केंद्र सरकार का डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन एक्ट (DPDP Act) अगले साल मई से लागू होने जा रहा है, लेकिन इससे पहले ही इस कानून को लेकर प्रेस की आजादी और खोजी पत्रकारिता पर गंभीर सवाल उठने लगे हैं। डिजिटल न्यूज पब्लिशर्स एसोसिएशन (DNPA) ने इस कानून के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की है। एसोसिएशन का कहना है कि कानून में पत्रकारिता के लिए स्पष्ट छूट नहीं होने से खोजी पत्रकारिता करना मुश्किल हो सकता है।
इस कानून को लेकर सबसे बड़ा सवाल यह है कि अगर कोई रिपोर्टर किसी व्यक्ति के खिलाफ भ्रष्टाचार, वित्तीय अनियमितता या किसी दूसरे मामले की पड़ताल कर रहा है, तो क्या उसे संबंधित व्यक्ति की सहमति लेनी पड़ सकती है? यदि ऐसा हुआ, तो जिस व्यक्ति के खिलाफ खबर की जांच की जा रही है, उसे पहले ही इसकी जानकारी मिल सकती है। इससे सबूत जुटाने और सच्चाई सामने लाने की प्रक्रिया प्रभावित होने की आशंका है।
मसलन, कोई पत्रकार किसी सरकारी अधिकारी की संपत्ति, किसी कारोबारी के वित्तीय लेन-देन या किसी संस्थान में कथित गड़बड़ी की जांच कर रहा है। ऐसी स्थिति में संबंधित व्यक्ति की व्यक्तिगत जानकारी जुटाने या उसका इस्तेमाल करने से पहले सहमति लेने की बाध्यता खोजी पत्रकारिता के रास्ते में मुश्किल खड़ी कर सकती है। संबंधित व्यक्ति सहमति देने से इनकार कर सकता है या जांच की जानकारी मिलने के बाद सबूतों को प्रभावित करने की कोशिश कर सकता है।
DNPA की याचिका में इसी तरह की आशंकाएं उठाई गई हैं। एसोसिएशन का तर्क है कि पत्रकारिता के लिए स्पष्ट कानूनी सुरक्षा नहीं होने पर डेटा संरक्षण से जुड़े प्रावधानों का इस्तेमाल सार्वजनिक हित में प्रकाशित खबरों को चुनौती देने के लिए किया जा सकता है। इससे भ्रष्टाचार और दूसरी अनियमितताओं को उजागर करने वाली रिपोर्टिंग प्रभावित हो सकती है।
इस विवाद का दूसरा पहलू खबरों में इस्तेमाल की गई व्यक्तिगत जानकारी और उसे हटाने की मांग से जुड़ा है। यदि किसी खबर में किसी व्यक्ति से संबंधित जानकारी प्रकाशित की गई है और वह व्यक्ति उसे हटाने की मांग करता है, तो मीडिया संस्थानों के सामने कानूनी चुनौती खड़ी हो सकती है। आशंका है कि इसका इस्तेमाल पुरानी खबरों को हटवाने या सार्वजनिक हित से जुड़े तथ्यों को सार्वजनिक मंच से हटाने के लिए भी किया जा सकता है।
डिजिटल निजता की रक्षा करना कानून का उद्देश्य है, लेकिन सवाल यह है कि इस प्रक्रिया में पत्रकारिता की स्वतंत्रता कैसे सुरक्षित रहेगी। पत्रकारों का काम केवल आधिकारिक बयानों को प्रकाशित करना नहीं, बल्कि उन मामलों की पड़ताल करना भी है जिनमें संबंधित लोग जानकारी सार्वजनिक नहीं करना चाहते।
DNPA ने सुप्रीम कोर्ट में कानून के प्रावधानों को चुनौती देते हुए पत्रकारिता के लिए स्पष्ट सुरक्षा की जरूरत उठाई है। अब इस मामले में अदालत का रुख महत्वपूर्ण होगा। फिलहाल, यह कहना सही नहीं होगा कि हर खोजी खबर के लिए संबंधित व्यक्ति की सहमति लेना अनिवार्य हो जाएगा। यह इस बात पर निर्भर करेगा कि कानून के प्रावधानों की व्याख्या किस तरह होती है और अदालत इस मामले में क्या फैसला देती है।
लेकिन DNPA की याचिका ने एक अहम सवाल जरूर खड़ा कर दिया है—अगर किसी के खिलाफ खबर की पड़ताल करने से पहले उसी की सहमति लेने की नौबत आ जाए, तो भ्रष्टाचार और अनियमितताओं का पर्दाफाश करने वाली खोजी पत्रकारिता कैसे बचेगी?
मिलिंद खांडेकर-
खोजी पत्रकारिता मुश्किल?
केंद्र सरकार ने डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन एक्ट (DPDP Act) बनाया है. यह कानून अगले साल मई से लागू होगा. डिजिटल न्यूज़ पब्लिशर्स एसोसिएशन (DNPA) ने इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका लगाई है. याचिका में दावा किया गया है कि इस कानून के बाद खोजी पत्रकारिता करना मुश्किल होगा.

यह कानून बना तो पर्सनल डेटा के प्रोटेक्शन के लिए है लेकिन पत्रकार भी इसके दायरे में आ गए हैं. तीन आपत्तियाँ हैं
रिपोर्टर किसी पर स्टोरी कर रहा है तो उस व्यक्ति से सहमति (Consent) लेनी पड़ सकती है. इसमें डर यह है कि जिस पर स्टोरी हो रही है वो सबूत नष्ट कर सकता है. वो अड़ंगा लगा सकता है.
अगर किसी व्यक्ति पर कोई स्टोरी हुई है तो वो डेटा हटाने की माँग कर सकता है. इसके चलते स्टोरी में बदलाव करना पड़ सकता है.
सरकार स्टोरी से संबंधित डेटा माँग सकती है. इससे सोर्स का पता चल सकेगा. सोर्स की पहचान सार्वजनिक होने लगे तो लोग जानकारी देने से डरेंगे.
कुल मिलाकर खोजी पत्रकारिता पर आँच आ सकती है. सुप्रीम कोर्ट में आज सुनवाई होने की संभावना है.
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