राहुल देव-
पिछले साल जब दिल्ली छोड़ी नहीं थी तो लगभग इन्हीं दिनों कई चैनलों और उनके एंकरों को बता कर उनके और दूसरे सभी चैनलों पर जाना बंद कर दिया था। अब भी आग्रहपूर्वक बुलावे आते हैं, विनम्रता से मना करता हूँ।
धीरे-धीरे यह महसूस होने लगा था कि जब एक भी चैनल और उनकी चर्चाएँ निष्पक्ष और गरिमापूर्ण बची ही नहीं हैं तब उनमें शामिल होकर हम उन्हें ही सम्मान और प्रतिष्ठा प्रदान करते हैं। अपनी गरिमा को आहत करते हैं।
एक चैनल चर्चा के अनुभव ने इस फ़ैसले की प्रेरणा दी।
धर्म संकट नाम के कार्यक्रम में हर बार की तरह एक विख्यात हिंदू धर्मगुरु थे। पहले भी उस कार्यक्रम में जा चुका था क्योंकि धर्म में रुचि है। कई धर्मगुरुओं की तुलना में सज्जन, विनम्र और शालीन।
हम चार या पाँच पैनलिस्ट थे। आजकल हर चर्चा में गरमा-गरमी होती ही है। विषय धर्म हो तो पूछना ही क्या? हालाँकि धर्म की चर्चा में आवेग-आवेश, चीख-चिंघाड़, आरोप-प्रत्यारोप होने ही नहीं चाहिए।
चर्चा में दो बार कहा कि धर्म जैसे गूढ़ विषय पर इतने कम समय में इतने अगंभीर तरीक़े से बातचीत कैसे हो सकती है…ज़ाहिर है इसका कोई असर नहीं होना था। चैनल पर लोग ख़ुद को सही दूसरों को ग़लत बताने ही आते हैं विषय कोई भी हो। खैर…
कार्यक्रम का नाम ही धर्म संकट था (अब भी चल रहा है शायद) यानी यह ध्रुव सत्य के रूप में मान लिया गया था कि धर्म संकट में है। भारत में आजकल धर्म शब्द आते ही मान लिया जाता है कि मतलब हिंदू धर्म से है। यह भी अटल सत्य मान लिया गया है कि हिंदू धर्म यानी सनातन धर्म। दोनों में कितना बड़ा अंतर है इसका अधिकतर लोगों को आभास नहीं है।
तो उस आवेशपूर्ण बहस में मैंने शांति से धर्मगुरु जी से पूछा, “स्वामी जी, क्या जो सनातन है उस पर कोई संकट आ सकता है?”
वे गंभीर और विचारमग्न हुए। कुछ कहते उससे पहले ही एंकर ने तुरंत एक नया सवाल उछाला और दूसरे पैनलिस्ट से मुख़ातिब हो गया। उसी क्षण तय किया कि अब किसी चर्चा में नहीं जाना है क्योंकि उसका कोई मतलब नहीं रहा।
क्या सचमुच तथाकथित सनातन धर्म पर, सनातन पर संकट है?
जो सनातन है क्या उसे तोड़ा, मारा, आहत किया जा सकता है? यानी क्या सनातन कोई वस्तु है, कोई पदार्थ है, परंपरा है, रस्म, पूजा-पाठ, कर्मकांड, रूढ़ि, पहचान है?
जिसपर संकट की बात की जा रही है वह सचमुच सनातन है या कुछ और?
जो संकट देखा-बताया जा रहा है उसकी प्रकृति क्या है? स्रोत क्या है?
धर्म-संकट की चर्चा में इन प्रश्नों पर गंभीरता के साथ विचार होना चाहिए। कहाँ होता है?
इन प्रश्नों पर सारे समाज में विचार विमर्श होना चाहिए। कहाँ हो रहा है?
एंकरों का सारा ध्यान और काम चर्चा को गरमागरम और गतिशील बनाए रखना होता है। चैनल प्रबंधन की अपनी विचारधारा और उद्देश्य उनकी सारी एंकरिंग पर हावी रहते हैं।
वह एंकर मेरे प्रिय एंकरों में रहा है। गंभीर है। धर्म, शास्त्रों से बाक़ी सभी की तुलना में कहीं अधिक परिचित है। उससे वहीं कहा आज के बाद तुम्हारे चैनल में नहीं आऊँगा। वह गले लगा और इतना ही कहा सर आप तो सब समझते हैं।
तब से किसी टीवी चैनल पर नहीं गया हूँ।
यूट्यूब पर कुछ गिने-चुने लोग हैं जिनकी चर्चा में जुड़ना ठीक लगता है हालाँकि सम्यक् पत्रकारीय संतुलन और निष्पक्षता वहाँ भी कम ही होती है।
स्वयं निष्पक्ष हूँ यह नहीं कह सकता। पूरी तरह निष्पक्ष और तटस्थ होना लंबी आध्यात्मिक-वैचारिक साधना और निस्संगता माँगता है। लेकिन उस तटस्थता के साथ नागरिक धर्म निभाना लगभग असंभव है। संपूर्ण संन्यास में जगत से पूरी तरह उपराम होना पड़ता है। वह इस देश-
काल में काम्य भी है कि नहीं कहना कठिन है।
वैचारिक रूप से साथ किसी के नहीं हूँ लेकिन साफ़-साफ़ किसके ख़िलाफ़ होना अनिवार्य पाता हूँ इसकी पूरी स्पष्टता है।
वह पक्ष है हर तरह की घृणा का। धर्म-जाति-वर्ग के आधार पर द्वेष और भेदभाव का। वैचारिक-वाचिक-शारीरिक हिंसा का। प्रतिशोध और प्रतिहिंसा का। और धर्म के नाम पर घोर अधर्म का।

