चंद्र भूषण-
एंग्जाइटी की बीमारी और यक्ष का एक सवाल…
महाभारत के यक्ष-युधिष्ठिर संवाद में यक्ष का प्रश्नपत्र कठिन तो है ही, साथ में यह बहुत लंबा भी है। पूरे पचासी श्लोकों में चले इस सवाल-जवाब के सिलसिले को शुरू से अंत तक पढ़ना आज भी हम जैसे किसी आम पढ़वैये को बुरी तरह थका देता है। ऐसे में सोचा जा सकता है कि अपने चार महापराक्रमी भाइयों को तालाब के किनारे मरा हुआ देखकर उनके प्राण लौटाने की फिक्र के अलावा प्यास से अपने प्राण बचाने की भी महाचिंता में डूबे युधिष्ठिर के लिए किसी अदृश्य प्रश्नकर्ता के इन सवालों का सही और सटीक जवाब देना कितना टेढ़ा काम रहा होगा।
आम तौर पर हमारे सामने इस अति विस्तृत प्रश्नावली के अंतिम चार सवाल आते रहे हैं, जो एक श्लोक की पहली अर्धाली बनाते हैं। ‘को मोदते, किमाश्चर्यम्, क: पंथा: काच वार्तिका?’ कौन खुश रहता है? आश्चर्य क्या है? रास्ता कौन सा है, और बतकही क्या है? युधिष्ठिर न सिर्फ इन प्रश्नों के, बल्कि सारे ही प्रश्नों के जमीनी जवाब देते हैं। अत्यंत सरल संस्कृत में सदा-सर्वदा टिके रह जाने वाले जवाब। जगह की कमी के चलते हम इन चार में केवल दूसरे वाले सवाल पर अपना ध्यान केंद्रित करते हैं- ‘आश्चर्य क्या है?’
जवाब है- ‘अहन्यहनि भूतानि गच्छंतिह्यमालयम्/ शेषा: स्थावरमिच्छंति किमाश्चर्यमत: परम्?’ दिन-रात प्राणियों को यमराज के घर (मौत के मुंह में) जाते हुए देखकर भी बाकी लोग खुद को अजर-अमर मानते रहते हैं, इससे बड़ा आश्चर्य और क्या हो सकता है? सवाल के जवाब में स्वत:सिद्ध सत्य जैसा एक और सवाल अक्सर प्रश्नकर्ता का मुंह बंद कर देने के लिए काफी होता है। लेकिन हम भारतीयों के लिए यह चिंता का विषय होना चाहिए कि यक्ष-युधिष्ठिर संवाद के बाद इस सवाल पर बार-बार लौटना, इसका हल खोजना हमें जरूरी क्यों नहीं लगा!
मजे की बात यह कि अपनी मृत्यु का प्रश्न भारत में ही नहीं, पूरी दुनिया में लोगों के लिए मन के स्तर पर हमेशा से गैरजरूरी रहा है, और आज भी हर जगह यह वैसा ही है। कबीर के यहां अलबत्ता इसने दूसरा स्वरूप लिया है- ‘हम न मरब मरिहै संसारा, हमकूं मिला जियावन हारा।’ सारा संसार मर जाएगा, मैं नहीं मरूंगा (क्योंकि) मुझे जिलाने वाला मिल गया है। जाहिर है, इस बात का संदर्भ बिल्कुल अलग है। उनसे पहले गोरख के यहां मौत को स्वागत योग्य बताया गया है- ‘मरो हे जोगी मरो, मरण है मीठा।’
अमरता का आध्यात्मिक आयाम कबीर और गोरख के बाद इतने ही सुंदर ढंग से आपको रूसी उपन्यासकार फ्योदोर दोस्तोएव्स्की की रचना ‘ब्रदर्स करमाजोव में’ मिल सकता है, हालांकि वह मुख्यत: ईश्वरहीन आध्यात्मिकता है। ‘कुछ तो आपका बचा ही रह जाएगा। एक बार पैदा हो गए, फिर मरने का सवाल कहां पैदा होता है?’ आधुनिक विज्ञान और मनोविज्ञान का चिंतन इस बात पर चल रहा है कि लोग अपने सामने दूसरों को मरते हुए देखकर भी बाकी चीजों से ज्यादा अपनी मृत्यु की चिंता क्यों नहीं करते? यह भी कि जिस हद तक करते हैं, उस हद तक इस चिंता के संदर्भ समय के साथ किस तरह बदल रहे हैं?
मानव-मस्तिष्क के इजराइली अध्येता यैर डोर-जिडरमन ने लोगों के सामने स्क्रीन पर कई आत्मीय या जाने-पहचाने जिंदा इंसानी चेहरे रखे। साथ में मृत्यु की शब्दावली वाले कुछ शब्द, जैसे- ‘कफन-दफन’, ‘अंतिम संस्कार’, ‘रस्म उठाला’ वगैरह। इस दौरान देखने वालों की दिमागी उथल-पुथल का हाल जानने के लिए उनके दिमाग की एमआरआई स्कैनिंग चलती रही। सभी चेहरों के उभरने के साथ दिमाग में आश्चर्य वाली जगह सक्रिय होती और कोई किस्सा सा बनता था। लेकिन इन चेहरों में जब भी देखने वाले का अपना चेहरा उभरता तो दिमाग ठस्स हो जाता था। आश्चर्य तो क्या, कोई प्रतिक्रिया तक नहीं!
अचरज में आकर कोई ट्रैजेडी या कॉमेडी गढ़ना तो दूर, अपनी मौत की खबर पर इंसान चौंकता भी नहीं। प्रकृति ने न सिर्फ हमारा बल्कि शायद हर जीव का दिमाग उसे जिंदा रखने की कोशिशें करने के लिए ही बना रखा है। मौत का ख्याल इन कोशिशों को कमजोर कर सकता है, लिहाजा शुरू से उस सर्किट को ही ठप रखा गया है। मृत्युभय अलबत्ता जिंदा रहने के लिए एक जरूरी तत्व है, लेकिन समय बीतने के साथ जैसे-जैसे जीवन की सुरक्षा बढ़ रही है, मन पर यह जरूरत से ज्यादा हावी होता जा रहा है।
बूढ़े-बीमार लोगों के लिए अब अधिक इंतजाम होने लगे हैं। उनका जीवन लंबा खींचने के लिए पूरी हेल्थकेयर इंडस्ट्री खड़ी है। लेकिन स्वयं मृत्यु पहले लोगों को जितनी नजदीकी से शिक्षित करती थी, अपने प्रति उन्हें निर्भय बनाती थी, वह प्रक्रिया दिनोंदिन कमजोर पड़ती जा रही है। मृत्युभय की पड़ोसी ‘दुश्चिंता’ (एंग्जाइटी) अभी मानव मनोविज्ञान की विश्वव्यापी धुरी बन गई है। मनोचिकित्सकों के लिए यह गंभीर चिंता का विषय है लेकिन इसका एक दार्शनिक पक्ष भी है, जिसपर कोई काम नहीं हो पा रहा है।

