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उत्तर प्रदेश

मां की हत्या पर की जा रही झूठी रिपोर्टिंग पर भड़के IPS आशुतोष मिश्रा, देखें वीडियो

Split-screen: left is a man in a police uniform with a blue beret; right an elderly woman in a light scarf.

अभिषेक उपाध्याय-

मां की हत्या पर की जा रही झूठी सरकारी रिपोर्टिंग पर भड़के IPS आशुतोष मिश्रा। ऐसे चैनलों के लिए कहा कि- “ये सुधर जााएं तो देश सुधर जाएगा।

न पुलिस की रिपोर्ट है इनके पास। न मेरे घर आकर पूछे। और चला रहे हैं कि जवाहरात बरामद हो गए।”

दरअसल आशुतोष मिश्रा की मां के मुंह में कपड़ा ठूंसकर हत्या की गई। जवाहरात लूट लिए गए। एफआईआर में ये सब लिखा भी है।

मगर कुछ खास चैनल बता रहे हैं कि हत्या और लूट की कहानी झूठी है। उनके पास न कोई पुलिस की रिपोर्ट, न कोई सबूत।

बस जो कहीं से बताया गया, उसी को टाइपिंग मशीन की तरह खटाखट चला दिया।

आशुतोष मिश्रा ने अंबेडकर नगर की पुलिस कप्तान प्राची सिंह के लिए यहां तक कह दिया, कि वे बता रही हैं कि खुलासा हो गया, लूटा गया सामान मिल गया। ऐसा कुछ नहीं हुआ और प्रेस में निकाले बैठे हुए हैं।

आशुतोष मिश्रा ने पुलिस और पुलिसिया पत्रकारिता दोनो को आइना दिखा दिया है, मगर आपके लिए सोचने वाली बात ये है कि जब इस सिस्टम में एक IPS का ये हाल है, तो आम जनता का क्या होगा, यही तो असली सवाल है?


राजीव तिवारी बाबा-

बूढ़ी मां की मौत के सच की तलाश में खड़ा IPS बेटा

‘मुझे लगता है मां की हत्या हुई है…!’ एक IPS अधिकारी की यह पुकार महज एक बेटे की भावुकता नहीं, बल्कि उस सवाल की दस्तक है जिसका जवाब अब पुलिस प्रशासन और सरकार को देना होगा।

अम्बेडकरनगर में 91 वर्षीय मां की मौत के बाद IPS अधिकारी आशुतोष मिश्रा ने जिस तरह मामले को सामान्य मौत मानकर छोड़ देने के बजाय जांच की मांग की, उसने राज्य की कानून व्यवस्था को गंभीर सवालों के घेरे में ला दिया है। सवाल सिर्फ यह नहीं है कि वृद्ध मां की मौत कैसे हुई, सवाल यह भी है कि आखिर ऐसा क्या था जिसने वर्षों से पुलिस सेवा में रहे एक अनुभवी अधिकारी को अपनी मां की मौत पर संदेह करने के लिए मजबूर किया?

बकौल श्री मिश्र, जब वह गांव में मां के कमरे में गये तो कमरा अस्त व्यस्त था। अलमारी खुलीं थी। मां पलंग पर पींठ के बल लेटी थीं। उनके मुंह में तौलिया का एक कोना करीब पांच-छह इंच तक ठूंसा हुआ था। होंठ फट हुए थे। होंठ के घाव से खुश रिस कर पपड़ी पड़ गयी थी। मां के गले से सोने की गुझिया वाली चेन और कान से सोने के टाप्स व पैर की पायल नदारद थी। इससे पहले गांव की कामवाली जब सुबह उनके घर पहुंची तो मुख्य द्वार बाहर से बंद मिला था न कि अंदर। रात में मां अकेली सोयीं थी। तो स्वाभाविक है दरवाजा अंदर से बंद होना चाहिए था हमेशा की तरह।

कुछ मीडिया संस्थानों और चैनलों द्वारा घटना को मौके पर गए बिना ‘हार्ट अटैक से मौत’ बताकर कहानी को खत्म करने की कोशिश किए जाने के आरोपों ने मामले को और गंभीर बना दिया है। परिवार का कहना है कि इससे उन्हें गहरा आघात पहुंचा है। यदि घटना संदिग्ध है, तो बिना घटनास्थल देखे और जांच के निष्कर्ष तक पहुंचे किसी मौत को महज हार्ट अटैक बताना आखिर किस आधार पर उचित है?

और सबसे बड़ा सवाल—लूटे गए जेवरात बरामद होने की खबर आखिर किस जांच और किस आधिकारिक पुष्टि के आधार पर सामने आई? यदि बरामदगी हुई है तो पुलिस इसका स्पष्ट विवरण सार्वजनिक करे। यदि बरामदगी नहीं हुई, तो ऐसी खबर चलाने वालों की जिम्मेदारी भी तय होनी चाहिए। किसी परिवार की सबसे बड़ी त्रासदी को आधी-अधूरी सूचनाओं और सनसनीखेज निष्कर्षों से ढकना पत्रकारिता नहीं हो सकता।

यहां एक बात समझना बेहद जरूरी है। आशुतोष मिश्रा कोई सामान्य शिकायतकर्ता नहीं हैं। वह एक वरिष्ठ IPS अधिकारी हैं, जिन्होंने पुलिस सेवा में वर्षों तक काम किया है। उन्हें घटनास्थल, परिस्थितियों और पुलिस जांच की बारीकियों का अनुभव है। क्या कोई अनुभवी पुलिस अधिकारी बिना किसी ठोस वजह के अपनी 91 वर्षीय मां के शव का पोस्टमार्टम कराने की मांग करेगा? क्या कोई बेटा अपनी मां के शव की दोबारा जांच इसलिए करवाएगा कि उसे अपनी ‘भद’ पिटवानी है?

पोस्टमार्टम की मांग करना अपने आप में अपराध का प्रमाण नहीं है, लेकिन यह जरूर बताता है कि बेटे के मन में कोई गंभीर आशंका पैदा हुई है। उस आशंका का जवाब जांच से मिलना चाहिए, मीडिया की सुविधाजनक सुर्खियों से नहीं।

परिवार का दर्द भी समझना होगा। एक तरफ मां की मौत का सदमा, दूसरी तरफ मौत के कारण को लेकर सवाल और तीसरी तरफ ऐसी खबरें जिनमें घटना को जल्दबाजी में सामान्य मौत बताने की कोशिश दिखाई देती है—यह किसी भी परिवार के लिए दोहरी पीड़ा है।

इस मामले में सबसे आसान रास्ता है—‘हार्ट अटैक था, मामला खत्म।’ लेकिन कानून-व्यवस्था का तकाजा इससे बिल्कुल उलट है—अगर हार्ट अटैक था तो जांच उसे साबित कर देगी और अगर कुछ और था तो जांच उसे सामने ले आएगी। मेडिकली भी अगर किसी मुंह दबाया जाए तो रिपोर्ट तो यही आएगी न कि सांस रुकने से मौत हुई जिसका मतलब हार्ट ने काम करना बंद कर दिया।

इसलिए सवाल सरकार से भी है और पुलिस से भी—क्या इस मौत की निष्पक्ष, पारदर्शी और वैज्ञानिक जांच होगी? क्या घटनास्थल से मिले साक्ष्यों, पोस्टमार्टम रिपोर्ट, फोरेंसिक जांच, सीसीटीवी, मोबाइल/तकनीकी साक्ष्यों और कथित जेवरात की बरामदगी की स्वतंत्र रूप से पुष्टि की जाएगी?

और मीडिया से भी एक सवाल है—क्या सरकार की किरकिरी न हो, इसलिए किसी संदिग्ध मौत को जल्दबाजी में ‘हार्ट अटैक’ बताकर खत्म कर देना पत्रकारिता का धर्म है?

मां की मौत का सच चाहे जो हो, उसे सामने आना चाहिए। यदि वह स्वाभाविक मौत थी तो परिवार और समाज के सामने यह तथ्य मजबूती से साबित होना चाहिए। और यदि मौत के पीछे कोई रहस्य है तो उसे दबाने की नहीं, उजागर करने की जरूरत है।

क्योंकि इस कहानी में सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह नहीं है कि मौत को क्या नाम दिया जा रहा है—सवाल यह है कि 91 साल की उस मां की मौत के पीछे आखिर सच क्या है?

और उस सच को जानने का हक सबसे पहले उसके बेटे और परिवार को है।

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