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जयशंकर की पुस्तक पर परिचर्चा में इतिहास, सत्ता, पत्रकारिता और लोकतांत्रिक मूल्यों पर गंभीर विमर्श!

Group of men standing along a table on a stage, each holding a book during a book-launch event, with a projector screen in the background.

राजगोपाल सिंह वर्मा-

आपातकाल से अमृतकाल तक : लोकतंत्र के सवाल!

जयशंकर की पुस्तक पर परिचर्चा में इतिहास, सत्ता, पत्रकारिता और लोकतांत्रिक मूल्यों पर गंभीर विमर्श

आपातकाल के पचास वर्ष बाद भारतीय लोकतंत्र कहाँ खड़ा है? क्या हमारी संवैधानिक संस्थाएँ पर्याप्त स्वतंत्र हैं? राजनीतिक दलों में लोकतंत्र कितना बचा है? और क्या पत्रकारिता आज भी सत्ता से निर्भीक होकर सवाल पूछ पा रही है? इन्हीं प्रश्नों के बीच जयशंकर की लगभग सवा पाँच सौ पृष्ठों की पुस्तक पर आयोजित परिचर्चा में वरिष्ठ पत्रकारों, समाजवादी नेताओं, साहित्यकारों और बुद्धिजीवियों ने भारतीय राजनीति के पिछले छह दशकों का विश्लेषण किया। अध्यक्षता वरिष्ठ कवि मदन कश्यप ने की।

प्रो. राजकुमार जैन ने पुस्तक को आधुनिक भारत के राजनीतिक इतिहास का महत्वपूर्ण दस्तावेज बताया। प्रो. जैन ने कहा कि पुस्तक की असली शक्ति लेखक का अपना भोगा हुआ इतिहास है। अखबारों की कतरनों और पुस्तकों से सामग्री संकलित करके इतिहास लिखना अलग बात है, लेकिन उन्नीस महीने जेल में बिताकर उस दौर की पीड़ा, संघर्ष और मनःस्थिति को शब्द देना अलग अनुभव है।

उन्होंने पुस्तक की प्रस्तावना का उल्लेख करते हुए कहा कि आपातकाल के समय भारत की जनसंख्या लगभग 62 करोड़ थी, जो अब लगभग 145 करोड़ है। नई पीढ़ियों का बहुत बड़ा हिस्सा उस दौर का प्रत्यक्ष साक्षी नहीं रहा। इसलिए आपातकाल का इतिहास केवल राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप के लिए नहीं, लोकतांत्रिक चेतना विकसित करने के लिए पढ़ा जाना चाहिए।

प्रो. जैन ने पुस्तक में आपातकाल और वर्तमान राजनीतिक परिस्थितियों के बीच किए गए अंतर को रेखांकित किया। उनके अनुसार 1975 का आपातकाल सीमित अवधि का था, लेकिन वर्तमान राजनीतिक प्रवृत्तियों के सामाजिक और संस्थागत प्रभाव कितने लंबे समय तक रहेंगे, यह कहना कठिन है। उन्होंने इंदिरा गांधी की अधिनायकवादी गलतियों की आलोचना के साथ वर्तमान राजनीति में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण पर चिंता व्यक्त की।

उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के इतिहास और कार्यप्रणाली पर पुस्तक के विस्तृत अध्यायों को भी महत्वपूर्ण माना तथा इसे विद्यार्थियों और शोधार्थियों के लिए उपयोगी बताया।

विनोद अग्निहोत्री ने लोकतांत्रिक संस्थाओं की स्वायत्तता को केंद्रीय प्रश्न बनाया। उन्होंने कहा कि चुनाव प्रक्रिया पर उठने वाले सवालों का जवाब चुनाव आयोग को देना चाहिए, सत्तापक्ष को नहीं। संस्थाओं की निष्पक्षता लोकतंत्र की बुनियादी शर्त है। उन्होंने राजनीतिक दलों में आंतरिक लोकतंत्र के अभाव, समाजवादी आंदोलन के परिवारवाद और जातीय राजनीति में सिमटने तथा कांग्रेस के वैचारिक और संगठनात्मक क्षरण की भी आलोचना की। उनके अनुसार लोकतंत्र की वर्तमान कमजोरियों के लिए विभिन्न राजनीतिक धाराओं को अपनी जिम्मेदारी स्वीकार करनी होगी।

उर्मिलेश ने इंदिरा गांधी के मूल्यांकन में ऐतिहासिक परिस्थितियों को समझने पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि आपातकाल और अधिनायकवादी प्रवृत्तियों की आलोचना जरूरी है, लेकिन बैंक राष्ट्रीयकरण जैसे जनपक्षीय निर्णयों तथा अमेरिकी वर्चस्व के विरुद्ध उनके राजनीतिक रुख की उपेक्षा भी उचित नहीं होगी। उन्होंने तत्कालीन दक्षिणपंथी शक्तियों, कांग्रेस के भीतर के विरोध और समाजवादी नेतृत्व के राजनीतिक निर्णयों की समीक्षा की आवश्यकता बताई। अपने बचपन के संस्मरणों के माध्यम से उन्होंने समाजवादी और कम्युनिस्ट आंदोलनों की साझा राजनीतिक संस्कृति को भी याद किया।

कमर वहीद नकवी ने आपातकाल की घोषित सेंसरशिप और आज की पत्रकारिता की परिस्थितियों की तुलना की। उन्होंने बताया कि तब समाचारों को प्रकाशित करने से पहले सरकारी अधिकारियों की स्वीकृति लेनी पड़ती थी। आज औपचारिक सेंसरशिप नहीं है, फिर भी पत्रकारिता की स्वतंत्रता पर गंभीर प्रश्न हैं। उन्होंने विद्यालय के मध्याह्न भोजन की खराब व्यवस्था उजागर करने वाले पत्रकार पर कार्रवाई और युद्ध के दौरान टेलीविजन चैनलों की भ्रामक रिपोर्टिंग के उदाहरण दिए। उनका सवाल था कि मीडिया के इतने बड़े हिस्से में एक जैसी गलत सूचनाएँ कैसे प्रसारित होती हैं? उन्होंने चेताया, ‘अगर आपसे सच नहीं बोला जा रहा है तो यकीनन आपको ठगा जा रहा है।’

मोहन प्रकाश ने आपातकाल में अपनी गिरफ्तारी और समाजवादी आंदोलनों के अनुभव साझा किए। उन्होंने कहा कि इंदिरा गांधी की गलतियों का उल्लेख वर्तमान सरकारों को वैसी गलतियाँ दोहराने का अधिकार नहीं देता। उन्होंने 12 जून 1975 के इलाहाबाद उच्च न्यायालय के निर्णय का उल्लेख करते हुए न्यायिक संस्थाओं की भूमिका रेखांकित की। उनकी सबसे बड़ी चिंता समाज में बढ़ती असहिष्णुता और असहमति के प्रति हिंसक व्यवहार को लेकर थी। हालाँकि नई पीढ़ी के शांतिपूर्ण आंदोलनों में उन्हें उम्मीद दिखाई देती है। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि जनता की सामूहिक शक्ति के सामने कोई सत्ता स्थायी नहीं रह सकती।

वरिष्ठ पत्रकार एवं लेखक अरविन्द मोहन ने जयशंकर गुप्त की पुस्तक आपातकाल से अमृतकाल को पिछले पचास वर्षों के भारतीय राजनीतिक इतिहास का महत्वपूर्ण दस्तावेज बताया। उनके अनुसार पुस्तक का महत्व आपातकाल और वर्तमान राजनीतिक परिस्थितियों की तुलना से कहीं अधिक व्यापक है। विशेष रूप से आपातकाल संबंधी अध्यायों में अनेक घटनाओं, व्यक्तियों और परिस्थितियों का ऐसा विस्तृत विवरण मिलता है, जो उस दौर के उपलब्ध साहित्य को उपयोगी ढंग से समृद्ध करता है। हालाँकि, उन्होंने पुस्तक के विश्लेषण में एक महत्वपूर्ण कमी की ओर ध्यान दिलाया। उनका कहना था कि 1975 के आपातकाल को केवल इंदिरा गांधी और संजय गांधी की महत्वाकांक्षाओं अथवा सत्ता के केंद्रीकरण का परिणाम मानना पर्याप्त नहीं है। उसके पीछे तत्कालीन समाज की सामंती प्रवृत्तियों, विशेषाधिकार प्राप्त वर्गों, नौकरशाही और सत्ता से लाभान्वित समूहों की भूमिका की भी पड़ताल आवश्यक है। उन्होंने के. सी. त्यागी के वक्तव्य का संदर्भ देते हुए नेहरू के दौर से इंदिरा गांधी के समय तक राजनीतिक संगठन और सत्ता के संबंधों में आए परिवर्तनों को समझने पर जोर दिया। उनके अनुसार यह प्रश्न भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि आपातकाल को संभव बनाने वाली परिस्थितियाँ क्या थीं और बाद में किन राजनीतिक तथा सामाजिक कारणों से उसे समाप्त कर चुनाव कराने का निर्णय लिया गया। इसी ऐतिहासिक दृष्टि से उन्होंने वर्तमान परिस्थितियों का मूल्यांकन करने का आग्रह किया। उनका प्रश्न था कि लोकतांत्रिक संस्थाओं की स्वायत्तता और नागरिक स्वतंत्रताओं को लेकर उठती चिंताओं के बावजूद औपचारिक आपातकाल की आवश्यकता क्यों नहीं समझी जा रही है। इसका उत्तर राजनीतिक नेतृत्व के निर्णयों के साथ भारतीय समाज में पिछले चार दशकों के दौरान हुए संरचनात्मक परिवर्तनों में भी खोजा जाना चाहिए।

अरविन्द मोहन ने इस संदर्भ में वैश्वीकरण, मंडल और मंदिर को भारतीय राजनीति के तीन महत्वपूर्ण परिवर्तनकारी कारकों के रूप में रेखांकित किया। उनके अनुसार पुस्तक में मंडल और मंदिर की राजनीति पर चर्चा हुई है, लेकिन वैश्वीकरण तथा उसके राजनीतिक प्रभावों का अपेक्षित विश्लेषण नहीं मिलता। राजीव गांधी के दौर से आरंभ हुए आर्थिक नीतिगत परिवर्तनों और बाद की विभिन्न सरकारों द्वारा अपनाई गई उदारीकरण की दिशा ने राज्य, बाजार, निजी पूँजी और राजनीतिक सत्ता के संबंधों को प्रभावित किया। भूमि अधिग्रहण, कृषि नीतियों, निजीकरण तथा अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थाओं के प्रभाव का उल्लेख करते हुए उन्होंने तर्क दिया कि विभिन्न सरकारों की आर्थिक नीतियों में दिखाई देने वाली निरंतरता को इस व्यापक संदर्भ में समझना आवश्यक है। उनके आकलन में मंदिर आंदोलन से विकसित राजनीतिक शक्तियों और वैश्वीकरण की आर्थिक दिशा के बीच अपेक्षाकृत अधिक सामंजस्य दिखाई दिया, जबकि मंडल राजनीति से उभरे नेतृत्व का संबंध अधिक जटिल रहा। लेकिन अरविन्द मोहन का विश्लेषण लोकतंत्र के भविष्य को लेकर निराशा तक सीमित नहीं था। उन्होंने पिछड़े वर्गों, वंचित समुदायों और सामाजिक न्याय के आंदोलनों से विकसित राजनीतिक चेतना को लोकतांत्रिक प्रतिरोध की महत्वपूर्ण शक्ति माना। उनके अनुसार संविधान, सार्वभौमिक मताधिकार और सामाजिक भागीदारी के विस्तार ने ऐसे समूहों को राजनीतिक हस्तक्षेप की क्षमता प्रदान की है, जिन्हें अब आसानी से अनदेखा नहीं किया जा सकता। इसलिए भारतीय लोकतंत्र का मूल्यांकन करते समय संस्थागत कमजोरियों के साथ समाज में विकसित हुई प्रतिरोध की शक्तियों को भी पहचानना आवश्यक है। अरविन्द मोहन की इस टिप्पणी से परिचर्चा में एक महत्वपूर्ण विश्लेषणात्मक आयाम जुड़ा कि लोकतंत्र के संकट को समझने के लिए राजनीतिक सत्ता के चरित्र के साथ आर्थिक संरचना और सामाजिक शक्तियों के बदलते संबंधों का अध्ययन भी अनिवार्य है।

बक्सर के सांसद सुधाकर सिंह ने ‘अमृतकाल’ की अवधारणा पर सवाल उठाते हुए समुद्र मंथन के अमृत वितरण का उदाहरण दिया। उन्होंने पूछा कि आज के अमृतकाल का लाभ किन वर्गों तक पहुँच रहा है। उन्होंने लोकतंत्र के ऐतिहासिक विकास, उसकी सामाजिक आधारभूमि और वर्तमान व्यवस्था में जनता की वास्तविक भागीदारी पर विचार करने की आवश्यकता बताई।

अध्यक्षीय वक्तव्य में मदन कश्यप ने सत्य, निर्भयता और लेखकीय स्वतंत्रता को विशेष महत्व दिया। उन्होंने कबीर की परंपरा का उल्लेख करते हुए कहा कि आज सच बोलने से पहले भयमुक्त होना आवश्यक है। पत्रकारिता में ‘मैन्युफैक्चरिंग कंसेंट’, अर्थात सत्य के बजाय मनचाही सहमति तैयार करने की प्रवृत्ति पर उन्होंने चिंता व्यक्त की। उनके अनुसार यह समस्या केवल मुख्यधारा के मीडिया तक सीमित नहीं है, स्वतंत्र डिजिटल पत्रकारिता में भी वैचारिक पूर्वाग्रह काम करते हैं।

उन्होंने राजनीति, साहित्य और पत्रकारिता की भाषा में कल्पनाशीलता के क्षरण की चर्चा की, लेकिन हाल के जनांदोलनों की रचनात्मक अभिव्यक्तियों में नई संभावनाएँ भी देखीं। लेखक और राजनेता की भूमिकाओं का अंतर स्पष्ट करते हुए उन्होंने कहा कि राजनीति प्रायः सत्ता के विरुद्ध दूसरी सत्ता खड़ी करती है, जबकि लेखक का दायित्व सत्ता के विरुद्ध सहअस्तित्व की चेतना विकसित करना है।

इस परिचर्चा की विशेषता यह रही कि आपातकाल को केवल अतीत की घटना नहीं, बल्कि वर्तमान लोकतंत्र को समझने के ऐतिहासिक संदर्भ के रूप में देखा गया। वक्ताओं ने अलग-अलग दृष्टिकोणों से संस्थाओं की स्वतंत्रता, राजनीतिक नैतिकता, समाजवादी आंदोलन की विरासत, सांप्रदायिकता, पत्रकारिता और नागरिक अधिकारों के प्रश्न उठाए।

आखिर लोकतंत्र की रक्षा केवल सत्ता परिवर्तन से होगी या राजनीतिक संस्कृति, संस्थाओं और समाज के लोकतांत्रिक चरित्र को मजबूत करने से? यही प्रश्न इस पूरी परिचर्चा के केंद्र में रहा।

परिचर्चा में वरिष्ठ समाजवादी नेता के. सी. त्यागी तथा वरिष्ठ पत्रकार संदीप चौधरी और आशुतोष की भागीदारी भी उल्लेखनीय रही जिन्होंने विषय के संदर्भ में अपनी अपनी वैचारिकता स्पष्ट की।

Poster for a Hindi literary event featuring a book cover on the left and 16 speaker photos with names on a yellow background, with event details in Hindi on the left edge.
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