यह सब किरेन रिजिजू क्यों कर रहे हैं। रक्षा मंत्री और विदेश मंत्री कहां हैं? ये दोनों मंत्री तो सोशल मीडिया में भी मोर्चे पर नहीं जाने जाते हैं। अमर उजाला की लीड आज सरकार के सोशल मीडिया मोर्चे में मंत्रियों को झोंकने की खबर है। संभावित कारण यह हो सकता है कि इन्हें हिन्दी पट्टी से चुनाव नहीं लड़ना है और इनके लिए यह सब चुनावी मुद्दा नहीं हो सकता है।
संजय कुमार सिंह
आज छपी खबरों के अनुसार, सत्येन्द्र जैन और चार अन्य को 3 सितंबर तक न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया है (दैनिक भास्कर)। खबर यह भी है कि सत्येन्द्र जैन की गिरफ्तारी केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह के कहने पर हुई। देशबन्धु में खबर है, आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक और दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल ने सत्येन्द्र जैन की गिरफ्तारी को लेकर गंभीर आरोप लगाए हैं। उन्होंने दावा कि एसीबी अधिकारी ने बताया कि सुबह तक सत्येन्द्र जैन को गिरफ्तार करने की कोई योजना नहीं थी। लेकिन दोपहर में श्री शाह की ओर से सीधे फोन आने के बाद उन्हें गिरफ्तार किया गया। आप जानते हैं कि एसीबी 1.52 करोड़ रुपए के मनी ट्रेल को खंगाल रही है और यह गिरफ्तारी उसी सिलसिले में हुई है। इससे पहले की खबर यह है कि नीट पेपर लीक के कारण 20 से ज्यादा बच्चे आत्महत्या कर चुके हैं। केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू कह चुके हैं, “गोली कहां चली? किसी की मौत नहीं हुई ना किसी की हड्डी टूटी।” उन्होंने यह भी कहा कि कुछ लोगों ने हिंसा भड़काने की कोशिश की, लेकिन “कोई नहीं मरा”। उन्होंने दिल्ली पुलिस की प्रशंसा की कि उसने स्थिति को नियंत्रित किया। इसलिए उन्होंने यह भी कहा है, जब कोई मरा नहीं तो हमें क्यों नहीं पुलिस की प्रशंसा करनी चाहिए? मोटे तौर पर वे कह चुके हैं कि जब किसी की मौत नहीं हुई, किसी की हड्डी नहीं टूटी और कोई गंभीर रूप से घायल नहीं हुआ, तो पुलिस की प्रशंसा क्यों न की जाए। यह सब तब जब पुलिस ने घटना वाले दिन घायलों की संख्या नहीं बताई थी। अगले दिन अखबारों में घायलों के संबंध में अलग-अलग खबर थी। इनमें गंभीर रूप से घायल, पेलेट गन से जख्मी मरीज की सर्जरी और आंखों की रोशनी जाने की आशंका का विवरण शामिल है।
आप जानते हैं कि यह विरोध प्रदर्शन शिक्षा और परीक्षा में अनियमितताओं के खिलाफ हुआ था और इसके लिए जिम्मेदार माने गए शिक्षा मंत्री का इस्तीफा होने के बाद ही खत्म हुआ। सरकार ने जो प्रचार किया सो अलग। आज द हिन्दू की लीड का शीर्षक है, सुप्रीम कोर्ट ने कहा, एनटीए के सुधारों में सार्थक निरंतरता होनी चाहिए। यही नहीं, सुप्रीम कोर्ट का कहना है कि एजेंसी में सुधार संस्थागत होने चाहिए, न कि किसी संकट पर आनन-फानन में की गई प्रतिक्रिया। सर्वोच्च अदालत ने समाधान खोजने के लिए सरकार के एक पैनल से दूसरे पैनल पर जाने को लेकर सवाल उठाए हैं। इंडियन एक्सप्रेस में इस खबर का शीर्षक है, शीर्ष अदलत ने कहा, एनटीए सुधारों को संस्थागत रूप दें, यूपीएससी का जीवंत उदाहरण दिया। आप समझ सकते हैं कि सरकार कैसे काम कर रही है। इसके बावजूद सुप्रीम कोर्ट एसआईआर होने दे रहा है। इससे लाखों मतदाता वोट देने से वंचित रह गए और पश्चिम बंगाल में भाजपा की सरकार बन गई। भाजपा की सरकार और उसके काम काज का हाल यह है कि टाइम्स ऑफ इंडिया की एक खबर के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट ने उड़ीशा सरकार से कहा : दारा सिंह की सज़ा कम करने की अर्ज़ी पर फ़ैसला करें, वरना हम करेंगे। मामला यह है कि 1999 में ऑस्ट्रेलियाई मिशनरी ग्राहम स्टेन्स और उनके दो बच्चों की हत्या के आरोप में जेल में 26 साल से बंद दारा सिंह की सजा खत्म करने की अपील पर राज्य सरकार फैसला नहीं कर रही है। राज्य में डबल इंजन की सरकार है तब भी। सुप्रीम कोर्ट ने उड़ीशा सरकार को कड़ी चेतावनी दी कि वह “हमें टालने की कोशिश न करे”।
उड़ीशा सरकार पिछले कुछ महीनों से दारा सिंह की सज़ा कम करने की अर्ज़ी के मामले को टालती रही है और बुधवार को भी कोर्ट के सामने अपना पक्ष बताने से बचती रही। बेंच ने राज्य सरकार से कहा, “आप जैसा चाहें वैसा फ़ैसला लें। अगर आप फ़ैसला नहीं लेंगे, तो हम लेंगे।” बेंच ने मामले की सुनवाई दो सितंबर के लिए तय कर दी है। कहने की जरूरत नहीं है कि यही सरकार नागरिकों को जेल भेजने का निर्णय लेने में देरी नहीं करती है, उसे जमानत न मिल जाए – यह सुनिश्चित करने में कोई चूक नहीं होती – मामला संजीव भट्ट का हो या उमर खालिद का। सोनम वांगचुक को भी इसी श्रेणी में रख सकते हैं। लेकिन दारा सिंह के मामले में निर्णय नहीं करती है। सत्ता में आने से पहले हिन्दुओं की भलाई का दिखावा कौन भूल सकता है और फिर चढ़ावा चोरी तथा उसमें बड़े लोगों को क्लिन चिट। जो लोग क्लिन चिट के दम पर सत्ता भोग रहे हैं वे तरुण तेजपाल को निचली अदालत से बरी कर दिए जाने के बाद हाई कोर्ट गए और फिर सुप्रीम कोर्ट ताकि सजा बढ़वाई जा सके। तरुण तेजपाल कोई शातिर अपराधी नहीं हैं और हों भी तो संपादक रहे हैं और भाजपा के खिलाफ खबरें करने के लिए जाने जाते हैं। अमित शाह के गृहमंत्री बनते ही पी चिदंबरम को जेल भेजा गया था और तरुण तेजपाल को अदालत से बरी किए जाने के बाद भी राहत नहीं मिल रही है जबकि जज लोया कि संदिग्ध मौत की जांच नहीं हुई और तमाम जजों को इनाम दिए जाने तथा अजमल कसाब के लिए सरकारी काम पर लगाए जाने वाले अधिवक्ता उज्ज्वल निकम को भाजपा की ओर से महान बनाए जाने की कहानी सर्वविदित है। मुझे लगता है कि इतनी बुरी स्थिति में भी इस्तीफा नहीं देने का कारण यह भी हो सकता है कि सबको डर हो । ऊपर से शुरुआत हुई तो नीचे वाले क्या कुछ कर सकते हैं और उसके बाद क्या होगा कल्पना की जा सकती है।
इस व्यवस्था में मजदूरी बढ़ाने के लिए प्रदर्शन कर रहे मजदूरों को औसतन 50 दिन से ज्यादा जेल में रहना पड़ा। यह इंडियन एक्सप्रेस की खबर है और आज प्रमुखता से छपी है। यह अलग बात है कि इसके बावजूद जेन जी का आंदोलन हुआ, बच्चे धमकियों से नहीं डरे और फंसाने की पूरी कोशिश के बावजूद सुप्रीम कोर्ट उन्हें राहत देना चाहता है। दें या नहीं दे डर खत्म हो गया लगता है। अखबार ने लिखा है, नोएडा में अप्रैल में हुए विरोध-प्रदर्शनों पर पुलिस ने सख़्त कार्रवाई की; गंभीर आरोपों वाली एफआईआर में ज़मानत की 84% याचिकाओं पर अदालतों ने राहत दी: ‘सिर्फ़ मौजूदगी ज़मानत न देने का आधार नहीं हो सकती, ठोस सबूत ज़रूरी हैं, मज़दूरों की तुलना उकसाने वालों से नहीं की जा सकती।’ हिन्दुस्तान टाइम्स की सेकेंड लीड के अनुसार, दिल्ली के पंप पर सीएनजी टैंक फटने से तीन मर गए। तीन लोग जख्मी भी हुए हैं। कारण पता नहीं चला है। इसी तरह एसी में आग लगने से मौतें होती रहती हैं। आज भी द टेलीग्राफ की लीड है कलकत्ता के एक होटल में आग लगने से नौ लोग मर गए। कारण शॉर्ट सर्किट बताया जा रहा है। जाहिर है, जहां नियम हैं, जो लंबे समय से चल रहा है उसमें भी दुर्घटनाएं हो रही हैं लोग मर रहे हैं। लेकिन बिना सोचे समझे पेट्रोल में इथेनॉल मिलाया जा रहा है। 10 प्रतिशत पर मन नहीं भरा तो उसे 20 प्रतिशत कर दिया गया। शिकायतों पर सुनवाई नहीं है। सियाम ने दिक्कत बताई तो उसे अपनी शिकायत वापस लेनी पड़ी और इलेक्ट्रीक कारों (गाड़ियों) के संबंध में नियम तय नहीं हैं। बहुमंजिली इमारतों में चार्ज की जा रही गाड़ी में आग लगने की खबर है लेकिन सरकार ने इससे संबंधित नियम बनाए हैं, ऐसी कोई जानकारी नहीं है। घरेलू बिजली से कार चार्ज नहीं की जानी चाहिए और होटल दुकान के लिए खरीदी जाने वाली बिजली भी कार्ज चार्ज करने के लिए बेची नहीं जा सकती है लेकिन गाड़ियां चार्ज हो सकती हैं। सुरक्षा और जरूरत का ख्याल करके सरकार को नियम बना देने चाहिए थे पर सरकार सोशल मीडिया पोस्ट हटवाने और उसके नियम बनाने में व्यस्त है।
अमर उजाला में आज खबर है, दोहरा नजरिया…. दुनिया भर के बच्चों को सोशल मीडिया की लत लगाने वाले मेटा और गूगल के टेक दिग्गज अपनी संतानों को इससे दूर रखते हैं। यही हालत नेताओं की है। वे अपने बच्चों को तो विदेश में पढ़ा रहे हैं लेकिन आपके बच्चों को संस्कारी और कांवड़ ढोने वाला बनाना चाहते हैं। तमाम लोग बना ही रहे हैं और ऐसी खबरों को प्राथमिकता नहीं मिलती है। इस खबर के समर्थन में अखबार ने तर्क दिया है, बिल गेट्स ने 14 साल तक नहीं दिया मोबाइल। खबर के अनुसार, माइक्रोसॉफ्ट के सह-संस्थापक बिल गेट्स ने बताया था कि उन्होंने अपने बच्चों को 14 साल की उम्र तक मोबाइल फोन नहीं दिया। गूगल के प्रमुख सुंदर पिचाई ने कहा था कि उनका 11 साल का बेटा फोन का इस्तेमाल नहीं करता था। ठीक है कि ऐसे लोगों को पैसों की दिक्कत नहीं है और वे चाहें तो फोन दे सकते हैं लेकिन अमर उजाला के कितने पाठकों के पास इतना पैसा होगा कि वे बच्चों को मोबाइल खरीद कर दें। मैंने नहीं देखा कि मध्यम या उच्च मध्यम वर्ग में अभी भी बच्चों के पास मोबाइल होता है। 10वीं के बाद तो लैपटॉप की जगह कोई मोबाइल इस्तेमाल कर ले तो उसे फोन नहीं कहा जा सकता है। जो बच्चे फोन इस्तेमाल करते हैं वह अक्सर उनके मां-बाप का ही होता है। ऐसे में बिल गेट्स का उदाहरण किसी काम का नहीं है। जाहिर है, यह खबर भारत के लिए नहीं है लेकिन आदर्श और संस्कार का प्रचार करना आजकल मीडिया का शौक है सो यह आज का बॉटम है। कल छपा था कि 64 साल और 70 साल के दो बुजुर्गों की मृत्यु के बाद उनके बच्चों ने उनका हाल नहीं पूछा। मुझे लगता है कि अखबार और समाज की जिम्मेदारी यह समझने की भी होनी चाहिए कि 64 और 70 साल में मृत्यु क्यों हो रही है। उसकी जो अकेले रह रहा था या बच्चों के साथ नहीं रहता था। चिन्ता इसकी भी होनी चाहिए। पर की जा रही है संस्कारों की। कहने की जरूरत नहीं है कि ज्यादातर मामले आपसी रिश्तों के होते हैं और रिश्ते ठीक नहीं हों तो उसका असर व्यवहार में दिखेगा ही। मीडिया की प्रस्तुति से लगता है जैसे सबका व्यवहार एक जैसा है जबकि सामान्य और अच्छे व्यवहार के भी तमाम उदाहरण हैं।
आज दि एशियन एज की लीड का शीर्षक है, मंत्रियों के सोशल मीडिया प्रदर्शन की रैंकिंग में मोदी सबसे आगे या सर्वश्रेष्ठ। खबर के अनुसार, कैबिनट की बैठक में मंत्रियों के सोशल मीडिया रिपोर्ट कार्ड की चर्चा हुई। आप जानते हैं कि जेन जी आंदोलन के बाद सरकार/भाजपा के डिजिटल राजनीतिक संचार में रणनीतिक बदलाव दिखाई देता है। जेन जी आंदोलन से पता चला कि जिस सोशल मीडिया को मोदी और उनकी भाजपा ने राजनीतिक संवाद की अपनी बड़ी ताकत बनाया था, उसी का इस्तेमाल युवा वर्ग ने सरकार के खिलाफ मीम, रील, व्यंग्य और वायरल कंटेंट के लिए किया। इसमें गालियां शामिल रहीं। यानी समस्या यह नहीं थी कि कुछ युवा सरकार से नाराज थे। समस्या यह भी थी कि सरकार जिस डिजिटल भाषा (खेल) पर अपना एकाधिकार समझती उसी से जेन जी ने उसे धूल चटा दी। इसलिए मोदी का इंस्टाग्राम पर अचानक अधिक अनौपचारिक होना उनकी मजबूरी है। खबरों के मुताबिक मोदी ने मंत्रियों से कहा है कि वे इंस्टाग्राम पर सक्रिय हों, फॉलोअर्स बढ़ाएं। इसी क्रम में आज अमर उजाला की लीड है, जेन जी को साधने के लिए मोर्चाबंदी तेज। भाजपा ने जेन जी को साधने के लिए मंत्रियों की जिम्मेदारी सौंपी है – सरकारी काम नहीं है। भाजपा का काम मंत्री करें यह उचित तो नहीं ही है, दूसरी ओर मंत्री और मुख्यमंत्री को भी सरकारी काम करने के लिए आम बाबुओं के बराबर सुरक्षा भी नहीं मिल रही है और सरकारी व भाजपाई लोग उनके खिलाफ मुकदमा चलाने की अनुमति दे रहे हैं जो बिल्कुल राजनीतिक मामले साबित हुए हैं। अमर उजाला की खबर का शीर्षक है, भाजपा ने विश्वविद्यालयों में युवाओं से संवाद का जिम्मा केंद्रीय मंत्रियों को सौंपा। कहने की जरूरत नहीं है कि यह काम केंद्रीय और डबल इंजन वाले राज्यों के शिक्षा मंत्री करते तो अलग बात होती लेकिन सरकार खुल कर मंत्रियों से चुनावी राजनीति करवा रही है और मंत्रियों के काम का पता नहीं चलता है। नवोदय टाइम्स ने अरुणाचल सीमा पर केंद्रीय मंत्री रिजिजू के बयान को पहले पन्ने पर तीन कॉलम में छापा है जो किसी और अखबार में नहीं दिखा। अव्वल तो सरकार ने इसपर अधिकृत रूप से रक्षा मंत्री या विदेश मंत्री के जरिए कुछ नहीं कहा है वह भी खबर है। उधर वंदे मातरम पर सरकार की देशभक्ति को कांग्रेस ने ठेंगा दिया है, उसपर भी कुछ नहीं है। सिर्फ ठेंगा दिखाने की खबर सभ्य और शालीन भाषा में है।

मैं रोज चार हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल दस, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। एआई का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।


