आलोक नंदन-
कॉकरोच ने बीजेपी के अंदर एक विकेट और गिराया है और वह है आईटी सेल संभालने वाले अमित मालवीय। जंतर-मंतर पर आंदोलन के दौरान डिजिटल मीडिया पर कॉकरोचों की ताबड़तोड़ बल्लेबाजी की वजह से अमित मालवीय पूरी तरह से धराशाई हो गए। कॉकरोचों ने बीजेपी के सूचना तंत्र को ही पूरी तरह से बिगाड़ दिया था। जिस लंपटई के साथ अमित मालवीय अब तक अपने विरोधियों पर हमले करते आ रहे थे, उससे कई गुना ज्यादा लंपटई के साथ कॉकरोचों ने उन्हें जवाब दिया, जैसे को तैसा वाले अंदाज में। एक बार में ही उन्हें आउटडेटेड करार दे दिया। स्पष्ट हो गया कि जेन जी से निपटने की क्षमता उनके अंदर नहीं है।
एक निश्चित बने-बनाए फार्मूले को अपनाकर वह कांग्रेसियों, वामपंथियों और उदारवादियों को धूल चटाने में माहिर थे, लेकिन कॉकरोचों की प्रवृत्ति और मनोवृत्ति को सही तरीके से समझकर नई रणनीति बनाने की क्षमता उनके अंदर बिल्कुल नहीं थी। या यूँ कहा जाए कि वह इस नई पौध को भाँप नहीं सके।
‘एक झूठ को सौ बार दोहराओ तो वह सच हो जाता है’ की हकीकत से पूरा देश वाकिफ हो चुका है। और रील्स की पल-पल बदलती दुनिया में यह फार्मूला चलने वाला भी नहीं है। प्रचार-प्रसार में समुदाय विशेष के खिलाफ नफरत, और आक्रोश वाली बौद्धिकता त्वरित एंटरटेनमेंट करने वाले रील्स के आगे बौना साबित हो रही थी। देशभक्ति और देशद्रोही जैसे दो बिंदुओं पर आधारित अमित मालवीय की प्रचार प्रणाली एंटरटेनमेंट पैदा नहीं कर सकी। जबकि विजुअल वर्ल्ड एंटरटेनमेंट की डिमांड करती है। कॉकरोच और उनके समर्थक यहीं पर बाजी मार ले गए और कंटेंट को लेकर अमित मालवीय के टूल्स और तकनीक को कम्युनिकेशन की दुनिया में अप्रासंगिक बना दिया।
धर्मेंद्र प्रधान के बाद अमित शाह की बलि लेना बीजेपी की मजबूरी हो गई। कॉकरोच के धक्के में धर्मेंद्र प्रधान के बाद अमित मालवीय भी ढह गए।
अमित शाह के प्रचार तंत्र से बीजेपी के सामान्य कार्यकर्ता और जमीनी नेता पूरी तरह से गायब हो चुके थे। उनके संघर्ष, उनके त्याग और उनके कार्यों की चर्चा न के बराबर होती थी। पूरा फोकस प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को एक अति शक्तिशाली अवतारी पुरुष बताने पर टिका हुआ था। उनकी विदेश यात्राओं को पूरी भव्यता के साथ पेश किया जाता था, अंतरराष्ट्रीय नेताओं के साथ उनके दोस्ताना संबंधों पर जोर दिया जाता था। कभी पीठ ठोकते तो कभी गले मिलते हुए उनके फोटो खूब वायरल किए जाते थे। और इसे वैश्विक स्तर पर मोदी की धमक के तौर पर प्रदर्शित किया जाता था।
अमित मालवीय के प्रचार तंत्र की टैगलाइन यही होती थी कि ऐसा पहली बार हो रहा है। देश की जनता लंबे समय से इसको वॉच कर रही थी। विरोधी जब भी इस पर सवाल उठाते थे तो उन्हें अमित मालवीय और उनकी टीम देश-विरोधी मानसिकता करार देते हुए खारिज करने में अपनी पूरी ताकत झोंकते थे।
कॉकरोच ने इस दिशा में भी व्यवस्थित तरीके से काम किया, हालांकि कांग्रेस पहले से ही इस मुद्दे को उठा रही थी। लेकिन कॉकरोच ने जब विदेशी नेताओं के साथ अंतरराष्ट्रीय रंगमंच पर मोदी की ठीक ही करती हुई क्लिपिंग वायरल करना शुरू किया तो इसका जबरदस्त प्रभाव पड़ा आम लोगों के दिलो-दिमाग पर। लोगों को फुल एंटरटेनमेंट मिल रहा था। लोग हँसते-हँसते लोटपोट हो रहे थे और अचेतन रूप से उनके मन में मोदी की एक नकारात्मक छवि बन रही थी। अमित मालवीय इस चीज को पकड़ने में नाकाम रहे।
कम्युनिकेशन का एक सामान्य थ्योरी है, अत्यधिक प्रचार भी भारी पड़ जाता है कभी-कभी। अमित मालवीय इस फार्मूले के मर्म को भी नहीं समझ सके। खैर, नितिन नवीन ने उन्हें अपनी टीम से बाहर किया है। उनकी जगह पर दीपक म्हास्के को लेकर आए हैं। अब मीडिया सेल के इस मोर्चे पर दीपक किस तरह बल्लेबाजी करते हैं और अपनी टीम को किस तरह से क्षेत्ररक्षण में लगाते हैं, यह देखना रोचक होगा।
इतना तय है कि अब हिंदू-मुस्लिम, पाकिस्तान जाओ, देशद्रोही हो, राष्ट्र-विरोधी हो जैसी थीम वाली माइंडसेट नहीं चलेगी। पंडित नेहरू को भी एक अश्लील इंसान के तौर पर पेश करने की मानसिकता अब कारगर साबित नहीं होगी। दीपक को कुछ इनोवेटिव करना होगा, क्योंकि यह याद और एआई का है, जेन जी का है, जेन अल्फा का है, और सबसे बड़ी बात महिलाओं का है, जो सामान्य तौर पर नफरत की भाषा पसंद नहीं करती हैं।


