अयोध्या। राम मंदिर चढ़ावा चोरी मामले में जांच रिपोर्ट सामने आने के बाद सिर्फ चंपत राय और अनिल मिश्रा की भूमिका ही चर्चा में नहीं है, बल्कि इस पूरे मामले पर मीडिया की बदलती रिपोर्टिंग भी सवालों के घेरे में है। खासकर उन अखबारों और पोर्टलों की रिपोर्टिंग को लेकर सवाल उठ रहे हैं, जो एक दिन पहले तक दोनों को SIT से क्लीन चिट मिलने की खबर प्रमुखता से चला रहे थे और अगले ही दिन उनकी भूमिका, लापरवाही और संभावित कार्रवाई पर सवाल उठाने लगे।
इस बदलाव का सबसे साफ उदाहरण अमर उजाला की रिपोर्टिंग में दिखाई देता है। 18 अगस्त की उसकी रिपोर्ट का शीर्षक था—“राम मंदिर चढ़ावा चोरी: SIT जांच में चंपत राय और अनिल मिश्रा को क्लीन चिट, टीम ने शासन को सौंपी रिपोर्ट”। रिपोर्ट में कहा गया था कि SIT की फाइनल रिपोर्ट में चंपत राय को क्लीन चिट दी गई है और अनिल मिश्रा पर भी कोई आरोप तय नहीं किए गए।
लेकिन इसके ठीक अगले दिन यानी 19 अगस्त को इसी अखबार की रिपोर्ट का रुख पूरी तरह बदला नजर आया। नई रिपोर्ट का शीर्षक है—“राम मंदिर चढ़ावा चोरी: चंपत राय लापरवाही के दोषी, अनिल मिश्रा की भूमिका पर सवाल, कसेगा कानूनी शिकंजा।” रिपोर्ट में सूत्रों के हवाले से कहा गया कि SIT ने किसी को क्लीन चिट नहीं दी है और प्रबंधन से जुड़े पदाधिकारियों व कर्मचारियों की जिम्मेदारी तय की गई है।
आखिर एक दिन में इतना बड़ा बदलाव क्यों?
यही इस पूरे मामले का सबसे बड़ा सवाल है। अगर SIT की फाइनल रिपोर्ट में वास्तव में किसी को क्लीन चिट नहीं दी गई थी, तो 18 अगस्त को ‘क्लीन चिट’ की हेडलाइन कैसे बनी? और अगर 18 अगस्त की रिपोर्ट सही थी, तो महज 24 घंटे बाद उसी मामले में चंपत राय को लापरवाही का दोषी और अनिल मिश्रा की भूमिका को साजिश की तरफ इशारा करने वाली क्यों बताया गया?
अमर उजाला की 19 अगस्त की रिपोर्ट के मुताबिक, SIT ने चंपत राय की भूमिका को आपराधिक साजिश में नहीं पाया, लेकिन उन्हें प्रबंधन की जिम्मेदारी के कारण लापरवाही का दोषी माना है। वहीं अनिल मिश्रा को गणना प्रक्रिया का अहम जिम्मेदार पदाधिकारी बताते हुए रिपोर्ट में कहा गया है कि बैंक के साथ हुए करारों पर उनके हस्ताक्षर थे और उन्होंने तय नियमों में बदलाव किए। इसी आधार पर उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई की संभावना जताई गई है।
क्या ‘क्लीन चिट’ शब्द ही गलत तरीके से इस्तेमाल हुआ?
मामले में एक और महत्वपूर्ण बात है। राज्य सरकार की SIT की रिपोर्ट के बाद भी पूरी जांच खत्म नहीं हुई है। उपलब्ध रिपोर्टों के मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में चल रही दूसरी जांच अभी जारी है। ऐसे में राज्य SIT की रिपोर्ट को अंतिम न्यायिक निष्कर्ष मान लेना भी जल्दबाजी होगी।
यानी सवाल सिर्फ चंपत राय और अनिल मिश्रा की भूमिका का नहीं है। सवाल यह भी है कि मीडिया किसी जांच रिपोर्ट की व्याख्या किस आधार पर करता है और इतनी महत्वपूर्ण खबर में ‘क्लीन चिट’ जैसे निर्णायक शब्द कितनी सावधानी से इस्तेमाल किए जाते हैं।
रिपोर्टिंग के इस बदलाव ने खड़े किए बड़े सवाल
राम मंदिर चढ़ावा चोरी जैसा संवेदनशील मामला महीनों से जांच के दायरे में है। जून में दोनों के इस्तीफे के बाद उनकी भूमिका को लेकर सवाल उठे थे। बाद में SIT की रिपोर्ट के अलग-अलग हिस्सों को लेकर भी खबरें सामने आती रहीं। अब 18 और 19 अगस्त की रिपोर्टिंग में दिखाई दे रहा विरोधाभास इस बहस को और तेज करता है।
एक दिन पहले तक ‘क्लीन चिट’ और अगले दिन ‘लापरवाही के दोषी’—आखिर पाठक किस रिपोर्ट को सच माने?
यही वह सवाल है जिसका जवाब मीडिया संस्थानों को अपनी रिपोर्टिंग की पारदर्शिता और स्रोतों के आधार पर देना चाहिए। क्योंकि किसी जांच के दौरान ‘नाम रिपोर्ट में नहीं है’, ‘आरोप तय नहीं हुए’, ‘लापरवाही मिली’ और ‘क्लीन चिट’—इन चारों का कानूनी और पत्रकारिता के लिहाज से अर्थ अलग-अलग होता है।

अख़बारों को क्या हो गया?
कल तो चंपत राय और अनिल मिश्रा को क्लीन चिट दे रहे थे!
आज वे लापरवाही के दोषी हो गए?
रिपोर्टिंग बदल गई?
या ‘किसी को नहीं छोड़ेंगे’ कहने वाली सरकार अपनी इमेज खतरे में पड़ने के ख़ौफ में आ गई?
लगभग 7000 करोड़ के विशाल विज्ञापन वाली सरकार की सबसे बड़ी चिंता बस यही है?
-अभिषेक उपाध्याय, वरिष्ठ पत्रकार


