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38वें हफ्ते की टीआरपी : एनडीटीवी वाले इतनी कम टीआरपी पाते हैं, लेकिन ‘भक्तगण’ इससे ही क्यों घबराते हैं?

टीआरपी यानि बाजार का वह ‘यंत्र’ जिससे सबसे ज्यादा देखे जाने वाले चैनलों का पता चल पाता है.. यह ‘यंत्र’ हमेशा एनडीटीवी तो नौवें या दसवें नंबर पर बताता है. इस साल के 38वें हफ्ते की टीआरपी में भी एनडीटीवी 10वें नंबर पर लुढ़का पड़ा है. लेकिन ऐसा क्या है इस चैनल में, जिसके कारण दसवें नंबर पर होने के बावजूद इसकी चर्चा सोशल मीडिया पर हर ओर होती रहती है. खासकर इस चैनल के एंकर रवीश कुमार तो ट्विटर से लेकर फेसबुक तक पर छाए रहते हैं, दुश्मनों और दोस्तों के कारण.

टीआरपी यानि बाजार का वह ‘यंत्र’ जिससे सबसे ज्यादा देखे जाने वाले चैनलों का पता चल पाता है.. यह ‘यंत्र’ हमेशा एनडीटीवी तो नौवें या दसवें नंबर पर बताता है. इस साल के 38वें हफ्ते की टीआरपी में भी एनडीटीवी 10वें नंबर पर लुढ़का पड़ा है. लेकिन ऐसा क्या है इस चैनल में, जिसके कारण दसवें नंबर पर होने के बावजूद इसकी चर्चा सोशल मीडिया पर हर ओर होती रहती है. खासकर इस चैनल के एंकर रवीश कुमार तो ट्विटर से लेकर फेसबुक तक पर छाए रहते हैं, दुश्मनों और दोस्तों के कारण.

एनडीटीवी के चर्चित एंकर रवीश कुमार ने ‘भक्तगणों’ से खुद की जान का खतरा बताते हुए एक पत्र पीएम नरेंद्र मोदी को लिख भेजा है. यह पत्र असल में मीडिया के वर्तमान हालात पर सत्ता के दैत्याकार हमले से उपजा है. रवीश पर भक्तगण लगातार हमलावर रहते हैं. जान बूझ कर टारगेट करते हैं. अब तो जान से मारने की धमकियां तक खुलेआम दे रहे हैं. पर सत्ता सिस्टम मौन है. बल्कि पीएम धमकाने वालों के गिरोह के सरगनाओं को फालो करते हैं इसलिए कौन धमकाने वालों को पकड़े. रवीश जिस एनडीटीवी चैनल में काम करते हैं वह भले टीआरपी में नौवें या दसवें नंबर का चैनल हो, पर उसका कंटेंट असल में सत्ता की पोल-खोलने वाला और आलोचनात्मक होता है, जो सही मायने में हर एक मीडिया हाउस का होना चाहिए. लेकिन नए दौर में मीडिया हाउस सत्ता के पालतू हो चले हैं. यही कारण है सोशल मीडिया पर टॉप के एक से लेकर नौ नंबर तक के चैनल्स के एंकर्स की चर्चा ज्यादा नहीं होती. चर्चा के मामले में सब पर एनडीटीवी और रवीश कुमार ही भारी पड़ जाते हैं…

तो क्या, कहीं कुछ गड़बड़ है इस टीआरपी मशीन में…? जो बाजार के बहाने पत्रकारिता के कंटेंट पर प्रतिघात कर रही है… आलोचना करने वालों का मुंह बंद करने का प्रयास किया जा रहा है… लोकतंत्र में तार्किक विरोध, लोकतांत्रिक आलोचना और सही सवाल उठाए जाने की परिपाटी को अगर खत्म कर दिया गया तो फिर लोकतंत्र बचेगा किधर… ये सच है, जो सत्ता की पोल खोलता है, जो सत्ता पर सवाल उठाता है, उसे आजकल सत्ताधारी सबसे ज्यादा घेरते, पीटते, उत्पीड़ित करते हैं…

फिलहाल आइए देखें इस साल के 38वें हफ्ते की टीआरपी….

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