मेरठ में दलित छात्रा की हत्या के विरोध में हुए प्रदर्शन के दौरान लाठीचार्ज और थप्पड़ मारने की घटना को लेकर विवादों में आए तत्कालीन SSP अविनाश पांडेय को योगी सरकार ने मेरठ से हटा दिया है। उन्हें पुलिस मुख्यालय से संबद्ध किया गया है। इसके साथ ही भारतीय किसान यूनियन (बीआर अंबेडकर) के राष्ट्रीय अध्यक्ष दिग्विजय भाटी से मारपीट के आरोपों को लेकर भी अविनाश पांडेय के खिलाफ जांच चल रही है। मामले को लेकर समाजवादी पार्टी ने भी कार्रवाई की मांग की है। सरकार की इस कार्रवाई को लेकर अब सवाल उठ रहे हैं कि क्या यूपी चुनाव से पहले योगी सरकार ने दलित समाज में नाराजगी को कम करने और बड़ा राजनीतिक संदेश देने की कोशिश की है।
कुछ लोग आईपीएस तो बन जाते हैं लेकिन उनमें फ़ील्ड पोस्टिंग वाला गुण नहीं होता. अविनाश पांडे ने मिलने गए दो दलित किसान नेताओं को जिस तरह मारा पीटा है वह अक्षम्य अपराध है. पढ़ सुनकर पूरा वाकया विचलित हूँ. ए डी जी साहब भास्कर जी ग़ैरतमंद आदमी हैं. उन्होंने संज्ञान लिया और खुलकर विरोध दर्ज कराया है. उम्मीद करता हूँ पांडे को दुबारा फील्ड पोस्टिंग न मिले.
-यशवंत सिंह, एडिटर, भड़ास4मीडिया
विनय मौर्या-
मैं आज तक नेतागिरी से लेकर पत्रकारिता के सफर में जितने आईपीएस अफसरों से मिला हूं, अमूमन उन्हें विनम्र, व्यवहारिक और सज्जन ही पाया है। न पद का गुरुर, न अधिकारों के दुरुपयोग की प्रवृत्ति,न फिजूल की एठनबाजी। मेरठ कप्तान अविनाश पांडेय की मारपीट वाली हरकत मेरे लिए अपवाद स्वरूप है। यह पुलिसिंग और सामाजिक व्यवहार से ज्यादा अत्यधिक आक्रोश, कुंठा या साइको कैटेगरी का मामला लगता है।
अमूमन आईपीएस अधिकारी मारपीट जैसी हरकतों पर नहीं उतरते। ऐसी हरकतें सिपाही, दरोगा और इंस्पेक्टर स्तर तक आकर सिमटती जाती हैं। नेताओं और अधिकारियों के बीच किसी मुद्दे पर गर्मागर्म बहस हो जाना धरना प्रदर्शन नारेबाजी कोई असामान्य बात नहीं है, मगर वह बहस भी आमतौर पर इतनी आगे नहीं जाती कि बात मारपीट तक पहुंच जाए।
पत्रकारिता में आने से पहले, करीब दो दशक पहले जब मैं एक राजनीतिक दल का पदाधिकारी था, तब बनारस में आईजी कमल सक्सेना हुआ करते थे,बेहद अच्छे नाम इसलिए याद है क्योंकि उनका व्यवहार मेरे प्रति स्नेह सहयोग से भरा था । किसी मुद्दे या पैरवी को लेकर अक्सर उनसे बहस हो जाती थी। वह मेरी बात गंभीरता से सुनते थे। एक बार किसी मुद्दे पर मैंने नाराजगी जाहिर करते हुए कहा कि अब मैं आपके पास नहीं आऊंगा तो वह हंसकर बोले झगड़ने के लिए ही आया करो, मगर आते रहा करो भाई।
ऐसे ही एसपी सिटी अनंत देव थे। मेरे बचपन के मित्र ****मिश्रा को थाने पर इस बात के लिए बिठा लिया गया था कि उसका छोटा भाई प्रेम प्रसंग में अपनी प्रेमिका को लेकर गायब हो गया था। उस पर दबाव बनाया जा रहा था कि वह लड़की को वापस बुलाए, जबकि मेरा मित्र अपने परिवार से अलग रहता था।
मैं एसपी सिटी के आवास पर पहुंचा। उन्होंने मुझे अपने ड्राइंग रूम में बुलाया। चाय-बिस्किट आया, पानी आया और थोड़ी देर बाद लोअर-टीशर्ट में वह खुद आए। मुझसे उनकी तब एक दो ही बार मुलाकात हुई थी। हाल खबर के बाद बोले क्या समस्या है भाई।
मैंने पूरा मामला बताया। उन्होंने थाने पर फोन किया, मामला समझा और फिर समझाने लगे भाई, उसे इसलिए बैठाया गया है कि उसका भाई वापस आ जाए। जानते हो लड़की वकील की है, उनको लगे कि पुलिस सक्रिय है।
मैंने कहा क्या भइया, हद है। उसे तीन दिन से बिठाए हैं। अगर उसका भाई वापस नहीं आया तो क्या उसे बिठाए रखेंगे।
मैं उठकर जाने लगा तो वह बोले पानी तो पी लो भाई। मैंने कहा मेरी बात तो सुनी नहीं आप, अब क्या पानी पीऊं। और उठकर बाहर आ गया।
कुछ घंटे बाद मेरे मित्र को छोड़ दिया गया। बाद में प्रेम प्रसंग में घर से गया उसका भाई और वह लड़की दोनों ने शादी कर ली। बाद में लड़की का परिवार भी राजी हो गया।
खैर, बात आईपीएस अधिकारियों के व्यवहार की है तो जरा सोचिए, वह दोनों लोग मुझसे कद, पद और उम्र में बड़े थे। उस समय मेरी उम्र 25 प्लस रही होगी और जिस पार्टी में मैं था, वह उस समय विपक्षी पार्टी थी। बावजूद इसके उन आईपीएस अधिकारियों के व्यवहार में न पद का अहंकार था, न सत्ता का रौब।
आज मैं 50 की उम्र के आसपास हो रहा हूं। आज भी कई आईपीएस अधिकारियों से मिलता हूं, बात करता हूं तो उनका सरल, सहज, शालीन और व्यवहारिक रवैया बेहद प्रभावित करता है।
मैंने महसूस किया है कि पुलिस विभाग भी किसी समंदर की तरह है। समंदर जितना गहरा होता है उतना शांत होता है और किनारे की ओर आते-आते पानी उथला होता जाता है और गर्जन बढ़ता जाता है। पुलिस विभाग में भी अक्सर ऐसा ही दिखाई देता है। बड़े पद पर बैठे अधिकारी अमूमन ज्यादा शांत, गंभीर और संयमित होते हैं और जैसे-जैसे नीचे आते हैं, वैसे-वैसे रौब, गर्मी और अधिकार प्रदर्शन बढ़ता जाता है।
हालांकि यह कोई नियम नहीं है। कुछ सिपाही, दरोगा और इंस्पेक्टर भी बेहद शिष्ट और सहयोगी होते हैं, मगर ऐसे उदाहरण कम ही देखने को मिलते हैं।
वैसे कुछ पुलिस वाले किसी दलीय निष्ठा के कारण भी दूसरे दल के नेताओं समर्थकों से ऐसे व्यवहार करते हैं, जैसे वह पुलिसकर्मी नहीं बल्कि उसी दल के कार्यकर्ता हों। कुछ तो साइको होते हैं और पद और पावर के दुरुपयोग से भी नहीं चूकते।
शासन को चाहिए कि हर तीन से छह महीने में पुलिसकर्मियों के स्वास्थ्य के साथ उनके मानसिक स्वास्थ्य की भी जांच अवश्य कराए। जो मानसिक या व्यवहारिक रूप से अनफिट मिले, उसका इलाज कराया जाए और जरूरत हो तो उसे प्राइम पोस्टिंग से हटाया जाए।
मैं इसलिए भी यह कह रहा हूँ क्योंकि 2025 में मुरादाबाद, में तैनात एक ट्रेनी आईपीएस अधिकारी ने खुद को भगवान कल्कि का अवतार बताकर दो चूहों को मारकर उनकी कथित तौर पर ‘बलि’ दी थी और एक सिपाही पर हवन करने का दबाव बनाया था। यानी वह मानसिक रूप से अनफिट थे।
पुलिस अधिकारी पद में बड़ा हो या छोटा उसे वर्दी के साथ अधिकार मिलता है और अधिकार के साथ जिम्मेदारी भी। वर्दी की ताकत का मतलब यह नहीं कि आदमी सामने वाले से बड़ा हो गया, बल्कि असली ताकत तो तब है जब आदमी के पास सामने वाले को दबाने का पूरा पावर अधिकार हो और फिर भी वह अपने व्यवहार में इंसान बना रहे,न कि क्रूर कठोर और अशिष्ट।


