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सुख-दुख

भारत 4,000 करोड़ रुपये का नुकसान झेलकर 10 लाख टन चीनी विदेशों से खरीदेगा!

हम पहले ही अमेरिका से रिकॉर्ड इथेनॉल खरीद रहे हैं, मक्का भी बाहर से खरीद रहे हैं, अब चीनी भी खरीदेंगे..

Front page of a Hindi newspaper with a large bold lead about sugar prices rising; includes a small chart/table and images of sugar and cheese beside the story.

सुभाष सिंह सुमन-

भक्तमंडली समेत पूरे कबीले का हाल हास्यास्पद हुआ पड़ा है। आईटीसेल कोई भी मनोहर कहानी पकड़ा दे, ये लोग उसको वेदवाक्य और ब्रह्मवाक्य मान लेते हैं। सरकार को अनपच में उल्टी या लूज मोशन हो जाये, भक्त लोग उसे चाट-चाटकर साफ करने में जुट जाते हैं। हालाँकि यह अप्रत्याशित नहीं है। मैं इसी कारण बार-बार जोर देकर कहता हूँ कि भक्ति में सबसे पहले बुद्धि की बलि चढ़ती है। कल से चीनी पर एक ब्रैंड न्यू मनोहर कहानी घूम रही है। कहानी है कि गन्ने से चीनी बनाने के बाद जो कुछ बचता है, सिर्फ उससे इथेनॉल बनता है। और यह भी कि यदि इथेनॉल नहीं बनता, तो आज चीनी 100 रुपये किलो हो जाती।

अब चूँकि यह मनोहर कहानी है, जो आईटीसेल से मैन्यु्फैक्चर होकर आयी है, स्वाभाविक है इसका तथ्य या सत्य से कोई संबंध नहीं है। फिर भी कुछ विस्तार से, कुछ तथ्य से और कुछ आँकड़ों से इसे समझ लेते हैं।

ऑल इंडिया डिस्टिलर्स एसोसिएशन के आँकड़े कह रहे हैं पिछले साल 720 करोड़ लीटर इथेनॉल बना देश में। इसमें 1.33 करोड़ टन तो अनाजों का इस्तेमाल हुआ। भारत में दो ही अनाज से इथेनॉल बनाने की इजाजत है अभी। चावल और मक्का। तो माना जा सकता है कि 1.33 करोड़ टन चावल और मक्के का यूज किया गया। बाकी इथेनॉल बनाने में यूज गन्ने का हुआ। आँकड़े कहते हैं कि गन्ने और गन्ने से निकले जिन उत्पादों का इस्तेमाल इथेनॉल बनाने में किया गया, उनसे 25 लाख टन चीनी बनायी जा सकती थी।

यह आँकड़ा न भी हो, तब भी मनोहर कहानी टिकने योग्य नहीं है।

मनोहर कहानी में दावा किया जा रहा है कि सीधे गन्ने से इथेनॉल नहीं बनाया जा सकता, या गन्ने के उस हिस्से से इथेनॉल नहीं बनाया जा सकता, जिससे चीनी बनती है। यह दावा उतना ही सच है, जितना अमृतलाल ब्रो के पढ़े-लिखे होने का प्रमाणपत्र। हर वह चीज, जो सड़ती-गलती है, उससे इथेनॉल बनाया जा सकता है। जिसमें ज्यादा ग्लूकोज-फ्रक्टोज होगा, उससे ज्यादा इथेनॉल बनेगा। कई विकसित देशों में म्यूनिसिपल वेस्ट से इथेनॉल बनाया जाता है। यानी आपके घर से जो कूड़ा-कचरा निकल रहा है, उससे। उस कूड़े-कचरे में ग्लूकोज-फ्रक्टोज कम होते हैं, इस कारण उनसे कम इथेनॉल बनता है। उसके लिए मशीनें भी महँगी लगती हैं। उससे बेहतर है सीधे अनाज मिल जाये। जैसे चावल या मक्का या गेहूँ। उससे भी बेहतर है ग्लूकोज-फ्रक्टोज यानी मिठास से भरपूर कोई चीज मिल जाये। जैसे गन्ना।

सीधे अनाज या सीधे गन्ने से इथेनॉल बनाना अवॉइड किया जाता है। इसका कारण है खाद्य सुरक्षा। लेकिन जिनके पास जरूरत से बहुत ज्यादा अनाज है, वो उससे इथेनॉल बना लेते हैं। जैसे अमेरिका में मक्के का खूब यूज होता है। ब्राजील के पास गन्ना बहुत है, तो वो उसका बड़ा हिस्सा चीनी की जगह सीधे इथेनॉल बनाने में यूज कर लेता है।

भारत की स्थिति अलग है। डेढ़ अरब पेट हैं इस देश में। इस कारण भारत में न तो अनाजों से इथेनॉल बनाने की इजाजत थी और न ही सीधे गन्ने से। लेकिन यह तो बुद्धिमता वाली बात हो गयी। अमृतकाल में विजडम का क्या काम! बुद्धि का अस्तित्व अमृतकाल के लिए रिस्क है। सो कानून बदल दिये गये। इथेनॉल प्लांट्स को सीधे अनाज यूज करने की परमिशन मिल गयी। पहले टूटे चावल की मिली, फिर साबूत चावल की भी मिल गयी। मध्यप्रदेश में तो भाइयों ने फोर्टिफाइड वाला भी यूज कर डाला। मक्का हमने पूरा डाल दिया इथेनॉल में। मक्के के बड़े निर्यातक थे हम। अब अपना पूरा मक्का इथेनॉल में झोंक रहे हैं। अमेरिका से भी मक्का खरीदकर ला रहे हैं। पिछले साल एक और कानून बदला। सितंबर में खाद्य मंत्रालय ने उसे अधिसूचित किया। उसमें चीनी मिलों समेत सभी प्लांट्स को गन्ना जूस और शीरे का पूरा यूज सिर्फ इथेनॉल बनाने में करने की छूट दे दी गयी। यह छूट पूरे साल भर के लिए दी गयी। इसमें कोई रिस्ट्रिक्शन नहीं। सारी पाबंदियाँ हटा दी गयीं। खुलकर खेलने के लिए कह दिया सरकार ने। खेल गये सब। जिस रॉ मटीरियल से 25 लाख टन चीनी बनायी जा सकती थी, उसे भी पेल डाले इथेनॉल में।

अब अपने देश में लोगों की जरूरतें पूरी करने में चीनी कम पड़ जा रही है। सरकार कल 10 लाख टन कच्ची चीनी के आयात की अधिसूचना निकाल चुकी है, वो भी पूरी तरह से ड्यूटी-फ्री। पहले ही हम अमेरिका से रिकॉर्ड इथेनॉल खरीद रहे हैं। मक्का भी बाहर से खरीद रहे हैं। अब चीनी भी खरीदेंगे। आखिरी बार हमने चीनी का मेजर इम्पोर्ट 10 साल पहले किया था। तब देश में सूखा पड़ने से गन्ने की उपज बहुत कम रह गयी थी। वह प्राकृतिक आपदा थी। इस बार आपदा मूर्खता से मैन्युफैक्चर की गयी है। इस मूर्खता में सरकार को फिर से दस्त लगी है। भक्त बेचारे जुट गये हैं पूरी शिद्दत से उसे चाटकर साफ करने में।

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