संजय सिन्हा-
तुम अभी जेल जाओगे, कल तुम पेंशन पाओगे
पूर्व सूचना- कई लोग पूछते हैं कि संजय सिन्हा आजकल ऐसी पोस्ट क्यों लिख रहे हैं? बताना है कि क्या पता कभी इस लेखन क्रांति के बदले पेंशन मिल जाए।
आज जो सरकार की नीतियों का विरोध कर रहे हैं, जो सड़कों पर उतर रहे हैं, जो गिरफ्तार हो रहे हैं और जो जेल जा रहे हैं, उनसे मेरी एक छोटी सी गुजारिश है। अपना जेल का रिकॉर्ड संभालकर रखिएगा।
क्या पता, आज जिस जेल को आप अपनी लड़ाई की कीमत समझ रहे हैं, वही कल आपके लिए सरकारी पेंशन का रास्ता खोल दे।
आप सोच रहे होंगे कि मैं मजाक कर रहा हूं। नहीं, मैं एक ऐसी व्यवस्था की बात कर रहा हूं, जो हमारे देश में सचमुच मौजूद है। भारत में आपातकाल के दौरान जेल जाने वाले लोगों के लिए कई राज्य सरकारों ने पेंशन या सम्मान राशि की व्यवस्था की है। मध्य प्रदेश में इसे लोकतंत्र सेनानी सम्मान निधि कहा जाता है, बिहार में जेपी सेनानी सम्मान पेंशन योजना के नाम से सहायता दी जाती है।
दूसरे राज्यों में भी अलग-अलग नामों से ऐसी योजनाएं हैं। यानी सरकार के विरोध में जेल जाने का एक ऐसा इतिहास भी है, जिसकी राजनीतिक व्याख्या के साथ आर्थिक परिणति भी जुड़ गई है।
25 जून 1975 को देश में आपातकाल लगा था। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की सरकार ने नागरिक स्वतंत्रताओं पर गंभीर प्रतिबंध लगाए। विपक्षी नेताओं, राजनीतिक कार्यकर्ताओं और दूसरे लोगों को मीसा यानी मेंटेनेंस ऑफ इंटरनल सिक्योरिटी एक्ट और डीआईआर जैसे कानूनों के तहत जेल में रखा गया।
21 मार्च 1977 को आपातकाल समाप्त हुआ। उसके बाद राजनीतिक सत्ता बदली और जनता पार्टी की सरकार बनी। उस दौर में जेल जाने वाले अनेक लोगों को लोकतंत्र की रक्षा के संघर्ष का हिस्सा माना गया।
यह भी सच है कि आपातकाल भारतीय लोकतंत्र के इतिहास का एक गंभीर अध्याय है। सरकार के पास असाधारण शक्तियां थीं और नागरिक स्वतंत्रताओं का दमन हुआ था। लेकिन सवाल यह है कि उस दौर की स्मृति को सम्मानित करने का सबसे उचित तरीका क्या होना चाहिए था? क्या जेल में बिताए समय के आधार पर आजीवन पेंशन देना ही इसका स्वाभाविक उत्तर था?
सरकारें अपने विवेक से योजनाएं बनाती हैं। एक सरकार किसी ऐतिहासिक संघर्ष को सम्मान देने का निर्णय ले सकती है। लेकिन जब उस निर्णय का आर्थिक भार जनता के खजाने पर पड़ता है, तो यह पूछना भी जनता का अधिकार है कि उस खर्च का आधार क्या है और उसकी सीमा कहां तक है?
मध्य प्रदेश में मीसाबंदियों के लिए लोकतंत्र सेनानी सम्मान निधि की व्यवस्था की गई। वर्ष 2018 में इस योजना के समय लगभग 2,000 लाभार्थियों के लिए सालाना करीब 40 करोड़ रुपये के खर्च का आंकड़ा सामने आया था। यह उस समय का अनुमान था, आज का सत्यापित खर्च नहीं। बिहार में जेपी सेनानी सम्मान पेंशन योजना के अंतर्गत 1974 से 1977 के आंदोलन के दौरान जेल जाने वाले पात्र लोगों को पेंशन दी जाती है।
बिहार सरकार ने अगस्त 2025 में जेपी सेनानियों की पेंशन दोगुनी करने का फैसला किया।
छह महीने से अधिक जेल में रहने वालों की मासिक पेंशन 15,000 रुपये से बढ़ाकर 30,000 रुपये और कम अवधि के लिए जेल जाने वालों की पेंशन 7,500 रुपये से बढ़ाकर 15,000 रुपये कर दी गई।
अब जरा हिसाब लगाइए। कभी चुनी हुई सत्ता का विरोध करने के बदले तीस हजार रुपए।
यह पैसा किसी नेता की निजी तिजोरी से नहीं आता। यह जनता के खजाने से आता है। उसी जनता के खजाने से, जिससे अस्पताल चलते हैं, सरकारी स्कूल चलते हैं, सड़कें बनती हैं, गरीबों के लिए योजनाएं चलती हैं और बुजुर्गों को सामाजिक सुरक्षा मिलती है।
सवाल पूछना जरूरी है। लेकिन क्या किसी ऐतिहासिक राजनीतिक संघर्ष में जेल जाने के कारण किसी व्यक्ति को जीवन भर पेंशन मिलनी चाहिए?
अब मान लीजिए कि आज कोई सरकार की किसी नीति का विरोध करता है। वह धरने पर बैठता है, प्रदर्शन करता है और गिरफ्तार हो जाता है। मुकदमा चलता है। वह जमानत पर बाहर आता है या कुछ समय जेल में बिताता है। आज उसके समर्थक उसे आंदोलनकारी कहते हैं, विरोधी उसे कानून तोड़ने वाला बताते हैं। समय बीतता है और राजनीति करवट बदलती है।
कल को केंद्र में दूसरी सरकार आ जाती है। तब नई सरकार यह घोषणा कर देती है कि पिछली सरकार की नीतियों के विरोध में जेल जाने वाले लोगों को लोकतंत्र की रक्षा करने वाला मानकर पेंशन दी जाएगी।
तब क्या होगा? जो लोग आज अपने आंदोलन को लोकतंत्र की लड़ाई बता रहे हैं, वे कल उसी आधार पर सम्मान राशि के दावेदार हो सकते हैं। उनकी गिरफ्तारी की तारीखें, जेल में बिताए दिन और मुकदमों के दस्तावेज अचानक महत्वपूर्ण हो जाएंगे।
इसलिए संजय सिन्हा की सलाह पर गंभीरता से विचार कीजिए। अपना रिकॉर्ड संभालकर रखिएगा।
क्या पता, जिस आंदोलन के कारण आज आपकी नौकरी जाए, परिवार परेशान हो या आपको जेल जाना पड़े, उसी आंदोलन का कोई राजनीतिक उत्तराधिकारी कल आपकी आर्थिक सहायता का आधार बना दे।
मीसाबंदी पेंशन की कहानी केवल अतीत की कहानी नहीं है। यह आज के आंदोलनों और आने वाली सरकारों के लिए भी एक सवाल है। सरकारें आती-जाती रहेंगी, लेकिन जनता के खजाने पर पहला हक जनता का ही रहना चाहिए।
इसलिए आंदोलन कीजिए, अपने अधिकारों के लिए लड़िए, अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाइए। और हां, अपना जेल का रिकॉर्ड संभालकर रखिएगा। पता नहीं, कब किस्मत की लॉटरी लग जाए!
नोट– हमारे देश में बहुतै लोग चुप्पे चाप इंदिरा विरोध का सम्मान प्रति माह डकार रहे हैं। 1975 में मैं बच्चा था, मौका चूक गया। दो चार दिन के लिए गलती से भीतर होता तो आज 30 हजार रुपए महीना दबा रहा होता। मैं उम्मीद से हूं।

