सुभाष सिंह सुमन-
बांकीपुर ने जंगलराज2.0 को रिजेक्ट किया है। इस उपचुनाव को भाजपा ने प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाया हुआ था। यह गलत भी नहीं है। अच्छा ही है कि कोई भी चुनाव लड़ो, पूरे मन से लड़ो। खानापूर्ति के लिए नहीं। गलत है चुनाव जीत लेने की हवस में नियम-कायदे-मर्यादा सबकी बत्ती बना डालना। इस चुनाव में पूरा प्रशासन भाजपा के कार्यकर्ता की तरह काम कर रहा था।
पीके के कार्यकर्ताओं को अकारण उठा लेने के बीसियों मामले आये। एक टूटी सड़क और खुले में कूड़े के पहाड़ का मामला उठाने के कारण पीके के लोगों पर आचार संहिता के उल्लंघन का मामला बना दिया जाता है। फिर सरकारी विभाग रातों-रात पूरी सड़क बना देता है और कूड़ा उठाकर ले जाता है। चुनाव आयोग यहाँ पर आचार संहिता भूल जाता है। बांकीपुर शहरी इलाका है। बिहार का साउथ एक्स कह लीजिए। सामाजिक रूप से सक्रिय हर बिहारी का यार-रिश्तेदार मिल जायेगा उस क्षेत्र में। यह सामान्य बात है कि इलाज या किसी और काम से पटना गये लोग अपने यार-रिश्तेदार के घर ठहरते हैं। ऐसे भी मामले आये इस चुनाव में कि पीके के समर्थक माने जाने वाले घरों से उनके गेस्ट जबरदस्ती निकाल दिये गये। जंगलराज1.0 में पता नहीं ऐसा होता था या नहीं!
पर जो हुआ, सो हुआ। अब अपडेट यह है कि पीके ने बांकीपुर का किला ऑलमोस्ट फतह कर लिया है। इसकी आधिकारिक पुष्टि की औपचारिकता ही बच रही है अब। बांकीपुर को बिहार में भाजपा की सबसे मजबूत सीट माना जाता रहा है। नितिन नबीन के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने से यह सीट खाली हुई थी। भाजपा को यह अहंकार था कि वह किसी गदहे को भी टिकट दे देगी और जनता उसे जिताकर भेज देगी। बांकीपुर की जनता और पीके ने यह अहंकार भी तोड़ा है।
इस एक सीट के नतीजे के मायने व्यापक हैं। 4 दशकों से लालू-नीतीश के द्वंद्व में उलझे बिहार को विकल्प चाहिए। बिहार को लग रहा कि वह विकल्प भाजपा देगी। गाहे-बेगाहे भाजपा के पास मौका आया। भाजपा ने बिहार को ऐसा विकल्प दिया कि कुछ ही महीने में पूरा बिहार अघा गया। इस एक सीट के परिणाम से सरकार की सेहत पर सीधे कोई असर नहीं पड़ने वाला है, लेकिन बिहार की जनता को विधानसभा में एक बहुत मजबूत आवाज मिलने वाली है। मौजूदा विधानसभा का सत्ता पक्ष हो या विपक्ष, मुझे कोई ऐसा नाम नहीं दिखता, जो पीके के साथ किसी भी मुद्दे पर बहस में टिक सकेगा। बहस का सबसे अच्छा मंच विधानसभा है। पीके को वही मंच मिल गया है। मैं अब उस दिन के इंतजार में हूँ, जब विधानसभा में किसी मुद्दे पर पीके ब्रो और हाफिडिफिट ब्रो का आमना-सामना होगा।
इस नतीजे में सबक भी कई सारे हैं। भाजपा के लिए सबक है कि इलेक्शन के माथे पर सेलेक्शन न बिठाओ। जिस बिहार ने जंगलराज 1.0 को बर्दाश्त नहीं किया, वो जंगलराज 2.0 को भी किसी सूरत में बर्दाश्त नहीं करेगा। पहली बार सीएम बनाने का मौका मिला है, उसका उपयोग जनता को हर तरीके से लूटने में मत करो। रेवेन्यू बढ़ाने के लिए डाका डालना कानूनी नहीं बनाया जा सकता। बिहार जात-पात से निकलना चाहता है। इसमें मदद करो। जात-पात का नया जाल और जंजाल न बनाओ। जदयू की कहानी आगे गोल है, तो इसकी चर्चा ही बेकार। राजद को सबसे ज्यादा सबक लेने की जरूरत है।
अभी छात्रों के जिस आंदोलन ने पूरे देश में विपक्ष को नयी ऊर्जा दी, बिहार का मुख्य विपक्ष उस आंदोलन में कहीं दिखा ही नहीं। उससे पहले भी कई मौके आये। भरत तिवारी की सरकारी हत्या को बड़ा मुद्दा बना सकते थे। वहाँ जात का गणित सही नहीं बैठ रहा था, तो बंटी यादव हत्याकांड पर ही सक्रियता दिखा सकते थे। लेकिन जमीन पर नेता प्रतिपक्ष की अनुपस्थिति ही रही। राजद की यह निष्क्रियता और जदयू के सूर्यास्त से जो निर्वात बन रहा है, पीके के पास उसमें सबसे ज्यादा हिस्सा कब्जाने का मौका है। लेकिन इसके लिए पीके को भी एक सबक सीखने की जरूरत है। एरोगेंस की मात्रा कुछ कम कर दें, क्योंकि नापने के लिए आगे पूरा आसमान है।


