अजमेर में पिछले कुछ समय से यूट्यूब और सोशल मीडिया आधारित पत्रकारिता का दायरा तेजी से बढ़ा है। शहर में बड़ी संख्या में नए डिजिटल चैनल और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म सक्रिय हुए हैं। डिजिटल मीडिया का विस्तार निश्चित रूप से पत्रकारिता के लिए नए अवसर लेकर आया है, लेकिन बड़े सरकारी और राजनीतिक आयोजनों में बाइट लेने की होड़ और कवरेज के दौरान अव्यवस्था अब गंभीर सवाल खड़े करने लगी है।
मंगलवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ई-बस योजना के तहत अजमेर को मिली नई बसों के शुभारंभ कार्यक्रम में भी ऐसा ही नजारा देखने को मिला। राजस्थान विधानसभा अध्यक्ष वासुदेव देवनानी कार्यक्रम में मौजूद थे। कार्यक्रम समाप्त होने के बाद उनकी बाइट लेने के लिए कई यूट्यूब और सोशल मीडिया चैनलों से जुड़े लोग माइक और आईडी लेकर आगे बढ़ते नजर आए। बाइट लेने की होड़ में धक्का-मुक्की जैसी स्थिति बन गई।
दूसरी ओर रीजनल न्यूज चैनलों, नेशनल न्यूज चैनलों और बड़ी न्यूज एजेंसियों के पत्रकार भी विधानसभा अध्यक्ष की बाइट लेने के लिए लगातार प्रयास करते रहे। लेकिन भीड़ और अव्यवस्था के बीच स्थिति ऐसी बनी कि देवनानी संबंधित बस में बैठकर रवाना हो गए और कई पत्रकार बाइट से वंचित रह गए।
स्वतंत्रता दिवस समारोह में भी दिखा था ऐसा ही नजारा
इससे पहले स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर अजमेर पुलिस लाइन में आयोजित जिला स्तरीय समारोह के दौरान भी ऐसी ही स्थिति देखने को मिली थी। कार्यक्रम में राजस्थान की उपमुख्यमंत्री दिया कुमारी मौजूद थीं। कार्यक्रम के बाद उनकी बाइट लेने के लिए बड़ी संख्या में सोशल मीडिया और यूट्यूब चैनलों से जुड़े लोग आगे बढ़े। बाइट लेने की कोशिश में पत्रकारों के बीच धक्का-मुक्की जैसी स्थिति दिखाई दी।
इस दौरान उन पत्रकारों को भी काफी परेशानी का सामना करना पड़ा जो लंबे समय से रीजनल, नेशनल न्यूज चैनलों और प्रतिष्ठित न्यूज एजेंसियों के लिए काम कर रहे हैं। सीमित समय में मंत्री या जनप्रतिनिधि से महत्वपूर्ण सवाल पूछकर खबर के लिए एक्सक्लूसिव बाइट लेने वाले पत्रकारों को भीड़ के बीच अपनी जगह बनाने के लिए संघर्ष करना पड़ा।
माइक आईडी से ज्यादा जरूरी है सवाल और पत्रकारिता
डिजिटल मीडिया के विस्तार के साथ पत्रकारिता का स्वरूप भी बदला है। आज कोई भी व्यक्ति अपना डिजिटल प्लेटफॉर्म बनाकर खबरों को लोगों तक पहुंचा सकता है। लेकिन सवाल यह है कि क्या केवल माइक, आईडी कार्ड या सोशल मीडिया चैनल का नाम किसी व्यक्ति को पत्रकार की पहचान दे देता है?
पत्रकारिता केवल किसी नेता या मंत्री के सामने माइक लगाने तक सीमित नहीं है। पत्रकारिता का मूल उद्देश्य सवाल पूछना, तथ्यों की पड़ताल करना और जनता से जुड़े मुद्दों को सामने लाना है। कई बार बड़े आयोजनों में देखा जाता है कि बाइट लेने की होड़ तो दिखाई देती है, लेकिन जनहित से जुड़े सवाल पूछने वाले पत्रकारों के लिए पर्याप्त जगह और समय नहीं बचता।
बढ़ती भीड़ के बीच व्यवस्था की भी जरूरत
अजमेर में यूट्यूब और सोशल मीडिया चैनलों की संख्या लगातार बढ़ रही है। ऐसे में बड़े सरकारी कार्यक्रमों में मीडिया प्रबंधन और बाइट व्यवस्था को लेकर भी नई व्यवस्था की जरूरत महसूस होने लगी है। यदि किसी मंत्री, विधायक या बड़े जनप्रतिनिधि की बाइट निर्धारित स्थान पर कराई जाए और सभी मान्यता प्राप्त तथा कार्यरत मीडिया संस्थानों के पत्रकारों को व्यवस्थित तरीके से अवसर मिले, तो ऐसी स्थिति से बचा जा सकता है। डिजिटल पत्रकारिता के साथ पत्रकारिता के मूल अनुशासन, मर्यादा और सवाल पूछने की जिम्मेदारी भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।
अजमेर की पत्रकारिता के सामने बड़ा सवाल
आज सवाल किसी एक यूट्यूब चैनल या किसी एक पत्रकार का नहीं, बल्कि बदलते मीडिया परिदृश्य का है। एक तरफ वर्षों से पत्रकारिता कर रहे रीजनल, नेशनल चैनलों और न्यूज एजेंसियों के पत्रकार हैं, जो अपनी संस्थाओं के लिए खबर और बाइट जुटाने की जिम्मेदारी निभाते हैं। दूसरी तरफ तेजी से बढ़ता डिजिटल मीडिया है, जो अपनी जगह बना रहा है।
जरूरत टकराव की नहीं, बल्कि ऐसी व्यवस्था की है जिसमें हर माध्यम के पत्रकार को सम्मान मिले, लेकिन बड़े आयोजनों में अनुशासन भी कायम रहे। आखिर पत्रकारिता की पहचान सिर्फ माइक और कैमरे से नहीं, बल्कि सही सवाल, तथ्यपरक खबर और जनता की आवाज को मजबूती से सामने रखने की क्षमता से होती है।


