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उत्तर प्रदेश

गाजियाबाद : किसी जज द्वारा पुलिस बुलाकर वकीलों पर लाठी चलवाना पहली बार सुना देखा गया है!

आशीष माहेश्वरी-

गाजियाबाद में वकीलों और जिला जज के बीच बहस हुई , किसी वकील के साथ जमीन बेचने को की गई धोखाधड़ी के आरोपियों की अग्रिम जमानत को खारिज करवाने की मांग को लेकर गाजियाबाद बार एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष नाहर सिंह यादव और दूसरे वकील कथित रूप से जिला जज से जल्द सुनवाई करने और सुनवाई न करने की स्थिति में मामले को किसी अपर जिला जज की अदालत में ट्रांसफर करने की मांग कर रहे थे.

कानून का थोड़ा जानकार होने के नाते बता दूं कि जिला अदालत में जिला जज की वही भूमिका होती है जो हाइकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में चीफ जस्टिस की होती है, सारे मामले जिला जज खुद न सुनकर उनको बाकी अपर जिला जजों के बीच काम का बंटवारा करते हैं, किसी अपर जिला जज द्वारा दिए गए फैसले का वही महत्व होता है जो एक जिला जज द्वारा दिए गए फैसले का होता है.

प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक वकीलों और जज के बीच कहासुनी में जिला जज और वकीलों के बीच बेहद गर्मागर्मी हो गई और इसके बाद जिला जज ने गुस्साए वकीलों पर पुलिस बुलाकर लाठीचार्ज करवा दिया.

बीते कुछ वक्त से मैं ऐसा महसूस कर रहा हूं कि जजों का व्यवहार वकीलों के प्रति काफी रुखा होने लगा है, वकीलों की एसोसिएशन मजबूत न हो तो वकीलों के संरक्षण के लिए कोई ज्यादा सुरक्षा कानूनों में नहीं है, आज भी कई मामलों में देखा गया है कि सड़क चलते वकील या थाने पहुंचे वकील से पुलिस द्वारा मारपीट की बात कई बार सामने आती है. वहीं, एक जज की तारीफ आंख करने से भी पुलिस कांपती है. इससे पहले पिछले साल वकीलों के कड़े विरोध को देखते हुए कानपुर नगर के जिला जज का भी तबादला हाइकोर्ट द्वारा किया गया था.

बीते कुछ सालों में देखा गया है कि हाइकोर्टस अपने अधीनस्थ जजों के संरक्षण करती देखी गई हैं लेकिन वकीलों को अपने सम्मान के लिए लंबी लड़ाइयां लड़नी पड़ी हैं.

कानून की भाषा में समझें तो वकील किसी जज का कोई अधीनस्थ नहीं बल्कि ऑफिसर ऑफ द कोर्ट होता है और एक न्याय व्यवस्था में बेंच (जज) और बार (वकील) के संयोजन से ही न्याय व्यवस्था की आधारशिला टिकी होती है. आज से 25 साल पहले देखें तो बार और बेंच एक दूसरे का साथ देती देखी गई हैं लेकिन आज न्यायपालिका में जो नया रिक्रूटमेंट हो रहा है उसमें बार के प्रति सम्मान न होने की शिकायतें अक्सर सुनने को मिलती हैं.

किसी जज द्वारा पुलिस बुलाकर वकीलों पर लाठीचार्ज करवाना शायद पहली बार सुना और देखा गया है लेकिन क्या पुलिस कोर्ट रूम के अंदर वकीलों से बर्बरता कर सकती है ये एक बड़ा सवाल है?

दूसरा सवाल क्या पुलिस बिना लाठीचार्ज किए ही कोई दूसरा रास्ता निकाल सकती थी और यदि लाठीचार्ज जिला जज के आदेश पर हुआ है तो क्या जिला जज को ऐसा आदेश देने के स्थान पर कोई दूसरा रास्ता निकालने के बारे में सोचना चाहिए था?

फिलहाल बार और बेंच दोनों ही झुकने को राजी नहीं हैं लेकिन ये घटना बेहद दुखद है.

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