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समाज और कई मिडिल क्लास परिवारों का आज सबसे बड़ा कष्ट है- “मृत्यु का इंतजार”

Hindi newspaper front page with large bold headline about family members affected by long illness and caregivers bearing strain; mentions 30% decline in campaigns (front-page image).

नरेंद्र नाथ मिश्रा-

पिछले दिनों इकोनॉमिस्ट ने एक कवर स्टेारी की थी। उसके अनुसार इस सदी की सबसे बड़ी बीमारी और सबसे बड़ा कष्ट बन कर सामने आ रहा है-मृ़त्यू का इंतजार। आंकड़ा देकर बताया गया कि किस तरह यूरोप, अमेरिका जैसे देशा में मृत्यू का इंतजार सबसे बड़ा ट्रामा बन रहा है।

अब यह ट्रेंड भारत में भी आ चूका है! मेडिकल-इलाज और दूसरे साधन से इंसान की उम्र बढ़ी लेकिन अकेले लड़ने की क्षमता उतनी ही रही। इलाज ने मरते लोगों की उम्र बढ़ा दी! क्वांटिटी ऑफ़ लाइफ दे दी! क्वालिटी ऑफ़ लाइफ नहीं! यही त्रादसी बन रही है!

मृत्यु का इंतजार आज समाज और कई मिडिल क्लास परिवारों का सबसे बड़ा कष्ट है। यह सफर हर स्तर पर तोड़ देता है! अर्थ-समर्थ-मानसिक! परिवारों को तोड़ देता है!


यशवंत सिंह-

बीमार तो एक होता है, लेकिन उसके साथ पूरा परिवार बीमार पड़ जाता है।

सबसे दर्दनाक हालत उसकी होती है, जो दिन-रात अपने बीमारों की देखभाल में खुद को भुला देता है। वह अपनी नींद, नौकरी, खुशियां और धीरे-धीरे अपनी सेहत तक खो देता है। सबका दर्द समझते-समझते उसका दर्द समझने वाला कोई नहीं बचता।

जो सबको संभाल रहा है, क्या उसे संभालने वाला कोई है?

कभी उस मां, उस पिता, उस पत्नी या पति की आंखों में झांकिए, जो बरसों से किसी अपने को बचाने की जंग लड़ रहा है। हो सकता है, चेहरे पर हिम्मत हो, लेकिन भीतर सब कुछ टूट रहा हो।

याद रखिए, देखभाल करने वाले पत्थर नहीं होते। उन्हें भी थकान होती है, आंसू आते हैं और सहारे की जरूरत पड़ती है।

कभी किसी बीमार की सेवा करने वाले का हाथ थामकर कहिए- “आप थोड़ा आराम कर लो, आज हम संभाल लेंगे।”

किसी अपने को बचाते-बचाते, उसे बचाने वाला ही न टूट जाए, इस दर्द को समझना और बांटना भी इंसानियत है।

अजय प्रकाश (Ajay Prakash) जी ने एक शानदार स्टोरी की है।

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