सत्ता परिवर्तन की कोशिश के नाम पर कांग्रेस को बदनाम करने का जवाब पवन खेड़ा ने दिया लेकिन कायदे की खबर सिर्फ अमर उजाला में दिखी वह भी राजनाथ सिंह के ‘हमले’ की खबर के साथ।
संजय कुमार सिंह
दिल्ली के कई अखबारों ने कल की तिरंगा रैली को न सिर्फ असफल बताया है खबर भी छोटी सी छापी है। हिन्दी अखबारों में अमर उजाला और दैनिक भास्कर ने प्रदर्शन के कारण बिक्री कम होने का व्यापारियों का दावा भी प्रकाशित किया है। व्यापारियों को मुआवजा दिलाने संबंधी सुप्रीम कोर्ट का आश्वासन दैनिक भास्कर में लीड है। अमर उजाला में सेंकेंड लीड है। अमर उजाला की लीड भाजपाई कल्पना या आरोप है। इसका शीर्षक है, अब आंदोलन बनाम अराजकता की बहस।
कहने की जरूरत नहीं है कि यह बहस आम नागरिकों, बुद्धिजीवियों या पत्रकारों में नहीं, संबंधित पक्षों में हो रही है। मुझे लगता है कि यह राजनीति है और भाजपा सरकार विरोधी आंदोलन को लेकर इस समय 2013 के अपने आंदोलन के मुकाबले बिल्कुल अलग तेवर में है। कांग्रेस की ओर से पवन खेड़ा ने कहा भी है कि जो प्रशांत भूषण 2013-14 में अपनी इन्हीं बातों के लिए भाजपा के साथ थे अब बुरे लग रहे हैं। अखबार के अनुसार, खेड़ा ने कहा है कि यह व्यवस्था बदलनी है, चुनाव के जरिए सरकार को हराना है। इसमें अराजकता या बहस जैसा कुछ है नहीं पर शीर्षक यही है।
तिरंगा यात्रा की खबर अमर उजाला, दैनिक भास्कर और टाइम्स ऑफ इंडिया में फोटो और कैप्शन के रूप में है। अमर उजाला में फोटो तीन कॉलम का है, कैप्शन तीन लाइन का। दैनिक भास्कर में फोटो दो कॉलम का है और यहां भी कैप्शन तीन ही लाइन का है। टाइम्स ऑफ इंडिया में फोटो दो कॉलम का है। शीर्षक है, पुलिसियों ने तिरंगा रैली को ब्लॉक किया। कैप्शन नौ लाइन का है और अंदर विवरण होने की सूचना भी है। देशबन्धु में यह खबर सात कॉलम की लीड है जबकि नवोदय टाइम्स में यह टॉप पर पांच कॉलम की खबर है। तीन कॉलम की फोटो के साथ। यहां शीर्षक है, गुरिल्ला प्रदर्शन की चपेट में सीपी।
दि एशियन एज ने जो हुआ उसे फ्लैश प्रोटेस्ट लिखा है। यह किसी भीड़-भाड़ वाली जगह पर अचनाक बिना घोषणा किया जाने वाला विरोध प्रदर्शन होता है। इस खबर से लगता है कि पुलिस की भारी तैनाती के बावजूद प्रदर्शनकारी अपना काम सफलता पूर्वक कर पाए। इसमें प्रदर्शन करने वाले अचानक आते हैं और अपना काम करके भीड़ में इधर-उधर (गायब) हो जाते हैं। दि एशियन एज की लीड का शीर्षक है – तिरंगा, डिटेंशन और फ्लैश प्रोटेस्ट सीजेपी के दिल्ली आंदोलन की खास बातें रहीं। अंग्रेजी अखबारों में टाइम्स ऑफ इंडिया ने इस खबर को सबसे कम महत्व दिया है।
आज खबरों की चर्चा से पहले बता दूं कि यह खबर क्यों महत्वपूर्ण है और इसे एक छोटी खबर के रूप में निपटा देना सरकार की चापलूसी भी हो सकती है। आप जानते हैं कि इस समय देश भर में चल रहा आंदोलन मुख्य रूप से मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को हटाने की मांग पर है। भारत का चुनाव आयोग तीन सदस्यीय है और दि इंडियन एक्सप्रेस की खबर से साबित हुआ कि तमाम आदेश मुख्य चुनाव आयुक्त अकेले जारी कर रहे थे। दो आयुक्तों की असहमतियों को नजरअंदाज करके। यह एक संवैधानिक संस्था का असंवैधानिक कृत्य हुआ। इसे एक संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति ने सुप्रीम कोर्ट की सख्ती न होने से कारण अंजाम दिया है।
चुनाव आयोग और उसकी ओर से सत्तारूढ़ दल के लोगों, समर्थकों तथा प्रचारकों ने इस खबर और इसके लिए दि इंडियन एक्सप्रेस की भी साख खराब करने की पूरी कोशिश की। दूसरी ओर, सरकार के खिलाफ आंदोलन के साथ उसमें लोगों की भागीदारी बढ़ती गई। जनता की नाराजगी और पुलिस का बचाव स्पष्ट रूप से सड़कों पर दिख रहा है। ऐसे में जब जंतर-मंतर को प्रदर्शन स्थल नहीं रहने दिया गया और वहां झंडा फहराने वालों को जेल हो गई तो कॉक्रोच जनता पार्टी के अभिजीत दिपके ने कनाट प्लेस के सेंट्रल पार्क में तिरंगा फहराने के लिए जुटने की अपील की थी।
इसके बाद पुलिस ने इसे रोकने के लिए जो सब किया उसकी चर्चा कल के अखबारों में थी और तथ्य है कि पुलिस की कोशिशों के बावजूद बड़ी संख्या में लोग जुटे। प्रदर्शनकारियों को हताश करने और दिल्ली पुलिस की ज्यादती को सही ठहराने के लिए व्यापारियों को आगे किया गया होगा। उनका दावा है कि प्रदर्शनों के कारण कई दिन की बिक्री शून्य हो गई है। दैनिक भास्कर की लीड का शीर्षक है, “बंद का आदेश गलत हुआ तो व्यापारियों को मुआवजा : कोर्ट”। खबर के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को व्यापारियों से कहा कि सेंट्रल पार्क बंद करने का एनडीएमसी का आदेश गलत मिला तो नुकसान की भरपाई करवाएंगे।
यह व्यापारियों को विशेष लाभ या सहयोग हो सकता है जबकि मेट्रो स्टेशन बंद रखने से भी व्यापारियों को नुकसान हुआ होगा। यात्रियों और नौकरी पेशा लोगों को दफ्तर जाने में परेशानी भी हुई होगी। यह सब सुप्रीम कोर्ट की मनाही के बावजूद हुआ और अदालत को दिए गए स्पष्टीकरण या माफी नामे में दिल्ली मेट्रो ने कहा है कि दिल्ली में विभिन्न विरोध प्रदर्शनों (जैसे राजनीतिक मार्च और रैलियों) के दौरान प्रदर्शनकारियों द्वारा मेट्रो नेटवर्क का दुरुपयोग न हो और किसी अप्रिय घटना को रोका जा सके, इसलिए पुलिस के निर्देशों और सुरक्षा प्रोटोकॉल के तहत गेट बंद किए गए थे।
जाहिर है, कि गेट बंद किया जाना स्वीकारा गया है और परेशानी इससे कम नहीं होती है। लेकिन अभी तक वह मुद्दा ही नहीं है। प्रदर्शनकारियों के खिलाफ सरकार की सख्ती दिल्ली मेट्रो के अलावा दिल्ली पुलिस के जरिए भी की जा रही है। एनडीएमसी ने प्रशासनिक कारणों से दो दिन पार्क बंद रखने का आदेश यूं ही नहीं दिया होगा। कहने की जरूरत नहीं है कि यह सब नहीं होता तो लोग जाते झंडा फहराते और लौट जाते। समय मिलता, पैसे होते तो खरीदारी भी कर सकते थे लेकिन बंद किए जाने से इसकी संभावना ही खत्म हो गई और दुकानदारों ने दैनिक भास्कर की खबर के अनुसार, इसका कारण प्रदर्शन को बताया है। खान मार्केट ट्रेडर्स एसोसिएशन ने कहा है कि बाजार से ग्राहक गायब हैं। प्रदर्शन कनाट प्लेस में था, खान मार्केट से ग्राहक गायब हैं तो कारण सिर्फ प्रदर्शन नहीं हो सकता है। खबरों के अनुसार सुप्रीम कोर्ट इसपर विचार करेगा।
आज खबर यह होनी थी कि रैली हुई या नहीं, हुई तो कैसी रही। पुलिस ने क्या किया, रैली को ठीक से होने देने में उसका क्या योगदान था या वह रैली को पूरी तरह रोक पाने में कामयाब रही। सोशल मीडिया पर कल की पोस्ट से मैं यही समझ पाया हूं कि रैली हुई, ठीक-ठाक हुई और उसके रोकने में पुलिस बुरी तरह नाकाम रही। एनडीएमसी द्वारा पार्क बंद किए जाने से भले लोग पार्क में नहीं घुस पाए लेकिन उसके आस-पास तक पहुंच ही गए और पुलिसिया रोकथाम के कारण काफी बड़े इलाके में भीड़ रही।
द टेलीग्राफ की लीड इस बारे में बताती है। शीर्षक है, पुलिस की मजबूत पकड़ थोड़ी ढीली हुई। इस खबर का फ्लैग शीर्षक है, नेहा (बोरा) और अभिजीत (दिपके) तिरंगा यात्रा के दौरान डीटेन किए गए। खबर इस प्रकार है, दिल्ली मेट्रो सामान्य तौर पर चली, कनाट प्लेस की दुकानें खुली रहीं, सरकार समर्थक गुंडे नहीं थे और मोटे तौर पर प्रदर्शन की इजाजत थी। प्रशासन ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के विरोध में आंदोलन के खिलाफ अपनी कार्रवाई से एक दुर्लभ छूट दी। टाइम्स ऑफ इंडिया की लीड चुनाव आयोग का नया आदेश है जिसकी खबर कल भी छपी थी।
आज की खबर का शीर्षक है, विशेष अभियान शुरू होने से शहर में हटाए गए 47.6 लाख वोटर के लिए दूसरा मौका। खबर का इंट्रो है – अनुपस्थित, कहीं और चले गए, मृत्यु हो गई और दो जगह नाम होने के कारण जिन लोगों के नाम कट गए थे वे पुनर्पुष्टि के बाद 30 अक्सूबर तक अपने फॉर्म 6 जमा कर सकते हैं। स्पष्ट है कि चुनाव आयोग अपनी गलतियों या मनमानी की लीपापोती कर रहा है और इसके लिए किसी सजा या कार्रवाई की खबर नहीं है। मैंने कल यहां यही लिखा था। इसके बावजूद दिल्ली के दो बड़े अखबारों की लीड का शीर्षक एक जैसा है। खबर तो एक है ही।
टाइम्स ऑफ इंडिया की विशेषता है कि तिरंगा रैली की खबर इस खबर के साथ है और खबर फोटो कैप्शन के रूप में ही है। हिन्दुस्तान टाइम्स की लीड का शीर्षक हिन्दी में कुछ इस तरह होगा। दिल्ली के हटाए गए 47 लाख मतदाताओं की फिर से जांच की जाएगी। खबर के अनुसार अधिकारियों ने कहा है कि नाम हटाए जाने से पहले दोबारा जांच की जाएगी। तिरंगा मार्च की खबर हिन्दु्स्तान टाइम्स में लीड के लगभग बराबर में है। लीड का फौन्ट बड़ा है तो सेकेंड लीड का फौन्ट बोल्ड है। टाइम्स ऑफ इंडिया की बात अलग है। हालांकि, लगभग ऐसा ही शीर्षक देशबन्धु में है। लेकिन यह सात कॉलम की खबर है। सीजेपी के तिरंगा मार्च पर पुलिस की रोक। सेंट्रल पार्क में प्रदर्शन से पहले हिरासत में लिए गए दिपके व नेहा बोरा। किलेबंदी के बावजूद कनॉट प्लेस क्षेत्र में जुटे सीजेपी समर्थक।
हिन्दुस्तान टाइम्स की खबर का शीर्षक इस तरह है – प्रतिबंधों, डिटेंशन के बीच सीपी में तिरंगा मार्च हुआ। द हिन्दू की लीड का शीर्षक और स्पष्ट है – दिपके गिरफ्तार; पुलिस ने प्रदर्शन स्थल तक पहुंच रोका। उपशीर्षक है, छात्र समूहों, कार्यकर्ताओं और वामपंथी सांसदों ने विरोध प्रदर्शन में हिस्सा लिया; सीजेपी और एआईएसए का आरोप है कि सुरक्षाकर्मी दीपके और नेहा बोरा को अज्ञात जगहों पर ले गए; इस मार्च को लेकर भाजपा और कांग्रेस ने एक-दूसरे पर आरोप लगाए।
दि इंडियन एक्सप्रेस की खबर का फ्लैग शीर्षक है, तिरंगा मार्च की सीजेपी की अपील पर कनाट प्लेस में भीड़ इकट्ठा हुई। मुख्य शीर्षक है – सीईसी के खिलाफ प्रदर्शन के बाद 100 से ज्यादा रोके गए, विपक्ष ने दिपके, बोरा को रिहा करने की मांग की। इस खबर का इंट्रो है, राजधानी के केंद्र में पुलिस का भारी बंदोबस्त, सीजेपी संस्थापक को मार्च से पहले ही डीटेन कर लिया गया।

मैं रोज चार हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल दस, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। एआई का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।

