सुशोभित-
नक्सलबाड़ी, पश्चिम बंगाल का एक गाँव है, जहाँ 1967 में दहक़ानों ने बग़ावत की थी। अटूट शोषण के खिलाफ़ विद्रोह का परचम उठाया था। मई का महीना था और बिगुल किसान अपने हक की ज़मीन पर कब्ज़ा लेने गया था। ज़मींदार के गुंडों ने उसे पीटा और उसके हल-बैल छीन लिए। बरसों से अन्याय झेल रहे किसानों का धैर्य जवाब दे गया। वे बाग़ी हो गए। जोतदारों से ज़मीनें छीनी जाने लगीं। देखते ही देखते आन्दोलन हिंसक हो गया, ख़ून बहने लगा। ख़ून इसलिए नहीं बहा, क्योंकि धरती के बेटे ख़ून के प्यासे थे। वो इसलिए बहा, क्योंकि बहते पसीने की समय रहते क़द्र नहीं की गई थी। नक्सलबाड़ी के नाम पर ये बाग़ी नक्सली कहलाने लगे और उनकी विचारधारा नक्सलवाद कहलाई।
नक्सलबाड़ी आन्दोलन के सूत्रधारों में से एक कानू सान्याल इस नक्सलवाद शब्द को पसंद नहीं करते थे। वे कहते थे कि रूस में जो क्रांति हुई, वो मार्क्सवादी-लेनिनवादी क्रांति थी, रूसवादी क्रांति नहीं थी। जगह के नाम पर विचारधारा का नाम नहीं होता, विचारों के प्रवर्तकों के नाम पर होता है। उस आन्दोलन के एक अन्य नेता चारु मजुमदार शायद इसे माओवाद कहना ज़्यादा पसंद करते। वे चीन में माओत्से तुंग के नेतृत्व में हुई जनवादी क्रांति के पैरोकार थे। उस समय सोवियत संघ और चीन के बीच वैचारिक-विघटन हो रहा था और भारतीय कम्युनिस्ट राजनीति पर भी इस विभेद का असर दिख रहा था।
मसलन, सीपीएम के लीडरान माओवादी तौर-तरीक़ों से सहमत नहीं थे और नक्सलबाड़ी विद्रोह के बाद उन्होंने चारु मजुमदार आदि को पार्टी से बर्ख़ास्त भी कर दिया था। तब उन्होंने अपनी एक स्वतंत्र पार्टी बनाई, जो आज सीपीआईएमएल कहलाती है। सीपीआईएमएल की ही स्टूडेंट विंग आईसा है, जो हाल के छात्र आन्दोलन में सक्रिय थी। शायद अब आप ‘नक्सली’ शब्द के ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्यों को समझ सकेंगे!
एक ज़िम्मेदार और संवेदनशील हुकूमत वह होती है, जो यह सवाल पूछती है कि हल उठाने वालों के हाथों में हथियार कैसे आए? वो उनके गुस्से को समझने की कोशिश करती है, उससे आहत होकर उनसे लड़ाई नहीं छेड़ बैठती। वो इन लोगों को बेगाना या पराया समझकर ‘आइसोलेट’ करने की बात नहीं कहती, उनसे संवाद करती है, उनकी समस्याएँ सुनती है और उनके समाधान खोजने के प्रयास करती है।
किन्तु इसके बजाय उलटे नक्सल शब्द को ही गाली बना दिया जाए तो? शिक़ायतें करने वालों और प्रतिरोध की आवाज़ उठाने वालों को कभी ‘अर्बन-नक्सल’ तो कभी ‘दिमाग़ी-नक्सल’ कहकर अवमानित किया जाए, सताया जाए तो? अगर सरकार उन्हें अपने ही देशवासी न समझकर उलटे उन्हें अपना दुश्मन समझने लगे और देशवासियों से अपील करने लगे कि इन लोगों के चेहरे पहचानें, इन्हें अपने से अलग कर दें- जैसे कि किसी को अलग-थलग कर देने से उनके सवालों के शुतुरमुर्ग़ भी रेत में अपना सिर छुपा लेंगे- तो?
नक्सल आन्दोलन में किसान शामिल थे- ग़रीब, देहाती, दहक़ान। कम्युनिस्ट विचारधारा के लोग उनका नेतृत्व कर रहे थे। कालान्तर में इस आन्दोलन में कई हिंसक और अपराधी तत्त्व भी जा मिले। लेकिन अपराधी तत्त्व तो हमारी संसदों-विधानसभाओं में भी हैं। वो कौन-सा प्रजातंत्र है जो इनमें से एक को सलाम ठोंकता है और दूसरों को जूतों तले कुचलने की अपीलें करता है? वो जनता की हुकूमत तो नहीं ही हो सकती- कुलीनों, सामन्तों, अमीरों, सरमायेदारों की हुकूमत हो तो हो। राजद्रोह को देशद्रोह क़रार दे देने वाला राजा ख़ुद को ही देश समझ बैठे तो बैठे, उसकी सरकार अवाम की सरकार तो नहीं ही हो सकती! और जम्हूरियत में जो सरकार अवाम की नहीं होती, वो किसी काम की नहीं होती!
नक्सलबाड़ी एक पता है, जो एक जगह पैबस्त होने के बावजूद समय-समय पर अपनी जगहें बदलता रहता है। क्योंकि शोषण के प्रतिरूप हमेशा एक सरीखे होते हैं। जब-तब उनकी शक्लें ज़ुल्म और ताक़त के तंत्र में उभर आती हैं।
ये शक्लें अवाम को क्या ख़ाक़ ‘आइसोलेट’ करेंगी, अवाम ही उन्हें एक दिन इतिहास के उस रद्दीख़ाने में फेंक आएगी, जहाँ उनकी असली जगह है!


