
अशोक पांडे-
1966 बैच के आईपीएस मोहन भैया खुर्राट और बेहद ईमानदार पुलिस अफसर थे और मध्य प्रदेश के डीजी होकर रिटायर हुए थे. आलम यह था कि जिन दिनों वे मध्य प्रदेश के सबसे बड़े पुलिस अफसर थे तब भी उनके घर पर फोन उठाने वाला कोई अर्दली नहीं था. अपने फोन खुद उठाते थे.
छोटे भाई को याद करते हुए मोहन भैया का गला रुंध जाया करता था. मोहन भैया यानी शिवनन्दन प्रसाद डंगवाल वीरेनदा के सबसे बड़े भाई थे – उनकी कविताओं में आने वाले उनके बचपन के नायक.
वीरेनदा के असमय संसार से चले जाने के तुरंत बाद का कोई दिन था. बरेली वाले घर में मोहन भैया के साथ थोड़ी सी तन्हाई मिली तो उन्होंने अचानक मेरा हाथ थाम लिया और फफक कर रोने लगे – “मुन्ना मेरा बड़ा बेटा था यार! मेरे सामने पैदा हुआ था. इतना सा था! घर के नीचे गोठ में पैदा हुआ था. कैसे तोतली बोली में गाने सुनाता था सबको … ”घर पर मुन्ना कहे जाने वाले वीरेन दा का नाम शुरू में सुमित्रानंदन प्रसाद डंगवाल रखा गया था जिसे मोहन भैया के इसरार पर बदला गया.
बाद में मोहन भैया ने अपने लाड़ले छोटे भाई को याद करते हुए एक असाधारण, सधा हुआ गद्य लिखा. भाई-बहनों के साथ बड़े होते हुए अपने घर के जटिल तनाव में एक आम मध्यवर्गीय भारतीय परिवार की विडम्बना और उससे उपजने वाले रचनाकर्म को उन्होंने यूं बयान किया था –
“हमारा परिवार परस्पर विरोधी प्रवृत्तियों का परिवार था जिसमें हर एक के अपने-अपने फ्रस्ट्रेशन थे. नतीजे में अनुराग और झगड़ा साथ साथ पलते रहे, भले ही यह हमारी शक्ति भी थी और कमजोरी भी. इसके मूक प्रत्यक्षदर्शी और इससे सबसे अधिक प्रभावित थे वीरेन की धैर्यमती पत्नी और बच्चे. निश्चय ही इस बात ने उसके लेखन को प्रभावित किया होगा. अपने परिवार के इर्द गिर्द से शुरू हुई उसकी कविता पूरे समाज के लिए बनती चली गयी, विशेषकर सर्वसाधारण और सर्वहारा वर्ग के लोगों के लिए, जिनकी पीड़ा उसकी सोच का हिस्सा बन गयी थी.”
जिस कवि की कविता के लिए उसका बड़ा भाई यह लिख सकता है उसे किसी आलोचक की क्या जरूरत. उसे किसी भी और इंसान की क्या जरूरत!
मोहन भैया ने आगे लिखा – “असल प्यार – उदार, समर्पित और निश्छल प्यार – उसके भीतर का स्थाई भाव था. हमारी शादी के बाद उसकी भाभी विदा के समय रो रही थी कि अकस्मात् उससे भी ज़्यादा फूट-फूट कर रोता मुन्ना उससे बोला. “भाभी रोओ मत, मैं तुम्हारा नौकर हूँ.”
आज वीरेन डंगवाल का जन्मदिन है. होते तो आज अपने अस्सीवें साल में प्रवेश कर रहे होते. वीरेनदा को याद करना उनके साथ जुड़े उस पूरे संसार को याद करना है जिसके एक छोर पर घर-परिवार-भाई-बहन-मित्र-परिचित-काम-रोजगार की लतर-पतर थी दूसरे पर एक निहायत एकांतप्रेमी, नई रचना के लिए छटपटाता, बेचैन लेकिन सचेत सर्जक.
आज तक हैरान होता हूँ वीरेनदा एक ही जीवन में इस सब को कैसे सलीके से निभा ले गए.


