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आयोजन

हृदयेश जोशी के साथ श्याम मीरा सिंह को कुलदीप नैयर सम्मान मिलना पत्रकारिता में नई फसल के लिए उम्मीद जगाती है!

Two men seated on a stage at a panel discussion, with water bottles and marigold garlands on the table and a Hindi slide in the background.

राजू सजवान-

गांधी शांति प्रतिष्ठान से लौट रहा हूं। दो साथी पत्रकारों को कुलदीप नैयर पुरस्कार से नवाजा गया है। एक तो हृदयेश जोशी (Hridayesh Joshi) और दूसरे श्याम मीरा सिंह (Shyam Meera Singh)।

दोनों का काम अलहदा है। हृदयेश पर्यावरण के मुद्दों पर वीडियो बनाते हैं और श्याम वर्तमान ज्वलंत मुद्दों पर रिपोर्ट करते हैं। श्याम प्रतिरोध की पत्रकारिता का नया चेहरा हैं।

दोनों अलग-अलग मुद्दों पर पत्रकारिता करते हैं, लेकिन दोनों ही सवाल उठाते हैं। सवाल प्रतिरोध पैदा करता है। जो सरकारों को नहीं सुहाता। चाहे इनकी सरकार हो या उनकी या आपकी।

कार्यक्रम में इमरजेंसी के समय से पत्रकारिता कर रहे लोग भी थे। पत्रकारिता पर संकट की बातें कर रहे थे। कमर अहमद नकवी ने खूब कहा, पत्रकारिता हमेशा संकट में रही है। संकट अलग- अलग तरह का रहा। आज का संकट नए तरीके का है।

इमरजेंसी में दो ढाई साल तक अखबारों पर पाबंदी लगाई गई। उस समय सरकार जो चाहती थी, वहीं छपता था। लेकिन वह समय ढाई साल ही रहा, परन्तु अब तो 12 साल हो गए।

खूब बातें हुई। एक सवाल खुद श्याम भाई ने उठाया, उनसे पूछा गया कि उन्होंने डिटेन होने पर अमित शाह के ख़िलाफ़ नारेबाजी क्यों की। उनका जवाब खूबसूरत था, जब उनसे कैमरा छीन लिया गया, तब वह पत्रकार नहीं रह गए और एक नागरिक होने के नाते उन्होंने नारबाजी की।

बुजुर्ग पत्रकारों ने भी कहा, पत्रकार नागरिक भी होता है और उसे पत्रकारिता के साथ-साथ नागरिक होने का धर्म भी निभाना चाहिए।

हृदयेश भाई ने कहा, जब वो एनडीटीवी की अच्छी खासी नौकरी छोड़कर पर्यावरण जैसे विषय पर काम करने लगे तो शुभचिंतकों ने टोका था, लेकिन उनका निश्चय दृढ़ था कि पर्यावरण जैसे ज्वलंत मुद्दों पर पत्रकारिता की सख्त जरूरत है।

बहुत से लोग जानते हैं कि उनके विडियो वायरल नहीं होते। बहुत कम देखे जाते हैं। लेकिन हृदयेश लगे हुए हैं।

तबीयत सही न होने के कारण आशीष नंदी नहीं बोल पाए। ऐसे समय में उनको न सुन पाने का मलाल रहेगा।

खैर!! ये तो सब अपनी जगह, लेकिन इन सबसे हटकर जो बात मुझे निराश करने वाली थी, वो कि मुझे लग रहा था कि कार्यक्रम में भीड़ होगी, बैठने को जगह नहीं मिलेगी। लेकिन ऐसा न था।

बावजूद इसके, सभागार में बैठे कुछ युवाओं में मुझे संभावनाओं के बीज दिखाई दिए। श्याम मीरा सिंह को यह पुरस्कार देकर समिति ने इन बीजों को पानी देने का काम किया है। उम्मीद ही कर सकते हैं कि आने वाली फसल शानदार होगी।

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