प्रतिभा कटियार-
वीरेन डंगवाल जी के शहर में होने का सुख अलग ही है। जीवन कैसा होना चाहिए का जवाब है, वीरेन जी का जीवन। उनके परिवार और साहित्यिक परिवार ने मिलकर उनकी स्मृतियों को सँजोने का जो आत्मीय आयोजन किया उसकी ख़ुशबू बनी रहेगी। यह पूरा कार्यक्रम ही एक लंबी कविता सा था। कौन था वहाँ ऐसा जो गले-गले वीरेन जी के प्रति प्रेम से भरा न हो। कितने ही लोग बोलते बोलते रूँध गए, कितनों की कविताओं में वीरेन जी चले आए थे और कितनों के हंसी मज़ाक में। जब आँखें भर आ रही थीं, तब भी ऐसा लग रहा था जैसे वो आस पास हों और कह रहे हों, अरे मैं यहीं तो हूँ।
और सचमुच वो वहीं थे। सबकी स्मृतियों में। कार्यक्रम में जाकर एक और बात जो बहुत सुकून देने वाली लगी कि घर दफ्तर की भाग के बीच देश दुनिया की ख़बरों में खुद के लिए जो एक आइसोलेशन कचोटता है, वो यहाँ आकर टूटता है। यह एहसास ही कितना सुंदर है कि एक जैसा सोचने वाले इतने लोग हैं। और बड़ी उम्मीद है। बहुत से लोगों से पहली बार मिलना हुआ। प्रभात सर से बरसों बाद मिलना हुआ, प्रोफेसर गणेश देवी को सुनना तो कमाल का अनुभव था ही। नईम सरमद, मृत्युंजय, ज़ुबैर सैफ़ी, आशु मिश्रा को सुनना तो जैसे ट्रीट रहा।
संदीप, प्रेमशंकर, रानी, शिवांगी, पूजा, केतन, अनुपम सिंह, शालिनी से आत्मीय मुलाक़ात भली लगी। पंकज चतुर्वेदी जी को सामने से पहली बार सुना, राजेश सकलानी जी के साथ तो यात्रा की मुश्किल भी मुश्किल नहीं लगी। ज़हूर आलम जी की ग़ज़ल तो जैसे सबके मन की ही बात हो.


कार्यक्रम की शुरुआत वीरेन दा के स्मारक पर जाकर उन्हें याद करने और उनकी कविता के पाठ से हुई। उनकी कविता ‘हमारा समाज’ का अंकुर राय और मृत्युंजय ने शानदार पाठ किया। दिन का सुर वहीं लग गया था जो बीच में आई बारिश के साथ लगातार निखरता गया।
वीरेन जी का पूरा परिवार जिस आत्मीयता से सबसे मिल रहा था, ख़्याल रख रहा था, वह विरले ही देखने को मिलता है। रीता भाभी हों या वीरेन दा के पुत्र प्रफुल्ल या अन्य लोग, सबने भर भर के अपनाइयत से लबरेज किया। ऐसे कार्यक्रम सुकून होते हैं, उम्मीद होते हैं और ऊर्जा से भर देते हैं कि हम अकेले नहीं हैं इस दुनिया को बेहतर बनाने का ख़्वाब देखने वाले।
संजय जोशी जी नवारूण की कमान थामे हुए ही कार्यक्रम की पूरी संरचना को भी संभाल रहे थे। शांत तबीयत वाले मदन चमोली जी की पसंदीदा जगह नेपथ्य मालूम होती है लेकिन वहाँ रहते हुए ही वो सबके भीतर ऊर्जा का ईंधन जलाए रहते हैं।
अरे हाँ, यह बात तो सबसे जरूरी है कि कार्यक्रम में वीरेन दा के पौत्र 8 वर्ष के प्रवीर ने भी वीरेन दा की कविता सुनाई, ‘इतने भले मत बन जाना साथी…’ प्रवीर ने सुंदर ढंग से कविता सुनाई और इस बात की तसदीक़ की कि विरेन दा के विचारों की कमान इस नन्ही पीढ़ी ने भी कसकर थाम रखी है।
कार्यक्रम के आयोजकों का शुक्रिया, हम खयाल लोगों के मिलने का, साथ चलने का, साथ होने का यह एहसास कीमती है। मुलाकातों का सिलसिला बना रहे….




