संजय कुमार सिंह
लोकसभा में परीक्षा सुधार से जुड़े संशोधन विधेयक पर चर्चा में कल कांग्रेस की तरफ से गौरव गोगोई और प्रियंका गांधी ने अपनी बात रखी। आज अमर उजाला की लीड का शीर्षक है, पेपर लीक पर तकरार : लोकसभा में परीक्षा सुधार से जुड़े संशोधन विधेयक पर चर्चा। गौरव गोगोई ने पूछा 46 में 44 जमानत पर कैसे तो जितेंद्र सिंह ने कहा, यूपीए राज में भी परचे लीक हुए। आप समझ सकते हैं कि भाजपा का बचाव कौन लोग कैसे तर्कों से कर रहे हैं। यहां मैं उसकी बात नहीं करता हूं। यहाँ मुझे बताना है कि अमर उजाला के लिए यह लीड है। इसके साथ एक छोटी सी खबर है, लोकसभा में शिक्षा मंत्री पर प्रियंका (गांधी) की टिप्पणी पर हंगामा। खबर इस प्रकार है, चर्चा के दौरान कांग्रेस सांसद प्रियंका गांधी ने पेपर लीक को युवाओं के भविष्य व सपने की चोरी बताया। उन्होंने कहा, युवाओं की उम्मीदें टूटीं तो सबसे बड़ी हार देश की होगी। इसलिए प्रधानमंत्री कैमरे का नहीं दिल का एंगल बदलें। प्रियंका ने नए शिक्षा मंत्री प्रह्लाद जोशी को लेकर एक टिप्पणी की, जिस पर भारी हंगामा हुआ। प्रियंका की टिप्पणी कार्यवाही से हटा दी गई। हालांकि, सदन के बाहर राहुल गांधी ने जोशी पर बिलकिस बानो दुष्कर्म केस के आरोपियों को संरक्षण देने का आरोप लगाया। दुनिया जानती है कि ये आरोप सही है, खबरें हैं, वीडियो है और मामला जमाने से सार्वजनिक है। फिर भी भाजपा को इसपर एतराज था अमर उजाला ने संतुलित पत्रकारिता करते हुए प्रह्लाद जोशी का भी पक्ष छापा है। शीर्षक है, जोशी बोले-प्रमाण दें प्रियंका। कायदे से इसपर संपादकीय लिखा जाना चाहिए था, कितने प्रमाण चाहिए जोशी जी? पर ऐसी पत्रकारिता संभव होती तो मैं यह सब थोड़े लिख रहा होता। खबर के अनुसार, प्रियंका के आरोपों पर केंद्रीय मंत्री जोशी ने इसका प्रमाण देने की मांग की। प्रियंका ने कहा कि वह सदन को तथ्य बताएंगी। इस बीच, भाजपा ने कहा है कि प्रियंका और राहुल की टिप्पणी तथ्यहीन है। शिक्षा मंत्री ने मामले के गुण-दोष पर नहीं, बल्कि कानूनी प्रक्रिया पर टिप्पणी की थी। देश को गुमराह करने की कोशिश कांग्रेस की राजनीति का हिस्सा बन गई है। स्पष्ट तौर पर भाजपा और प्रहलाद जोशी झूठ (असंसदीय है इसलिए संसद वाले असत्य पढ़ें) बोल रहे हैं। पर मेरा मुद्दा वह नहीं है।
मैं यह देखकर चकित हूं कि प्रियंका गांधी ने जो कहा वह नहीं छपा है। कार्यवाही से कब हटाया गया पता नहीं लेकिन सोशल मीडिया पर तो है ही, इसलिए बताया जाना चाहिए था कि उन्होंने क्या कहा। नवोदय टाइम्स इस मामले में (या भाजपा की सेवा में) एक कदम आगे निकल गया है, लीड का शीर्षक है, प्रियंका के बयान पर हंगामा। नवोदय टाइम्स में भी प्रियंका गांधी की टिप्पणी नहीं है लेकिन खबर कहती है, संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने कहा कि प्रियंका गांधी ने असंसदीय भाषा का इस्तेमाल किया और उसे सदन की कार्यवाही से हटाया जाना चाहिए। हंगामे के बीच लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने सदस्यों से सदन की गरिमा बनाए रखने और तथ्यों के आधार पर ही अपनी बात रखने का आग्रह किया। जोशी ने प्रियंका के आरोपों का खंडन करते हुए कहा कि उन्हें अपने आरोपों को सत्यापित करना चाहिए। इसी दौरान भाजपा सांसद निशिकांत दुबे ने पूर्व प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू को लेकर प्रियंका गांधी की ओर से की गई टिप्पणी का भी मुद्दा उठाया। कांग्रेस महासचिव प्रियंका (गांधी) ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हालिया ‘इंस्टाग्राम’ वीडियो को लेकर लोकसभा में उन पर कटाक्ष करते हुए कहा कि यदि सरकार को ‘जेन जेड’ का भरोसा जीतना है तो उन्हें ‘कैमरे का एंगल’ नहीं, बल्कि ‘दिल का एंगल’ भी बदलना पड़ेगा। कहने की जरूरत नहीं है कि प्रियंका गांधी का आरोप नए बने मंत्री के खिलाफ साधारण नहीं था लेकिन अमर उजाला ने गौरव गोगोई के भाषण को लीड बनाया है क्योंकि उसे जितेन्द्र सिंह के आरोप को हवा देनी थी। इधर नवोदय टाइम्स (किरेन रिजिजू के बहाने) यह बता रहा है कि प्रियंका गांधी ने असंसदीय भाषा का इस्तेमाल किया।
यहां यह दिलचस्प है कि झूठ असंसदीय है और असत्य नहीं। ऐसे में यह भाषा से संबंधित गंभीर मुद्दा है और इसपर उन लोगों को बात करनी चाहिए जो बच्चों की गालियों की भाषा से आहत हैं लेकिन वह भी नहीं होगा और उसपर खबर भी नहीं होगी। एक्स पर एएनआई की पोस्ट के अनुसार, लोकसभा में कांग्रेस सांसद प्रियंका गांधी वाड्रा कहती हैं, “प्रधानमंत्री ने एक नए शिक्षा मंत्री को नियुक्त किया है, एक ऐसे व्यक्ति को जिन्होंने एक गर्भवती महिला के साथ बलात्कार के दोषियों की रिहाई पर सहमति और खुशी भी जताई थी…।” जहां तक खबर की बात है, देशबन्धु की लीड का शीर्षक है – छात्रों पर पैलेट गन व एके 47 क्यों चलाई। उपशीर्षक है, 21 छात्र-छात्राओं की आत्महत्या पर शर्म करने की बजाए धर्मेन्द्र प्रधान का स्वागत कर रही है भाजपा। नए शिक्षा मंत्री प्रह्लाद जोशी के बारे में राहुल गांधी ने कहा है, ….यह जिम्मेदारी कैबिनेट के किसी और मंत्री को दी जा सकती है लेकिन शिक्षा मंत्री एक ऐसे व्यक्ति को बनाया गया, जिसने बलात्कार के आरोपियों (असल में अपराधियों या सजायाफ्ता दोषियों कहना चाहिए) का बचाव किया था। यह हैरान करने वाली बात है। पेपर लीक के खिलाफ विरोध प्रदर्शन में छात्रों के साथ-साथ छात्राएं भी शामिल थीं। अब आप समझ सकते हैं कि अखबार आपको कैसी सूचनाएं दे रहे हैं। अगर आप खबरों के लिए खरीद कर पढ़ते हैं तो जरूर सोचिए कि क्या खरीद और पढ़ रहे हैं। दैनिक भास्कर की लीड पाक अधिकृत कश्मीर की है वहां से 30 मौतों की खबर है। लेकिन कल संसद में जो हुआ वह भास्कर में पहले पन्ने पर नहीं है। अंदर छात्र आंदोलन की पूरी खबर लीड है। सरकार और दिल्ली पुलिस पर यह आरोप भी है कि प्रदर्शन के दौरान न सिर्फ पेलेट गन चलाए गए भाग लेने वालों की डिजिटल प्रोफाइलिंग भी की गई थी। कल इसपर दिल्ली पुलिस के हवाले से खबर थी, पर मुद्दा यह है कि दिल्ली पुलिस ने इन्हें अपराध करने से पहले क्यों नहीं रोका और अगर नहीं रोका तो क्या वे अपराधी थे और अगर नहीं थे, उनके खिलाफ कार्रवाई हो रही है तो आंदोलनकारियों के खिलाफ एफआईआर वापस लेने के समझौते और आदेश के मद्देनजर इन्हें भी राहत क्यों नहीं मिलनी चाहिए। पुराने आरोप पर अगर कार्रवाई होनी थी तो पहले होनी चाहिए थी, पुलिस ने जानते हुए अपराध करने के लिए क्यों छोड़ा और अगर अपराध किया ही नहीं है तो पुराना मामला जैसे चल रहा था वैसे ही क्यों न चले?
इस संबंध में टाइम्स ऑफ इंडिया की खबर का शीर्षक भी ऐसा ही लगता है। अंग्रेजी में छपा यह शीर्षक हिन्दी में मेरे हिसाब से यह होगा – सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस से कहा मौजूदा एफआईआर की जांच कीजिए, छात्रों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं। इसका अर्थ बहुत सीधा और सरल लगता है – मैं नहीं जानता आदेश में क्या लिखा है पर शीर्षक का हिन्दी अनुवाद एकदम स्पष्ट है। इस खबर का इंट्रो है, आपराधिक पृष्ठभूमि के लिए कोई सुरक्षा कवच नहीं। इसका मतलब यह नहीं हुआ कि अगर पहले से किसी के खिलाफ कोई एक एफआईआर है तो वह आपराधिक पृष्ठभूमि का हो गया। आपराधिक पृष्ठभूमि वाले पूर्व तड़ी पार होते हैं और उनका मामला साबित नहीं हुआ तो वे मंत्री बन सकते हैं फिर धरना प्रदर्शन में भाग क्यों नहीं ले सकते हैं। मैं यही कह रहा हूं कि जिनका मामला सही साबित हो चुका है वे फरार होंगे तो उन्हें राहत देने की मांग कौन कर रहा है और उमर खालिद को सजा नहीं हुई है पर वह जेल से अनुमति लेकर आया था तो क्या करना है – अदालत तय करे पर आया ही नहीं होगा तो मुद्दा ही नहीं है। इसलिए मुद्दा यह है कि डिजिटल प्रोफाइलिंग की गई और आज यह भी खबर हो सकती थी या है। इस मामले में सीजेपी का कहना सही है कि आदेश की पुलिसिया व्याख्या के अनुसार आदेश सरकार के भरोसे या आश्वासन के खिलाफ है। लेकिन इस शीर्षक से चीजें स्पष्ट हैं और वैसे ही हैं जैसे प्रियंका गांधी पर खराब भाषा के उपयोग का आरोप लगाना। आज की एक महत्वपूर्ण और बड़ी खबर यह भी है कि बच्चों पर पेलेट गन चलाने का आदेश किसने दिया था, इसका जवाब नहीं मिला है। कल खबर थी कि प्रधानमंत्री और गृहमंत्री दोनों संसद में नहीं थे। जवाब होना नहीं था, नहीं है लेकिन खबर तो यह होनी ही चाहिए थी कि इसका जवाब नहीं है। द टेलीग्राफ में पहले पन्ने पर आज सिंगल कॉलम की एक खबर है, “विपक्ष ने अमित शाह से पूछा : ताकत का इस्तेमाल करने का निर्देश किसने दिया?” द टेलीग्राफ की खबर में लिखा है कि दोनों लोग संसद में नहीं थे पर यह खबर आपको कहीं दिखी? दि एशियन एज में प्रियंका गांधी की दो कॉलम की फोटो के साथ तीन कॉलम की खबर है, बच्चों पर आंसू गैस और पेलेट गन फायर करने के आदेश किसने दिए : प्रियंका? इस खबर का उपशीर्षक है, प्रधानमंत्री पर निशाना साधा, पेपर लीक विरोध विधेयक को लेकर लोकसभा में हंगामा। इसकी तुलना नवोदय टाइम्स से कीजिए तो समझ में आएगा कि इस तरह के शीर्षक रोज बोलकर या दबाव डालकर नहीं लगवाए जा सकते हैं। नवोदय टाइम्स और दि एशियन एज के शीर्षक का अंतर विचारधारा का अंतर है, पत्रकारिता की सीख और समझ का अंतर है।
हिन्दुस्तान टाइम्स की लीड भी बिल्कुल स्पष्ट है। शीर्षक हिन्दी में कुछ इस तरह होगा – सुप्रीम कोर्ट ने छात्रों, पुलिसवालों पर हमले की जांच का रास्ता साफ किया। लीड के साथ छपी खबर का शीर्षक है, पुलिस डायरी की एंट्री पेलेट राउंड का इस्तेमाल दिखाती है। प्रवेश लामा की बाइलाइन वाली इस खबर में पर्याप्त विवरण है। दि इंडियन एक्सप्रेस की खबर भी कम नहीं है। शीर्षक हिन्दी में इस प्रकार होगा – याचिकाओं के जरिए पुलिस ‘बर्बरता’ को रेखांकित किया गया, सुप्रीम कोर्ट स्वतंत्र जांच के विकल्प पर सोच रहा है। इंडियन एक्सप्रेस में प्रियंका गांधी के भाषण का अंश है और शीर्षक है – प्रियंका गांधी ने प्रधानमंत्री से कहा, प्रधानमंत्री कैमरे का नहीं दिल का एंगल बदलें….। द हिन्दू की लीड का शीर्षक है – सुप्रीम कोर्ट ने कहा, छात्रों के विरोध प्रदर्शन के दौरान हिरासत में लिए गए सभी नाबालिगों को रिहा किया जाए। उपशीर्षक है, सर्वोच्च अदालत प्रोटेस्ट के दौरान पुलिस ज्यादतियों के आरोपों की स्वतंत्र जांच पर विचार कर रही है; राज्यों को जांच जारी रखने की इजाज़त दी गई है, लेकिन पुलिस को छात्रों के खिलाफ ‘जबरदस्ती की कार्रवाई’ करने से रोका गया है। इस मुख्य खबर के साथ भारत के मुख्य न्यायाधीश, सूर्यकांत का एक कोट है, “जिस किसी ने भी ज्यादती की है या बेगुनाह लोगों पर अत्याचार किया है, कानून उनसे निपटेगा। इसके लिए पूरी तरह से स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच होनी चाहिए… अगर किसी की जिम्मेदारी तय नहीं की जाती है, तो जांच का कोई मतलब नहीं है”।

मैं रोज चार हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल दस, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। एआई का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।


