वरिष्ठ पत्रकार विवेक शुक्ला : दिल्ली की स्मृतियों के दस्तावेज़कार और जनसरोकारों के सजग लेखक
वरिष्ठ पत्रकार, लेखक और स्तंभकार विवेक शुक्ला हिंदी पत्रकारिता की उन चुनिंदा हस्तियों में हैं जिन्होंने चार दशक से अधिक समय तक पत्रकारिता को केवल खबरों तक सीमित नहीं रखा, बल्कि इतिहास, समाज, संस्कृति और विशेष रूप से दिल्ली की बदलती पहचान को अपने लेखन का विषय बनाया। वे उन पत्रकारों में गिने जाते हैं जिनकी रिपोर्टिंग तथ्यों, शोध और ऐतिहासिक संदर्भों पर आधारित होती है।
विवेक शुक्ला ने अपने लंबे पत्रकारिता जीवन में राजनीतिक, सामाजिक, ऐतिहासिक और राष्ट्रीय महत्व के विषयों पर 14 हजार से अधिक लेख, फीचर और रिपोर्ट लिखी हैं। उनका कार्यक्षेत्र दक्षिण एशिया, राष्ट्रीय राजनीति, आंतरिक सुरक्षा, व्यापार और दिल्ली के सामाजिक-राजनीतिक इतिहास तक फैला रहा है। उन्होंने चंद्रशेखर, अटल बिहारी वाजपेयी, आई. के. गुजराल और इमरान खान सहित अनेक प्रमुख हस्तियों के साक्षात्कार भी किए हैं।
दिल्ली उनके लेखन का सबसे प्रिय विषय रहा है। राजधानी के इतिहास, उसकी गलियों, इमारतों, बाज़ारों और सांस्कृतिक विरासत पर उनका शोधपरक लेखन उन्हें दिल्ली का गंभीर दस्तावेज़कार बनाता है। उनकी चर्चित पुस्तकों में “दिल्ली का पहला प्यार : कनॉट प्लेस” तथा “Gandhi’s Delhi” विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। इन पुस्तकों के माध्यम से उन्होंने दिल्ली के अतीत और वर्तमान को आम पाठकों के सामने सरल, रोचक और प्रमाणिक शैली में प्रस्तुत किया है।
पत्रकारिता के साथ-साथ विवेक शुक्ला का लेखन विभिन्न राष्ट्रीय समाचार संस्थानों और पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से प्रकाशित होता रहा है। वे वर्तमान में भी समसामयिक घटनाओं, इतिहास और दिल्ली की विरासत पर लगातार लिख रहे हैं। उनके लेखों में शोध, तथ्य और सहज भाषा का संतुलित मेल दिखाई देता है।
हिंदी पत्रकारिता में उनके दीर्घकालिक योगदान को देखते हुए वर्ष 2026 में उन्हें नई दुनिया फाउंडेशन मीडिया फॉर यूनिटी अवॉर्ड्स के अंतर्गत प्रतिष्ठित प्रभाष जोशी अवॉर्ड से सम्मानित किया गया। यह सम्मान हिंदी पत्रकारिता में उनके उल्लेखनीय योगदान, जनसरोकारों के प्रति प्रतिबद्धता और सकारात्मक पत्रकारिता के लिए प्रदान किया गया। बाद में आयोजित सम्मान समारोह में उन्हें यह पुरस्कार न्यायमूर्ति ऋषिकेश रॉय, राज्यसभा सांसद राजीव शुक्ला और सांसद शशि थरूर के हाथों प्राप्त हुआ।
विवेक शुक्ला की पत्रकारिता की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे इतिहास को वर्तमान से जोड़ते हैं। उनके लेख केवल सूचना नहीं देते, बल्कि पाठकों को उस दौर, उस समाज और उन परिस्थितियों से भी परिचित कराते हैं जिनसे आधुनिक भारत का निर्माण हुआ। यही कारण है कि उन्हें एक ऐसे पत्रकार-लेखक के रूप में देखा जाता है, जिनका लेखन समाचार से आगे बढ़कर सामाजिक स्मृति का हिस्सा बन जाता है।
-यशवंत (एडिटर, भड़ास4मीडिया)
भारतीय पत्रकारिता जगत में विवेक शुक्ला एक ऐसा नाम हैं जिन्होंने अपनी लेखनी, शोधपरक दृष्टि और बेबाक पत्रकारिता से विशिष्ट पहचान बनाई है। लंबे समय तक प्रतिष्ठित समाचार पत्र हिंदुस्तान टाइम्स से जुड़े रहने के दौरान उन्होंने अनेक महत्वपूर्ण राष्ट्रीय और सामाजिक विषयों पर प्रभावशाली रिपोर्टिंग की। इसके साथ ही देश के कई प्रमुख समाचार पत्रों और पत्रिकाओं में उनके नियमित कॉलम प्रकाशित होते रहे हैं, जिनमें समसामयिक घटनाओं, इतिहास, संस्कृति और समाज के विविध पहलुओं का गहन विश्लेषण देखने को मिलता है।
विवेक ने पत्रकारिता जीवन में राजनीति, साहित्य, कला, सिनेमा, खेल और सामाजिक जीवन से जुड़ी अनेक प्रतिष्ठित हस्तियों के साक्षात्कार किए हैं। उनकी बातचीत का अंदाज़ तथ्यपरक, संवेदनशील और गहराई से भरपूर होता है, जो पाठकों और दर्शकों को विषय के नए आयामों से परिचित कराता है। पत्रकारिता के साथ-साथ वे एक सफल लेखक भी हैं। उन्होंने इतिहास, समाज और समकालीन भारत से जुड़े विषयों पर कई महत्वपूर्ण पुस्तकें लिखी हैं, जिन्हें पाठकों और समीक्षकों ने समान रूप से सराहा है। उनकी लेखनी शोध, प्रामाणिकता और सहज भाषा का उत्कृष्ट उदाहरण मानी जाती है।
आज के इस विशेष संवाद में वरिष्ठ पत्रकार, लेखक और चिंतक विवेक शुक्ला से बातचीत कर रही हैं पत्रकार शिवा। यह बातचीत केवल एक पत्रकार के पेशेवर सफ़र की कहानी नहीं, बल्कि पत्रकारिता के बदलते स्वरूप, लेखन की जिम्मेदारी और समाज के प्रति मीडिया की भूमिका पर एक सार्थक विमर्श भी है।



सवाल: नमस्कार, भड़ास4मीडिया डॉट कॉम से बात करने के लिए आपका बहुत धन्यवाद. शुरू करते हैं आपके बचपन से, परिवार और पढ़ाई की… फिर पत्रकारिता तक पहुँचने का सफर जानना चाहेंगे!
जवाब: मेरा परिवार मूल रूप से उत्तर प्रदेश का है। हरदोई और उन्नाव से हमारा रिश्ता रहा है। लेकिन 1895 में मेरे परदादा श्री राम सहाय शुक्ला रेलवे की नौकरी के सिलसिले में रावलपिंडी चले गए थे। उसके बाद हमारा पूरा परिवार वहीं बस गया। मेरे दादाजी और पिताजी दोनों का जन्म भी रावलपिंडी में ही हुआ। रावलपिंडी में हमारे पड़ोस में मशहूर फिल्मकार बलराज साहनी जी का परिवार रहता था। 1947 तक सब कुछ वहीं था। फिर विभाजन हुआ। उस समय मेरे दादाजी रावलपिंडी रेलवे स्टेशन के स्टेशन मास्टर थे। जब दंगे भड़के सारा परिवार दिल्ली आ गया। मुझे लगता है कि मेरे दादा जी सितंबर, 1948 में रावलपिंडी से दिल्ली आए। मुझे लगता है कि वे रावलपिंडी से निकलने वाले आख़िरी हिंदू थे। रावलपिंडी के दंगों का ज़िक्र मैंने अपनी आने वाली किताब “विभाजन के शेष सवाल” में विस्तार से किया है।
दिल्ली आने के बाद हमारा परिवार न्यू राजेंद्र नगर में बस गया। बहुत लोग शायद नहीं जानते कि न्यू राजेंद्र नगर देश की पहली रिफ्यूजी कॉलोनियों में से एक थी। वहीं से हमारे परिवार ने नई शुरुआत की। मेरे पिताजी अर्थशास्त्री थे। उन्होंने कुछ समय दिल्ली विश्वविद्यालय के Hansraj College समेत दूसरे कॉलेजों में अध्यापन भी किया। मेरी शुरुआती पढ़ाई राउज़ एवेन्यू स्कूल में हुई। उसके बाद दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नातक किया, स्नातकोत्तर मेरठ विश्वविद्यालय से किया।
पत्रकारिता में आने का कोई बहुत बड़ा प्लान नहीं था। शुरुआत दैनिक जागरण से हुई। कानपुर और मेरठ में कुछ समय काम किया। फिर हिंदुस्तान ग्रुप की भर्ती निकली। लिखित परीक्षा हुई और मेरा चयन हिंदी और अंग्रेज़ी दोनों के लिए हो गया। अंग्रेज़ी के लिए मुझे Hindustan Times के पटना संस्करण में हिन्दुस्तान टाइम्स के कार्यकारी अध्यक्ष नरेश मोहन जी भेजना चाहते थे, उन्हें लगा कि मैं बिहार से संबंध रखता हूं। पर मैंने दिल्ली में रहकर हिंदुस्तान के साथ काम करना चुना।
मैंने 1986 में हिंदुस्तान में अपनी पारी शुरू की। फिर देखते-देखते करीब ढाई दशक वहीं बीत गए। 2010 तक मैं हिंदुस्तान में रहा और स्पेशल कॉरेस्पोंडेंट के तौर पर काम किया। इसी दौरान हिंदुस्तान टाइम्स समूह की इन-हाउस मैगज़ीन ‘Between Us’ का संपादन भी मेरे ज़िम्मे रहा। वहीं से रिपोर्टिंग, लेखन और संपादन-तीनों का लंबा सफर आगे बढ़ता गया।
सवाल- अपने इसी फील्ड को क्यों चुना? आप और भी बहुत कुछ कर सकते थे।
जवाब – देखिए पत्रकार बनने का कीड़ा मुझमें बचपन में ही लग चुका था। मेरे घर के पड़ोस में दो पत्रकार रहते थे। पी. शर्मा। उनका बेटा मेरा दोस्त भी था। वो आजकल आईआईटी, बॉम्बे में फीजिक्स पढ़ाता है। शर्मा जी के घर के बाहर की नेम प्लेट पर लिखा था, पी. शर्मा, दि स्टेट्समैन। मेरे घर में दि स्टेट्समैन भी आता था। उसमें मैं उनका नाम देखता था। यह चीज मुझे काफी फैसीनेट करती थी। और एक थीं अंजली देशपांडे जो कि मेन स्ट्रीम मैगज़ीन में काम करती थी। बहुत शानदार पत्रकार हैं अंजली देशपांडे। ये लोग मेरे शुरुआती प्रेरणा थे बचपन के। एक बात और थी कि अखबारों की सुगंध मुझे बहुत आकर्षित करती थी। साथ ही ये पेशा एक अलग आनंद देता है। घर में पिता जी के परम मित्र और आकाशवाणी के महान समाचार वाचक देवकीनंद पांडे जी, अनादि मिश्र जी और जयदेव त्रिवेदी जी लगातार आकर बैठकी करते थे। इसलिए खबरों का माहौल तो था ही।
सवाल -अखबार में लिखने का पहला सुखद अनुभव कौन सा था।
जवाब – शिवा! ये जीवन भी न बड़ा अजीब सा है। हम किसी से मिलते हैं तो यूंही नहीं मिलते उसके पीछे कोई वजह होती है। मैं पत्रकार तो बचपन में ही बन गया था।
मेरा स्कूल में एक दोस्त था, उसके पिता ज्योति प्रकाश जी गांधी जी के पुत्र और हिन्दुस्तान टाइम्स के एडिटर देवदास गांधी के ड्राइवर थे। उन्हें हिंदुस्तान टाइम्स हाउस में ही घर मिला हुआ था। मैं किसी काम से उस मित्र के घर गया। ये बात होगी 1979 की। हिंदुस्तान टाइम्स की बिल्डिंग देखकर मुझे लगा कि काश यहां कोई नौकरी मिल जाए। फिर मैंने अपने दोस्त को हिन्दुस्तान टाइम्स के स्कूल बुलेटिन कॉलम के लिए एक छोटा सा आर्टिकल दिया। उसने मेरे लेख को उस कॉलम को देखने वाले पत्रकार चांद जोशी को दे दिया। चांद जोशी अंग्रेजी के शानदार पत्रकार थे। बहुत नाम था उनका। संडे आया तो मैने देखा सबसे पहले मेरा ही आर्टिकल छापा हुआ है। उस दिन मैं अपने मुहल्ले का हीरो था। आप यकीन करना मैं उसी दिन पत्रकार बन गया था फिर कुछ दिनों बाद 30 रूपये का मनीऑर्डर आया। उस दिन मैने डिसाइड कर लिया। गुरु! अब तो हम यही बनेंगे। बाद में चांद जोशी मेरे परम मित्र बने।
सवाल – चांद जोशी पर इतना फोकस क्यों है आपका? कुछ बताइए उनके बारे में ।
जवाब – अरे! चांद जोशी भारत के एक अत्यंत सम्मानित और प्रखर खोजी पत्रकार (Investigative Journalist) तथा लेखक थे। वह चटगांव विद्रोह की महान स्वतंत्रता सेनानी कल्पना दत्ता और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI) के पहले महासचिव पूरन चंद जोशी (पी.सी. जोशी) के सुपुत्र थे।
सवाल – इस फील्ड में कुछ कड़वे अनुभव हुए? कभी ऐसा लगा कि यह जगह छोड़ दूँ।
जवाब – नेवर एवर। एक समय ऐसा था जब मेरी नौकरी छूट गई थी। मुझे रियल स्टेट से संबंधित कई अच्छे पैसे की नौकरी मिल रही थी, मगर मैंने अपनी पत्रकारिता की पैशन की वजह से वह नौकरी नहीं की।
सवाल – क्या इस पेशे ने आपके जीवन के ख्वाब पूरे किए?
जवाब – हाँ बिल्कुल! जैसे, मैने घर चाहा था। घर मिला। पैसा जितनी जरूरत थी मिला। मैं इस पेशे में पैसे वाला बनने नहीं आया था। ये पेशा मुझे एक अलग जॉय देता है। मैं अगले जन्म भी इसी पेशे में रहना चाहूंगा। अगर आपको इसमें जॉय नहीं मिलता तो फिर आपको किसी अन्य पेशे से जुड़ना चाहिए।
सवाल – क्या आपको कभी ऐसा नहीं लगा कि आपको इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से जुड़ कर पत्रकारिता करुँ। कभी ऐसा नहीं लगा कि टीवी एंकर बनूं। चकाचौंध भरी दुनिया का हिस्सा बनने का मन नहीं हुआ?
जवाब – चकाचौंध क्या होता है? सात प्रधानमंत्री और राष्ट्रपतियों के इंटरव्यू किए है मैंने। हॉलीवुड स्टार बेन किंग्सले और रोजर मूर के इंटरव्यू किये। आप मुझे बता दीजिए, कितने लोगों ने इतनी बड़ी बड़ी हस्तियों के इंटरव्यू किये होंगे। ये सब पत्रकारिता की वजह से ही मुमकिन हुआ। मैने जॉन मेजर, आई के गुजराल, चंद्रशेखर, अटल बिहारी वाजपेयी समेत कई दिग्गजों के इंटरव्यू किए। मैं देश का पहला पत्रकार होऊंगा जिसने पेप्सीको कंपनी की सीइओ रही इंद्रा नूई का इंटरव्यू किया। पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान मेरे मित्र ही बन गए थे। जब वो 2004 में दिल्ली आए थे तो मैं उनको नमाज़ पढ़वाने जामा मस्जिद लेकर गया था।
सवाल – आपने प्रधानमंत्री से लेकर हॉलीवुड अभिनेता तक का इंटरव्यू किया, इनमें से सबसे ज्यादा प्रभावित किसने किया आपको?
जवाब – प्रधानमंत्री आई के गुजराल जी का 2006 में इंटरव्यू कर रहा था, तो वे अचानक से बताने लगा कि वे शहीद भगत सिंह की अंत्येष्टि में अपने पिता के साथ शामिल हुए थे। उन्होंने बताया था कि जब वे रावी के तट पर पहुंचे तब तक भगत सिंह, राज गुरू और सुखदेव की चितांएं ठंड़ी पड़ने लगी थीं। वे जब उस मंजर को बयां कर रहे थे तब हम दोनों की आंखें नम हो रही थीं। जरा सोचिए कि आपके सामने कोई प्रधानमंत्री, पूर्व या वर्तमान, लगभग रो रहा हो।
दूसरा चंद्रशेखर जी के व्यक्तित्व ने किया। उनका व्यक्तित्व बहुत डायनेमिक था। मैं इस क्रम में कथक गुरू बिरजू महाराज के इंटरव्यू की भी चर्चा करूंगा। उनका इंटरव्यू करते हुए मुझे लगा रहा था कि कितना विराट व्यक्तित्व है उनका। महान एथलीट कॉर्ल लुईस का 1989 में जवाहरलाल नेहरू स्टेडियम में इंटरव्यू किया था। वो भी यादगार रहा था।
सवाल: अच्छा बेन किंग्सले से मुलाकात का मौका कैसे मिला?
जवाब: यह 1991 की बात है। जून या जुलाई का महीना था। भीषण गर्मी थी। मैं हिंदुस्तान टाइम्स के दफ्तर में गेट के पास खड़ा था। तभी पीछे से आवाज़ आई, “विवेक!” मुड़कर देखा तो अनिल सहारी थे। वे अंग्रेज़ी के कवि, फिल्म पत्रकार और बेहद विद्वान व्यक्ति थे। विद्यार्थी जीवन से मैं उन्हें जानता था।
उन्होंने कहा, “जल्दी गाड़ी में बैठो।” मैं बैठ गया। रास्ते में पूछा, “सर, कहाँ जा रहे हैं? मेरी ड्यूटी शुरू होने वाली है।” उन्होंने बस इतना कहा, “एक बहुत महत्वपूर्ण व्यक्ति से मिलने।”
जब हम मेरिडियन होटल पहुँचे तो मैंने फिर पूछा, “अब तो बता दीजिए, किससे मिलने जा रहे हैं?”
उन्होंने मुस्कराते हुए कहा, “बेन किंग्सले।”
यह सुनते ही मैं घबरा गया। मैंने कहा, “सर, मुझे मत ले जाइए। बेन किंग्सले का इंटरव्यू करना कोई बच्चों का खेल नहीं है।”
अनिल सहारी ने हँसते हुए कहा, “पागल मत बनो। यह लाइफटाइम अपॉर्च्युनिटी है। ऐसे मौके बार-बार नहीं मिलते।”
सवाल: पहली मुलाकात का दृश्य कैसा था?
जवाब: हम होटल के एक बड़े कमरे में पहुँचे। कमरे के एक कोने में बड़े आराम से कुर्ता-पायजामा पहने बेन किंग्सले बैठे थे। उन्हें देखकर बिल्कुल नहीं लगा कि सामने ऑस्कर विजेता अभिनेता बैठे हैं। हमने अभिवादन किया और बातचीत शुरू हो गई। चर्चा स्वाभाविक रूप से ‘गांधी’ फिल्म पर आ गई।
सवाल: बातचीत के दौरान ऐसा क्या हुआ, जिससे बेन किंग्सले प्रभावित हुए?
जवाब: मैंने उनसे कहा कि फिल्म गांधी की नींव तो 1946 में ही पड़ गई थी।
उन्होंने तुरंत पूछा, “How?”
मैंने बताया कि निर्देशक रिचर्ड एटनबरो को इस फिल्म की प्रेरणा अमेरिकी लेखक लुई फिशर की गांधी पर लिखी कालजयी जीवनी The Life of Mahatma Gandhi से मिली थी। गांधी जी पर हजारों जीवनियाँ लिखी गई हैं, लेकिन यह आज भी सबसे प्रामाणिक जीवनियों में मानी जाती है। मैंने यह भी बताया कि इसी वजह से फिल्म की शुरुआत गांधी जी की अंत्येष्टि से होती है, क्योंकि फिशर की लिखी जीवनी की शुरूआत में गांधी हत्याकांड और अंतिम संस्कार ही हैं।
सवाल: आपने लुई फिशर के बारे में क्या बताया?
जवाब: मैंने उन्हें बताया कि 1946 में लुई फिशर अमेरिका से भारत आए थे। वे गांधी जी से मंदिर मार्ग की हरिजन बस्ती में मिलते थे। उन्होंने गांधी जी से लगातार संवाद किया, अनेक प्रश्न पूछे और उसी आधार पर उनकी जीवनी लिखी। वही जीवनी बाद में रिचर्ड एटनबरो के लिए प्रेरणा बनी और ‘गांधी’ जैसी कालजयी फिल्म का जन्म हुआ।
सवाल: आपकी बात सुनकर बेन किंग्सले की क्या प्रतिक्रिया थी?
जवाब: वे कुछ क्षण चुप रहे। फिर आश्चर्य से बोले, “Oh God! I never knew .”
बातचीत समाप्त होने लगी तो उन्होंने मेरी ओर देखकर कहा, “Vivek, you must write a book on Gandhi.” मेरे लिए यह सिर्फ एक तारीफ़ नहीं थी, बल्कि विश्वस्तरीय अभिनेता की ओर से मिला ऐसा सम्मान था, जिसे मैं आज भी अपनी पत्रकारिता की सबसे बड़ी उपलब्धियों में गिनता हूँ। उनके कहने के काफी बाद मैंने Gandhi’s Delhi किताब लिखी।
सवाल: आपने कई किताबें लिखी हैं। उनसे से एक का नाम है ‘दिल्ली, पहला प्यार : कनॉट प्लेस’। इस नाम के पीछे कोई वजह?
जवाब: कनॉट प्लेस मेरी ज़िंदगी का एक अहम हिस्सा रहा है। मैंने अपनी लगभग पूरी ज़िंदगी वहीं बिताई है। नौकरी भी वहीं की। युवावस्था भी वहीं बीती और आज भी हर दूसरे-तीसरे दिन वहाँ जाना हो ही जाता है। कनॉट प्लेस की शायद ही कोई ऐसी जगह हो, जिससे मैं वाकिफ़ न हूँ। वहाँ के दुकानदारों से लेकर पुराने लोगों तक, बहुत-से लोग मेरे दोस्त हैं। उसकी पूरी कहानी मेरी आँखों के सामने गुज़री है।
इसी लगाव ने मुझे उस पर किताब लिखने के लिए प्रेरित किया। जब किताब प्रकाशित हुई तो लोगों ने उसे बहुत पसंद किया। बिहार, मध्य प्रदेश, दिल्ली और देश के कई हिस्सों से पाठकों के फोन आए। बहुत-से नए दोस्त भी उसी किताब की वजह से बने। मैंने किताब का नाम ‘दिल्ली, पहला प्यार : कनॉट प्लेस’ इसलिए भी रखा, क्योंकि मेरे लिए कनॉट प्लेस दिल्ली का सबसे बड़ा प्रतीक है। यह ऐसी जगह है, जहाँ पहुँचते ही मन का बोझ हल्का हो जाता है। चाहे आपका मूड कितना भी ख़राब क्यों न हो, कनॉट प्लेस पहुँचते ही एक सकारात्मक ऊर्जा महसूस होती है। मुझे हमेशा लगता है कि यह सचमुच मेरा पहला प्यार है।
अगर मुझसे पूछा जाए कि दिल्ली की सबसे अच्छी जगह कौन-सी है? तो मैं बिना किसी हिचक के कनॉट प्लेस का नाम लूँगा। वजह सिर्फ़ उसकी खूबसूरती नहीं है, बल्कि यह है कि रोज़ लाखों लोग वहाँ रोज़गार के लिए आते हैं। सुबह घर से निकलते हैं, काम करते हैं और शाम को अपने परिवार के पास लौटते हैं। जो जगह लाखों लोगों की रोज़ी-रोटी का ज़रिया बने, उससे बेहतर जगह भला और क्या हो सकती है? मेरी यह किताब कनॉट प्लेस के डिजाइनर रोबर्ट टोर रसेल को समर्पित है। उन्होंने ही वेस्टर्न कोर्ट, ईस्टर्न कोर्ट, तीन मूर्ति, लुटियंस दिल्ली के बहुत सारे सरकी बंगलों और सफदरजंग एयरपोर्ट को भी डिजाइन किया था।
इसके करीब संसद मार्ग पर देश के कई बड़े बैंकों के उत्तर भारत के मुख्यालय हैं। एक समय पूरा मीडिया उद्योग भी वहीं केंद्रित था। आज भी वहाँ छोटे-बड़े मिलाकर हज़ारों दफ़्तर हैं। हर दिन लाखों लोग वहाँ काम करने पहुँचते हैं। मेरे लिए रोज़गार देने वाली जगह किसी मंदिर से कम नहीं होती। जब किसी की जेब में मेहनत की कमाई आती है, उससे बड़ी खुशी कोई नहीं होती।
सवाल – मीडिया जगत के बारे में आपका क्या सोचना है
जवाब – मीडिया बहुत संवेदनशील और खूबसूरत लोगों की जगह है, ये अच्छे लोगों की दुनिया है। आज तक मुझे एक भी आदमी नहीं मिला जो खराब हो। गरीब गुरबाके लिए कौन लिखता है बताइए। दूसरों के बारे में कौन लिखता है आखिर! क्या समाज हमारी कभी फिक्र करता है।
सवाल – तो क्या आज की मीडिया के बारे में भी आप यही कहेंगे?
जवाब – देखिए पत्रकार खराब नहीं है, व्यवस्था खराब है। और टीवी चैनलों का मामला गड़बड़ हो गया है जिसके लिए मैं उनके मालिकों को दोष देता हूँ, एंकर्स को नहीं।
सवाल: क्या आपको लगता है कि इतना लिखने के बाद आप समाज के हृदय को कुछ बदल पाए हैं?
जवाब: मैं समाज बदलने के लिए नहीं आया हूँ। मेरी कोशिश सिर्फ इतनी रहती है कि जिन मुद्दों पर बात होना ज़रूरी है, उन पर मैं अपना हस्तक्षेप कर सकूँ। आज ही न्यूज़18 में मेरा एक ब्लॉग प्रकाशित हुआ है, जिसमें मैंने अभिजीत दीपके के बारे में लिखा है। इसकी वजह यह है कि वे दलित समाज से आते हैं। मुझे लगता है इसे सेलिब्रेट किया जाना चाहिए। मुझे तो याद नहीं आता कि हमारे यहां आरक्षण की मांग से हटकर किसी आंदोलन की सरपरस्ती किसी दलित ने की हो।
सवाल: क्या आप अभिजीत दीपके का समर्थन उनके मुद्दे की वजह नहीं बल्कि इसलिए कर रहे हैं कि वे दलित समाज से आते हैं?”
जवाब: मैं इसे एक सकारात्मक संकेत के रूप में देखता हूँ कि शहरी भारत का युवा अब जाति को पहले जितना महत्व नहीं देता। आज यदि कोई दलित युवा, खासकर जेन-ज़ी के बीच, किसी बड़े आंदोलन का नेतृत्व कर रहा है तो यह अपने आप में एक सकारात्मक बदलाव है। मैं उसी बदलाव का स्वागत करता हूँ, क्योंकि मैंने उस समाज की पीड़ा को बहुत करीब से देखा है। मैं वाल्मीकि समाज के बच्चों के साथ रहा हूँ और उनके अनुभवों को समझा है।
सवाल: आपने जाति के अनुभव को व्यक्तिगत रूप से कैसे महसूस किया?
जवाब: जब मैं उत्तर प्रदेश या बिहार जाता हूँ तो लोग मेरा नाम पूछते हैं। मैं कहता हूँ, “विवेक।” फिर वे पूछते हैं, “आगे बताइए।” जब मैं अपना उपनाम “शुक्ला” बताता हूँ तो कई लोग मेरे चरण स्पर्श करने लगते हैं। मैं उनसे कहता हूँ कि ऐसा मत कीजिए। मैं कोई महान व्यक्ति नहीं हूँ, बस एक साधारण इंसान हूँ। केवल इसलिए कि मेरा जन्म ब्राह्मण परिवार में हुआ है, मेरे चरण स्पर्श करने का कोई मतलब नहीं है।
सवाल: तो आपके अनुसार चरण स्पर्श किसके किए जाने चाहिए?
जवाब: कम-से-कम जाति के आधार पर तो बिल्कुल नहीं। अगर किसी के प्रति सम्मान है तो कीजिए, लेकिन जाति के कारण नहीं। मेरे घर में राखी के दिन जो महिला खाना बनाती हैं, मैं उन्हें अपनी बड़ी बहन मानता हूँ और उनके चरण स्पर्श करता हूँ। मुझे उनकी जाति तक नहीं पता, और न जानने की ज़रूरत है।
सवाल: आज रील्स और शॉर्ट वीडियो के दौर में क्या लोगों के पास लंबे लेख पढ़ने का समय बचा है?
जवाब: सच कहूँ तो मुझे भी 2000–2500 शब्दों के लंबे लेख पढ़ना मुश्किल लगता है। मेरा मानना है कि संपादकीय लेख लगभग 800–850 शब्दों के भीतर होने चाहिए। आज अधिकांश अखबार भी इसी दिशा में जा रहे हैं। हालांकि कुछ अंग्रेज़ी अखबारों, जैसे Hindustan Times, में अब भी 2000–2500 शब्दों के लेख प्रकाशित होते हैं, लेकिन सवाल यही है कि उन्हें पढ़ेगा कौन?
सवाल: क्या आपको लगता है कि प्रिंट मीडिया का अस्तित्व खतरे में है?
जवाब: नहीं, बिल्कुल नहीं। प्रिंट मीडिया आज भी बहुत मज़बूत है। यह सही है कि लोगों के पास समय कम है और वे फेसबुक, इंस्टाग्राम या दूसरे डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर जल्दी जानकारी पा लेते हैं। अखबारों का सर्कुलेशन कम हुआ हो सकता है, लेकिन आज भी बड़ी संख्या में लोग अखबार पढ़ते हैं। इसलिए प्रिंट मीडिया का महत्व खत्म नहीं हुआ है।
सवाल: निष्पक्ष पत्रकारिता के बारे में आपका क्या ख्याल है? आजकल पत्रकारों पर ‘गोदी मीडिया’ होने के आरोप लगते हैं। आप इसे कैसे देखते हैं?
जवाब: यह एक गंभीर चिंता का विषय है। कुछ पत्रकार लगातार सरकार की नीतियों की प्रशंसा करते दिखाई देते हैं, तो कुछ हमेशा विरोध में खड़े नजर आते हैं। पत्रकारिता का काम किसी राजनीतिक पक्ष का प्रवक्ता बनना नहीं, बल्कि निष्पक्ष होकर तथ्यों को सामने रखना है। अगर पत्रकार अपनी स्वतंत्रता खो देता है, तो पत्रकारिता की विश्वसनीयता भी प्रभावित होती है।
सवाल: यह भी कहा जाता है कि कुछ पत्रकारों को राजनीतिक दलों से आर्थिक लाभ मिलता है। इसमें कितनी सच्चाई है?
जवाब: मेरे पास इसका कोई ठोस या प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं है। इसलिए मैं ऐसा दावा नहीं कर सकता। हालांकि, ऐसी बातें सार्वजनिक विमर्श में अक्सर कही जाती हैं। जब तक प्रमाण न हों, किसी पर आरोप लगाना उचित नहीं है।
सवाल: मीडिया में डेस्क और रिपोर्टिंग के बीच जो अंतर दिखाई देता है, उसकी सबसे बड़ी वजह क्या है? क्या डेस्क को पर्याप्त सम्मान मिलता है?
जवाब: मेरी राय में डेस्क और रिपोर्टिंग एक-दूसरे के पूरक हैं। दोनों के बिना पत्रकारिता अधूरी है। रिपोर्टर खबर लेकर आता है, डेस्क उसे बेहतर ढंग से प्रस्तुत करती है। दुर्भाग्य से डेस्क के योगदान को अक्सर वह सम्मान और पहचान नहीं मिलती जिसकी वह हकदार है।
सवाल: डेस्क का योगदान वास्तव में कितना महत्वपूर्ण होता है?
जवाब: एक अच्छा डेस्क एडिटर सिर्फ भाषा नहीं सुधारता, बल्कि पूरी कॉपी में वैल्यू एडिशन करता है। बेहतर हेडलाइन, प्रस्तुति और संपादन किसी सामान्य खबर को भी प्रभावशाली बना सकते हैं। विदेशों की कई प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में रिपोर्टर के साथ-साथ एडिटर का नाम भी प्रकाशित किया जाता है। मुझे लगता है कि भारत में भी डेस्क को ऐसा ही श्रेय मिलना चाहिए।
सवाल: क्या आपके साथ कभी ऐसा अनुभव हुआ, जब डेस्क ने आपकी रिपोर्ट को और बेहतर बना दिया हो?
जवाब: हाँ, कई बार। एक बार मैंने शरणार्थियों पर एक लेख लिखा था टाइम्स ऑफ इंडिया में। जब वह प्रकाशित हुआ, तो संपादन और प्रस्तुति इतनी शानदार थी कि मुझे लगा जैसे लेख का स्तर ही बदल गया हो। उसे मशहूर पत्रकार प्रभा चंद्रन ने री-राइट किया था। उस अनुभव ने मुझे महसूस कराया कि एक सक्षम डेस्क एडिटर किसी भी लेख को नई ऊँचाई दे सकता है। मुझे हिन्दी अखबारों में खालिद बेग ( नवभारत टाइम्स), पलाश विश्वास ( जनसत्ता) गंगेश मिश्र ( हिन्दुस्तान और दैनिक जागरण), राजेश मित्तल ( नवभारत टाइम्स, हरीश यादव ( आउटलुक), भरत शर्मा ( बीबीसी), शशि झा वगैरह ने बहुत प्रभावित किया है।
सवाल: लेकिन कई पत्रकारों की शिकायत रहती है कि डेस्क उनकी खबर को बिगाड़ भी देता है।
जवाब: मैं अपवादों की बजाय अच्छे उदाहरणों की बात करना पसंद करता हूँ। मेरे अनुभव में कई ऐसे डेस्क एडिटर रहे हैं जिन्होंने खबरों को अधिक सटीक, प्रभावी और पठनीय बनाया। इसलिए डेस्क के महत्व को कभी कम नहीं आंकना चाहिए।
सवाल – अच्छा ऐसा कुछ बताइए जिससे लगा हो कि मीडिया अपनी आत्मा बेच रही हैं?
जवाब – देखिए, अंग्रेज़ी में कहते हैं ‘ब्लैक शिप’। कुछ लोग गड़बड़ करते हैं। मैंने अपने करियर में ऐसे लोगों को देखा है जो खुलकर कुछ नेताओं के लिए काम करते थे। कोई दूसरे नेता के घर पर सुबह से शाम तक मौजूद रहते हैं। मुझे याद है एक वरिष्ठ पत्रकार जगदीश टाइटलर के लिए काम करते थे। एक अखबार के चीफ रिपोर्टर राजेश पायलट की तरफ से दिवाली की मिठाई बांटते थे। पर ये गिनती के ही हैं।
सवाल – क्या आपको लगता है कि मैं कुछ ऐसा लिख रहा हूँ जिससे मैं कुछ दे पा रहा हूँ समाज को?
जवाब – पत्रकार का पहला दायित्व है कि वह तथ्यात्मक और ईमानदार खबर लिखे। अगर कहीं भ्रष्टाचार हुआ है या प्रशासन की लापरवाही है, तो उसे बिना किसी दबाव के सामने लाए। सच को सच की तरह रखना सबसे बड़ी जिम्मेदारी है हर पत्रकार की। मैंने भी इस बात का हमेशा ख्याल रखा। अगर कभी तथ्यों के स्तर पर चूक हो जाती है तो सारा दिन अपराधबोध में गुजर जाता है।
सवाल: आप बार-बार कहते हैं कि समाज में दलित उद्यमियों और नेतृत्व की संख्या बढ़नी चाहिए। लेकिन एक वर्ग का तर्क है कि अब आरक्षण काफी मिल चुका है, असली समस्या तो बेरोज़गारी है। ऐसे में आपकी प्राथमिकता क्या होनी चाहिए-आरक्षण, उद्यमिता या रोजगार?
जवाब: देखिए मैं चाहता हूँ कि समाज ज़्यादा समावेशी बने। मैं बिजनेस जर्नलिज्म से जुड़ा रहा हूँ और लंबे समय तक इस क्षेत्र को करीब से देखा है। आज भी बड़े उद्योगों में मुख्य रूप से सवर्ण समुदायों का दबदबा है। अगर भविष्य में कोई दलित बड़ा उद्योगपति बने, कोई दलित उद्योग संगठन का अध्यक्ष बने, तो मैं उसका स्वागत करूँगा। समाज तभी बदलेगा, जब हर वर्ग की बराबर भागीदारी होगी।
आरक्षण कोई नौकरी बाँटने की योजना नहीं है। उसका उद्देश्य ऐतिहासिक रूप से वंचित समुदायों को मुख्यधारा में लाना है।ऐसी व्यवस्थाएँ सिर्फ भारत में नहीं, दुनिया के कई देशों में हैं। अमेरिका में भी Affirmative Action जैसी व्यवस्था रही है।
सवाल: रिपोर्टिंग के दौरान किस घटना ने आपको प्रभावित किया। अपने अंदर आपने बदलाव महसूस किया हो.
जवाब: 1995 में पंजाब के तत्कालीन मुख्यमंत्री बेअंत सिंह की हत्या हुई थी। उस घटना को कवर करने मैं Sunday Observer के लिए पंजाब गया। उसी दौरान पंजाब में आतंकवाद से जुड़े कई पहलुओं को भी करीब से देखने और कवर करने का मौका मिला।
सवाल: पत्रकारिता शुरू करते समय की और आज की पत्रकारिता में सबसे बड़ा फर्क क्या देखते हैं?
जवाब: बहुत बड़ा फर्क आ गया है। हमारे समय में न ट्विटर था, न ब्रेकिंग न्यूज़ की होड़ थी। टीवी का भी इतना प्रभाव नहीं था। पूरी पत्रकारिता लगभग प्रिंट पर टिकी हुई थी। खबरों को समय मिलता था। आज दुनिया बहुत तेज़ हो गई है, पत्रकारिता भी उतनी ही तेज़ हो गई है। लेकिन इसके साथ एक चुनौती भी आई है। पत्रकारिता की विश्वसनीयता सवालों के घेरे में आई है। मुझे लगता है कि सरकारी पन बहुत बढ़ गया है। सरकार या किसी अधिकारी ने जो प्रेस रिलीज़ जारी कर दी, वही खबर बन जाती है। नई योजना, नई घोषणा, नई सेवा। ऐसी खबरें पहले भी होती थीं, लेकिन आज उनका अनुपात बहुत बढ़ गया है।
सवाल: पत्रकारिता में आपके रोल मॉडल कौन रहे हैं?
जवाब: रिपोर्टिंग की बात करूँ तो आलोक तोमर मेरे ऑल टाइम फेवरेट रिपोर्टर हैं। उनकी लिखी खबर को पढ़ने का सुख अप्रतिम होता है। टाइम्स ऑफ इंडिया के अविजीत घोष और मोहम्मद वजीउद्दीन भी लाजवाब हैं। आजतक के संजय शर्मा, नवभारत टाइम्स के राजेश चौधरी, हाल तक न्यूज 24 के लिए काम कर रहे प्रभाकर मिश्र, एनडीटीवी के आशीष भार्गव और पंजाब केसरी के सतेन्द्र त्रिपाठी भी सुप्रीम कोर्ट की रिपोर्टिंग से लेकर क्राइम की खबरों में जान डाल देते है।
प्रश्न: आजकल आप अंग्रेजी के किन-किन अखबारों के लिए लिख रहे हैं?
उत्तर: मैं आजकल अंग्रेजी के करीब आठ-दस अखबारों और न्यूज़ वेबसाइट्स के लिए मुख्य रूप से पाकिस्तान, बिज़नेस, इतिहास और दिल्ली से जुड़े मसलों पर लिख रहा हूँ। इनमें इंडियन एक्सप्रेस, दि पैट्रिआट, यूएनआई, टाइम्स ऑफ इंडिया, पंजाब टाइम्स, हैदराबाद हेडलाइंस वगैरह शामिल हैं। दि पैट्रिआट में मेरा पिछले करीब चार सालों से कॉलम चल रहा है। इसमें लिखकर इसलिए भी अच्छा लगता है क्योंकि इस पेपर से महान स्वाधीनता सेनानी अरुणा आसफ़ अली जी जुड़ी हुई थीं। मैंने उनका 1988 में प्रेस एरिया के पैट्रिआट के दफ़्तर में इंटरव्यू भी किया था हिन्दुस्तान टाइम्स के लिए। वह बहुत यादगार इंटरव्यू था। वह पहले बात करने के लिए तैयार नहीं थीं, पर बाद में मेरे बार-बार आग्रह करने पर मान गईं। फिर उनसे लंबी बातें हुईं 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन से लेकर उनके दिल्ली का मेयर बनने तक।
प्रश्न: आपने बहुत सारे हिन्दी और अंग्रेजी के संपादकों के साथ काम किया है। उनके बारे में कुछ बताइए?
उत्तर: मैंने आलोक मेहता जी जी के अंडर काम किया। बहुत मेहनती और हमेशा नए आइडियाज़ से लबरेज़ संपादक हैं वे। वे सबको मौका देते थे। हाँ, उनके कुछ फेवरेट भी रहते हैं। उनकी सक्रियता प्रभावित और प्रेरित करती है। नौकरी के बाद मैं कई अन्य संपादकों के साथ काम करता रहा। नवभारत टाइम्स के संपादक आशीष पांडे की एनर्जी लाजवाब हैं। तुरंत फैसले लेते हैं। मैं उन्हें स्टोरी आइडिया व्हाट्सऐप पर भेजता हूँ और अगले दस सेकंड में जवाब आ जाता है। वरिष्ठ साथियों का आदर करते हैं। हमें और क्या चाहिए। वे टेक-सेवी हैं। हिन्दुस्तान के प्रधान संपादक श्री शशि शेखर के साथ काम करने का एक ज़माने में मन था। पर वह हसरत पूरी नहीं हुई। दिग्गज हैं। उनसे कभी-कभी बात भी होती है। मुझे हिन्दुस्तान में छापते हैं। मैंने रोहित शरण से बहुत सीखा। वे मेरे दैनिक भास्कर के दिनों में एडिटर थे। उनके पास भी हमेशा आइडियाज़ रहते हैं। वे आजकल टाइम्स ऑफ इंडिया के मैनेजिंग एडिटर हैं। इकोनॉमिक टाइम्स के भी एडिटर रहे हैं। बिजनेस जर्नलिज्म के वे पहली पंक्ति के पत्रकार हैं। मैं यहाँ एक नाम सना शकील का भी लूँगा। दि पैट्रिआट की एडिटर हैं। उनमें हमेशा कुछ नया करने की जिजीविषा रहती है। युवा हैं और उनके साथ काम करने में बहुत मज़ा आता है। संडे ऑब्ज़र्वर के एडिटर रहे मोहम्मद सईद मलिक का नाम कैसे भूल सकता हूं। विनोद मेहता और चंदन मित्रा के बाद संडे ऑब्ज़र्वर के संपादक बने थे। शांत रहते हुए काम करने वाले संपादक रहे हैं मलिक साहब। उनसे जम्मू-कश्मीर के बारे में बहुत जाना। मलिक साहब ने मुझे अपने अखबार में बड़े पद और सैलरी पर नौकरी दी थी, जब मैं एक हिन्दी अखबार में काम करता था। मैंने उनकी सरपरस्ती में पंजाब में आतंकवाद के दौर को कवर किया। एक दौर में टाइम्स ऑफ इंडिया के सैटरडे टाइम्स में एडिटर थीं प्रभा चंद्रन। उन्होंने मुझसे दर्जनों स्टोरीज़ करवाईं। उन्होंने भी मुझे नौकरी दी। बेहतर सैलरी पर मैं वेज बोर्ड की नौकरी छोड़कर कॉन्ट्रैक्ट की नौकरी करने से डरता रहा। हालाँकि बाद में कॉन्ट्रैक्ट पर नौकरी भी की। वह हिन्दुस्तान टाइम्स में एचटी सिटी की भी एडिटर बनकर आईं। मुझे खूब छापती थीं। मेरे साथ उनकी गपशप होती रहती थी। इस वजह से मेरे बहुत सारे दोस्त खफ़ा रहने लगे थे।
सवाल: काम के अलावा घूमने-फिरने का भी शौक रहा है?
जवाब: बहुत रहा है। पत्रकारिता ने तो घुमाया ही, लेकिन निजी तौर पर भी काफी घूमने का मौका मिला। करीब 12-14 देशों की यात्रा कर चुका हूँ। मिस्र , केन्या, पाकिस्तान, सिंगापुर जैसे कई देशों में गया हूँ। देश के भीतर भी लगभग हर हिस्से को देखा है।
सवाल: आपने अपने अखबार में रहते हुए दूसरे अखबारों और पत्रिकाओं में लिखना कैसे शुरू किया?
जवाब: इसकी एक दिलचस्प कहानी है। मैं उस समय हिंदुस्तान में था। इसी दौरान मृणाल पांडे जी ने साप्ताहिक हिंदुस्तान के लिए मुझसे आरक्षण के मुद्दे पर एक लेख लिखवाया। मैंने उस पर काफी मेहनत की। कई लोगों से बात की। समाजवादी नेता मधु लिमये से भी लंबी चर्चा की। लेकिन किसी कारण से वह लेख साप्ताहिक हिंदुस्तान में नहीं छपा।
फिर वही लेख मैंने नवभारत टाइम्स में दिया। वहाँ एस. पी. सिंह ने उसे छापा। ये 1988 की बात है। उसके बाद फिर दूसरे अखबारों में लिखने का सिलसिला चल पड़ा। मैं हिंदुस्तान में काम करते हुए Hindustan Times में भी लिख रहा था, Mint में भी लिखता था। बाद में Pioneer, Sunday Observer, इंडियन एक्सप्रेस, Economic Times, दि हिन्दू और कई अन्य अखबारों से भी खूब लिखा।
सवाल: सर, एक्चुअली आपके पास तो अनुभवों का पूरा सागर है, और मैं सिर्फ गागर लेकर आई हूँ। कितना भी पूछ लूँ, लगता है कुछ न कुछ छूट ही जाएगा।
जवाब: ऐसा बात नहीं है। मैं अभी सीख ही रहा हूं। आपका आभार।
धन्यवाद, आपने अपना इतना कीमती समय दिया। भड़ास4मीडिया डॉट कॉम से बात करने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद!

विवेक शुक्ला जी से +91 98181 55246 या [email protected] के ज़रिए संपर्क कर सकते हैं।


