तृणमूल सांसद, महुआ मोइत्रा ने पूछा है – यह सरकार है या लोगों की जान लेने वाली कोई अक्षम मशीन? बंगाल में भाजपा सरकार को इस बात की ज़्यादा चिंता रही है कि पूजा पंडाल में पश्चिम बंगाल माकपा को किताबें बेचने से कैसे रोका जाए, बजाय इसके कि पंडालों में सुरक्षा के इंतज़ाम कैसे किए जाएं। बंगाल के लोगों, अगर आप किसी जोकर को चुनेंगे, तो आपको सर्कस ही मिलेगा।
संजय कुमार सिंह
आज मेरे 10 में से 9 अखबारों में कलकत्ता के एक दुर्गा पूजा पंडाल में भगदड़ मचने से 19 लोगों की मौत की खबर प्रमुखता से छपी है। मरने वालों में 13 महिलाएं बताई गई हैं। दि एशियन एज को छोड़कर मेरे बाकी सभी अखबारों में यह खबर लीड या सेकेंड लीड है। यहां यह खबर पहले पन्ने पर तो है लेकिन सिंगल कॉलम में। इस हादसे में 25 लोगों के घायल होने की भी खबर है। वैसे तो यह हादसा है और इसमें राजनीति नहीं ढूंढ़नी चाहिए लेकिन सभी अखबारों में लीड होना चौंकाता है। दिल्ली के बाहर के तमाम हादसों को दिल्ली के अखबारों में प्रमुखता नहीं मिलती रही है। मैंने गौर किया है कि पहले पन्ने पर ऐसी खबरें भाजपा की राजनीतिक जरूरत या नफा-नुकसान के अनुसार छपती हैं। आज ज्यादातर अखबारों ने सरकार को जिम्मेदारी से मुक्त करने वाले शीर्षक लगाए हैं।
टाइम्स ऑफ इंडिया ने शीर्षक में बारिश को हादसे का कारण बताया है, दि इंडियन एक्सप्रेस ने फ्लैग शीर्षक में बताया है कि मुख्यमंत्री ने हादसे के लिए निजी सुरक्षा गार्ड को जिम्मेदार ठहराया है। यहां हादसा या भीड़ बढ़ने का कारण आयोजकों की घोषणाओं, संकरी गलियों और बारिश को बताया गया है। द हिन्दू का उप शीर्षक है, पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री का कहना है कि उत्तरी कोलकाता में एक पूजा पंडाल के आयोजकों की ओर से की गई भ्रामक घोषणा के कारण भगदड़ मच गई; आयोजकों को हिरासत में ले लिया गया है और पंडाल को बंद कर दिया गया है; मामले की जांच चल रही है। हिन्दुस्तान टाइम्स में भगदड़ के बाद बिखरे हुए जूते-चप्पल की तस्वीर है। खबर का शीर्षक है, कलकत्ता के दुर्गापूजा पंडाल में भगदड़ मचने से 17 मरे। टाइम्स ऑफ इंडिया की फोटो ऐसी ही है लेकिन थोड़ी छोटी।
दिल्ली के अखबारों में छपने वाली हादसे की खबरों में तमिलनाडु में अभिनेता से नेता बने विजय की रैली में भगदड़ और मौत की खबर, उसकी सीबीआई जांच तथा कर्नाटक के बेंगलुरु में क्रिकेट मैच के दौरान भगदड़ की खबरें उल्लेखनीय है। इसके मुकाबले मणिपुर की खबरें पहले पन्ने पर बमुश्किल छपती हैं। फॉलोअप तो शायद ही किसी खबर का हुआ हो। पत्रकारों को परेशान करने की शिकायत पर गई एडिटर्स गिल्ड की टीम को भी परेशान किए जाने की खबर थी। केंद्र की ऐसी सरकार और उसके समर्थक सरकार के विरोध को अराजकता कहते हैं जबकि देश भर में, खासकर डबल इंजन वाले राज्यों में जो स्थितियां हैं वे अराजकता से कम नहीं है। कलकत्ता के चोरबगान स्थित जिस पूजा पंडाल में आग लगी वह 91 साल पुराना है। दि एशियन एज में एक खबर मणिपुर में हिंसा की भी है।
लोक गायिका नेहा सिंह राठौड़ के खिलाफ एक चैनल (एबीपी न्यूज) पर झूठी खबर और चैनल का माफी नामा मीडिया में चल रही अराजक स्थिति के ढेरों उदाहरण में एक है। आपत्तिजनक यह कि नेहा सिंह ने एक वीडियो पोस्ट कर बताया है कि चैनल के एक अधिकारी (रजनीश आहूजा) से फोन पर बात कर रही थीं तो उसने फोन काट दिया। यह प्रेस कांफ्रेंस नहीं करने, जनता के लिए मीडिया को जानकारी नहीं देने और रील बनाने वालों से सरकार की परेशानी आदि का पत्रकारीय रूप है। पत्रकारिता और मीडिया में बनी इस अराजक स्थिति में आज हादसे से संबंधित जो खबरें पहले पन्ने पर हैं वे सरकार का बचाव या प्रचार मानी जा सकती हैं। दिल्ली में इन तथ्यों को पहले पन्ने पर जगह देना, और कुछ हो या नहीं, अटपटा तो है ही।
अमर उजाला में मुख्य खबर के साथ पहले पन्ने पर जो खबरें छपी हैं वे भाजपा के प्रचार की श्रेणी में भी आएंगी। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी तमाम मौकों पर और मामलों में (शोक) संदेश नहीं देते हैं। इस बार उन्होंने दुख जताया पहले पन्ने की खबर है। मृतकों के परिजनों को 25 लाख रुपए और सरकारी नौकरी देने की घोषणा मुख्यमंत्री ने की है। मुझे लगता है कि दूसरे राज्यों में जब ऐसा नहीं होता है या राशि इतनी बड़ी नहीं होती है इसलिए यह पहले पन्ने की खबर हो सकती है। नफा नुकसान भाजपा समझेगी। इस खबर का पहले पन्ने पर होना इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि आज ही दिल्ली से लगे ग्रेटर नोएडा में एक परिवार के पांच लोगों के मरे पाए जाने की खबर है। पति-पत्नी और तीन नाबालिग बच्चों की मौत के मामले में खास बात यह है कि परिवार नूडल खाकर सोया था। इसलिए फूड प्वायजनिंग का मामला हो सकता है औऱ तब नूडल के एक चर्चित ब्रांड का नाम कहीं होना और कहीं नहीं होना पत्रकारीय अराजकता है। दिल्ली के अखबारों के लिए यह भी पहले पन्ने की खबर हो सकती थी। किसी में है किसी में नहीं।
दैनिक भास्कर में ग्रेटर नोएडा वाली खबर पहले पन्ने पर नहीं है। कलकत्ता की खबर के साथ एक सूचना बोल्ड में हाईलाइट की हुई है – सीएम शुभेंदु अधिकारी ने बताया कि पूजा समिति ने जो निजी सुरक्षाकर्मी तैनात किए थे, हादसा उन्हीं के कुप्रबंधन के कारण हुआ। उन्होंने जब अनाउंसमेंट की तभी लोगों ने भागना शुरू किया। खबर यह भी है कि बारिश के कारण पंडाल में ज्यादा लोग हो गए थे। पंडाल की थीम बेयॉन्ड साउंड थी और इस कारण रोशनी कम थी, एंट्री व एग्जिट गेट एक ही थे। मुझे लगता है कि यह बिल्कुल स्थानीय मामला है और ऐसे में मुख्यमंत्री ने जो कहा वह बहुत मायने नहीं रखता है। लेकिन मुख्यमंत्री ने कहा है और विवरण उससे संबंधित है तो खबर पहले पन्ने पर हो ही सकती है। पाठक को लगेगा कि संयोग है और यह तथ्य दिमाग में नहीं आएगा कि सरकार बदली और हादसा हो गया। अब जब पत्रकारिता का मकसद भाजपा की सहायता होता है तो यह खबर रेखांकित करने लायक है।
नवोदय टाइम्स में रूटीन और औपचारिक विवरण है। जांच के आदेश, आयोजक और सुरक्षा एजेंसी के लोग हिरासत में, पीएम मोदी ने की दो-दो लाख रुपए के मुआवजे की घोषणा, (अमित) शाह ने स्थगित किए रविवार के सारे कार्यक्रम, घायलों से मिलेंगे। एक और खबर है – अस्पताल पहुंचे शुभेन्दु अधिकारी। घायलों से मिले। नुडूल खाकर सोए पांच लोग मरे मिले – खबर यहां भी प्रमुखता से है। यहां बताया गया है कि मृतक परिवार के मुखिया ने फोन में किसी बातचीत का ऑडियो रिकार्ड किया है और मौत के लिए परिचितों को जिम्मेदार ठहराया है। अमर उजाला में पड़ोसियों द्वारा पुलिस को संपत्ति विवाद की जानकारी देने की भी सूचना है। जाहिर है, इन भिन्न सूचनाओं के कारण खबर को एक जैसा ट्रीटमेंट देना उचित नहीं है और यह कलकत्ता की भगदड़ में 19 लोगों की मौत के मुकाबले अलग खबर है।
देशबन्धु ने इन दो खबरों के अलावा, मिनी बस नाले में गिरने से आठ लोगों की मौत की खबर को मिलाकर सात कॉलम की खबर दी है, दुखद : हादसों का दिन रहा शनिवार। यहां शुवेन्दु अधिकारी के 25 लाख के मुआवजे और सरकारी नौकरी की खबर हाईलाइट नहीं है। यहां जो जानकारी हाईलाइट की हुई है वह है, मृतकों के परिजनों को दो-दो लाख व घायलों को पचास हजार की राहत राशि की घोषणा। अमर उजाला के अनुसार मुख्यमंत्री ने घायलों को पांच लाख की सहायता देने की घोषणा की है आप समझ सकते हैं कि तथ्यात्मक रूप से खबर कितनी आधी अधूरी होती है। दूसरी ओर, आपको ऐसी सूचनाएं भी प्राथमिकता के आधार पर दी जाती हैं जो आपके मतलब की हो या नहीं, व्यवस्था के बारे में राय खराब न बनने दे। निश्चित रूप से यह सरकारी प्रचार है और खबर नहीं है। देशबन्धु ने मुआवजे की सूचना को हाईलाइट नहीं किया होता तो ठीक था लेकिन पूरी खबर हाईलाइट नहीं की यह अनुचित है।
अंग्रेजी अखबारों में यह खबर कलकत्ता के द टेलीग्राफ में लीड होनी ही थी। फ्लैग शीर्षक का एक भाग है – मुख्य मंत्री ने आयोजकों से कमियां दूर करने के लिए कहा। यहां सवाल उठता है कि कमियां थीं क्यों? 91 साल पुराने पंडाल में इस साल कमियां होने का कारण क्या हो सकता है और मुख्यमंत्री ने हादसे के बाद जो कहा वह पहले कहा था या नहीं और नहीं कहा (या सुनिश्चित किया) तो क्यों? तृणमूल सांसद महुआ मोइत्रा ने एक्स पर लिखा है, ममता बनर्जी 15 साल मुख्यमंत्री रहीं और उनके कार्यकाल में, दुर्गा पूजा के दौरान बंगाल प्रशासन ने भीड़, ट्रैफ़िक और बाकी सभी चीज़ों को बहुत बेहतरीन ढंग से संभाला। भाजपा सरकार के पांच महीने के भीतर ही, एक पंडाल में भगदड़ मचने से 17 लोगों की मौत हो गई। यह सरकार है या लोगों की जान लेने वाली कोई अक्षम मशीन?
एक अलग पोस्ट में उन्होंने यह भी लिखा है, बंगाल में भाजपा सरकार को इस बात की ज़्यादा चिंता रही है कि पूजा पंडाल पश्चिम बंगाल माकपा को किताबें बेचने से कैसे रोका जाए, बजाय इसके कि पंडालों में सुरक्षा के इंतज़ाम कैसे किए जाएं। बंगाल के लोगों, अगर आप किसी जोकर को चुनेंगे, तो आपको सर्कस ही मिलेगा। कहने की जरूरत नहीं है कि आज खबरों का तेवर ऐसा नहीं है।

मैं रोज चार हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल दस, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। एआई का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।

