नई दिल्ली। भारत में टेलीविजन की दर्शक संख्या मापने वाली रेटिंग का संकट लंबा खिंचता जा रहा है। इसका असर टीवी चैनलों के साथ विज्ञापनदाताओं पर भी पड़ रहा है। इस बीच, Google ने विज्ञापनदाताओं के बीच YouTube को टेलीविजन के मुकाबले बेहतर निवेश विकल्प के रूप में पेश करने की मुहिम तेज कर दी है। दूसरी ओर, टीवी रेटिंग से जुड़े गतिरोध को दूर करने के लिए केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की अध्यक्षता में गठित मंत्रियों के समूह (GoM) की दूसरी बैठक अब तक नहीं हो सकी है।
विभिन्न मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, सितंबर के आखिरी सप्ताह में शुरुआती विचार-विमर्श के बाद मंत्रियों के समूह की दूसरी बैठक नहीं हुई है। रिपोर्ट में इसकी एक वजह कॉकroach जनता पार्टी (CJP), कांग्रेस, माकपा और अन्य वामपंथी संगठनों से जुड़े विरोध प्रदर्शनों के कारण मंत्रियों की व्यस्तता बताई गई है। इस बीच, टेलीविजन रेटिंग का निलंबन जारी रहने से ब्रॉडकास्टर्स और विज्ञापनदाताओं के सामने अनिश्चितता बनी हुई है।
YouTube को टीवी से बेहतर बताने में जुटा Google
BestMediaInfo की रिपोर्ट के अनुसार, Google ने अपने ‘Drive Festive Business Growth with Google and YouTube’ अभियान के जरिए विज्ञापनदाताओं को आकर्षित करने की कोशिश तेज कर दी है। कंपनी का दावा है कि YouTube पर विज्ञापन से मिलने वाला निवेश पर प्रतिफल (ROI), लीनियर टेलीविजन के मुकाबले 1.98 गुना और ओटीटी प्लेटफॉर्म के मुकाबले 1.94 गुना है।
Google ने ये आंकड़े Analytic Edge की ओर से 2021 से 2025 के बीच भारत में उपभोक्ता उत्पादों (CPG) की मार्केटिंग मिक्स मॉडलिंग से जुड़े अध्ययनों के विश्लेषण के आधार पर पेश किए हैं।
हालांकि, ये अध्ययन मौजूदा टीवी रेटिंग संकट शुरू होने से पहले के हैं। Google की प्रचार सामग्री में इन तुलनाओं को स्वतंत्र रूप से परखने के लिए जरूरी विस्तृत जानकारी उपलब्ध नहीं है। इसमें अलग-अलग उत्पाद श्रेणियों के नतीजों, विज्ञापन खर्च से जुड़ी धारणाओं और अध्ययन की विस्तृत पद्धति का खुलासा नहीं किया गया है।
ऐसे में Google के दावों को पूरे विज्ञापन बाजार पर लागू होने वाला निष्कर्ष मानने के बजाय कंपनी की ओर से पेश किए गए आंकड़ों के रूप में देखना जरूरी है।
मैगी के विज्ञापन अभियान का भी दिया उदाहरण
Google ने 15 अक्टूबर को Google for Business India के जरिए मैगी के एक विज्ञापन अभियान का उदाहरण भी पेश किया। कंपनी के मुताबिक, YouTube के कनेक्टेड टीवी (CTV) और लीनियर टेलीविजन के संयुक्त इस्तेमाल से 15.6 करोड़ विशिष्ट दर्शकों तक पहुंच बनाई गई। इसमें YouTube CTV ने पांच प्रतिशत अंक की अतिरिक्त पहुंच का योगदान दिया।
हालांकि, इस उदाहरण में भी YouTube CTV और पारंपरिक टेलीविजन दोनों का इस्तेमाल किया गया था। Google की प्रचार सामग्री में YouTube CTV से मिली अतिरिक्त पहुंच को प्रमुखता दी गई, लेकिन दोनों माध्यमों की अलग-अलग पहुंच, विज्ञापन पर हुआ खर्च और लागत के मुकाबले मिली सफलता का पूरा विवरण नहीं दिया गया।
टीवी उद्योग के लिए यह स्थिति इसलिए चुनौतीपूर्ण है, क्योंकि नियमित और स्वतंत्र दर्शक संख्या के आंकड़े उपलब्ध नहीं होने पर चैनलों के लिए विज्ञापनदाताओं के सामने अपनी पहुंच और विज्ञापनों के प्रभाव को प्रमाणित करना मुश्किल हो जाता है।
बिना रेटिंग के विज्ञापन बजट तय करना मुश्किल
टेलीविजन रेटिंग का इस्तेमाल विज्ञापनदाता यह समझने के लिए करते हैं कि उनके विज्ञापन कितने दर्शकों तक पहुंचे और अलग-अलग चैनलों पर विज्ञापन देने से उन्हें कितना फायदा हुआ। रेटिंग उपलब्ध नहीं होने पर विज्ञापन अभियानों की तुलना करना और बड़े विज्ञापन बजट के इस्तेमाल को सही ठहराना मुश्किल हो सकता है।
डाबर के राजीव दुबे ने पहले इस स्थिति की तुलना ऐसे मरीज से की थी, जो आईसीयू में हो, लेकिन उसके स्वास्थ्य की निगरानी करने वाले उपकरण काम नहीं कर रहे हों। उनकी टिप्पणी का आशय था कि विश्वसनीय रेटिंग के बिना टेलीविजन पर किए गए बड़े विज्ञापन निवेश का आकलन करना कठिन हो जाता है।
वहीं, फास्ट मूविंग कंज्यूमर गुड्स (FMCG) क्षेत्र के अन्य अधिकारियों ने भी डिजिटल विज्ञापन की उपयोगिता स्वीकार करते हुए कहा है कि नए ग्राहकों और नए बाजारों तक बड़े पैमाने पर पहुंच बनाने में पारंपरिक टेलीविजन की भूमिका अलग है। डिजिटल विज्ञापन से बिक्री बढ़ाने में मदद मिल सकती है, लेकिन हर परिस्थिति में वह टेलीविजन जैसी व्यापक पहुंच का विकल्प नहीं बनता।
रेटिंग के अभाव में विज्ञापनदाताओं के लिए करोड़ों रुपये के टेलीविजन विज्ञापन बजट को सही ठहराना कठिन हो रहा है। दूसरी ओर, डिजिटल प्लेटफॉर्म अपने विज्ञापनों की पहुंच, लक्षित दर्शकों और प्रदर्शन से जुड़े आंकड़े पेश कर रहे हैं।
CII ने भी रेटिंग बहाल करने की मांग उठाई
उद्योग संगठन भारतीय उद्योग परिसंघ (CII) ने भी टेलीविजन दर्शक मापन के लंबे समय से बाधित रहने पर चिंता जताई है। संगठन के अक्टूबर 2026 के श्वेतपत्र ‘The New Economics of Media & Entertainment’ में 2026 के दौरान टीवी रेटिंग बहाल करने की मांग की गई है। रिपोर्ट में रेटिंग की बहाली को मीडिया और मनोरंजन उद्योग में सुधार की तत्काल प्राथमिकताओं में शामिल किया गया है।
CII के मुताबिक, दर्शक संख्या मापने की व्यवस्था लंबे समय तक बाधित रहने से बाजार में पारदर्शिता और विज्ञापनदाताओं का भरोसा प्रभावित हो सकता है।
सरकार के फैसले का इंतजार कर रहा टीवी उद्योग
टीवी रेटिंग का संकट अब केवल तकनीकी या नियामकीय मसला नहीं रह गया है। इसका सीधा संबंध चैनलों की विज्ञापन आय, विज्ञापनदाताओं के निवेश संबंधी फैसलों और टेलीविजन की डिजिटल प्लेटफॉर्म से प्रतिस्पर्धा से है।
जहां Google और YouTube अपने विज्ञापन उत्पादों की पहुंच और निवेश पर प्रतिफल को बढ़-चढ़कर पेश कर रहे हैं, वहीं टीवी चैनलों के लिए नियमित स्वतंत्र रेटिंग के अभाव में अपनी प्रभावशीलता साबित करना मुश्किल हो रहा है।
उद्योग से जुड़े लोगों की चिंता है कि यदि यह गतिरोध लंबा खिंचता है, तो विज्ञापन बजट का रुख तेजी से डिजिटल माध्यमों की ओर जा सकता है। टेलीविजन उद्योग को देशव्यापी माध्यम के रूप में विकसित होने में तीन दशक से अधिक समय लगा है। ऐसे में रेटिंग व्यवस्था की बहाली में देरी का असर पूरे उद्योग पर पड़ सकता है।
अब निगाहें अमित शाह की अध्यक्षता वाले मंत्रियों के समूह की अगली बैठक पर हैं। रेटिंग बहाली को लेकर सरकार क्या फैसला करती है और यह व्यवस्था कब तक सामान्य होती है, इससे तय होगा कि टेलीविजन उद्योग विज्ञापन बाजार में अपनी स्थिति का बचाव किस तरह कर पाता है।

