवार थीं और उन्हें 7717 वोट ही मिले थे। इस बार हार-जीत का अंतर इससे काफी ज्यादा है। जाहिर है चुनाव भाजपा और जनसुराज में नहीं, प्रशांत किशोर का था और प्रशांत किशोर जीते हैं। उन्होंने भाजपा उम्मीदवार को नहीं, पूरी भाजपा को हराया है। वैसे भी, चुनाव जीतने के लिए वोट कटवा उम्मीदवार खड़े किए जाते हैं। लोकसभा-विधानसभा चुनाव में भाजपा उम्मीदवारों के लिए विशेष ट्रेन भी चली थी। दिल्ली के वोटर बिहार जाकर भी वोट डाल आए थे। इस बार यह सब नहीं था। उप चुनाव में होता भी नहीं है। इसलिए हार भाजपा की ही नहीं, उसकी रणनीतियों की भी है जो उपचुनाव में लागू नहीं किए जा सके या किए जा सकते हैं। बिहार चुनाव से पहले ऑपरेशन सिन्दूर किया गया था, शहीदों की संख्या संबंधित जानकारी छिपाई गई थी। खबरों के अनुसार बांकीपुर सीट पर 30 साल से भाजपा का कब्जा था तो वह नितिन नवीन पिता-पुत्र के कारण था। अब उनके अध्यक्ष बनने के बाद भाजपा उम्मीदवार के हारने के कई मायने हो सकते हैं। इसमें वंशवाद शामिल है और इस कारण अगर नितिन नवीन को अध्यक्ष बनाया गया तो भाजपा उम्मीदवार के मामले में वंशवाद लागू नहीं हुआ। अखबारों ने और भी कई कारण बताए हैं। मुझे लगता है कि नितिन नवीन की जगह उनके भाई-बन, मां-चाचा उम्मीदवार होते तो नतीजा कुछ और हो सकता था। कई बार उपचुनाव मुख्यमंत्री के जीतने के लिए होता है और कल्पना कीजिए कि मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी की टक्कर प्रशांत किशोर से हो रही होती। जाहिर है, नतीजा अलग हो सकता था।
2024 में पद्मश्री से सम्मानित बिहार के वरिष्ठ हिंदी पत्रकार सुरेंद्र किशोर से मैं अक्सर असहमत रहता हूं लेकिन आज पहले के कई उपचुनावों के नतीजों का उल्लेख करते हुए ‘निष्कर्ष’ में उन्होंने लिखा है, “बांकीपुर उपचुनाव का नतीजा आज की स्थिति के अनुसार आया है। मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने उसे स्वीकारा और प्रशांत किशोर को बधाई भी दी। पर अगला लोकसभा या बिहार विधानसभा चुनाव का नतीजा क्या होगा, वह उस समय की स्थिति पर निर्भर करेगा। लोक सभा चुनाव सन 2029 और बिहार विधान सभा चुनाव 2030 में होगा। आम चुनाव सरकार बनाने या गिराने का अवसर मतदाताओं को देता है। किसी सरकार के बारे में मतदातागण बहुत सारी बातों को ध्यान में रखकर फैसला करते हैं–किसी एक या दो मुद्दे को लेकर नहीं। सबसे बड़ी बात अधिकतर मतदाताओं के दिमाग में यह होती है कि हमारे लिए कौन दल या दल समूह बेहतर है और कौन बदतर। पूर्ण तो न कोई मनुष्य है और न कोई मनुष्य-निर्मित दल। लालू-राबड़ी सरकार और नीतीश-सम्राट सरकार की उपलब्धियों और विफलताओं को लेकर इनमें से किसी एक को चुनने में बिहार के जागरूक मतदातागण एक क्षण की भी देरी नहीं करेंगे। इसी तरह मनमोहन सिंह-सोनिया राज और नरेंद्र मोदी -अमित शाह राज के बीच फैसला करने में भी किसी को कोई देरी नहीं लगेगी। इसलिए न तो राजग को पस्तहिम्मत होने की जरूरत है और न ही प्रतिपक्ष को अति उत्साहित।” मेरा मानना है कि भाजपा की हार होने के बावजूद उसके कमजोर होने का संकेत नहीं है और इसका तो बिल्कुल नहीं कि आगे के चुनाव में भी भाजपा इसी तरह हार सकती है या चुनाव ऐसे ही ‘निष्पक्ष’ होंगे। चुनाव चोरी और चुनाव आयोग की निष्पक्षता मुद्दा है उसे बनाए रखना होगा।

मैं रोज चार हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल दस, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। एआई का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।


