प्रियंका दुबे-
बीते कुछ वर्षों में इस बात पर मेरा विश्वास पक्का होता रहा है कि अपने बारे में खुशफ़हमी और वहम का शिकार होने वाला सबसे बड़ा समुदाय पत्रकारों का है। अपवाद निश्चय ही हैं लेकिन बड़ी तादाद में पत्रकारों को लगता है कि उनको बहुत कुछ आता है, वे बहुत कुछ जानते हैं। जबकि असल में किसी भी चीज़ के बारे में या कहें कि अपनी expertise वाले क्षेत्र को छोड़कर अधिकतर चीज़ों के बारे में वे कुछ नहीं जानते।
अधिकतर बड़े पत्रकार भी बहुत- बल्कि बेहद कम पढ़ते हैं। दर्शन या इतिहास से लेकर किसी भी चीज़ का उन्हें गहराई से ज्ञान नहीं होता। उन चंद पत्रकारों को जिन्हें दुनिया को फर्स्ट हैंड देखने का मौक़ा मिलता है, उनके पास फिर भी एक ईमानदार अनुभव की बड़ी संपदा होती है -लेकिन ऐसे लोग भी उँगलियों पर गिने जा सकते हैं। पढ़ाई-लिखाई या अधिकतर विषयों को मूर्ख साबित होने की हद तक कम जानना या समझना मेरे निकट इतनी बड़ी बात नहीं है जितनी बड़ी बात वह बेइंतहा delusion है जो नब्बे फ़ीसदी से अधिक पत्रकारों को घेरे रहता है।
सत्ता के गलियारों में घूमने की वजह से अधिकतर लोगों को यह भ्रम हो जाता है कि वे महत्वपूर्ण हैं या उन्हें बहुत कुछ आता है। जबकि रेह्टोरिक्स और रैंट्स के सिवा ज़्यादातर पत्रकार कोई बात ही नहीं करते। सामाजिक मुद्दों पर BA फर्स्ट ईयर वाले तर्कों को लोग जीवन भर देते रहते हैं। कभी इस बात पर अपना परीक्षण नहीं करते कि आख़िर हम क्या बकवास कर रहे हैं? शर्म भी नहीं आती कि कुछ तो ठोस आगे का पढ़े-लिखें- कुछ काम की बात करें। वहीं प्रेस क्लब के जाम और वही सीमित बातें।
जॉन डिडियन जैसे भी पत्रकार संसार में हुए हैं। श्याम लाल जैसे संपादक भी हुए हैं। रेणु ने भी यादगार रिपोर्ताज लिखा है। हम बस अपनी गाड़ी के आगे प्रेस लिखवाकर हर दूसरी बात पर हर तीसरे दफ़्तर में रेह्टोरिक्स पे रेह्टोरिक्स परोस कर संतुष्ट रहते हैं। यह सब बहुत शर्मिंदा करता है मुझे। उदास करता है। थोड़ा आत्मवलोकन करना चाहिए।
पोस्ट पर आए ये दो कमेंट्स भी पढ़िए…
ओम थानवी-
आपकी बात ठीक है। स्थिति विकट है। टीवी की कथित पत्रकारिता ने पत्रकारिता का बेड़ा और गर्क किया है। लेकिन आपको हिंदी में एक भी पत्रकार का नाम ख़याल नहीं आया? जब जॉन डिडियन और शाम लाल (श्याम लाल नहीं) का ज़माना आपको याद आ गया, तो पचास नाम हिंदी के मैं एक साँस में गिना सकता हूँ जिनसे हमने भाषा और निष्ठा सीखी, जिनकी समझ (पढ़ें लेखन) ने समाज, राजनीति, साहित्य, कला, सिनेमा, शिल्प आदि में हमें भी झकझोरा। आपने दिनमान में छपे रेणु के रिपोर्ताज का ज़िक्र वाजिब किया, लेकिन सच्चिदानंद वात्स्यायन का नाम भूल गईं जिन्होंने बिहार के सूखे की रिपोर्टिंग की थी। यात्रा में रेणु उनके साथ थे। नेत्रसिंह रावत, विष्णु खरे, प्रयाग शुक्ल या विनोद भारद्वाज न होते तो कला या सिनेमा की हमारी समझ क्या होती? प्रभाष जोशी और राजेंद्र माथुर तो हमारे सामने ही महान हुए। बाक़ी सुरेंद्र किशोर (उनके जो भी विचार हों) से लेकर राजकिशोर (रविवार वाले) तक सलीक़े के पत्रकारों की सूची भी छोटी नहीं। इसका अर्थ यह न निकालें कि आपकी बात की काट है; महज़ कुछ तरमीम की ओर इशारा है।
संजय पटेल-
आपने ठीक कहा पत्रकारिता से स्वाध्याय गुम है।
मेरी स्मृति में मजबूती से वे दृश्य भी दर्ज हैं जब राहुल बारपुते, राजेंद्र माथुर और प्रभाष जोशी जैसे वरेण्य पत्रकार पंडित रविशंकर, पंडित कुमार गंधर्व या बिरजू महाराज के लाइव कंसर्ट में, हबीब तनवीर के नाटकों में या जे स्वामीनाथन और कलागुरु विष्णु चिंचालकर की चित्र नुमाइश में रिलीजिसली नज़र आते थे। कला और समाज से विमुखता, पत्रकार के बौद्धिक को कमज़ोर करती है। हाँ अक्षयकुमार, आलिया भट्ट, दिलजीत दोसांज और विराट कोहली के आयोजन में मीडिया की शानदार उपस्थिति नज़र आ जाएगी।



