अनिल कुमार-
ज्यादा जोगी मठ उजाड़…..योगीजी की सरकार होगी कबाड़…… बेचारे पंकज चौधरी, संप्रत्ति भाजपा प्रदेश अध्यक्ष उत्तर प्रदेश, ने झोला भर के प्रदेश प्रवक्ताओं की नियुक्ति की. धर्मपाल जी भाई साहब ने भी इसी झोले में अपने अपने बंदों को सेट कर दिया. वह अपनों को बहुत अच्छा सेट करते हैं. एकदम चुपचाप. फिर दोनों लोगों, भाई साहब एवं आदरणीय भाई साहब ने डिबेट टोली की भी नियुक्ति की. कुल मिलाकर झऊआ भर प्रवक्ता और पैनलिस्ट बनाये गये. कांग्रेसी-सपाई एकदम टेंशन में आ गये कि अब तो हमलोग कइसे सेतिहाभर के लोगों से भिड़ पायेंगे? अलबत्ता बसपा को कोई फर्क नहीं पड़ा.
प्रदेश अध्यक्ष जी तो अब तक समझ नहीं पाये हैं कि वह प्रदेश अध्यक्ष हैं. हां, धर्मपाल जी भाई साहब ने समझ लिया है कि वह आदरणीय भाई साहब हैं, और अपने लोगों को सेट करने की जिम्मेदारी उनकी है, जैसे बंसल जी भाई साहब किया करते थे. बंसल जी भाई साहब भौकाल बनाकर अपने लोगों को सेट करते थे, धर्मपाल जी भाई साहब ऐड़ा बनकर पेड़ा खिला रहे हैं, अपने लोगों को. पिछड़ा पिछड़ा भी खूब खेल रहे हैं, भीतरे भीतर. तो बताना यह था कि इन दोनों भाई साहबों ने झोला भर भर के प्रवक्ता मीडिया टीम में डाले, और हम जैसे लोगों खाना वाले ब्लॉगरों की तरह ओए होए ओए होए करते रहे.
प्रदेश अध्यक्ष जी तो खैर माशाअल्लाह इतनी जिम्मेदारियों से घिरे हैं कि उनकी रूह को राहत मिलता ही नहीं दिख रहा है. वह अब तक यह समझ नहीं पाये हैं कि उनको कौन से रोल में ज्यादा अभिनय करना है. सांसद के रोल में, केंद्रीय मंत्री के रोल में या फिर प्रदेश अध्यक्ष के रोल में या फिर अपने तेल के धंधे पर प्रमुखता से फोकस करना है? कुल मिलाकर पूरा प्रदेश भाजपा संगठन ही ‘गया तेल लेने’ जैसा ही समझ में आ रहा है. उस पर भी मजा ये कि एक पैराट्रूपर जम्पर को मीडिया विभाग का प्रभारी बना दिया गया है. वह प्रभारी कहां प्रभार संभाल रहा है, पता ही नहीं चल पा रहा है.
हालत यह है कि कुल मिलकर मीडिया विभाग में एकसठ, बासठ, तिरसठ, चौसठ टाइप के प्रवक्ता, पैनलिस्ट, प्रभारी, संयोजक, आयोजक हो गये हैं, लेकिन जब पत्रकार बाइट वगैरह लेने मीडिया विभाग पहुंचते हैं तो पता चलता है कि आज मुख्य जी प्रवक्ता नहीं हैं, तो कोई प्रवक्ता काम नहीं करेगा. पहले हमको लगा कि 31 प्रवक्ता बनाये गये हैं तो 31 दिन वाले महीने में एक एक प्रवक्ता रोज दिन में बैठेगा, और मुख्य जी भाई साहब और आदरणीय भाई साहब के यहां बैठेंगे, लेकिन हालत यह है कि जंबो टीम होने के बाद भी प्रवक्ता कक्ष की कुर्सी खाली रहती है.
अच्छा, शाहरुख खान के बाद हम खुद को बहुत बड़ा हकला समझते थे, लेकिन कई नये प्रवक्ताओं को देखने के बाद लग रहा है कि हकलाने में शाहरुख खान और हम इन लोगों से पिछड़ गये हैं. इससे बड़ा मौका क्या हो सकता था कि खड़गेजी ने मोदीजी के बाप पर बयान दिया, और एक भी प्रवक्ता रोअन पीटन में शामिल नहीं हुआ. इतना बड़ा कांड होने के बाद भी मोदीजी अकेले पड़ गये, एक भी प्रवक्ता ने ‘आई हो माई-आई हो बाप-का बोलला हो खड़गे आप’ करके टीवी चैनल पर भोंकार पार कर नहीं रोया, जबकि भूपेंद्र चौधरी और तो और हमारे डा. महेंद्रनाथ पांडेय के समय में करुण क्रंदन मच गया होता.
ऐसा लग रहा है कि उत्तर प्रदेश भाजपा के लोग अब मोदीजी के बाप को अपना बाप नहीं मानकर चल रहे हैं, जबकि यही लोग थे कि जब मोदीजी की मां पर किसी ने बयान दिया था तो ‘’या हुसैन’’ टाइप खूब छाती पीट रहे थे. भोंकार पार रहे थे. कुछ लोग इतने द्रवित हो गये थे कि सुबक सुबक कर, सिसक सिसक कर मन में ही रो भी रहे थे, लेकिन खड़गे जी ने पटना में इतना बड़ा बयान मोदीजी के पिताजी के खिलाफ दिया, प्रदेश का एक भी भाजपाई जोरशोर से विरोध करने सामने नहीं आया. जो एकाध लोग बयान जारी भी किये, वह बस केवल कोरमपूर्ति कर दिये, दिल से रोअन पीटन नहीं किये.


आदरणीय फलाने जी भाई साहब शाक्य सैनी को भाजपा में पदाधिकारी बनाने में इतने मशगूल हो गये कि उन्हें ध्यान ही नहीं रहा कि सिनोद शाक्य सपा में जा चुके हैं. पर जातीय प्यार में आदरणीय भाई साहब इस कदर मदमस्त हुए कि एनआरआई यानी नॉन रेजिडेंट इंडियन की तर्ज पर पार्टी से हास्य विनोद करते हुए सिनोद शाक्य को एनआरबी यानी नॉन रेजिडेंट भाजपाई समझकर कार्यकारिणी का सदस्य बना दिया.
वाह आदरणीय भाई साहब आपका अनुराग देखकर गौतम की याद आ गई.

