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सियासत

भारतीय शेयर बाज़ार एक बड़ी गिरावट के लिए तैयार बैठा है!

एशिया के बाजारों में इंडोनेशिया से भी नीचे गिरकर भारत अब सबसे कम तरजीह वाला बाजार बन चुका है! क्या निफ्टी बीस हज़ार तक गोता लगाएगा?

Bar chart of Asian stock markets; India at -32 net overweight, the lowest, with Taiwan 55 and Japan 50 as the highest values.

सुभाष सिंह सुमन-

निफ्टी ठीक 2 साल पहले मने अगस्त 2024 में 25 हजार पर एवरेज किया था। अगस्त 2024 शुरू हुआ था 25,010.90 पर और समाप्त हुआ था 25,235.90 पर। बीच में 24,000 से नीचे गिरा था। उसके अगले महीने सितंबर 2024 में पहली बार 26,000 को पार कर नया शिखर बनाया था। उसके बाद से जो ग्रहण शुरू हुआ, अभी तक लगा हुआ है। बहुत कम लोग तब यह सोच पा रहे थे कि निफ्टी अगले 2 साल नहीं चलने वाला है। लेकिन आज की स्थिति बता रही है कि बाजार ऑलमोस्ट वहीं पर है, या कुछ नीचे ही गिरा हुआ है। आज की क्लोजिंग निकली है 24,078.30 पर।

2 साल के इस अंतराल में 2 ही चीजें अप्रत्याशित हुई हैं। पहला ट्रंप टैरिफ। दूसरा ईरान युद्ध। ट्रंप टैरिफ का अकेला शिकार भारत नहीं हुआ। सबने झेला। ईरान युद्ध ने अकेले भारत के लिए तेल महँगा नहीं किया। सबके लिए तेल महँगा हुआ। एशिया में तो तुलना योग्य सारी अर्थव्यवस्थाएँ तेल के लिए आयात पर निर्भर हैं। मतलब अकेले भारत के लिए कुछ भी अनोखा नहीं हुआ। लेकिन फिर भी इन 2 सालों में जापान, कोरिया, ताईवान जैसे बाजारों ने कई ऑलटाइम हाई बनाये।

फिर भारत क्यों पिछड़ा? इसका एक ही कारण है एफपीआई। एफपीआई ने अक्टूबर 2024 से भारत में बेचना शुरू किया। उसके बाद से अबतक कुछेक महीने अपवाद वाले ही आये हैं, जब एफपीआई ने भारतीय बाजार में डॉलर डाला है। अक्टूबर 2024 से अभी तक एफपीआई 5 लाख करोड़ रुपये के लगभग भारत से निकाल चुके हैं। अब एफपीआई भारत से क्यों भाग रहे हैं, इसके भी 2 कारण हैं। पहला कारण एआई, जिसकी सब चर्चा करते हैं। भारत में एआई पर नया काम जीरो है। दूसरा कारण, जिसकी खुलकर चर्चा कम होती है, वो है ट्रस्ट डेफिसिट। हिन्दी में भरोसे की कमी।

पहले कई एक्सपर्ट जब यह बात पॉइंट आउट करते थे कि भारत सरकार आर्थिक आँकड़ों में घोटाला कर रही है, मैं विश्वास नहीं करता था। मुझे लगता था यह नीच काम है। लेकिन अब मैं मानता हूँ कि वास्तव में आर्थिक आँकड़े बहुत बढ़ा-चढ़ाकर दिखाये जा रहे हैं। ग्रोथ रेट का जो फिगर सरकार दे रही है, एक्चुअल आँकड़े उसके आधे के आस-पास हैं। सरकार ने अर्थव्यवस्था बनाने के ऊपर आँकड़े मैन्युफैक्चर करने को तरजीह दे दी है।

ब्लूमबर्ग ने कुछ समय पहले एक स्टोरी की थी। उसका कहना था कि रिजर्व बैंक ने सोना बेचा। रिजर्व बैंक ने उसका फैक्टचेक किया। उस फैक्टचेक में जो सबसे मजेदार बात थी, वो यह थी कि ब्लूमबर्ग जिस टाइम-फ्रेम में सोना बेचे जाने की बात कर रहा था, रिजर्व बैंक उससे 2 हफ्ते पहले का डेटा देकर उसकी स्टोरी को गलत बता रहा था। आगे अंदरखाने जो भी हुआ, ब्लूमबर्ग की स्टोरी विड्रॉ हो गयी।

ऐसे प्रकरण ट्रस्ट डेफिसिट पैदा करते हैं। अब आईएमएफ हो या वर्ल्डबैंक, ब्लूमबर्ग हो या रॉयटर्स, एसऐंडपी हो या गोल्डमैन सैक्स, कोई किसी देश में खुद से आँकड़े नहीं जुटा सकता। सब संबंधित देश द्वारा जारी आधिकारिक आँकड़ों के आधार पर ही विश्लेषण करते हैं। अब जिसके आँकड़े हैं, वही सरकार आँकड़े बदल दे या उससे मुकर जाये, तब आपके सामने रिपोर्ट विड्रॉ करने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचता। लेकिन जन्नत की हकीकत तो मालूम पड़ ही जाती है। जो कई दशकों से रोज यही काम कर रहा है, आप उसका मुँह तो बंद करा सकते हैं, लेकिन आप उससे जबरदस्ती निवेश नहीं ला सकते हैं।

और विदेशियों को छोड़ो। देश में ही देख लो। कोविड के बाद से इंडियन कॉरपोरेट मने भारतीय कंपनियों के पास कैश का अंबार लगते गया है। कैश के पहाड़ पर भारत की कंपनियाँ बैठी हुई हैं, लेकिन नया निवेश करने में हिचक रही हैं। क्या कारण हो सकता है इसका? सिवाय इसके कि उन्हें कुछ तो ऐसा मालूम है, जो बताया नहीं जा रहा है? वो भी उसके बारे में बोल नहीं सकते हैं। सबको करना है बिजनेस। बोलने पर क्या होता है, इसकी जानकारी वेदांता वाले अनिल अग्रवाल से ली जा सकती है। बेचारे 10 साल से डंकापति के डंका पीटते रहे, लेकिन एक बार मुँह खोल देने का पुरस्कार कॉमेडी टाइप एफआईआर में नाम डालकर दिया गया। उसके बाद वो भी चुप हो गये।

अंदरखाने जो चीजें चल रही हैं, अगर कहीं से सिरा खुलना शुरू हुआ, मार्केट में बवंडर फैल जायेगा। लेकिन बीमारी जितना दबाते जायेंगे, उतनी ज्यादा परेशानी बढ़ती जायेगी। वही बीमारी, जो भारत का बैंकिंग सेक्टर एकबार झेल चुका है और जिसे साफ करने में रघुराम राजन की जरूरत लगी। लेकिन अभी समस्या उससे गंभीर है। इलाज उससे कड़ा करना पड़ेगा। इसके लिए बड़ी हिम्मत लगेगी। इस सरकार में तो बीमारी और बढ़ने ही वाली है। इसके बाद जब भी दूसरी सरकार आयेगी, उसे ठोस जमीन तलाशने में कई साल लग जायेंगे।

अभी 2 साल में एफपीआई की इतनी तगड़ी बिकवाली के बाद भी बाजार लगभग टिका हुआ है, उसका सबसे बड़ा कारण हैं रिटेलर्स यानी छोटे निवेशक। सिप से रिकॉर्ड इनफ्लो आ रहा है। यही भारतीय बाजार में सबसे स्ट्रॉन्ग चीज बच रही है अभी। भारत में अब भी आबादी के 10% से कम लोग पैसा लगा रहे हैं। इसमें बहुत बढ़ने की गुँजाइश है। बाजार में रिटेलर्स ही लीस्ट इनफॉर्म्ड क्लास है। मतलब जिसे जन्नत की हकीकत न के बराबर मालूम होती है। लेकिन रिटेलर्स में धैर्य भी कम होता है।

रिटेलर्स कब तक कृष्ण बनकर गोवर्धन को कँधे पर थाम पायेंगे! अभी 2 साल से थामे हुए हैं, तब भी एशिया के बाजारों में इंडोनेशिया से भी नीचे गिरकर अब भारत सबसे कम तरजीह वाला बाजार बन चुका है।

मेरी प्रार्थना रहेगी कि ये आशंकाएँ भविष्य में गलत साबित हों। मैं मार्केट में सबको कमाते देखना पसंद करने वाला व्यक्ति हूँ। लेकिन अभी बाजार चलने की सूरत में नहीं दिख रहा है।

इसी सप्ताह कोई बुरी खबर आ जाये तो बाजार गहरी डुबकी लगाने को तैयार बैठा है भाई!

-नितिन काजला

मार्केट आय को भाव देता है न कि नाम को। जिन कम्पनियों के दम पर मार्केट पिछले एक दशक से चल रहा था उनमें से ज्यादातर का प्रॉफिट मार्जिन पहले वाली रफ्तार से धीमा पड़ गया है। कुछ की परिस्थिति साथ नहीं दे रही तो कुछ ने खुद ही उड़ते तीर ले लिए। बड़ी कम्पनियाँ जैसे रिलायंस, HDFC, ICICI बैंक, ITC, TCS, इंफोसिस जिनका निफ्टी और सेंसेक्स में सबसे ज्यादा वजन है वो अपना खुद का वजन नहीं सम्भाल पा रही हैं। नए IPO में 1-1 लाख करोड़ की बोली लग जा रही है तो मार्केट में पैसे की कमी नहीं है, बस ऐसी कम्पनियों की कमी है जिनके लिए पैसा आए।

आज अगर म्यूच्यूअल फण्ड असल में ईमानदारी से अपने पोर्टफ़ोलियो को मात्र रिबैलेंस करने लगें तो भारत का शेयर बाज़ार मात्र तीन दिन में हर्षद मेहता स्कैम वाले दिनों से ज़्यादा क्रैश कर जाएगा। मज़े की बात ये होगी कि इसमें डंकापति या उनके सिपहसालारों का कोई लेना देना नहीं होगा।
आपने जो वेदांता वाले साहब का उदाहरण दिया तो उनके ढोल में भी बहुत बड़ा पोल है। उनकी पोल बस जिंक और एल्युमीनियम की तेजी ने छुपा दी वरना जिस हिसाब का उनका कॉरपोरेट गवर्नेन्स और कल्चर उनकी कम्पनी में काम कर रहे सीनियर मैनेजमेंट के लोग बताते हैं, उनकी असलियत सामने आने में भी ज़्यादा देर नहीं लगनी है।

-राय साहब बलिया वाले

जून क्वार्टर में अर्निंग ग्रोथ काफी बढ़िया रही, 10 क्वार्टर में बेस्ट, फिर भी मार्केट अबतक अटका हुआ है। मतलब सिर्फ अर्निंग से मार्केट ड्राइव नहीं होता। प्राइमरी मार्केट में इसीलिए बंपर बिड आ रहे हैं, क्योंकि सेकेंडरी मार्केट नहीं चल रहा। और रही अग्रवाल साहब की बात तो उनको मैंने कहीं दूध का धुला तो बताया नहीं, बस ये इंडीकेट किया कि जेपी केस में भाई फेयर विनर था। गलत हुआ उस केस में। उसके बाद और ज्यादा गलत हुआ।

-सुभाष सिंह सुमन

सुभाष सिंह सुमन जेपी केस में हमने मात्र उनका वाला वर्जन सुना क्योंकि बैंकों के कंसोर्टियम से उनके बयान पर कोई ऑफिशियल रिएक्शन नहीं आया। बैंकों की प्राथमिकता जेपी केस में अपना डूबा पैसा जल्द से जल्द निकालने की थी न कि भारी मुनाफ़ा कमाने की। अग्रवाल साहब बड़े धंधे का सबसे बड़ा नियम भूल गए जिसे टाटा और बिड़ला ने बंगाल में अपनी फैक्ट्रियों के बरबाद हो जाने के बाद भी याद रखा कि मीडिया में जाकर नहीं रोना है क्योंकि इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता बस रिश्ते ख़राब होते हैं। अब अग्रवाल साहब को अपने निजी जीवन में हुई दुःखद घटनाओं के बाद इन बातों से कोई फ़र्क नहीं पड़ रहा है पर उनके बाद पूरे ग्रुप पर इसका असर पड़ना तय है।

-राय साहब बलिया वाले

भैया इसमें किसी के वर्जन पर जाने की जरूरत ही नहीं है। IBC के रूल्स कई सालों से पब्लिक डोमेन में हैं। आगे अब इसपर मैं कुछ नहीं कहने वाला। निरर्थक बहस है।

-सुभाष सिंह सुमन

सरकार को मस्त फॉर्मूला मिल गया है। अंट शंट टैक्स लगाओ (इक्विटी और डेरिवेटिव मार्केट में ही कई टैक्स मल्टीफोल्ड हो गए हैं।) और पैसे इकट्ठे करके फ्रीबीज बांटकर वोट खरीदो।
हमारे आपके जैसे आदमी का वैल्यू वर्तमान सरकार के सामने दो कौड़ी है।

-आशुतोष झा

इस सरकार की सबसे बड़ी समस्या है रडार साइंटिस्ट, जो सबसे बड़ा इकोनॉमिस्ट भी है। इसी में ब्रॉड प्रॉस्पेक्ट वाली पॉलिसी नहीं बनती। मार्केट के अट्रैक्टिव हो जाने पर इनकी अलग आफत बढ़ जायेगी। आपसे बेहतर कौन समझेगा बैंक डिपॉजिट क्राइसिस को। जरूरत प्रॉपर बैलेंस बनाने की है, जिसके लिए एक अदद काबिल बुद्धि की जरूरत है।

-सुभाष सिंह सुमन

Bhaiya market is gonna dive. अभी समय है उसमें लगभग दो साल पर जिन बारह कंपनी पे निफ्टी आधारित है वह अब डुबकी लगाएंगी और गिरेंगी भी until and unless SEBI is not broadening the nifty index with more companies.

सुभाष bhaiyaa

पिछले दो साल से FPI लगातार पैसा निकाल रहे हैं, फिर भी बाजार पूरी तरह टूटा नहीं क्योंकि SIP और रिटेल का पैसा लगातार आता रहा और विदेशी बिकवाली को absorb करता रहा। अब असली दिक्कत आगे की है।

Nifty नाम के लिए 50 कंपनियों का है, लेकिन असली खेल कुछ बड़ी heavyweight कंपनियों का ही है। अगर इन बड़ी कंपनियों में अब earnings और valuation पर दबाव आने लगा, तो Nifty को नीचे खींचने में ज्यादा टाइम नहीं लगेगा।

अभी तक रिटेल वाला श्री कृष्ण बने हुये है और SIP के पैसे से गोवर्धन उठा रखा है. अगर FPI बेचते रहे, बड़े stocks गिरने लगें और किसी point पर retail sentiment भी खराब हो जाए, SIP inflow भी धीमा पड़ जाए, तो फिर market को संभालने वाला कौन रहेगा?

फिर जो चीज दो साल से धीरे-धीरे हो रही है, वही अचानक तेज हो सकती है।

इसीलिए कह रहा कि अगले 1–2 साल Nifty के लिए काफी tough हो सकते हैं।

और मेरा index broaden wala bhi wahi mtlb hai —जितना ज्यादा index कुछ heavyweight stocks पर depend करेगा, उतना ही उनका गिरना पूरे Nifty को disproportionately नीचे खींचेगा।
अभी market को जो support मिल रहा है, वो permanent नहीं है। जिस दिन ये support कमजोर पड़ा, असली गिरावट वहीं से शुरू हो सकती है।

अभी तक गोवर्धन बने हुए रिटेल कब तक श्री कृष्ण जी के हाथ की तरह मजबूत रहते हैं।

हो सकता है मेरी बात में solution और problem का connection ठीक से explain नहीं हुआ। मैं concentration को अकेली समस्या नहीं कह रहा हूँ। मेरा point यह है कि concentration downside को amplify करने वाला factor हो सकता है।

मैं तो बस ये कह रहा था कि पिछले दो साल से FPI लगातार selling कर रहे हैं और domestic investors/SIP उस selling को absorb कर रहे हैं। इसी वजह से market अभी तक संभला हुआ है।

अब अगर आगे FPI selling जारी रहती है, earnings पर pressure आता है और किसी वजह से domestic flows भी धीमे पड़ते हैं, तो heavyweight stocks की गिरावट Nifty में ज्यादा तेज दिखाई दे सकती है।

इसलिए बात यह है कि क्या हम जिस domestic liquidity के भरोसे पिछले दो साल से market को संभाल रहे हैं, वह अगले 1–2 साल भी इसी तरह foreign selling को absorb कर पाएगी?

अगर हाँ तो i might be wrong

अगर नहीं, तो फिर concentration सिर्फ समस्या नहीं, बल्कि गिरावट को amplify करने वाला factor बन सकती है।

इसीलिए मैंने index broadening की बात कही थी—solution के तौर पर नहीं, बल्कि risk को कम करने के एक तरीके के तौर पर।

बाकी आपकी बात सही है कि पहले असली बीमारी identify करनी चाहिए।

-श्रवण कुमार

लगभग दो साल पहले मैंने एक कंमेंट में कहा था निफ़्टी जब तक बीस हज़ार का गोता नहीं लगाएगा, करेक्शन मानेंगे ही नहीं। मेरी बात बकवास लग सकती थी किसी को भी उस वक़्त मगर अब देख लो। करेक्शन टाइम का भी तो होता है, और अभी तो रुको! ….Game to baki hai 28 tak Trump 29 tak Modi.

-विवेक रोहन शर्मा

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